Showing posts with label नवतुरिया. Show all posts
Showing posts with label नवतुरिया. Show all posts

Saturday, August 16, 2008

किरीट मंदरियाल की कुछ और कविताएं

दोस्तो कल मैंने किरीट की तीन कविताएं लगायीं, जिन पर आप सबकी अच्छी प्रतिक्रिया भी मिली। आज उन्होंने तीन कविताएं और भेज दीं, जिनमें 15 अगस्त पर लिखी कविता भी है और वह मेरी कल की टिप्पणी पर आधारित है और एक उलाहने जैसी मुझी को समर्पित भी। यह तात्कालिक कवितानुमा संवाद मुझे तो अच्छा लगा, शायद आपको भी अच्छा लगे !

रात के सफ़र पर
(आदरणीय वीरेन डंगवाल जी के लिए)

मैं निकलूंगा
सपनों की तलछट लेकर
रात के सफ़र पर
टूटे इरादे हों कि टूटे सितारे
सब मेरे साथी होंगे

गुजरूंगा
यातनाओं के शिविर से
तो कराहूंगा नहीं
कराहने से नहीं टूटते
अंधेरे के तिलिस्म
जानता हूं मैं

हालांकि
बहुत मुश्किल है कहना कुछ भी अंधेरे के बारे में
फिर भी कहता हूं
कि जैसे मिट्टी के अंधेरे में पूरी करता है
अपनी यात्रा
एक नन्हा-सा बीज
मैं भी करूंगा

अंधेरे से गुजरने वाला
हर रास्ता
जाता है सुबह की ही तरफ
ऐसा यकीन है मेरा !


एक आत्मप्रशस्ति

फ़ौरन
खुल जाती है मेरी जुबान
जिस पर ताला लगाना
मुझे नहीं आता

खुश होता हूं तो अधिक
और गुस्सा उससे भी अधिक

लिखता हूं
हर रोज एक कविता आपत्तियों की
बांचता हूं उसे
और बनता हूं बुरा

सोचता हूं - मजबूत तने और गहरी जड़ों वाला
एक पेड़ हूं मैं
जो खिलाफ हवाओं में भी
अपने आप को
उखड़ने से रोक सकता है

और
भूल जाता हूं हमेशा
कि मेरे बहुत पास तक
आ पहुंचा है
दीमकों का काफिला !


उन्होंने कहा - 15 अगस्त 2008 की कविता
(शिरीष भाई साहब के लिए)

उन्होंने कहा
मुझमें उम्मीदें और स्वप्न ज्यादा हैं
और समय बेहद खराब और खतरनाक

बेहद खराब और खतरनाक समय में भी
देख सकता हूं स्वप्न
धर पाता हूं उम्मीद

यह तो बेशक कविता में दर्ज करने लायक बात है

उन्होंने कहा
और मैंने दर्ज कर लिया !

Friday, August 15, 2008

किरीट मंदरियाल की कविताएं

किरीट मेरे लिए व्यक्ति से ज़्यादा एक व्यक्तित्व हैं। उन्हें अपने अनुभव अभी प्राप्त करने हैं। वे अपने पहाड़ी गांव से नस-नाल आबद्ध हैं और बोलते-बतियाते उनके भीतर पहाड़ जैसे जी उठता है।
यहां उनकी कुछ कविताएं दी जा रही हैं, जो दरअसल उनके ठेठ भौगोलिक परिवेश से भिन्न कुछ भीतरी और निजी संघर्षों के छोटे-मोटे आख्यान-प्रत्याख्यान भर हैं। उनकी उम्र का नयापन या कहिए कि कच्चापन, आपको इनमें दिखेगा, जो मेरे हिसाब से इन कविताओं को एक भोला-भाला स्वर प्रदान करता है। हमारे सबसे ख़राब और ख़तरनाक समय में भी इन कविताओं में बसी उम्मीद भले बचकानी कही जाए पर लुभा भी बहुत रही है। बाक़ी आप बताइए !

इस महान सदी के आरम्भ में

इस
महान सदी के आरम्भ में
आम आदमी के लिए
शोकगीत लिखने वाले
कवियों से
मैं परिचित नहीं

मैं परिचित नहीं
अंत की घोषणा करने वाले
विद्वानों से
साहित्य के गढ़ और मठ कविता के
मेरी पहुंच से बाहर हैं

कम
बहुत ही कम और सीमित है
मेरा परिचय
और अपनी इस सीमा से बंधा मैं
खुश हूँ बहुत

खुश हूं
कि जहां रहता है आदमी
अपनी पूरी मुश्किलों और संघर्षों के साथ
मैं भी रहता हूं वहीं
और सुरक्षित है मेरी कविता भी
जीवन के उन्हीं
छोटे-बड़े दुखों और सुखों में
कहीं !

हम तुम मिलेंगे

हम-तुम मिलेंगे
इसी को शायद कहते हैं उम्मीद
सपना इसी को कहते हैं
इसी को शायद कहते हैं खुशी

तो एक उम्मीद को करने के लिए पूरा
साकार करने के लिए एक स्वप्न
पाने के लिए खुशी
हम-तुम मिलेंगे

मिलेंगे और देखेंगे तब
दुनिया
जो ज्यादा खूबसूरत होगी !



'क' से बनती है 'कोशिश'
और 'कामयाबी' भी
'क' न होता तो क्या कहलाती 'कविता' ?

क्या होता फिर प्रश्नों का
कैसे कहते फिर हम यह सब -
क्यों ?
कब ?
कैसे ?
क्या ?
कहां ?

Friday, July 25, 2008

अजेय की कवितायें



अजेय हिमाचल के सुदूर इलाके लाहौल में रहने वाले नौजवान कवि हैं। उनकी कवितायें पहल जैसी पत्रिकाओं में छपी हैं। अनुनाद उन्हें अपने साथ पा कर खुश है !


एक नदी उपभोग के लिए हमें चाहिए


एक नदी

उस में कूद जाने के लिए

एक नदी

उसमें तैरने के लिए

एक नदी

उसमें डूब जाने के लिए।


एक नदी हम सोचें

अपने आकाश और उसकी सूखती हवा के लिए

एक नदी हम खोजें

अपनी धरती

और उसकी तपती मिट्टी के लिए

एक नदी हम पोसें

अपनी ज़िन्दगी

और उसमें गायब हरियाली के लिए।


एक नदी एक मुश्त, अभी

एक चिलचिलाते समय के लिए

और पीते रहें उसे किश्तों में

आहिस्ता - आहिस्ता।


कहीं यह आखिरी कविता न हो


दोस्तो, ध्यान से सुनना

आप्त वचनों की तरह

शुद्ध हृदय से बोल रहा हूँ

आखिरी बार।


तमाम जनतांत्रिक माहौल और उदारवादी अहसासों के बावजूद

पता नहीं क्यों डर रहा हूँ

कि इसके बाद कोई कविता नहीं लिखी जाएगी

कि इस के बाद जो कुछ भी लिखा जाएगा

वह होगा

आवेदन

जहाँ तय रहेगा पहले से एक प्रपत्र

तय रहेगीं विवरणों की सीमाएं

छोटे-छोटे कॉलमों में आप केवल `हाँ ´ या `नहीं´ लिख सकेंगे

बड़ी हद `लागू नहीं´ लिख लीजिए

टीप के लिए नहीं बने होंगे हाशिए ।


अथवा होंगी

याचिकाएँ जिन्हें दायर करने के लिए आपकी एक हैसियत चाहिए

और कोई अधिसूचना या

तयशुदा कानूनी शब्दावली में कोई अध्यादेश

जिसे फौरी तौर पर पढ़ने से

लगे कि सचमुच ही जनहित में जारी किया गया है!


इसके बाद कुछ लिखा जाएगा

तो हलफनामे और अनुबंध लिखे जायेंगे

और भनक भी नहीं लगेगी

कि आपने अपने इन हाथों से अपनी कौन सी

ज़रूरी ताकतें रहन लिख दीं!


इसीलिए दोस्तों ध्यान से सुनना

बड़ी मेहनत से लिख रहा हूँ

अपने नाखून छील कर

अपनी ही पीठ पर

गोद रहा हूँ ये तल्ख तेज़ाबी अक्षर।


तुम ध्यान दोगे अगर

तो मेरी दहकती पीठ पर ठंडक उतर आएगी

दूना-चौगुना रक्त दौड़ेगा धमनियों में

स्वस्थ मज्जा से मेरी खोखली रीढ़ भर जाएगी

तुम्हारी सामूहिक उर्जा से आविष्ठ होगा

मेरा स्नायुतंत्र

तन कर सीधी खड़ी हो जाएगी मेरी संक्रमित देह

मौसम की मनमर्जि़यों के खिलाफ

चमकेंगे नए हरूफ मेरी बेचैन छाती पर


यही मौका है, दोस्तो ध्यान से सुनना

तन्मय होकर

कहीं यह आखिरी कविता न हो !

Monday, March 31, 2008

राजेन्द्र कैडा

सपनों पर किसी का जोर नहीं

न तुम्हारा, न मेरा और न ही किसी और का

कुछ भी हो सकता है वहाँ

बर्फ-सी ठंडी आग या जलता हुआ पानी

यह भी हो सकता है कि मैं डालूं अपनी कमीज की जेब में हाथ

और निकाल लूं हरहराता समुद्र - पूरा का पूरा

मैं खोलूं मुट्ठी

और रख् दूं तुम्हारे सामने विराट हिमालय

अब देखो - मैंने देखा है एक सपना

मैं एक छोटा-सा बच्चा लटकाए हुए कंधे पर स्कूल बैग

अपने पिता की अंगुली थामे भाग रहा हूं स्कूल की घंटी के सहारे

भरी हुई क्लास में

सबसे आगे बैंच पर मैं

और

तुम मेरी टीचर

कितनी अजीब-सी घूरती हुई तुम मुझे

और मैं झिझक कर करता हुआ आंखें नीची

मैंने देखा - दो और दो होते हुए पांच

और खरगोश वाली कहानी में बंदर वाली कविता का स्वाद
तुम पढ़ा रही थीं `ए´ फार `एप्पल´

और मुझे सुनाई दिया `प´ से `प्यार´

तुम फटकारती थीं छड़ी

सिहरता था मैं

खीझ कर तुमने उमेठे मेरे कान

सपनों के ढेर सारे जादुई नीले फूलों के बीच ही

मैंने देखा

मेरा ही सपना खेलता हुआ मुझसे

जब बड़े-बड़े अंडों से भरा मेरा परीक्षाफल देते हुए

तुमने कहा मुझसे - `फेल हो गए हो तुम हजारवीं बार´

और इतना कहते समय - मैंने देखा

तुम्हारी बड़ी-बड़ी आंखों में दमकता हुआ

पृथ्वी भर प्यार

और मुझे महसूस हुआ

कि वहीं कहीं आसपास शहद का छत्ता गुनगुना रहा था

धीमे से

हजार-हजार फूलों के सपनों का गीत !

दोस्तो ये बिना शीर्षक कविता एक बिलकुल नए कवि के पहले प्रेम की कविता है ! आप बताइए कैसी है !