Saturday, October 29, 2011

श्रीलाल शुक्ल नहीं रहे

 श्रीलाल शुक्ल नहीं रहे. राग दरबारी रहेगा. उनके न रहने की सूचना एक आघात है लेकिन उनका रचा हुआ एक विरासत. कितने दिन ऐसे गुज़रते हैं जब राग दरबारी के दृश्य एक एक कर आँखों के आगे खड़े हो जाते हैं. कभी सामान्य ज़िन्दगी जीते हुए और कभी किसी भंवर में फंसे हुए. कभी समकालीन समाज और राजनीति से अपने अपने हिस्से का संवाद करते हुए. और कभी अपने ही कुछ टूटे हुए हिस्से जोड़ते हुए. साहित्य के दिनों दिन सीमित होते जाते घेरे के बाहर भी वे उतने ही लोकप्रिय हैं. मेरे विश्वविद्यालय में इतिहास के  अग्रज  प्रोफ़ेसर अनिल जोशी के बैग में राग दरबारी ज़रूर होता है. वे कुछ भी भूल जाएँ पर रोज़ इस किताब को अपने साथ रखना नहीं भूलते और जीवन और नौकरी की जटिलताओं में अक्सर उसका कोई प्रसंग छेड़ बैठते हैं.

कथा के इस कालजयी चितेरे का कविता से प्रेम भी किसी से छुपा नहीं है. लिहाजा कविता की यह पत्रिका अनुनाद अपने इस अद्भुत बुज़ुर्ग को अपना सलाम पेश करती है. जब तक हममें सही साहित्य पढने की बुद्धि सलामत रहेगी तब वे हमेशा हमारे साथ रहेंगे...हमारे सिरहाने उनका हाथ रहेगा.   

फोटो hindini.com से साभार

Thursday, October 27, 2011

प्रो. रामदयाल मुंडा की स्‍मृति और रीता जो की कविता - यादवेन्‍द्र

प्रो रामदयाल मुंडा
पिछले दिनों देश की आदिवासी संस्कृति के बड़े विद्वान और पैरोकार 72 वर्षीय प्रो. रामदयाल मुंडा का निधन हो गया पर बड़े समाचार माध्यमों में इस घटना की कहीं कोई गूंज नहीं सुनाई दी.झारखण्ड प्रदेश की परिकल्पना को व्यवहारिक रूप देने वाले विचारकों में प्रो.मुंडा अग्रणी थे, रांची विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर भी रहे. कहा जाता है कि प्रो. मुंडा का कमरा झारखण्ड के युवा नेतृत्व का उदगम और प्रशिक्षण स्थल रहा.आदिवासी समाज,संस्कृति और भाषाओं पर उनका काम देश में काम और विदेशों में ज्यादा समादृत था इसी लिए अमेरिका सहित अनेक देशों में वे अध्यापन कार्य करते रहे. वे एक स्वतः स्फूर्त गायक के रूप में भी जाने जाते थे.उनकी इन्ही विशेषज्ञताओं की बदौलत उन्हें पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी की सस्यता से सम्मानित किया गया.कुछ समय पहले उन्हें राज्य सभा के सदस्य के रूप में नामित किया गया था.अपने विचारों के प्रचार प्रसार के लिए पहले उन्होंने खुद अपना एक दल बनाया पर संगठन का अनुभव न होने के कारण उसको उन्हें शिबू सोरेन के दल झारखण्ड मुक्ति मोर्चा में शामिल करना पड़ा.वहाँ भी उनको जब कोई सार्थक काम होता हुआ नहीं दिखा तो कांग्रेस में शामिल हो गए.

उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि आदिवासी समाज के दस करोड़ सदस्यों को जबरन हिन्दू या ईसाई समुदाय के अंदर समाहित करने की साजिश आजादी के बाद से की जाती रही है.उनकी आराधना पद्धति प्रकृति पूजा की है और उन्हें देश के छह धार्मिक समुदायों से अलग मान्यता मिलनी चाहिए...उनकी धार्मिक मान्यता को नयी पहचान प्रदान करने के लिए उन्होंने आदि धर्म का आन्दोलन शुरू किया था...इसी नाम से उन्होंने आदिवासियों की प्रचलित आराधना पद्धतियों को संकलित करते हुए एक किताब भी लिखी थी. यहाँ प्रो. राम दयाल मुंडा को स्मरण करते हुए मुझे कनाडा के आदिवासी समुदाय की प्रमुख कवियित्री रीता जो की एक प्रसिद्ध कविता याद आ रही है:



मुझे भूल गया बोलना बतियाना

रीता जो


मुझे भूल गया बोलना बतियाना
जब मैं छोटी बच्ची थी
और स्कूल में पढ़ती थी
तब तुम जाने कब इसको उठा ले गए थे.

तुम मेरे बोलने बतियाने को मुझसे छीन कर भाग गए थे
अब मैं तुम्हारी तरह बोलती हूँ
अब मैं तुम्हारी तरह सोचती हूँ
अब मैं तुम्हारी तरह कामधाम करती हूँ
अपनी दुनिया के बारे में ही नृत्य करते हुए
कई बार डांवाडोल और लड़खड़ा जाती हूँ.

अब मैं दो तरीकों से बतियाती हूँ
पर दोनों तरीकों में कहती एक ही बात हूँ
कि तुम्हारा ढब ढंग मुझसे कहीं ज्यादा बेहतर है.

अब मैं हौले से बढाती हूँ अपना हाथ
और कहती हूँ तुमसे
मुझे वापिस ढूंढ़ने दो अपना बोलना बतियाना
जिस से मैं समझा सकूँ
तुम्हें कि आखिर मैं हूँ कौन.


प्रस्तुति: यादवेन्द्र

Wednesday, October 26, 2011

नैनीताल में दीवाली - वीरेन डंगवाल

( अनुनाद के सभी पाठकों को दीपावली की शुभकामनाएं )

ताल के ह्रदय बले
दीप के प्रतिबिम्ब अतिशीतल
जैसे भाषा में दिपते हैं अर्थ और अभिप्राय और आशय
जैसे राग का मोह

तड़ तडाक तड़ पड़ तड़ तिनक भूम
छूटती है लड़ी एक सामने पहाड़ पर
बच्चों का सुखद शोर

फिंकती हुई चिनगियाँ
बगल के घर की नवेली बहू को
माँ से छिपकर फूलझड़ी थमाता उसका पति
जो छुट्टी पर घर आया है बौडर से
***

Friday, October 14, 2011

बल्‍ली सिंह चीमा को बधाई

केन्‍द्रीय हिंदी संस्‍थान ने बल्‍ली सिंह चीमा को पुरस्‍कार देने का निर्णय लिया है। हमारी जानकारी में एक अरसे के बाद हिंदी संस्‍थान ने किसी जनकवि को सम्‍मानित करने की ओर कदम बढ़ाए हैं। अनुनाद इस फैसले का स्‍वागत करता है और बल्‍ली सिंह चीमा को बधाई देता है। उन्‍हें मानपत्र तथा एक लाख रूपए की पुरस्‍कार राशि प्रदान की जाएगी। जीवनसंघर्षों और जनआन्‍दोलनों में जि़न्‍दगी गुज़ार देने इस कवि के लिए अब पुरस्‍कार महत्‍व नहीं रखते, तब भी हम जैसे उनके चाहने वालों के लिए यह ख़ुशी का मौका है। यहां प्रस्‍तुत हैं उनके दो गीत कविताकोश से साभार।

1

मैं अमरीका का पिठ्ठू और तू अमरीकी लाला है
आजा मिलकर लूटें–खाएँ कौन देखने वाला है
मैं विकास की चाबी हूँ और तू विकास का ताला है
सेज़ बनाएँ, मौज़ उड़ाएँ कौन पूछ्ने वाला है

बरगर-पीजा खाना है और शान से जीना-मरना
ऐसी–तैसी लस्सी की, अब पेप्सी कोला पीना है
डॉलर सबका बाप है और रुपया सबका साला है
आजा मिलकर लूटें–खायें कौन देखने वाला है

फॉरेन कपड़े पहनेंगे हम, फॉरेन खाना खायेंगे
फॉरेन धुन पर डाँस करेंगे, फॉरेन गाने गायेंगे
एन०आर०आई० बहनोई है, एन०आर०आई० साला है
आजा मिलकर लूट मचाएँ, कौन देखने वाला है

गंदा पानी पी लेते हैं, सचमुच भारतवासी हैं
भूखे रहकर जी लेते हैं, सचमुच के सन्यासी हैं
क्या जानें ये भूखे–नंगे, क्या गड़बड़-घोटाला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

रंग बदलते कम्युनिस्टों को अपने रंग में ढालेंगे
बाक़ी को आतंकी कहकर क़िस्सा ख़तम कर डालेंगे
संसद में हर कॉमरेड जपता पूंजी की माला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

पर्वत, नदिया, जंगल, धरती जो मेरा वो तेरा है
भूखा भारत भूखों का है, शाइनिंग इंडिया मेरा है
पूंजी के इस लोकतंत्र में अपना बोलम–बाला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

तेरी सेना, मेरी सेना मिलकर ये अभ्यास करें
हक़-इन्साफ़ की बात करे जो उसका सत्यानाश करें
एक क़रार की बात ही क्या सब नाम तेरा कर डाला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

मैं अमरीका का पिठ्ठू और तू अमरीकी लाला है
आजा मिलकर लूटें–खाएँ कौन देखने वाला है
मैं विकास की चाबी हूँ और तू विकास का ताला है
सेज़ बनाएँ, मौज़ उड़ाएँ कौन पूछ्ने वाला है

***

2

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के
अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के

कह रही है झोपडी औ' पूछते हैं खेत भी
कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के

बिन लड़े कुछ भी नहीं मिलता यहाँ ये जानकर
अब लड़ाई लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के

कफ़न बाँधे हैं सिरों पर हाथ में तलवार है
ढूँढने निकले हैं दुश्मन लोग मेरे गाँव के

हर रुकावट चीख़ती है ठोकरों की मार से
बेडि़याँ खनका रहे हैं लोग मेरे गाँव के

दे रहे हैं देख लो अब वो सदा-ए-इंक़लाब
हाथ में परचम लिए हैं लोग मेरे गाँव के

एकता से बल मिला है झोपड़ी की साँस को
आँधियों से लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के

देख 'बल्ली' जो सुबह फीकी दिखे है आजकल
लाल रंग उसमें भरेंगे लोग मेरे गाँव के
***

Friday, October 7, 2011

टामस ट्रांसट्रोमर (तोमास त्रांसत्रोमर) की कविताएं

1950 के बाद से टामस ट्रांसट्रोमर (तोमास त्रांसत्रोमर) लगातार स्वीडिश कविता का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा बने हुए हैं। आधुनिक स्वीडिश कविता का कोई भी जिक्र उनके बिना अधूरा होगा। नोबेल के इस देश में उनका नाम पिछले पांच दशकों से अधिक समय से न सिर्फ कवि-अनुवादक, बल्कि एक मनोविज्ञानी के रूप में भी एक स्थापित और चर्चित नाम है। उन्‍हें अब जाकर नोबेल मिला है, अनुनाद इस फ़ैसले का स्‍वागत करता है।

 विश्वकविता में अपना एक विशिष्ट स्थान रखने वाले स्वीडिश कवि टॉमस ट्रांसट्रॉमर का जन्म 15 अप्रैल 1931 को हुआ। उनका बचपन अपनी के मां के साथ एक श्रमिक बस्ती में बीता। एक विद्यार्थी के रूप में उन्होंने मनोविज्ञानी की उपाधि प्राप्त की और संगीत से भी उन्हें बेहद लगाव रहा। इन सब बातों का प्रभाव उनकी कविता पर पड़ा, जहाँ मौजूद भीतरी और बाहरी संसार पाठकों को बरबस ही अपनी ओर खींचता है। यहां प्रस्‍तुत हैं उनकी कुछ कविताएं मेरे अनगढ़ अनुवाद में।

अधबना स्‍वर्ग


हताशा और वेदना स्थगित कर देती हैं
अपने-अपने काम
गिद्ध स्थगित कर देते हैं
अपनी उड़ान

अधीर और उत्सुक रोशनी बह आती है बाहर
यहाँ तक कि प्रेत भी अपना काम छोड़
लेते हैं एक-एक जाम

हमारी बनाई तस्वीरें -
हिमयुगीन कार्यशालाओं के हमारे वे लाल बनैले पशु
देखते हैं
दिन के उजास को

यों हर चीज़ अपने आसपास देखना शुरू कर देती है
धूप में हम चलते हैं सैकड़ों बार

यहाँ हर आदमी एक अधखुला दरवाज़ा है
उसे
हरेक आदमी के लिए बने
हरेक कमरे तक ले जाता हुआ

हमारे नीचे है एक अन्तहीन मैदान
और पानी चमकता हुआ
पेड़ों के बीच से -

वह झील मानो एक खिड़की है
पृथ्वी के भीतर
देखने के वास्ते।
***


स्मृतियां मुझ पर निगाह रखती हैं

जून की एक सुबह
यह बहुत जल्दी है जागने के लिए और दुबारा सो जाने के
बहुत देर हो चुकी है
मुझे जाना ही होगा
हरियाली के बीच जो पूरी तरह भरी हुई है स्मृतियों से
स्मृतियां -
जो निगाहों से मेरा पीछा करती हैं
वे दिखाई नहीं
घुलमिल जाती हैं अपने पसमंज़र में
गिरगिट की तरह

वे मेरे इतने पास हैं
कि चिडियों की बहरा कर देनेवाली चहचहाहट के बावजूद
मैं सुन सकता हूं
उनकी सांसों की आवाज़।
***

शंघाई की सड़कें

एक

पार्क में
कई लोग ध्यान से देख रहे हैं
सफेद तितलियों को
मुझे वह तितली बहुत पसन्द है
जो खुद ही जैसे सत्य का फड़फड़ाता हुआ
कोना है कोई

सूरज के उगते ही
दौड़ती-भागती भीड़ हमारे इस खामोश ग्रह को
गतिमान बना देती है
और तब पार्क भर जाता है
लोगों से

हर आदमी के पास आठ-आठ चेहरे होते हैं
नगों-से चमचमाते
गलतियों से बचने के वास्ते
हर आदमी पास एक अदृश्य चेहरा भी होता है
जो जताता है -
" कुछ है जिसके बारे में आप बात नहीं करते!"

कुछ जो थकान के क्षणों में प्रकट होता है
और इतना तीखा है
जैसे किसी जानदार शराब का एक घूंट
उसके बाद में महसूस होने वाले
स्वाद की तरह

तालाब में हमेशा हिलती-डुलती रहती हैं मछलियां
सोते में भी तैरती वे
आस्थावान होने के लिए एक मिसाल हैं -हमेशा गतिवान

दो

अब यह दोपहर है
सलेटी समुद्री हवा धुलते हुए कपड़ों-सी
फड़फड़ाती है
उन साइकिल सवारों के ऊपर
जो चले आते हैं
एक दूसरे से चिपके हुए
एक समूह में
किनारे की खाइयों से बेखबर

मैं घिरा हुआ हूं किताबी चरित्रों से
लेकिन
उन्हें अभिव्यक्त नहीं कर सकता
निरा अनपढ़ हूं मैं

और
जैसी कि उम्मीद की गई मुझसे
मैंने कीमतें चुकाई हैं
और मेरे पास हर चीज की रसीद है
जमा हो चुकी हैं
पढ़ी न जा सकने वाली ऐसी कई रसीदें
-अब मैं एक पुराना पेड़ हूं इन्हीं मुरझाई पत्तियों वाला
जो बस लटकती रहती हैं
मेरे शरीर से
धरती पर गिर नहीं पातीं

समुद्री हवाओं के तेज झोंके
इनमें सीटिया बजाते हैं।

तीन

सूरज के डूबते ही
दौड़ती-भागती भीड़ हमारे इस खामोश ग्रह को
गतिमान बना देती है

हम सब
सड़क के इस मंच पर खड़े हुए
कलाकार हैं जैसे

यह भरी हुई है लोगों से
किसी छोटी नाव के
डेक की तरह
हम कहां जा रहे हैं?
क्या वहां चाय के इतने कप हैं?
हम खुद को सौभाग्यशाली मान सकते हैं
कि हम समय पर पहुंच गए हैं
इस सड़क पर

क्लास्ट्रोफोबिया की पैदाइश को तो अभी
हजार साल बाकी है !

यहां
हर चलते हुए आदमी के पीछे
एक सलीब मंडराती है
जो हमें पकड़ना चाहती है
हमारे बीच से गुज़रना
हमारे साथ आना चाहती है

कोई बदनीयत चीज़
जो हमारे पीछे से हम पर झपटना
और कहना चाहती है -बूझो तो कौन?

हम लोग
ज्यादातर खुश ही दिखाई देते हैं
बाहर की धूप में
जबकि हम अपने घावों से रिसते खून के कारण
मर जाने वाले हैं

हम इस बारे में
कुछ भी नहीं जानते!
***


शुबेर्तियाना


1
न्यूयार्क से बाहर एक ऊँची जगह पर
जहाँ से एक ही निगाह में आप पहुँच जाते हैं
उन घरों के भीतर
जहाँ रहते हैं अस्सी लाख लोग

विशाल शहर के पार तक
वहाँ एक लम्बा चमकीला बहाव है -
दिखाई देती है
एक छल्लेदार आकाशगंगा
जिसके भीतर
मेज़ों पर खिसकाए जा रहे हैं काफी के मग
दुकानों की खिड़कियों की गुहार
और बेनिशान जूतों का गुज़र
ऊपर को चढ़ती लपकती भागती आग
स्वचालित सीढ़ियों के ख़ामोश द्वार
तीन तालों वाले दरवाज़ों के पीछे उमड़ता
आवाज़ों का हुजूम

एक दूसरे से जुड़ी कब्रों-से भूमिगत रेल के डिब्बों में
एक दूसरे पर लदे
ऊँघते बदन

मैं जानता हूँ इस जगह की यह सांख्यिकी भी
कि इस एक पल
वहाँ कहीं किसी कमरे में
बजाया जा रहा है शुबेर्त संगीत
और वह जो बजा रहा है इसे
उसके लिए तो बाक़ी की हरेक चीज़ के बरअक्स
कहीं अधिक वास्तविक हैं
उसके सुर

2
दूर तक फैले वृक्षविहीन मैदानों-से मानवमस्तिष्क
इतनी बार मोड़े और तहाए जा चुके हैं
कि समा जाएँ एक मुट्ठी में भी

अप्रैल में एक अबाबील लौटती है
अपने पिछले बरस के घोंसले की तरफ
ठीक उसी छत के तले
ठीक उसी दाने-पानी तक
ठीक उसी कस्बे में

सुदूर दक्षिण अफ्रीका से वह उड़ती है
दो महाद्वीपों को पार करती
छह हफ्तों में
पहुँचने को
भूदृश्य में खोते हुए ठीक इसी बिन्दु तक

और आदमी जो इकट्ठा करता है
जीवन भर से आए संकेतों को पञ्चतारवाद्य साजिन्दों के
मामूली तारों में

वह जिसे मिल गई है एक नदी सुई की आँख में से गुज़ार पाने को
औरों से घिरा बैठा एक नौजवान आदमी है
उसके दोस्त पुकारते थे उसे `मशरूम` कहकर
जो चश्मा पहने ही सो जाता था
और हर सुबह नियम से खड़ा दिखाई देता था
अपनी लिखने की ऊँची मेज़ पर
जब उसने यह किया
कि अद्भुत अष्टपाद रेंगने लगे पन्ने पर

3
पाँच साज़ बजते हैं
गर्म लकड़ियों के बीच से मैं घर लौटता हूँ
जहाँ मेरे पाँवों के नीचे पृथ्वी किसी स्प्रिंग -सी महसूस होती है
गुड़ीमुड़ी किसी अजन्मे बच्चे-सी
नींद में
निर्भार लुढ़कती भविष्य की ओर
अचानक मैं जान जाता हूँ
कि पेड़-पौधे भी कुछ सोचते हैं

4
जिए हुए हर पल में हम कितना विश्वास रखें!
कि गिरे नहीं धरती से

चट्टानों से उल्टी लटकती बर्फ पर विश्वास रखें
विश्वास रखें अनकहे वादों पर
और समझौते की मुस्कानों पर
विश्वास रखें कि टेलीग्राम जो आया है उसका हमसे कोई सम्बन्ध नहीं
और यह भी कि हमारे अन्दर
कुल्हाड़ी के प्रहार-सा औंचक
कोई आघात नहीं लगा
गाड़ी के उस घूमनेवाले लोहे पर विश्वास रखें
जिस पर सवार हो
हम सफर करते हैं लोहे की तीन सौ गुना बड़ी मधुमिक्खयों के
झुंड के बीच
लेकिन यह सब उतना कीमती नहीं
जितना कि वह विश्वास जो हमारे पास है

पाँच तारों वाले साज कहते हैं
हम किसी और चीज़ को विश्वास में ले सकते हैं
और वे हमारे साथ सड़क पर घूमते हैं
और जब बिजली का बल्ब सीढ़ियों पर जाता है
और हाथ उसका अनुसरण करते हैं उस पर विश्वास करते हुए
रेल की पटरियों पर दौड़ती हाथगाड़ी की तरह
जो अंधेरे में अपनी राह तलाश लेती है

5
हम सब पियानो के स्टूल के गिर्द इकट्ठे हैं और बजा रहे है उसे
चार हाथों से आइने में देखकर
एक ही गाड़ी को चलाते दो ड्राइवरों की तरह
यह थोड़ा बेहूदा दीखता है
यह ऐसा दीखता है जैसे हमारे हाथ आवाज़ से बने भार को
एक दूसरे के बीच अदल-बदल रहे हों
इस तरह जैसे असली वजन को साधा जाता है
किसी बड़े तराजू का सन्तुलन बनाने को
हर्ष और विषाद का भार बिल्कुल एक-सा है
एनी ने कहा -`` यह संगीत एक शानदार गाथा है`
वह सही कहती है

लेकिन वे जो इसे बजाते हुए आदमी को देखते हैं
ईर्ष्या के साथ
और खुद की प्रशंसा करते हैं हत्यारा न बनने के लिए,
नहीं खोज पाते खुद को इस संगीत में
वे जो खरादोफरोख़्त करते हैं दूसरों की
और मानते हैं कि हर किसी को ख़रीदा जा सकता है धरती पर
ख़ुद को यहाँ नहीं पाते

यह उनका संगीत नहीं
वह लम्बी सुरीली धुन जो बच जाती है इसके सभी रूपाकारों के बीच
कभी चमकती तो कभी सौम्य
कभी रूखी और ताकतवर
घोंघे के चलने पर पीछे छूटी लकीर और लोहे के तार-सी

यह बेकाबू सी गुनगुनाहट सुनाई देती है
यह क्षण
जो हमारे साथ है
ऊपर को उठता किसी गहराई में।
_____________________________________________________________
शुबेर्तियाना - फ्रैंज़ शुबेर्त (1797-1828) द्वारा अविष्कृत संगीत। शुबेर्त एक आस्ट्रियन संगीतकार थे। सिर्फ 31 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया, लेकिन उनके 600 के लगभग गीतों ने उन्हें अपने वक़्त के महान संगीतकारों में शुमार करा दिया। उपर्युक्त कविता उन्हीं की संगीतरचनाओं पर एक रहस्यात्मक लेकिन ऐंद्रिक काव्यात्मक प्रतिक्रिया है।

अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य

Wednesday, October 5, 2011

सिद्धान्त मोहन तिवारी की तीन कविताएं

यहां मेरे पास सिद्धान्त मोहन तिवारी की तीन कविताएं हैं। बनारस से व्योमेश शुक्ल के बाद एक और प्रतिभा युवा कविता में दखल के लिए एकदम तैयार है। एक अलग रंग, अलग तबीयत पर तरबीयत कुछ व्योमेश जैसी। दोनों की कविता में कुछ साम्य भी भाषा-शिल्प को लेकर दिखेगा पर मेरे ख़याल से ये सिर्फ़ शुरूआती प्रभाव है। इन कविताओं में एक अलग मुहावरा है। ये मुहावरा अपने समय और स्थानीय और निजी संघटनाओं से उपजा मुहावरा है। इन तीनों कविताओं में वह दिखेगा। इनके सामाजिक-राजनीतिक आशय भी स्पष्ट हैं, जिसकी मैं किसी भी कविता से उम्मीद करता हूं। एकाध अपवाद को छोड़ दें तो ये कविताएं भाषा में छुपाकर किसी रहस्य या मुश्किल का निर्माण नहीं करतीं, बल्कि उसे और खोलती हैं। यहां आकर सिद्धान्त की कविताएं कठिनाई के कवि* व्योमेश से कुछ अलग राह पकड़ती है। इनमें एक बौद्धिकता तो है पर उसे पार कर जानेवाली अनिवार्य बेबाकी भी। इन कविताओं की पठनीयता में कोई अवरोध नहीं। पाठक इन्हें और इनमें छुपे ज़रूरी सामाजिक सूत्रों को बिना किसी आलोचकीय व्याख्या के पकड़ सकता है।  कवि को मेरी शुभकामनाएं और अनुनाद पर स्वागत। हमारे दोस्त अनुराग ने सिद्धांत को सबद पर पहली बार प्रकाशित किया था, इस पोस्ट को इस लिंक पर देखिये.
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* इधर व्योमेश की कविता को दिया जाने वाला एक फतवा.
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रंग

मुझे प्रेम नहीं हुआ, कभी
मेरा प्रेम एक अलग निकाय था

जिसकी सारी ऊष्मा उसी में रहती थी

मुझे रंग चाहिए थे
ढेर सारे
एक बड़े पुलिंदे में

क्योंकि मेरे प्रेम की अनुभूति रंग से ही निर्धारित हुई थी

वहाँ काला रंग कहीं नहीं था
सफ़ेद, यदि था तो वह सफ़ेद नहीं हो रहा था
उसे हो जाना था कुछ और
लाल
मेरे सामने एक लाल नंगा युवक था
हाथ में था उसके एक ब्रश
उस ब्रश को एक लाल फूल को और ज़्यादा लाल करना था

मेरे लिए
जिस तरह एक हरी औरत थी
बाँस के तने को और ज़्यादा हरा कर रही थी

उसके लिए
एक पीला बच्चा भी तो था
वह किसी सूरजमुखी पर नहीं था
वह घास के पीले फूलों पर बैठा था
लगा था
पूरे मन से
अपनी ऊंगली से पोता-पाती में व्यस्त

एक नीला हिजड़ा था
एक सफ़ेदपोश को नारंगी रंग में रंगते हुए
चटख नारंगी

यह सारा खेल अनुभूति की सड़क की
क्यारियों में हो रहा था

वह सड़क अब प्रेम की सड़क है
नहीं, रंग की सड़क
सड़क का रंग 'बदरंग' था
वह 'बदरंग' मटमैला था

मेरा आईना था
थी
है

तुम अभी भी गुलाबी हो
सुर्ख़ गुलाबी, जैसे ज़ोर से मरोड़े गए गाल

मैं लंपट
बैंगनी.
***

हवा

कल की हवा, हवा नहीं थी
वह राख थी
जैसे परसों की हवा समय थी
आज कोई हवा नहीं है
आज सिर्फ़ खून है

बनारस की हवा मृत्यु से ख़त्म हो चुका भय है
यहाँ पानी नहीं है
यहाँ संत-साधु-घाट नहीं हैं
यहाँ की हवा मैं भी हूँ

सोनभद्र की हवा अलग है
उसकी हवा में क्रशर का चूरा नहीं है
आन्दोलन की चीखें भी नहीं हैं
पलाश और तेंदू पत्ते हैं

यहाँ की हवा
हमेशा
से
जैसे

दिल्ली में हवा ही नहीं है
बची-खुची तरावट है
या वहाँ की हवा
हवा ही है

हवा दरअस्ल हवा नहीं होती है
वह बू होती है.
***

उसके लिए जो कभी गाली नहीं दे पाया...

वह नहीं था
अपने वजूद में कहीं नहीं था
उसे डर था अपने मार खा जाने का
या पहले से ज़्यादा मज़ाक़ उड़ जाने का
जिसमें उसे सब अपना साला बुलाते थे

डर इतना था
माँ भी उसे डराती थी
बहनें भी
बाप भी
बेटी भी
पत्नी भी
बेटी और पत्नी अभी छूटे हुए थे ही

उसका हाथ नहीं उठा हर बार
जब उसके मुँह पर माँ और बहन
को
ले लिया गया

हाथ छोड़िये जनाब
मुँह तक नहीं फट पाया
गांड फटी सो अलग

यहाँ कोई दुःख नहीं था
ख़ुशी ही थी
अपने बाप की तरह होने का
बाप भी गाली नहीं देता था

बाप मर गया

माँ पाँच पुरुषों का बोझ नहीं सम्हाल पाई
मर गई

छोटी बहन तो कपडा फटते ही चली गई

दो बड़ी बहनें लिए जाने के बाद
लिए जाने के अर्थ कई हो सकते हैं, इसका अर्थ आपके मुताबिक़ न हो, तो मुझे दोषी न बनायें
गाली गन्दी थी - इसके लिए भी मुझे दोषी नहीं.
बलात्कार को बताने के लिए भी नहीं, दोषी

क्या वो मजदूर था
या कोई गुजराती कट्टू
***

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