मैं आपा के बारे में बात कर रहा हूँ जो
अम्मी के बारे में बात करती थी जो शौहर के बारे में
बात करती थीं जो उस अफसर के बारे में बात करते थे
जो देश के बारे में बात करता था जो
युद्ध के बारे में बात कर रहा था चीखते हुए उन दिनों
पाकिस्तान के बारे में फिलहाल कोई बात नहीं करूंगा !
असद जी की ये बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करने वाली छोटी -सी कविता उनके पहले संकलन " बहनें और अन्य कवितायेँ " से ...............
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Saturday, April 5, 2008
Friday, April 4, 2008
संस्कार
बीच के किसी स्टेशन पर दोने में पूड़ी साग खाते हुए
आप छिपाते हैं अपना रोना
जो अचानक शुरू होने लगता है पेट की मरोड़ की तरह
और फ़िर छिपाकर फेंक देते हैं
कहीं कोने में
अपना दोना
सोचते हैं - मुझे एक स्त्री ने जन्म दिया था
मैं यों ही
दरवाज़े से निकल कर नहीं चला आया था !
असद जी की ये अद्वितीय कविता उनके पहले संकलन " बहनें और अन्य कवितायेँ " से ...............
आप छिपाते हैं अपना रोना
जो अचानक शुरू होने लगता है पेट की मरोड़ की तरह
और फ़िर छिपाकर फेंक देते हैं
कहीं कोने में
अपना दोना
सोचते हैं - मुझे एक स्त्री ने जन्म दिया था
मैं यों ही
दरवाज़े से निकल कर नहीं चला आया था !
असद जी की ये अद्वितीय कविता उनके पहले संकलन " बहनें और अन्य कवितायेँ " से ...............
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असद जैदी
Sunday, March 30, 2008
अप्रकाशित कविता
एक कविता जो पहले ही से ख़राब थी
होती जा रही है अब और ख़राब
कोई इंसानी कोशिश सुधार नहीं सकती
मेहनत से और बिगाड़ होता है पैदा
वह संगीन से संगीनतर होती जाती स्थायी दुर्घटना है
सारी रचनाओं को उसकी बगल से
लंबा चक्कर काट कर गुज़रना पड़ता है
मैं क्या करूं उस शिथिल
सीसे सी भारी काया का
जिसके आगे प्रकाशित कवितायेँ महज़ तितलियाँ हैं
और समालोचना राख
मनुष्यों में वह सिर्फ़ मुझे पहचानती है
और मैं भी मनुष्य जब तक हूँ तब तक हूँ !
असद जी की यह कविता उनकी नई कविता पुस्तक "सामान की तलाश" से साभार.........
परिकल्पना प्रकाशन
डी - 68 , निराला नगर,
Lucknow -6
होती जा रही है अब और ख़राब
कोई इंसानी कोशिश सुधार नहीं सकती
मेहनत से और बिगाड़ होता है पैदा
वह संगीन से संगीनतर होती जाती स्थायी दुर्घटना है
सारी रचनाओं को उसकी बगल से
लंबा चक्कर काट कर गुज़रना पड़ता है
मैं क्या करूं उस शिथिल
सीसे सी भारी काया का
जिसके आगे प्रकाशित कवितायेँ महज़ तितलियाँ हैं
और समालोचना राख
मनुष्यों में वह सिर्फ़ मुझे पहचानती है
और मैं भी मनुष्य जब तक हूँ तब तक हूँ !
असद जी की यह कविता उनकी नई कविता पुस्तक "सामान की तलाश" से साभार.........
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