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Friday, July 25, 2008

अफ़ज़ाल अहमद का "एक पागल कुत्ते का नौहा"


(जीवन स्थितियों का इतना गहरा अवसाद, रचना के अनुभव में निहित तनाव की इतनी आवेगपूर्ण लय, इतना ताजगी भरा चाक्षुक बिंब विधान और पैराबल्स, काव्यात्मक तर्क का ऐसा ढांचा और इसके साथ कवि मिजाज में एक खास तरह की बेपरवाहीए अनौपचारिकता और बोहेमियनपन - मेरे मन में यह इच्छा जागी कि क्यों न इन कविताओं को हिंदी के समकालीन साहित्य संसार के सामने लाया जाए ! - विजय कुमार, पहल -45)
एक मज़दूर की हैसियत से
मैंने ज़हर की बोरी
स्टेशन से गोदाम तक उठाई
मेरी पीठ हमेशा के लिए नीली हो गई

एक शरीफ़ आदमी की हैसियत से
मैंने अपनी पीठ को सफ़ेद रंगवा लिया

एक किसान की हैसियत से मैंने एक एकड़ ज़मीन जोती
मेरी पीठ हमेशा के लिए टेढ़ी हो गई

एक शरीफ़ आदमी की हैसियत से मैंने
अपनी रीढ़ की हड्डी निकलवा कर अपनी पीठ
सीधी करवा ली

एक उस्ताद की हैसियत से मुझे
खरिया मिटटी से बनाया गया

एक शरीफ़ आदमी की हैसियत से
ब्लैक बोर्ड से

एक गोरकन की हैसियत से
मुझे लाश से बनाया गया
एक शरीफ़ आदमी की हैसियत से
मरहूम की रूह से

एक शायर की हैसियत से मैंने
एक पागल कुत्ते का नौहा लिखा

एक शरीफ़ आदमी की हैसियत से
उसे पढ़ कर मर गया !
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गोरकन - कब्र खोदने वाला
नौहा - एक तरह का शोकगीत
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फोटो - कबाड़खाने से

Sunday, June 29, 2008

शहरयार

१९३६ में जन्मे शहरयार उर्दू के विख्यात शायर हैं। यहाँ प्रस्तुत कविता के नाम से उनका एक संकलन भी है , जिस पर उन्हें १९८७ का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है।
ख़्वाब का दर बंद है
मेरे लिए रात ने
आज फ़राहम किया
एक नया मर्हला
नींदों ने ख़ाली किया
अश्कों से फ़िर भर दिया
कासा मेरी आँख का
और कहा कान में
मैंने हर एक जुर्म से
तुमको बरी कर दिया
मैंने सदा के लिए
तुमको रिहा कर दिया
जाओ जिधर चाहो तुम
जागो कि सो जाओ तुम
ख़्वाब का दर बंद है

फ़राहम - एकत्रित करके देना , मर्हला - पड़ाव , कासा - कटोरा

Monday, February 25, 2008

टामस ट्रांसट्रोमर


अधबना स्वर्ग

हताशा और वेदना स्थगित कर देती हैं
अपने -अपने काम
गिद्ध स्थगित कर देते हैं
अपनी उड़ान

अधीर और उत्सुक रोशनी बह आती है बाहर
यहाँ तक कि प्रेत भी अपना काम छोड़
लेते हैं एक-एक जाम

हमारी तस्वीरें - हिमयुगीन कार्यशालाओं के हमारे वे लाल बनैले पशु
देखते हैं दिन के उजास को
यों हर चीज़ अपने आसपास देखना शुरू कर देती है
धूप में हम चलते हैं
सैकड़ों बार
यहाँ हर आदमी एक अधखुला दरवाज़ा है
उसे हरेक आदमी के लिए बने हरेक कमरे तक ले जाता हुआ
हमारे नीचे है एक अन्तहीन मैदान

और पानी चमकता हुआ पेड़ों के बीच से -
वह झील मानो एक खिड़की है
पृथ्वी के भीतर देखने के वास्ते।

अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य



Tuesday, October 16, 2007

येहूदा आमिखाई

आंखों की उदासी और एक सफ़र की तफसील


एक अँधेरी याद है
जिस पर चीनी के बुरे की तरह बिखरा हुआ है
खेलते हुए बच्चों का शोर वहाँ

वहाँ वे चीज़ें हैं
जो दुबारा कभी नहीं बचायेंगी तुम्हें
और वहीँ
मकबरों से ज़्यादा मज़बूत वे दरवाजें हैं

वहाँ एक सुरीली धुन है
जैसी कि काहिरा के मादी में
उन चीजों के वादे के साथ जिन्हें इस वक़्त की खामोशी
नसों के भीतर ही
रोके रहने की कोशिश करती है

और वहाँ एक जगह है
जहाँ तुम दुबारा कभी नहीं लौट सकते
दिन के वक़्त
एक पेड छुपाता है इसे
रात के वक़्त
एक लैंप की रोशनी चमकाती है

मैं इससे ज़्यादा और कुछ भी नहीं कह सकता
मैं इससे ज़्यादा और कुछ भी नहीं जानता

भूलने और खुश होने के लिए
खुश होने और भूलने के लिए
इतना ही बहुत है

बाकी तो सब आंखों की उदासी है
और एक सफ़र की तफसील !

अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य
संवाद प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ' धरती जानती है ' में संकलित

Monday, October 15, 2007

हंस मानूस इंजेंत्सबरजर


खुशी


वह नहीं चाहती
कि मैं उसके बारे में कुछ बोलूं
उसे कागज पर नहीं उतारा जा सकेगा
और न ही
उसके बारे में कोई भविष्यवाणी ही की जा सकती है

वह इस सबसे अधिक कुछ है
लेकिन
मैं उसे जानता हूं
बहुत अच्छी तरह

चाहे स्थिर हो या गतिमान
वह
हर चीज को हिलाकर रख देगी

वह झूठ नहीं बोलेगी
कोहराम मचा देगी

उस अकेली से मैं अपने होने का
मतलब पाता हूं
वह मेरा तर्क है
हालांकि
मुझसे बाबस्ता नहीं है वह

वह अजीब और अडियल है
मैं उसे आसरा देता हूं और छुपाता हूं
किसी कलंक की तरह

वह भगोड़ी है
न तो दूसरों के साथ बांटने के लिए है
और न ही
खुद के पास रखने के लिए

मुझे उससे कुछ नहीं मिला
जो कुछ मेरे पास था
मैंने उसके साथ बांट लिया
लेकिन
वह मुझे छोड़ जायेगी

तब दूसरे आसरा देंगे उसे
विजय की ओर उसकी लम्बी उड़ान में
और अपनी रातों में
छुपायेंगे उसे

विक्रय मशीन

वह उसके छेद में
चार सिक्के डालता है
और अपने लिए
कुछ सिगरेट हासिल कर लेता है

वह हासिल कर लेता है
कैंसर
रंग-भेद
यूनान का राज्य
सत्ताकर
राज्यकर
व्यापारकर वगैरह
और अतिरिक्त मूल्य
मुक्त उद्यम और सकारात्मक विचारधारा

वह हासिल कर लेता है
एक बड़ी-सी लिफ्ट
बड़ा-सा व्यापार
और मनचीती लड़कियां
महान समाज
बड़े-बड़े धमाके
उल्टियाँ हर चीज बड़ी......और बड़ी........और बड़ी

वह हासिल कर लेता है
ज्यादा से ज्यादा
अपने चार सिक्कों के बदले
लेकिन पलभर के लिए
उसकी हासिल की हुई हर चीज
गायब हो जाती है
यहां तक कि सिगरेट भी

वह विक्रय मशीन की ओर देखता है
लेकिन उसे देख नही पाता
तब वह खुद को देखता है और उस एक पल के लिए
वह बिल्कुल
आदमी की तरह लगता है
और फिर जल्द ही
एक चुटकी में
वह पहले-सा हो जाता है!
ये रहीं उसकी सिगरेट

वह गायब हो चुका है- जो एक तेज़ी से बीतता हुआ पल था
-अचानक मिला एक सुख

अब वह गायब हो चुका है
चला गया है
दफन हो गया है उस कबाड़ के नीचे
जो उसे
महज चार सिक्कों के बदले मिला है!

समझदारों का गीत

अब जरूर कुछ किया जाना चाहिए
इतना हम जानते हैं
लेकिन यह बहुत जल्दी है कुछ करने को

लेकिन
अब बहुत देर हो गयी है
काफी कुछ बीत गया है दिन
ओह!
हम जानते हैं

हम जानते हैं
कि हम बहुत अच्छे हैं
और यह भी कि आगे और भी अच्छे होते जायेंगे
लेकिन यह किसी काम का नहीं
हम जानते हैं

हम जानते हैं कि हमें कोसा जायेगा
और अगर ऐसा होता है तो यह हमारी गलती नहीं है
और हम इससे पल्ला झाड़ लेंगे

हो सकता है
कि हमारे लिए अपना मुंह बंद रखना ही अच्छा हो
और यह भी कि हम इस तरह
अपना मुंह बन्द नहीं रख पायेंगे
हम जानते हैं
ओह!
हम जानते हैं

और हम यह भी जानते हैं
कि हम वास्तव में किसी की मदद नहीं कर सकते
और न ही कोई कर सकता है हमारी

और हम जानते हैं
कि हम बहुत प्रतिभावान और बुिद्धमान हैं
और `न होने` और `बेकार होने` में से कोई एक चीज़
चुनने के लिए आजाद हैं

हम जानते हैं
कि हमें इस समस्या का विश्लेषण
बहुत सावधानी से करना है
और यह भी कि हम अपनी चाय में
दो चम्मच चीनी लेते हैं
ओह!
यह सब हम जानते हैं

दमन और उत्पीड़न के बारे में भी
हम सब कुछ जानते हैं
और हम इसके सख्त खिलाफ भी हैं
और यह भी कि सिगरेट फिर गायब हो चुकी है
बाजार से

हम अच्छी तरह जानते हैं
कि देश वाकई दिक्कतों से गुज़र रहा है
और यह कि हमारे अनुमान अकसर बिल्कुल सही उतरते हैं
और यह भी
कि वे किसी काम के नहीं
और यह
कि ये सिर्फ एक बातचीत भर है
ओह!
हम जानते हैं

यह कोई ठीक बात नहीं है
कि चीजों को गिरता हुआ छोड़ दिया जाये
और हम जानते हैं
कि हम उन्हें गिरता हुआ छोड़ने जा रहे हैं

ओह!
हम जानते हैं
कि इस सबमें कुछ भी नया नहीं है
और अद्भुत है जीवन
यह सब कुछ ऐसा ही है
हम इस सबके बारे में
अच्छी तरह जानते है और उस सबके बारे में भी

हम यह भी जानते हैं और वह भी

ओह हम तो सब कुछ जानते हैं!


अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य

Sunday, October 14, 2007

कू सेंग












अब बच्चा


अब बच्चा
कुछ देख रहा है
कुछ सुन रहा है

कुछ सोच रहा है

क्या वह देख रहा है
उस तरह की चीज़ों को जैसी देखी थीं मोहम्मद ने
एक पहाड़ी गुफा में
खुदा के इलहाम के बाद?

क्या वह सुन रहा है
उन आवाज़ों को
जिन्हें नाज़रेथ के जीसस ने
अपने सिर के ऊपर बजते सुना था

जब उसका बपतिस्मा हुआ था
जार्डन के किनारे?

क्या वह खोया है
विचारों में
जैसे शाक्यमुनि खोये थे बोधिवृक्ष के नीचे?

नहीं!
बच्चा इसमें से कुछ भी नहीं
देख

सुन
और सोच रहा है

यह तो देख

सुन
और सोच रहा है
ऐसा कुछ जिसे कोई दूसरा देख

सुन
और सोच नहीं सकता

कुछ ऐसा
कि मानो एक शांत ओर अनोखा आदमी होने के नाते
ये अकेला ही ले आएगा
बहार
इस दुनिया में
सिर्फ अपने ही दम पर

तभी तो
यह मुस्करा रहा है

एक प्यारी-सी मुस्कान !

अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य
पुनश्च द्वारा प्रकाशित काव्यपुस्तिका से

Thursday, October 11, 2007

टामस ट्रांसट्रोमर


1950 के बाद से टामस ट्रांसट्रोमर लगातार स्वीडिश कविता का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा बने हुए हैं। आधुनिक स्वीडिश कविता का कोई भी जिक्र उनके बिना अधूरा होगा। नोबेल के इस देश में उनका नाम पिछले पांच दशकों से अधिक समय से न सिर्फ कवि-अनुवादक, बल्कि एक मनोविज्ञानी के रूप में भी एक स्थापित और चर्चित नाम है।


शंघाई की सड़कें

एक

पार्क में
कई लोग ध्यान से देख रहे हैं
सफेद तितलियों को
मुझे वह तितली बहुत पसन्द है
जो खुद ही जैसे सत्य का फड़फड़ाता हुआ
कोना है कोई

सूरज के उगते ही
दौड़ती-भागती भीड़ हमारे इस खामोश ग्रह को
गतिमान बना देती है
और तब पार्क भर जाता है
लोगों से

हर आदमी के पास आठ-आठ चेहरे होते हैं
नगों-से चमचमाते
गलतियों से बचने के वास्ते
हर आदमी पास एक अदृश्य चेहरा भी होता है
जो जताता है -
` कुछ है जिसके बारे में आपबात नहीं करते!`

कुछ जो थकान के क्षणों में प्रकट होता है
और इतना तीखा है
जैसे किसी जानदार शराब का एक घूंट
उसके बाद में महसूस होने वाले
स्वाद की तरह

तालाब में हमेशा हिलती-डुलती रहती हैं मछलियां
सोते में भी तैरती वे
आस्थावान होने के लिए एक मिसाल हैं -हमेशा गतिवान


दो

अब यह दोपहर है
सलेटी समुद्री हवा धुलते हुए कपड़ों-सी
फड़फड़ाती है
उन साइकिल सवारों के ऊपर
जो चले आते हैं
एक दूसरे से चिपके हुए
एक समूह में
किनारे की खाइयों से बेखबर

मैं घिरा हुआ हूं किताबी चरित्रों से
लेकिन
उन्हें अभिव्यक्त नहीं कर सकता
निरा अनपढ़ हूं मैं

और
जैसी कि उम्मीद की गई मुझसे
मैंने कीमतें चुकाई हैं
और मेरे पास हर चीज की रसीद है
जमा हो चुकी हैं
पढ़ी न जा सकने वाली ऐसी कई रसीदें
-अब मैं एक पुराना पेड़ हूं इन्हीं मुरझाई पत्तियों वाला
जो बस लटकती रहती हैं
मेरे शरीर से
धरती पर गिर नहीं पातीं

समुद्री हवाओं के तेज झोंके
इनमें सीटिया बजाते हैं।


तीन

सूरज के डूबते ही
दौड़ती-भागती भीड़ हमारे इस खामोश ग्रह को
गतिमान बना देती है

हम सब
सड़क के इस मंच पर खड़े हुए
कलाकार हैं जैसे

यह भरी हुई है लोगों से
किसी छोटी नाव के
डेक की तरह
हम कहां जा रहे हैं?
क्या वहां चाय के इतने कप हैं?
हम खुद को सौभाग्यशाली मान सकते हैं
कि हम समय पर पहुंच गए हैं
इस सड़क पर

क्लास्ट्रोफोबिया की पैदाइश को तो अभी
हजार साल बाकी है !

यहां
हर चलते हुए आदमी के पीछे
एक सलीब मंडराती है
जो हमें पकड़ना चाहती है
हमारे बीच से गुज़रना
हमारे साथ आना चाहती है

कोई बदनीयत चीज़
जो हमारे पीछे से हम पर झपटना
और कहना चाहती है -बूझो तो कौन?

हम लोग
ज्यादातर खुश ही दिखाई देते हैं
बाहर की धूप में
जबकि हम अपने घावों से रिसते खून के कारण
मर जाने वाले हैं

हम इस बारे में
कुछ भी नहीं जानते!

अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य

ईरानी कविता - फरूग फरूखजाद

ईश्वर से मुखामुखी

मेरी चमकती आंखों से दूसरी पर भाग जाने कि आतुरता
छीन कर
उन्हें सिखालाओ पर्दा करना
उन चमकीली आंखों से

हे ईश्वर
हे ईश्वर अपनी सूरत दिखलाओ
और बीन लो मेरे ह्रदय से स्वार्थ और पाप के ये कण

मत करो बर्दाश्त एक तुच्छ बांदी का विद्रोह
और दूसरे मे शरण की याचना

सुन लो मेरी गुहार
ओ समर्थ बिरले देवता !

मूल से अनुवाद : राजुला साह
तनाव अंक ९८ से साभार
टीप : अगर इस कविता के शीर्षक का अनुवाद ईश्वर से मुंहजोरी हो तो कैसा लगे ?
अनुनाद

Monday, October 8, 2007

टामस ट्रांसट्रोमर

स्मृतियां मुझ पर निगाह रखती हैं

जून की एक सुबह
यह बहुत जल्दी है जागने के लिए और दुबारा सो जाने के
बहुत देर हो चुकी है
मुझे जाना ही होगा

हरियाली के बीच जो पूरी तरह भरी हुई है स्मृतियों से

स्मृतियां -
जो निगाहों से मेरा पीछा करती हैं
वे दिखाई नहीं
घुलमिल जाती हैं अपने पसमंज़र में
गिरगिट की तरह

वे मेरे इतने पास हैं
कि चिडियों की बहरा कर देनेवाली चहचहाहट के बावजूद
मैं सुन सकता हूं
उनकी सांसों की आवाज़।



अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य

येहूदा आमीखाई

प्रेम की स्मृतियाँ

१ - छवि

हम कल्पना नहीं कर सकते
कि कैसे हम जियेंगे एक दूसरे के बिना
ऐसा हमने कहा

और तब से हम रहते हैं इसी एक छवि के भीतर
दिन-ब-दिन
एक दूसरे से दूर , उस मकान से दूर
जहाँ हमने वो शब्द कहे

अब जैसे बेहोशी की दवा के असर में होता है
दरवाजों का बंद होना और खिड़कियों का खुलना
कोई दर्द नहीं

वह तो आता है बाद में ......

२- शर्तें और स्थितियाँ

हम उन बच्चों की तरह थे जो समुद्र से बाहर आना नहीं चाहते
इस तरह नीली रातें आयीं
और फिर काली

हम क्या वापस ला पाए अपने बाक़ी के जीवन के लिए
एक लपट भरा चेहरा?
जलती हुई झाडियों सा, जो ख़त्म नहीं कर सकेगा खुद को
अपने जीवन के अखीर तक

हमने अपने बीच एक अजीब सा बंदोबस्त किया
यदि तुम मेरे पास आती हो तो मैं आऊंगा तुम्हारे पास
अजीब सी शर्तें और स्थितियाँ -
यदि तुम भूल जाती हो मुझे तो मैं तुम्हें भूल जाऊंगा
अजीब से करार और प्यारी सी बातें

बुरी बातें तो हमे करनी थीं हमारे
बाक़ी के जीवन में !

३- वसीयत का खुलना

मैं अभी कमरे में हूँ
अब से दो दिन बाद मैं देखूँगा इसे
केवल बाहर से
तुम्हारे कमरे का वह बंद दरवाज़ा
जहाँ हमने सिर्फ एक दूसरे से प्यार किया
पूरी मनुष्यता से नहीं

और तब हम मुड़ जायेंगें नए जीवन की ओर
मृत्यु की सजग तैयारियों वाले विशिष्ट तौर तरीकों के बीच
जैसे कि बाइबल में मुड़ जाना दीवार की ओर

जिस हवा में हम सांस लेते हैं उसके भी ऊपर जो इश्वर है
जिसने हमें दो आंख और पाँव दिए
उसी ने बनाया दो आत्माएं भी हमें

और वहाँ बहुत दूर
किसी दिन हम खोलेंगे इन दिनों को
जैसे कोई खोलता है वसीयत
मृत्यु के कई बरस बाद !

अनुवाद : शिरीष कुमार मौर्य
संवाद प्रकाशन से आयी पुस्तक 'धरती जानती है' से .......

येहूदा आमीखाई


समुद्र तट पर


निशाँ जो रेत पर मिलते थे
मिट गए
उन्हें बनाने वाले भी मिट गए

अपने न होने की हवा में

कम ज़्यादा बन गया और वह जो ज़्यादा था
बन जाएगा असीम
समुद्र तट की रेत की तरह

मुझे एक लिफाफा मिला
जिसके ऊपर एक पता था और जिसके पीछे भी एक पता था
लेकिन भीतर से वह खाली था
और खामोश
चिट्ठी तो कहीँ और ही पढी गई थी
अपना शरीर छोड़ चुकी आत्मा की तरह

वह एक प्रसन्न धुन
जो फैलती थी रातों को एक विशाल सफ़ेद मकान के भीतर
अब भरी हुई है इच्छाओं से और रेत से
लकड़ी के दो खम्बों के बीच कतार से टंगे
स्नान-वस्त्रों की तरह

जलपक्षी धरती को देख कर चीखते हैं
और लोग शांति को देख कर

ओह मेरे बच्चे - मेरे सिर की वे संतानें
मैंने उन्हें बनाया अपने पूरे शरीर और पूरी आत्मा के साथ
और अब वे सिर्फ मेरे सिर की संतानें हैं

और मैं भी अब अकेला हूँ इस समुद्र तट पर
रेत में कहीँ-कहीँ उगी थरथराते डंठलों वाली खर पतवार की तरह
यह थरथराहट ही इसकी भाषा है
यह थरथराहट ही मेरी भाषा है

हम दोनो के पास एक समान भाषा है !

अनुवाद : शिरीष कुमार मौर्य
संवाद प्रकाशन से आयी पुस्तक 'धरती जानती है' से ....

Sunday, October 7, 2007

नाज़िम हिकमत की कविता

इस बार वाया मंगलेश डबराल

स्त्रेस्नाय चौराहा

स्त्रेस्नाय चौराहे का गिरिजाघर बजाता है चार का गजर
हालांकि चौराहा और गिरिजाघर बहुत पहले उजड़ गए हैं

और उनकी जगह अब तान दिया गया है शहर का सबसे बड़ा सिनेमाघर
और वहाँ मैं मिलता हूँ उन्नीस वर्ष के नौजवान खुद से
उसे पहचान लेता हूँ फौरन बिना किसी अचरज के उसका फोटो तक देखे बग़ैर
हम बढाते हैं अपने हाथ लेकिन वे मिल नहीं पाते
चालीस वर्षों के आरपार
असीम समय - आर्कटिक समुद्र

बर्फ गिरने लगी है यहाँ स्त्रेस्नाय चौराहे पर
जिसका नाम अब पुश्किन चौराहा है
काँप रहा हूँ मैं ठिठुर गए हैं मेरे हाथ-पैर
हालांकि मैं पहने हुए हूँ ऊनी मोज़े और फरदार दस्ताने
बल्कि वही है मोजों और दस्तानों के बग़ैर
जूते फटे हुए चीथड़ों में पैर
उसकी जीभ पर एक खट्टे मांसल सेब की तरह है उम्र
अट्ठारह साल की एक किशोरी के पुष्ट स्तनों पर हैं उसके हाथ
उसकी आंखों में मीलों लंबे गीत हैं
और मृत्यु है बस छः फुट
और उसे नहीं मालूम क्या है उसके भविष्य के भीतर
वह तो मैं ही जानता हूँ उसका भविष्य
क्योंकि मैंने जिए हैं वे सभी विश्वास जिन्हें जियेगा वह
मैं उन शहरों में रह चुका हूँ जहाँ रहेगा वह
मैं उन औरतों से कर चुका हूँ प्रेम जिनसे करेगा वह
मैं सो चुका हूँ उन जेलों में जहाँ सोयेगा वह
मैं झेल चुका हूँ उसकी तमाम बीमारियाँ
उसकी तमाम नींदें सो चुका हूँ
देख चुका हूँ उसके तमाम स्वप्न
आखिरकार वह खो देगा सब कुछ
जो मैंने खोया है जीवन भर !

Saturday, October 6, 2007

नाज़िम हिकमत - कुछ और कवितायेँ

ये कवितायेँ भीं वाया वीरेन डंगवाल .......

रूबाईयात


जो दुनिया तुमने देखी रूमी, वो असल न थी, न कोई छाया वगैरह
यह सीमाहीन है और अनंत, इसका चितेरा नहीं है कोई अल्लाह वगैरह
और सबसे अच्छी रूबाई जो तुम्हारी धधकती देह ने हमारे लिए छोड़ी
वो तो हरगिज़ नहीं जो कहती है - सारी आकृतियाँ है परछाईयाँ वगैरह

न चूम सकूं न प्यार कर सकूं तुम्हारी तस्वीर को
पर मेरे उस शहर में तुम रहती हो रक्त मांस समेत
और तुम्हारा सुर्ख शहद वो
जो निषिद्ध मुझे
तुम्हारी वो बड़ी बड़ी आंखें सचमुच हैं
और बेताब भंवर जैसा तुम्हारा समर्पण
तुम्हारा गोरापन
मैं छू तक नहीं सकता !

नाज़िम हिकमत की दो कवितायेँ

ये अनुवाद किये है हमारे समय के सबसे बेचैन कवि वीरेन डंगवाल ने .........

तर्क

घोड़ी के सिर जैसे आकार वाला यह देश
सुदूर एशिया से चौकडियाँ भरता आता भूमध्य सागर में पसर जाने को
यह देश हमारा है

ख़ून सनीं कलाईँ भिंचे दांत नंगे पैर
धरती गोया एक बेशकीमती कालीन
यह जहन्नुम
यह स्वर्ग हमारा है

उन दरवाज़ों को बंद कर दो जो पराए हैं
वे दुबारा कभी खुले नहीं
आदमी कि आदमी पर गुलामी ख़त्म हो
यह हमारा तर्क है

रहना एक पेड की तरह अकेला मुक्त
एक वन की तरह भाईचारे में
यह बेताबी हमारी है !

अखरोट का पेड

मैं एक अखरोट का पेड हूँ गुल्हान पार्क में
मेरी पत्तियां चपल हैं चपल जैसे पानी में मछलियाँ
मेरी पत्तियां निखालिस हैं
निखालिस जैसे एक रेशमी रूमाल
उठा लो
पोंछो मेरी गुलाब अपनी आंखों में आंसू एक सौ हज़ार

मेरी पत्तियां मेरे हाथ हैं जो हैं एक सौ हज़ार
मैं तुम्हें छूता हूँ एक सौ हज़ार हाथों से
मैं छूता हूँ इस्ताम्बुल को

मेरी पत्तियां मेरी आंखें हैं, मैं देखता हूँ अचरज से
मैं देखता हूँ तुम्हें एक सौ हज़ार आंखों से, मैं देखता हूँ इस्ताम्बुल को

एक हज़ार दिलों की तरह धड़को
धड़को मेरी पत्तियों

मैं एक अखरोट का पेड हूँ गुल्हान पार्क में
न तुम ये बात जानती हो न पुलिस !

Tuesday, October 2, 2007

येहूदा आमीखाई की कवितायेँ

बम का व्यास

तीस सेंटीमीटर था बम का व्यास
और इसका प्रभाव पडता था सात मीटर तक
चार लोग मारे गए ग्यारह घायल हुए
इनके चारों तरफ एक और बड़ा घेरा है - दर्द और समय का
दो हस्पताल और एक कब्रिस्तान तबाह हुए
लेकिन वह जवान औरत जो दफनाई गई शहर में
वह रहने वाली थी सौ किलोमीटर से आगे कहीँ की
वह बना देती है घेरे को और बड़ा
और वह अकेला शख्स जो समुन्दर पार किसी देश के सुदूर किनारों पर
उसकी मृत्यु का शोक कर रह था - समूचे संसार को ले लेता है इस घेरे में

और मैं अनाथ बच्चों के उस रूदन का ज़िक्र तक नहीं करूंगा
जो पहुँचता है ऊपर ईश्वर के सिंहासन तक
और उससे भी आगे
और जो एक घेरा बनाता है बिना अंत और बिना ईश्वर का ।