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Tuesday, May 27, 2008

कहन

दोस्तों ये वो पहली पंक्तियाँ हैं, जिन्हें मैंने १७ की उम्र में लिखा और जिनमें कविता जैसा कुछ लगा। ये पंक्तियाँ उस समय की मेरी सबसे पक्की दोस्त सीमा को संबोधित थीं और मेरी ये एक छोटी सी बात मानने के बाद वही अब मेरी पत्नी भी है ...... तो इस तरह कविता उतनी बड़ी या महत्वपूर्ण नहीं है , जितनी ये अंतर्कथा !

कहन

मैं
कुछ कहता हूँ

तुम बैठो नदी किनारे
जैसे बैठे हैं
पत्थर

मैं बहता हूँ ......

Thursday, February 21, 2008

जीवन-राग2003-04

अनोखी सहजता वाले उस हृदय के लिए जिसने ` संगतकार ´ लिखी।यह कविताओं की एक विनम्र श्रंखला है। इसमें मैं तेरह दिनों तक रोज एक कविता आपके सम्मुख प्रस्तुत करूंगा।

आज का राग बसन्त

भीमसेन जोशी को सुनकर

इस तरह भी उतरता है बसन्त

धरती पर बेमौसम

बेवक्त


मन के भीतर बदल जाता है सभी कुछ

बाहर भले ही पत्ते झर रहे हों

भीतर कोंपलें फूटती हैं

जाड़ों की लम्बी रातों में

घोसलों में दुबकी चििड़यें आपस में कुछ पूछती हैं

भूरे से हरा हो जाता है

टिड्डों का रंग

इस तरह भी उतरता है बसन्त

जो किसी साजिश में शामिल नहीं

खून में नहीं सने हैं

जिनके हाथ

वे सभी महसूस कर सकते हैं

एक आवाज़ का हाथ पकड़कर

यों बसन्त का आना।