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Wednesday, August 6, 2008

उजाड़ में संग्रहालय - चंद्रकांत देवताले

पुराने उम्रदराज़ दरख्तों से छिटकती छालें
कब्र पर उगी ताज़ा घास पर गिरती हैं
अतीत चौकड़ी भरते घायल हिरन की तरह
मुझमें से होते भविष्य में छलाँग लगाता है

मैं उजाड़ में एक संग्रहालय हूँ
हिरन की खाल और एक शाही वाद्य को
चमका रही है उतरती हुयी धूप

पुरानी तस्वीरें मुझ पर तोप की तरह तनी है।
भूख की छायायों और चीखों के टुकडों को दबोच कर
नरभक्षी शेर की तरह सजा -धजा बैठा है जीवित इतिहास

कल सुबह स्वतंत्रता दिवस का झंडा फहराने के बाद
जो कुछ भी कहा जायेगा
उसे बर्दाश्त करने की ताक़त मिले सबको
मैं शायद कुछ ऐसा ही बुदबुदा रहा हूँ !

Monday, July 21, 2008

पंकज चतुर्वेदी की " हिंदी "


2४ अगस्त १९७१ को इटावा में जन्मे पंकज नई पीढी के प्रतिष्ठित आलोचक और कवि हैं - और भरपूर हैं ! उन्होंने इन दो लेखकीय रूपों को एक ही व्यक्तित्व में सम्भव करने का चमत्कार कर दिखाया है। आइये मैं पढ़वाता हूँ उनकी एक विलक्षण कविता -

" हिंदी "
डिप्टी साहब आए
सबकी हाजिरी की जांच की
केवल रजनीकांत नहीं थे

कोई बता सकता है -
क्यों नहीं आए रजनीकांत ?

रजनी के जिगरी दोस्त हैं भूरा -
रजिस्टर के मुताबिक अनंतराम -
वही बता सकते हैं , साहब !

भूरा कुछ सहमते - से बोले :
रजनीकांत दिक़ हैं

डिप्टी साहब ने कहा :
क्या कहते हो ?
साहब , उई उछरौ - बूड़ौ हैं

इसका क्या मतलब है ?

भूरा ने स्पष्ट किया :
उनका जिव नागा है

डिप्टी साहब कुछ नहीं समझ पाये
भूरा ने फ़िर कोशिश की :
रजनी का चोला
कहे में नहीं है

इस पर साहब झुंझला गए :
यह कौन - सी भाषा है ?

एक बुजुर्ग मुलाजिम ने कहा :
हिंदी है हुज़ूर
इससे निहुरकर मिलना चाहिए !

Friday, July 18, 2008

मंगलेश डबराल - आयोजन

हमारे समय के बड़े कवि मंगलेश डबराल की इस कविता में मैं समकालीन कविता की कई हकीकतें एक साथ देख पाता हूं। दोस्तो आप बताएं आपका क्या खयाल है?

आयोजन

इन दिनों हर कोई जल्दी में है
लोग थोडी थोडी देर के लिए झलकते हैं अकेले पीते हुए
धुंधले आकारों जैसे वे एक - दूसरे की तरफ़ आते हैं
उनके हाथ में होता है वही अकेलेपन का गिलास
अचानक मिलने की प्रसन्नता इतने दिन न मिलने का आश्चर्य
एक दिन दूर से जाते दिखे किसी मित्र का ज़िक्र
संकट के इस दौर में बढ़ते जाते हैं खाने - पीने के आयोजन
धीमी रौशनी में छतों और दीवारों पर परछाइयां लम्बी होती जाती हैं
इससे पहले कि यह शानदार दावत
एक सस्ती-सी चिल्लाती हुई जगह में बदल जाए
इससे पहले कि खुशी सिगरेट की तरह खत्म हो
हमें चल देना चाहिए वापस इसी भीड़ में

महान मित्रताएं भी एक समय तक चलीं
अब खाली कमरे में मेज पर एक गिलास रखा है
मित्रता के मार्मिक वर्णन से भरी किताब खुली पड़ी है
कि जब अंतत: वे जुदा होने को हुए
तो देर तक कांपता रहा उनका अस्तित्व
उसके बाद वैसी मित्रता संभव नहीं हुई !

Wednesday, July 16, 2008

असद ज़ैदी - मुझसे साफ़ करने को कहा जाएगा

मुझसे साफ़ करने को कहा जाएगा
कूड़ा जो मैं फैला रहा हूँ

मेरी स्मृति इसी कूड़े में इच्छाशक्ति गई कूड़े में
भूल गया क्या था मेरा सामान कूड़ा याद रहा
ये जो अफ़सोस भरा सर लिए मैं जाता हूँ
जल्दी ही कहा जाएगा इसे फेंको
जीवन को जियो जीवन की तरह

मुझसे कहा जाएगा बेफ़िक्र हो जाओ
यह नहीं कहा जाएगा लोगों की फ़िक्र करो ताकि
वे तुम्हारी फ़िक्र करें

और एक सुबह नींद से उठ कर
मैं आज़ाद हो जाऊंगा
शरीर से छूटे पसीने की तरह आज़ाद !

Sunday, July 13, 2008

वीरेन डंगवाल की लम्बी कविता - रामसिंह

४ दिन पहले मैं पौडी के सुदूर गाँव की यात्रा पर था और पता नहीं क्यों मुझे वीरेन दा की ये कविता याद आती रही। मेरे साथ आप भी पढिये इसे। कोई २८ साल पुरानी ये कविता आज भी उतनी ही ओजस्वी और असरदार है !

दो रात और तीन दिन का सफर तय करके
छुट्टी पर अपने घर जा रहा है रामसिंह

रामसिंह अपना वार्निश की महक मारता ट्रंक खोलो
अपनी गंदी जरसी उतारकर कलफदार वरदी पहन लो
रम की बोतलों को हिफाजत से रख लो रामसिंह
वक्त खराब है खुश होओ, तनो, बस में बैठो , घर चलो !

तुम्हारी याददाश्त बढ़िया है
रामसिंह पहाड़ होते थे अच्छे मौके के मुताबिक कत्थई-सफेद-हरे में बदले हुए
पानी की तरह साफ खुशी होती थी
तुम कंटोप पहनकर चाय पीते थे पीतल के चमकदार गिलास में
घड़े में गड़ी हुई दौलत की तरह गुड़ होता था
हवा में मशक्कत करते चीड़ के पेड़ पसीजते थे फौजियों की तरह
नींद में सुबकते घरों पर गिरा करती थी चट्टानें
तुम्हारा बाप मरा करता था लाम पर अंगरेज बहादुर की खिदमत करता
मां सारी रात रोती घूमती थी
भोर में जाती चार मील पानी भरने
घरों के भीतर तक घुस आया करता था बाघ
भूत होते थे सीले हुए कमरों में
बिल्ली की तरह कलपती हुई मां होती थी
पिता लाम पर कटा करते थे
सड़क होती थी अपरिचित जगहों के कौतुक तुम तक लाती हुई
मोटर में बैठकर घर से भागा करते थे रामसिंह
बीहड़ प्रदेश की तरफ
- - -
तुम किसकी चौकसी करते हो रामसिंह?

तुम बंदूक के घोड़े पर रखी किसकी उंगली हो?
किसका उठा हुआ हाथ?
किसके हाथों में पहना हुआ काले चमड़े का नफीस दस्ताना?
जिन्दा चीज में उतरती हुई किसके चाकू की धार ?
कौन हैं वे, कौन ?
जो हर समय आदमी का नया इलाज ढूंढते रहते हैं?
जो बच्चों की नींद में डर की तरह दाखिल होते हैं?
जो रोज रक्तपात करते हैं और मृतकों के लिए शोकगीत गाते हैं?
जो कपड़ों से प्यार करते हैं और आदमी से डरते हैं?
वे माहिर लोग लोग हैं रामसिंह
वे हत्या को भी कला में बदल देते हैं

पहले वे तुम्हे कायदे से बंदूक पकड़ना सिखाते हैं
फिर एक पुतले के सामने खड़ा करते हैं
यह पुतला है रामसिंह, बदमाश पुतला इसे गोली मार दो, इसे संगीन भोंक दो
उसके बाद वे तुम्हें आदमी के सामने खड़ा करते हैं
ये पुतले हैं रामसिंह, बदमाश पुतले इन्हें गोली मार दो, इन्हें संगीन भोंक दो, इन्हें ... इन्हें.... इन्हें
तुम पर खुश होते हैं - तुम्हें बख्शीश देते हैं
तुम्हारे सीने पर कपड़े के रंगीन फूल बांधते हैं
तुम्हें तीन जोड़ा वरदी, चमकदार जूते और उन्हें चमकाने की पालिश देते हैं
खेलने के लिए बंदूक और नंगी तस्वीरें
खाने के लिए भरपेट खाना, सस्ती शराब
वे तुम्हें गौरव देते हैं और इस सबके बदले
तुमसे तुम्हारे निर्दोष हाथ और घास काटती हुई लड़कियों से बचपन में सीखे गए
गीत ले लेते हैं

सचमुच वे बहुत माहिर हैं रामसिंह
और तुम्हारी याददाश्त वाकई बहुत बढ़िया है
- - -
बहुत घुमावदार है आगे का रास्ता

इस पर तुम्हें चक्कर आएंगे रामसिंह मगर तुम्हें चलना ही है
क्योंकि ऐन इस पहाड़ की पसली पर अटका है तुम्हारा गांव

इसलिए चलो, अब जरा अपने बूटों के तस्में तो कस लो
कंधे से लटका ट्रांजिस्टर बुझा दो तो खबरें आने से पहले
हां, अब चलो गाड़ी में बैठ जाओ, डरो नहीं,
गुस्सा नहीं करो, तनो

ठीक है अब जरा आंखें बंद करो रामसिंह
और अपनी पत्थर की छत से ओस के टपकने की आवाज़ को याद करो
सूर्य का पत्ते की तरह कांपना
हवा का आसमान फड़फड़ाना
गायों का नदियों की तरह रंभाते हुए भागना
बर्फ के खिलाफ लोगों और पेड़ों का इकट्ठा होना
अच्छी खबर की तरह वसन्त का आना
आदमी का हर पल हर पल मौसम और पहाड़ों से लड़ना
कभी न भरने वाले जख्म की तरह पेट
देवदार पर लगे खुश्बूदार शहद के छत्ते
पहला वर्णाक्षर लिख लेने का रामांच
और अपनी मां का कलपना याद करो

याद करो कि वह किसका खून होता है जो उतर आता है तुम्हारी आंखों में
गोली चलाने से पहले हर बार?

कहां की होती है वह मिट्टी जो हर रोज साफ करने के बावजूद
तुम्हारे भारी बूटों के तलवे में चिपक जाती है?

कौन होते हैं वे लोग जो जब मरते हैं
तो उस वक्त भी नफरत से आंख उठाकर तुम्हें देखते हैं

आंखें मूंदने से पहले याद करो रामसिंह और चलो !

Friday, October 5, 2007

आलोक धन्वा १

नदियां

इछामती और मेघना
महानंदा
रावी और झेलम
गंगा गोदावरी
नर्मदा और घाघरा
नाम लेते हुए भी तकलीफ होती है

उनसे उतनी ही मुलाक़ात होती है
जितनी वे रास्ते में आ जाती हैं

और उस समय भी दिमाग कितना कम
पास जा पाता है
दिमाग तो भरा रहता है
लुटेरों के बाज़ार के शोर से।

बकरियां

अगर अनंत में झाडियाँ होतीं तो बकरियां
अनंत में भी हो आतीं
भर पेट पत्तियां तूंग कर वहाँ से
फिर धरती के किसी परिचित बरामदे में
लौट आतीं

जब मैं पहली बार पहाड़ों में गया
पहाड़ की तीखी चढाई पर भी बकरियों से मुलाक़ात हुई
वे काफी नीचे के गांवों से चढ़ती हुई ऊपर आ जाती थीं
जैसे जैसे हरियाली नीचे से उजड़ती जाती
गर्मियों में

लेकिन चरवाहे कहीँ नहीं दिखे
सो रहे होंगे
किसी पीपल की छाया में
यह सुख उन्हें ही नसीब है।

आलोक धन्वा की छोटी कविताओं के क्रम में ये दो कवितायेँ और ............

Wednesday, October 3, 2007

वीरेन डंगवाल की कविताई ....

कल मैंने वीरेन डंगवाल की एक कविता पोस्ट की थी जिसे बडे भाई आशुतोष जी ने सराहा। आज उसी क्रम में प्रस्तुत हैं कुछ और कवितायेँ......

नैनीताल में दीवाली

ताल के ह्रदय बले
दीप के प्रतिबिम्ब अतिशीतल
जैसे भाषा में दिपते हैं अर्थ और अभिप्राय और आशय
जैसे राग का मोह

तड़ तडाक तड़ पड़ तड़ तिनक भूम
छूटती है लड़ी एक सामने पहाड़ पर
बच्चों का सुखद शोर
फिंकती हुई चिनगियाँ
बगल के घर की नवेली बहू को
माँ से छिपकर फूल झड़ी थमाता उसका पति
जो छुट्टी पर घर आया है बौडर से

कुछ कद्दू चमकाए मैंने

कुछ कद्दू चमकाए मैंने
कुछ रास्तों को गुलज़ार किया
कुछ कविता टविता लिख दीं तो
हफ्ते भर खुद को प्यार किया

अब हूई रात अपना ही दिल सीने में भींचे बैठा हूँ

हाँ जीं हाँ वही कन फटा हूँ हेठा हूँ

टेलीफोन की बगल में लेटा हूँ
रोता हूँ धोता हूँ रोता रोता धोता हूँ
तुम्हारे कपडों से ख़ून के निशाँ धोता हूँ

जो न होना था वही सब हुवां हुवां
अलबत्ता उधर गहरा खड्ड था इधर सूखा कुआँ
हरदोई मे जीन्स पहनी बेटी को देख
प्रमुदित हुई कमला बुआ

तब रमीज़ कुरैशी का हाल ये था
कि बम फोडा जेल गया
वियतनाम विजय की ख़ुशी में
कचहरी पर अकेले ही नारे लगाए
चाय की दुकान खोली
जनता पार्टी में गया वहाँ भी भूखा मरा
बिलाया जाने कहॉ
उसके कई साथी इन दिनों टीवी पर चमकते हैं
मगर दिल हमारे उसी के लिए सुलगते हैं

हाँ जीं कामरेड कज्जी मज़े में हैं
पहनने लगे है इधर अच्छी काट के कपडे
राजा और प्रजा दोनों की भाषा जानते हैं
और दोनों का ही प्रयोग करते हैं अवसरानुसार
काल और स्थान के साथ उनके संकलन त्रय के दो उदहारण
उनकी ही भाषा में :
" रहे न कोई तलब कोई तिश्नगी बाकी
बढ़ा के हाथ दे दो बूँद भर हमे साकी "
"मजे का बखत है तो इसमे हैरानी क्या है
हमें भी कल्लैन दो मज्जा परेसानी क्या है "

अनिद्रा की रेत पर तड़ पड़ तड़पती रात
रह गई है रह गई है अभी कहने से
सबसे ज़रूरी बात।

वीरेन डंगवाल की कविताई

वीरेन डंगवाल मेरे पसंदीदा कवि हैं। उनकी "नागपुर के रस्ते " यहां पेश है। मेरी पैदायिश भी इसी शहर की है, इसलिये भी ये मेरे दिल के करीब है और मुझे वापस उसी लैंडस्केप में ले जाती है...... बहरहाल ये कविता उस कवि की जिसे हल्द्वानी वाला कबाड़ी अपना उस्ताद बताता है! अधिक जानकारी के लिए देखें http://www.kabaadkhaana.blogspot.com/)



नागपुर के रस्ते




गाडी खडी थी

चल रहा था प्लेटफार्म

गन गनाता बसंत कहीँ पास ही मे था शायद

उसकी दुहाई देती एक श्यामला हरी धोती में

कटि से झूम कर टिकाए बिक्री से बच रहे संतरों का टोकरा

पैसे गिनती सखियों से उल्लसित बतकही भी करती

वह शकुंतला

चलती चली जाती थी खडे खडे

चलते हुए प्लेटफार्म पर

तकती पल भर

खिड़की पर बैठे मुझको





सुबह कोई गाड़ी हो तो बहुत अच्छा

रात कोई गाड़ी हो तो बहुत अच्छा

चांद कोई गाड़ी हो तो सबसे अच्छा



सुबह कोई गाड़ी होती तो मैं शाम तक पहुंच जाता
रात कोई गाड़ी होती तो मैं सुबह तक पहुंच जाता


चांद कोई गाड़ी होती तो मैं उसकी खिड़की पर ठंडे ठंडे

बैठा देखता अपनी प्यारी पृथ्वी को

कहीँ न कहीँ तो पहुंच ही जाता।

आलोक धन्वा

आलोक धन्वा की छोटी कवितायेँ
मुझे आलोक धन्वा को पढना हमेशा ही अच्छा लगता है। उनकी लम्बी कवितायेँ हमेशा चर्चा के केंद्र में रही हैं और इसके चलते उनकी कुछ बेहद कलात्मक छोटी कविताओं की अनदेखी हुई है । यहाँ प्रस्तुत हैं मेरी पसंद की कुछ छोटी कवितायेँ - कवि के प्रति आभार के साथ ......

पहली फिल्म की रोशनी

जिस रात बाँध टूटा
और शहर में पानी घुसा

तुमने खबर तक नहीं ली

जैसे तुम इतनी बड़ी हुई बग़ैर इस शहर के
जहाँ तुम्हारी पहली रेल थी
पहली फिल्म की रोशनी

आस्मां जैसी हवाएं

समुद्र
तुम्हारे किनारे शरद के हैं

और तुम स्वयं समुद्र सूर्य और नमक के हो

तुम्हारी आवाज़ आंदोलन और गहराई की है

और हवाएं
जो कई देशों को पार करती हुई
तुम्हारे भीतर पहुंचती हैं
आसमान जैसी

तुम्हें पार करने की इच्छा
अक्सर नहीं होती
भटक जाने का डर बना रहता है !

शरद की रातें

शरद की रातें
इतनी हल्की और खुली
जैसे पूरी की पूरी शामें हों सुबह तक

जैसे इन शामों की रातें होंगी
किसी और मौसम में

सूर्यास्त के आसमान

उतने सूर्यास्त के उतने आसमान
उनके उतने रंग
लम्बी सडकों पर शाम
धीरे बहुत धीरे छा रही शाम
होटलों के आसपास
खिली हुई रौशनी
लोगों की भीड़
दूर तक दिखाई देते उनके चेहरे
उनके कंधे जानी -पह्चानी आवाजें

कभी लिखेंगें कवि इसी देश में
इन्हें भी घटनाओं की तरह!

पक्षी और तारे

पक्षी जा रहे हैं और तारे आ रहे हैं

कुछ ही मिनटों पहले
मेरी घिसी हुई पैंट सूर्यास्त से धुल चुकी है

देर तक मेरे सामने जो मैदान है
वह ओझल होता रहा
मेरे चलने से उसकी धूल उठती रही

इतने नम बैंजनी दाने मेरी परछाई में
गिरते बिखरते लगातार
कि जैसे मुझे आना ही नहीं चाहिए था
इस ओर !