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Wednesday, August 13, 2008

दोस्तों के डेरे पर एक शाम - दो कवितायें

दोस्तों के डेरे पर एक शाम - एक

बहुत कुछ नहीं रहा जब बाक़ी
हमारे जीवन में
हमने टटोली अपनी आत्मा

जैसे आटे का ख़ाली कनस्तर
जैसे घी का सूना बरतन
जैसे पैंट की जेब में छुपा दिन का
आखिरी सिक्का

बहुत कुछ नहीं रहा जब बाक़ी
हमने खंगाला अपना अंतस

जैसे तालाब को खंगाले उसकी लहर
जैसे बादल को खंगाले उसकी गरज
हमने खंगाला खुद को

और फिर
रात और दिन के बीच छटपटाती
उस थोड़ी-सी
धुंधलाई रोशनी में
हमने पाया
कि बाक़ी था अभी
कनस्तर में थोड़ा-सा आटा
बरतन में छौंकने भर का घी

जे़ब में सिगरेट के लिए पैसा
अभी बाक़ी था

बाक़ी था जीवन।


दोस्तों के डेरे पर एक शाम - दो

बहुत कुछ टूटा हमारे भीतर
और बाहर भी

रिश्ते टूटे
रिश्तों के साथ टूटे दिल
दिलों के साथ देह

इच्छाओं की भीत टूटी
खुशियों का वितान

घर टूटे हमारे
घरों के साथ सपने
सपनों के साथ नींद

बहुत कुछ टूटा जीवन में
जागते हुए काटीं हमने अपनी सबसे काली रातें
पर बचे रहे

बचे रहे हम

जैसे आकाश में तारों के निशान
जैसे धरती में जल की तरलता
जैसे चट्टानों में जीवाश्मों के साक्ष्य

बचे रहे
इस दुनियावी उथल-पुथल में
हमेशा के लिए बस गई
हमारी उपस्थिति।
1999

Wednesday, July 23, 2008

बनारस से निकला हुआ आदमी .... यात्रा वृत्तान्त

दोस्तों ये लम्बी कविता पहल ८३ में छप कर चर्चित या विवादित रही(हिन्दी में दोनों का अर्थ एक ही है शायद)। मैं पहली बार अपने ब्लॉग पर कोई आवाज़ चिपका रहा हूँ इसलिए किसी बड़े कवि की कविता इस्तेमाल न करते हुए ख़ुद पर इस प्रयोग को आजमा रहा हूँ ! मेरा स्वर बहुत अटपटा अजीब सा सुनाई देता है , बाक़ी आप बताइए कि कैसा लगा ?
अवधि : १६ मिनट २४ सेकेण्ड



Thursday, July 3, 2008

विद्वेष

आप
उसे महसूस कर सकते हैं
बातों की
धूप - छाँव में
चेहरे पर वह कुछ अलग तरह की रेखाएं
बनाता है

पहली निगाह में दिखाई भले न दे
पर धीरे - धीरे
समझ में आता है

अचानक ही जन्म नहीं लेता वह
ह्रदय में पलता है
सरीसृपों के अंडे -सा

फूटता है
वांछित गर्माहट और नमी पा कर

मादा मगरमच्छ की तरह
हमेशा तैयार मिलते हैं
उसे
संभालकर मुंह में दबाये
जीवन के प्रवाह तक
पहुंचाने वाले !

Tuesday, June 17, 2008

कवितार्थ प्रकाश

कवितार्थ प्रकाश -एक

कुछ भी कहता हो नासा
कम्प्यूटर की स्क्रीन कितनी ही झलमलाए
पर इतना तय है
कि किसी सत्यकल्पित डिज़िटल दुनिया
या फिर सुदूर सितारों से नहीं आएगी कविता
अन्तरिक्ष में नहीं मंडराएगी

आएगी हम जैसे ही आम-जनों से भरी इसी दुनिया से
बार-बार हमसे ही टकराएगी

वह उस टिड्डे के बोझ तले होगी
जिसमें दबकर धीरे से हिलती है घास
वह उस आदमी के आसपास होगी

जो अभी लौटा है सफर से
धूल झाड़ता
और उस औरत की उदग्र साँसों में भी
जिसने
उसका इन्तज़ार किया

वह उस बच्चे में होगी
जिसके भीतर
रक्त से अधिक दूध भरा है

बावजूद इस सबके इतनी कोमल नहीं होगी
वहउसमें राजनीति भी होगी
ज़रूरी नहीं कि जीत ही जाए
लेकिन वह लड़ भी सकेगी

लोग बहुत विनम्र होंगे तो वह बेकार हो जायेगी
ऐसे लोगों की कविता सिर्फ संस्कृति करने के काम आयेगी !

कवितार्थ प्रकाश-दो

काम से घर लौटते
अकसर लगता है
मुझको
कि आज बुखार आने वाला है
और यह कुछ ऐसी ही बात है
जैसे कि लगे दिमाग़ को
कोई कविता आने वाली है

अभी वह आएगा
कनपटी से शुरू होकर घेरता पूरे सिर और फिर पूरे शरीर को
उसे हमेशा ही
एक गर्म आगोश की तलाश होगी
और वह उसे मिल जाएगा

सब कुछ ठीक रहा तो अपना काम कर
कंपाता हुआ मेरे वजूद को
एकाध दिन में गुज़र भी जाएगा

(ऊपर जो कुछ भी मैंने कहा वह तो बुखार के लिए था

कविता के बारे में कहने को हमेशा ही
सब कुछ बाक़ी ही रहा ! )

Friday, June 13, 2008

जिम कार्बेट पार्क में एक शाम - एक सफ़रनामा

जिम कार्बेट नेशनल पार्क में एक शाम


यही शीर्षोक्त स्थान
जिसे मैं अपनी सुविधा के अनुसार आगे सिर्फ जंगल कहूँगा

मनुष्यों ने नहीं बनाया इसे
हमने तो चिपकाया महज एक नाम और मशहूर कर दिया
दूर परदेस तक

बताती है प्रोजेक्ट टाइगर की एक पुरानी रिपोर्ट
कि भारतीय सैलानी उतनी संख्या में बांधवगढ़, सुन्दरवन या रणथम्भौर नहीं जाते
बाघ देखने
आते हैं जितनी संख्या में यहाँ
इस अंग्रेजनामधारी संरक्षित कानन में

शायद
यह भी नाम का ही प्रताप है !

यूं इसमें कोई हर्ज़ भी नहीं
इस इलाके में कभी प्रबलप्रतापी जिम कार्बेट
उतने ही बड़े संरक्षणवादी भी थे
जितने कि शिकारी

लेकिन
डर लगता है आज
कि बरसों-बरस बाद इसी तर्ज़ और तर्क पर
एक दिन
अमरीका ही न रख दिया जाए
सारी दुनिया का नाम !

माफ करना मित्रो
फिलहाल हमें दुनिया से क्या काम ?
गूंजते हुए
सन्नाटे वाले इस जंगल में
कितनी ही ध्वनियाँ समाहित हैं जहाँ
सिवा
जिप्सी गाड़ी की हल्की घरघराहट और उत्सुक सैलानियों की
बेहद स्पष्ट फुसफुसाहट के

एक मोड़ पर आ निकलती है
पुँछ उठाए घबरायी-सी कोई नन्हीं मादा काकड़
जिसे आंग्लभाषा में
भारतीय जन बार्किंग डियर कहते हैं
और उसके ठीक पीछे उसका गर्वीला जोड़ीदार भी

घास के चौड़ में इठलाते घूमते हैं नर चीतल
और संख्या में उनसे चौगुनी लेकिन किंचित सकपकायी-सी
उनकी मादाएं

बिना बात एक बड़ी झाड़ी से सींग उलझाए उसे धकियाता जाता है
लगातार बहती लार और सुर्ख आंखों वाला
नर साम्भर

बीच-बीच में अपनी थूथन उठाए
उसांसें भर-भर सूंघते ये सब के सब मानो
टोह लेते हैं हवाओं में
तेज़ी से आते वसन्त की

अचानक ही
खिलखिला भी पड़ती है अपने साथी को छेड़ती
जीवन में पहली बार जंगल देखने आयी
जींसधारी रंगेबालों वाली एक निहायत ही अल्हड़ नवयुवती
तो उसी की उम्र का बेचारा गाइड
होठों पर अंगुली धरे खमोश रहने का इशारा करता
बेहद आकुलता से उसके हुस्न को
अपलक निहारता है!

सब यहाँ बाघ देखने आए हैं
हमारी ही दुनिया की वह खूबसूरत खूंखार और जादुई शै
जो नहीं दिखती फिलहाल तो कहीं भी
उसी के इस इलाके़ में

हमें दिखाई दे जाते हैं रास्ते की धूल में
ताज़ा बने पंजों के निशान
इन्हें देख पाना भी उतना ही रोमांचक है - सोचते हैं हम
लेकिन तभी 100 मीटर की दूरी पर जोरों से हिलने लगती है
हाथी घास
आने लगती हैं घुरघुराती-सी कुछ आवाज़ें

बताया जाता है हमें
कि यह इस अद्भुत मायावी जानवर के जोड़ा बनाने का
समय है

अकस्मात आती है सृष्टि की सबसे स्पष्ट और शाश्वत आवाज़
हम पहचान सकते हैं इसे - पृथ्वी के इतिहास में
न जाने कब से जीवन को सिरजती
अपने होने के एहसास से लरजती
एक वही अनोखी
कभी न दबाई जा सकने वाली
कामातुर आदिम पुकार

वहाँ कांपते -थरथराते दुनिया रचते
दो अनदेखे
अनोखे शरीर हैं
और बिल्कुल दम साधे हम खड़े हैं थोड़ी ही दूर पर

घास के उस घटाटोप में घुसने से साफ मना कर देती है
हमारे आगे चल रही अपने नाम ही-सी `अलबेली´
एक किशोर हथिनी
उस पर बैठा सैलानी जोड़ा अफसोस के साथ महावत को कोसता है
कि निकला जा रहा है
एक खरीदा हुआ पल बाघ को देख सकने का
किसी तरह फुसफुसा कर समझाता है महावत उन्हें
कि यह सब तो कुदरत का कारोबार है और बेहद खूंखार हो सकता है नर बाघ
इसमें इस तरह खलल पड़ने से

मुझे कोई अफसोस नहीं
भले हमने न देखा हो
पर बाघ ने आज ज़रूर हमें देखा है
यों वह रोज़ ही देखता होगा अपने इलाक़े में घुसते
हम जैसे कितने ही दर्शना भिलाषी मनुष्यों को

एक बेहद उथली और उतनी ही उजली नदी को पार करते
धीरे-धीरे लौटते आते हैं हम
जैसे वापस अपने शरीर में

शाम ढलने से पहले हमें निकल आना है
जंगल से और छोड़ देना है उसे सिर्फ बाघ और चारों तरफ फैले
उसके भव्य साम्राज्य के लिए

हमें तो लौटना है वापस
अपनी दुनिया में
जहाँ खूब सारी रोशनी है और उससे भी ज्यादा
भय

अब शायद दुबारा फिर कभी न लौटें हम यहाँ

लेकिन देखा और महसूस किया जो उस ढलती शाम में
वह ज़रूर लौटेगा
जीवन में जहाँ - जहाँ भी हम रहेंगे
वहाँ - वहाँ !

Monday, May 12, 2008

हक़

हक़
उन्हें भी था
जो
मारे गए


और हक़
उन्हें भी है जो मारे जायेंगे


ग़रीबॉ के पास
सिर्फ़
हक़ होता है
चीज़ॉ पर

चीज़ें नहीं !

दोस्तों ये भी एक बहुत पुरानी - बहुत छोटी कविता १९९२ के ज़माने की .......

Friday, May 9, 2008

शोकसभा में

आप सभी को मेरी पुरानी कवितायेँ पसंद आ रही हैं ! इसलिए १९९४ की ये एक और कविता .........

शोकसभा में

यह समय
घनीभूत पीड़ा का है
और झुके हुए सिर
इसकी
गवाही दे रहे हैं

तूफान से पहले की नहीं
तूफान के बाद की शांति है ये

अवसाद के इस क्षण में
शोक मुझको भी है

शोक
उसका नहीं उतना
जो खो गया

शोक उसका
जो खो जायेगा एक दिन
यूं ही सिर झुकाये ...

Thursday, May 8, 2008

किताबें

दोस्तो ये कविता भी 1992 की है और मुझ पर आजकल अपने अतीत को याद करने की धुन सवार है। उसी क्रम में प्रस्तुत इस कविता में उत्साह और ऊर्जा का वह रूमानी दौर भरपूर मौजूद दिखाई देगा। मेरे लिए तो ये एक बार फिर भूले-बिसरे के नजदीक भर जाना है !

किताबें

सदियों से
लिखी और पढ़ी जाती रही हैं
किताबें

किताबों में आदमी का इतिहास होता है
राजा

रियासतें
और हुकूमतें होती हैं किताबों में
जो पन्नों की तरह
पलटी जा सकती हैं

किताबों में होता है
विज्ञान
जो कभी आदमी के पक्ष में होता है तो कभी
टूटता है
कहर बनकर उस पर

कानून होता है किताबों में जो बनाया
और तोड़ा जाता रहा है

किताबों में होती हैं दुनिया भर की बातें
यहां तक कि किताबों के बारे में भी लिखी जाती हैं
किताबें

कुछ किताबें नहीं होतीं हमारे लिए
देवता वास करते हैं
उनमें
पवित्र किताबें होती हैं वे
फरिश्तासिफत इंसानों के पास

हमारी किताबों में तो बढ़ते हुए कदम होते हैं
उठते हुए हाथ होते हैं
हमारी किताबों में

और उन हाथों में होती हैं
किताबें !

Wednesday, May 7, 2008

मैं जीवित हूँ

दोस्तो ये कविता 1992 की है और मुझे इस पर 80 के बाद की पीढ़ी के कविकुलगुरु केदारनाथ सिंह का प्रभाव साफ दिखाई देता है। मैं इस कविता और इस प्रभाव को अपना अतीत मानता हूं और अतीत की ये खुरचन आपके आगे रख रहा हूं। अपनी बेबाक टिप्पणी तो देंगे न ?

मैं जीवित हूं

मैं जीवित हूं

और ये जरूरी खबर किसी अखबार में नहीं

मेरे चेहरे पर छपी है

मैं जीवित हूं

और लगा आया हूं सुबह-सुबह

बाजार का एक चक्कर

मैं भांप आया हूं मौसम और लोगों का मिजाज -

फिलहाल लोगों को काम पर जाने की जल्दी है और मौसम

उनके साथ है

मैं देख आया हूं

कि शहर के सबसे बड़े मंदिर में चल रहा है

अखंड यज्ञ

कि मस्जिद की सबसे ऊंची मीनार से आ रही है

अजान की आवाज

कि शुरू हो चुकी है गुरुद्वारे में

अरदास

देख आया हूं मैं

कि सभी दुकानों में जारी है खरीदफरोख्त

सभी तरह की

नाप आया हूं सड़कें

और हालांकि पुलिस थाना अभी तक सो रहा है

लेकिन शहर में शांति है

जो चीख-चीखकर अपने होने का पता दे रही है

मेरे शहर के लोगो !

मैं जीवित हूं और आज की तारीख में यह सचमुच एक ऐसी बात है

जिसे मैं किसी भी दूसरे आदमी से कह सकता हूं

पूरे यकीन के साथ !

Monday, May 5, 2008

पहाड़

दोस्तो ये दो कविताएं 1991 की हैं और इनका कच्चापन साफ दिखाई देता है- आप इन्हें मेरी निजी और पुरानी डायरी के दो पीले पन्ने समझ सकते हैं। पर पुराने दिनों और पुरानी उम्र को भी याद करना कभी-कभी अच्छा लगता है ! है, ना ?

एक

मैंने कभी नहीं नापी
उसकी ऊंचाई

कभी नहीं किया
आश्चर्य
उसके इतना ऊंचा होने पर

मैं तो सिर्फ उसके ऊपर चढ़ा और उतरा
उतरा और चढ़ा

और इसके सबके बाद
मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं
कि मैं
अब पहाड़ पर रह सकता हूं !



दो

मुझे याद आया
पहाड़ की धार पर बसा वो गांव
जहां
अब मैं नहीं रहता

फिर मुझे याद आए
मौसम के सबसे चमकीले दिन
और ढलानों पर फलते जंगली फलों का उल्लास
जिनका स्वाद
अब भी मेरी जीभ पर है
बिल्कुल मेरी भाषा की तरह

फिर मुझे याद आए लोग
जो कई दिनों से मेरी नींद के आसपास थे
और जिन्हें वक्त रहते पहुंचना था
अपने-अपने घर

फिर मुझे
फिर-फिर याद आया
अपना पहाड़

और मैंने पाया कि वो तो रखा हुआ है
पूरा का पूरा
मेरे दिल पर !

Saturday, May 3, 2008

एक अविवाहिता का अविस्मरण

एक अविवाहिता का अविस्मरण

जहाँ पशु-पक्षियों में भी जोड़ा बनाने का विधान हो
हमारी उस नर-मादा दुनिया में
उसने सिर्फ़ मनुष्य बनने और अकेले रहने का
विकट फैसला लिया

अपने चुने हुए एकान्त में
अपने बुने हुए सन्नाटे में
उसने चाहा कि कोई उसे तंग न करे
और यह एक ऐसी कार्रवाई थी
जिसे उसके अपने घेरे के बाहर लोगों ने
विवाह विरोधी
परिवार विरोधी
समाज विरोधी
और अंत में चल कर
स्वैराचार करार दिया

अब उसकी उम्र के पाँचवे दशक में
उसका वह एकान्त
अचानक ही घुस पड़ा है
कई-कई विस्फोटों से भरे
मेरे जीवन में

उसका वह ज़बरदस्त सन्नाटा भी
गूंजता है
मुझसे जुड़े दूसरे रिश्तों के आत्मीय कोलाहल के बीच

उसे पता नहीं
या फिर शायद जानबूझ कर वह चली आई है
एक ऐसी खतरनाक जगह पर
जो ख़ुद मुझे पाँव देने को तैयार नहीं
और जिसका
कोई स्मरण
कभी
बाक़ी न रहेगा

मालूम होना चाहिए
उसे
कि मुझ जैसा कायर कवि नहीं
उसके इस तरह
अविस्मरणीय होने की कथा तो
उस जैसा
कोई मनुष्य ही कहेगा !

Saturday, April 26, 2008

प्रधानाध्यापक निलंबित

प्रधानाध्यापक निलंबित

एक मशहूर अखबार के
स्थानीय संस्करण के पहले सफ़े पर मोटे शीर्षक में
छपी है ख़बर -
``प्रधानाध्यापक निलंबित´´

ज़िलाधीश ने अपने औंचक दौरे में पाया
कि पाठशाला में
उपस्थित नहीं थे प्रधानाध्यापक सेवकराम त्रिपाठी
और वहाँ उनकी ओर से छुट्टी की कोई अर्जी भी मौजूद नहीं थी
लिहाजा
उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाना तय हुआ

उस दिन तो क्या
लगातार पिछले तीन दिनों से पाठशाला नहीं आए थे
सेवकराम त्रिपाठी
उनके निलम्बन से बावस्ता ख़बर जो छपी

उसमें भी नहीं थी इतनी गुंजाइश
और सदाशयता
कि पता किया जा सके आखिर क्यों उपस्थित नहीं थे
सेवकराम त्रिपाठी ?

महीना भर पहले ही
विभाग के बड़े अफसर को घूस देकर
किसी तरह भविष्य निधि से अग्रिम स्वीकृत करा
अपनी तीसरी और आखिरी बिटिया का विवाह किया था उन्होंने
और अब गंगासागर जाने के बारे में सोच ही रहे थे
कि अचानक
उस बिटिया के ससुराल में दुबारा
तलब कर लिया गया
उन्हें

वे गए भागते
बिना किसी से कुछ कहे
कांपते दिल से
वहाँ जाकर अपने दशम् ग्रह जामाता के मुख से
सुना उन्होंने एक महीने के भीतर होंडा पल्सर मोटरसाइकिल
और
नोकिया एन सिरीज़ मोबाइल ला देने का
फ़रमान

वे न तो इन शब्दों
और न ही इन वस्तुओं को समझ पा रहे थे ठीक से
हालांकि
घूमने लगे थे उनके सामने टीवी में मंडराते
गुदाज़ अधनंगी लड़कियों
और रंगीनियों से बजबजाते कई सारे विज्ञापन

वे तो दरअसल पानी भी नहीं मांग सकते थे
बिटिया की चौखट पर
कंठ के लगातार सूखते चले के बावजूद
ऐसा करने से कुल की परम्परा
और मरजाद भंग होती थी

अपने अंतस में गहराती एक अजीब-सी प्यास लिए
वे लौट रहे थे
रोती-बिलखती बिटिया के घर से

उस गीली और गाढ़ी शाम में
मरे मन से बस अड्डे पर उतरकर उन्होंने बरसों बाद
अकेले में बैठकर
दो प्याला देशी शराब पी

उन्हें नहीं पता था
कि इस दुनिया में लौटने का आखिर ठीक-ठीक क्या आशय होता है

लेकिन वे लौट रहे थे

अभी कोस भर दूर ही था उनका घर कि अधराह में सीने के दर्द से तड़पकर
अपना यह लौटना बीच में रोक
सड़क के किनारे की भीगी मिट्टी में
लेट जाना पड़ा उन्हें

और वे लेट गए आकाश में तारों का आना
और
पक्षियों का लौटना देखते
उनके भीतर टूटती जा रही थी हर चीज़

और वे लेटे रहे
सुनते हुए जीवन के टूटने की कुछेक आखिरी अनाम आवाजें

दूसरे दिन मृत पाये गए
स्कूल से सौ किलोमीटर दूर अपने गाँव के बाहर
हालांकि
उनकी देह ने हार जाने से पहले घिसटकर कुछ दूर चलने की कोशिश भी की
जो दर्ज थी
सड़क किनारे की मिट्टी पर

जब दिखाई जा रही थी
उनकी देह को
उसके हिस्से की आखिरी धुआंती -सुलगती आग
ठीक उसी रात
स्थानीय संवाददाता के हवाले से
अखबार में छापी जा रही थी
यह ख़बर -
``प्रधानाध्यापक निलंबित´´

अगले रोज़ ज़िलाधीश महोदय की सुबह की चाय को
खुशनुमा बनाने के वास्ते !

Thursday, April 10, 2008

एक चश्मदीद का बयान ......

रघुवीर सहाय को याद करते हुए

मैं किसी हत्या के बारे में कुछ नहीं
जानता हुज़ूर

अलबत्ता मैं जानता हूँ उस जगह के बारे थोड़ा कुछ
जहाँ सुना है कि हत्या हुई
उस रास्ते और उससे जुड़ी उस बंद गली के बारे में भी मैं जानता हूँ
और उन आवारा कुत्तों के बारे में भी
जो भूंकते हैं
वहाँ से गुज़रते ही

लेकिन मैं हत्या के बारे में कुछ नहीं जानता

हाँ , मैं मृतक को जानता हूँ माबदौलत
उसकी अड़तीस की उम्र
उसकी पत्नी की जवान मजबूरियों
और दो बच्चों की अनभिज्ञताओ को भी मैं जानता हूँ

हुज़ूर इस दुनिया में
मैं सिर्फ़ उतना जानता और नहीं जानता हूँ
जितना जानने और नहीं जानने से मैं
बच सकता हूँ
आपकी इस महान अदालत में
अगली किसी गवाही के लिए !

Friday, March 28, 2008

ग़ज़ल

सुकूते- राह में उसके कयाम की दुनिया
बहुत हसीन है अब मेरे नाम की दुनिया

मुझे है चाह फजा में बिखर के रहने की
ये मेरे बस की नहीं है एहतिमाम की दुनिया

कहीं तो कोई मेरा जिक्रे-सुखन छेड़ेगा
किसी को भाएगी मेरे कलाम की दुनिया

मैं आज भी हूँ ज़मीने - दहर का कारिंदा
मुझे अजीज बहुत है ये काम की दुनिया

शहर की राह पे मैं बेअदब मुसाफिर हूं
शहर के पास है झूटे सलाम की दुनिया

दोस्तो उर्दू के अक्षरों में लगने वाले कई नुक्ते यहां नहीं लग पा रहे हैं - ये शायद यूनीकोड की सीमा है - आप तक बात पहुंचेगी ये उम्मीद भी है !

Sunday, March 23, 2008

शिरीष कुमार मौर्य

स्वप्न

मेरे जीवन में उतनी नींद नहीं
जितने स्वप्न हैं

बेशुमार हैं वे
और अंट नहीं पाते मेरी रातों में
शायद यही कारण है
कि मुझे मारनी पड़ जाती है दिन में भी
एकाध झपकी

मेरे हिस्से के एक छोटे-से संसार में
वे ज्यादातर अतीत से आते हैं सम्मोहित करते
और भटकते हुए
कुछ आत्मीय लोगों
और जानी-पहचानी जगहों के साथ

इस तरह
किसी और काल में घटित होते हुए
देखना उन्हें
निश्चित ही सपने से ज्यादा
कुछ है

बहरहाल ऐसे ही वे आते हैं
या मैं जाता हूँ
उन तक
कभी-कभी तो
नींद के बाद की एक जागती हुई नींद में भी

कितनी बचकानी वास्तविकता है यह
कि मैं स्वप्न देखता हूँ वैसे
जैसे
खतने के समय
चाकू चलाने से ठीक पहले
बच्चों को दिखाया जाता है
हंस का पंख