दो दशकों से नियमित प्रकाशित साहित्य, संस्कृति और विचार की अग्रणी पत्रिका 'कल के लिए' का नया अंक आ गया है. इस बार - वीर भारत तलवार का साक्षात्कार, मदन कश्यप, रवि श्रीवास्तव, अभिजीत सिंह, विजय राय, कौशल किशोर सुशील सिद्धार्थ, मुसाफिर बैठा, मुदित माथुर, डा राम सुधार सिंह आदि के आलेख, प्रतिभा कटियार की कहानी, टामस ट्रांसट्रोमर, दिनेश कुमार शुक्ल, उमेश
चौहान तथा लीना मल्होत्रा की कविताएँ और अन्य स्थाई स्तंभों के साथ कुबेर दत्त का
कालम ‘एक
पाठक के नोट्स’ और
संस्मरण.
संपर्क - डा जयनारायण, 'अनुभूति', विकास भवन के पीछे, सिविल लाइन्स, बहराइच, 271801 (उत्तर प्रदेश) फोन - 09415036571,
09425787930 (अशोक
कुमार पाण्डेय)
ई मेल - budhwarjainarain@gmail.com,
ashokk34@gmail.com
सदस्यता शुल्क - वार्षिक - 70 रुपये , त्रैवार्षिक - 200 रुपये
यहाँ प्रस्तुत है इस अंक में डा जयनारायण का सम्पादकीय
भूमंडलीकरण और बाजार
की शक्तियों ने पहले हमसे हमारा मनुष्यत्व छीनने की कोशिश की
और नागरिक से उपभोक्ता बनाने के उपक्रम में कार्पोरेट घरानों ने विज्ञापनों के
जरिये हममे लालच के बीज बोये और भ्रष्टाचार को जीवन शैली के रूप में
सर्वस्वीकृत बनाने और उसे लेकर हर प्रकार के अपराध बोध से हमें मुक्त करने के लिए नया तर्कशास्त्र गढ़ा. फिर मल्टीनेशनल्स में
हमारे बच्चों को ऊंची तनख्वाहें देकर हमारे पारिवारिक मूल्यों पर हमला किया .हम समझते रहे क़ि
हमारे घरों में खुशहाली आ रही है . हुआ यह क़ि हमारे सामाजिक जीवन की
सुगंध विदा होती चली गयी और
एक ऊसर हमारे घरों में कब पसर गया हम ,जान ही न सके .
अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ,विश्वबैंक औरसी .आई .ए .नेमिल कर जो तानाबाना पिछले दिनों बुना है उसमें सरकार ,विरोधी दलों ,एन .जी .ओ .सबको समय और सुविधा के अनुसार उपयोग करने की जटिल रणनीति बनाई गयी है .अन्ना और रामदेव के
आन्दोलन को परदे के
पीछे से समर्थन देकर ,नरेंद्र मोदी का नाम आगे बढाकर अमेरिका यह साफ़ संकेत दे रहा है क़ि अगर मनमोहन सिंह की सरकार ने खनन ,खुदरा कारोबार ,खाद्य पदार्थों ,उर्वरकों ,और बिजली जैसे मुद्दों पर उनके हितों की रक्षा नहीं की तो वे अगले चुनावों में बी .जे पी का खुल कर समर्थन करने के लिए तैयार है .आज हमें यह याद करना और जनता को
याद दिलाना पड़ेगा क़ि सोवियत रूस का विघटन अमेरिका
ने कैसे किया था .क्या रक्त की
एक भी बूँद बही थी ?तीसरा विश्व युद्ध अमेरिका ने मीडिया प्रबंधन से लड़ा था
और रूस की कमजोर नसों को दबा दबा
कर वह वहां की
जनता को यह समझाने में
सफल ह़ो गया था क़ि तुम्हारा शासन
भ्रष्ट है ,तुम्हारी विचारधारा सड़ गयी है और वहां की जनता ने ही अपने देश को तोड़ डाला .भारतवर्ष जिस तेजी से
अपना विकास कर रहा है वह अमेरिकी अर्थ व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बन रहा
है .हमारे नौजवान वहां की अच्छी नौकरियां हासिल कर
रहे हैं ,वहां के बैंक दीवालिया ह़ो रहे हैं और पूंजीवाद एक डरावनी मौत मरने की
दशा में आगे बढ़ रहा है ऐसी परिस्थिति में अमेरिका हमारे देश में भी 'भ्रष्टाचार की
मुहिम की आड़ में हमारी संसदीय व्यवस्था
के प्रति हमारे दिलों में जहर घोल रहा है .सामान्य ढंग से देखने पर
ऐसा लगता है क़ि ये आन्दोलन
जिसे मीडिया दूसरी आजादी कह कर
हवा दे रहा है वह देश के
हित में है पर ध्यान से
देखिये तो सारी परतें अपने
आप खुलती जाती हैं .सच यह
है क़ि अमेरिका हमारे अंदरूनी मामलों में अपने
हित साधने के लिए दखलंदाजी कर
रहा है .इस पूरे प्रकरण में
सबसे खतरनाक बात ये है क़ि जो पढ़े लिखे समझदार लोग इस कहानी को समझ रहे
हैं उन्हें ही संदेह के घेरे में
लाने की साजिशें की जा रही हैं
.जो इस आन्दोलन के स्रोतों पर
सवाल उठाये वो देशद्रोही है ऐसा माहौल बनाया
जा रहा है हमें यह सच्चाई अपनी
भोली भाली जनता को बताना ही
होगा क़ि इस रक्तहीन
तथाकथित गांधीवादी क्रान्ति का
असली सूत्रधार कौन है? .जिन्हें ये बातें कोरी बकवास और
मुख्य मुद्दे से ध्यान हटाने वाली लग
रही हों उन्हें पिछले दिनों का
वाल स्ट्रीट जर्नल जरूर
पढना चाहिए .सवाल पूछने वाले बुद्धिजीवियों और
पत्रकारों की पूरी बिरादरी को
जिस तरह कटघरे में खड़ा किया
जा रहा है वह एक सफेदपोश फासिज्म
है. जो लोग फोर्ड फौन्देशन
और लेहमन ब्रदर्स से पैसा ले रहे हैं वे किसके हित
साधेंगे यह समझना कठिन नहीं होना चाहिए .इन आंदोलनों से
भ्रष्टाचार से मुक्ति मिले न मिले देश के संसदीय लोकतंत्र के प्रति घृणा को जिस
तरह कारपोरेट मीडिया हवा दे रहा है इसके परिणाम घातक
होंगे .भ्रष्ट संसद सदस्यों को जरूर घेरिये ,अपराधियों के
खिलाफ हर संभव आवाज उठा कर उन्हें भी सार्वजनिक जीवन से
निष्कासित कीजिये लेकिन देश
की अस्मिता और ,उसकी संप्रभुता को
तोड़ने में लगी ताकतों का चेहरा भी
पहचानिए.हम लोगो की ओर एक मुहावरा प्रचलित है 'चीलरों
के कारण कथरी नहीं फेंकी जाती है 'मेरा
विनम्र अनुरोध है एक एक चीलर को खोज खोज कर मारिये लेकिन जोश और गुस्से में आकर
अपनी वो कथरी न फेंक दीजिये जो शहीदों के खून से रंगी है और आज उन्ही की शहादत की दुहाई दे
कर कुछ लोग आपसे तार तार
करने की भावुक अपील कर
रहे हैं
इधर अमेरिका का
हमारे देश की राजनीति को
नियंत्रित और निर्देशित करने का दुस्साहस कुछ
ज्यादा ही बढ़ता जा रहा है मोदी बनाम राहुल की
वकालत के बाद छोटे राज्यों का मशविरा किस तरफ इशारा कर रहा है .मोदी को प्रमोट कर के वह हमारे
सामाजिक जीवन में भय और टकराहट पैदा करना चाह
रहा है दो प्रमुख सम्प्रदायों में
संघर्ष बढे यही उसका खेल है
.सारी दुनिया में अस्थिरता उत्पन्न कर
अपनी चौधराहट कायम करना उसकी विदेश नीति का
प्रमुख सूत्र है ,इसे इस देश का मीडिया न समझ सके ,आश्चर्य होता
है .
यह समय सजगता से
पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखने और उस पर प्रतिक्रिया देने का है .जिस तरह अरुंधती रॉय को
गालियाँ दी गयीं उसे वैचारिक जगत में फासीवादी ताकतों
के बढ़ते दखल के रूप में
देखा जाना चाहिए वैकल्पिक मीडिया की आज जरुरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गयी है क्योंकि बड़े अख़बारों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने
पूरी तरह पूंजीपतियों के हितों में समर्पण कर दिया है .
कल के लिए का यह अंक काफी विलम्ब से आ रहा है .इस बीच हमारे कुछ ऐसे
बिछुड़े हैं जिनसे हम प्रेरित भी होते थे और
हमेशा कुछ नया सीखते भी थे .वसुधा के
यशस्वी संपादक कमला प्रसाद जी से में
कभी नहीं मिला .फोन पर
ही बातें होती थी .उनका संगठन कौशल अद्भुत था .द्रष्टि स्पष्ट और
गतव्य सुनिश्चित .उनसे मैंने बहुत कुछ
सीखने क़ि कोशिश की.उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि .प्रख्यात मार्क्सवादी आलोचक ,विचारक चन्द्रबली सिंह भी चले गए .दिल्ली में जब एक्सीडेंट के बाद मेरा इलाज चल रहा था ,वे आये .हम
कभी मिले नहीं थे .मेरा हाथ अपने
हाथों में लेकर सिर्फ इतना कहा 'तुम जल्दी ही ठीक होकर बहराइच जाओ ,तुम्हे अभी बहुत
काम करना है .उनके हाथों
की वह आत्मीय छुवन अभी
भी स्मृति में उतनी ही ताज़ी है .प्रतिबद्धता और संघर्ष की उस जीवंत मूर्ति
को नमन .इस बीच मैंने अपने
व्यक्तिगत मित्र कथाकार ,आलोचक
अनिल सिन्हा को भी खो दिया .वे मितभाषी ,गंभीर साहित्यकर्मी थे
.विनम्रता और सादगी के साथ द्रढ़ता को कैसे साधा जाता है मैंने उनसे सीखा .ये सारे सदमे भूला
भी नहीं था की कुबेर भी एकाएक छोड़
कर चले गए .वे मेरे लिए क्या थे मैं यहाँ कुछ
नहीं कह सकूंगा सिवा इसके
कि इतना प्यार ,इतना सम्मान इतना
अधिकार एक साथ मुझे कहीं
से नहीं मिला .कल के लिए मैं वे 'एक
पाठक के नोट्स 'के नाम से एक स्तम्भ लिखते
थे .इसमें लिखी गयी उनकी कुछ
टिप्पणियां गंभीर आलोचकीय द्रष्टि का परिचय देती हैं . मेरे विपरीत स्वास्थ्य के कारण 'कल के लिए 'के अंकों के नियमित न आने से
वे भी मेरी तरह बहुत दुखी रहते थे
.
मुझे आपको यह बताते हुए हर्ष भी
है और संतोष भी कि इस अंक से
चर्चित कवि ,अनुवादक और
लेखक अशोक कुमार पाण्डेय कल के लिए का कार्य मेरे साथ कार्यकारी संपादक
के रूप में संभाल रहे हैं .मुझे पूरा विश्वास है कि उनकी प्रतिभा और
कर्मठता से कल के लिए नियमित
भी होगी और उसका विस्तार भी होगा
.इस बात की पीड़ा हमेशा रहेगी क़ि कुबेर को यह सूचना मैं नहीं दे सका .सोचता था
उन्हें 'सरप्राइज' दूंगा पर वे हमेशा
की तरह इस बार भी जीत
गए ,एक बड़ा 'सरप्राइज 'देकर चले गए
.यह अंक उनकी स्नेहिल और ऊष्मा से भरी स्मृति को समर्पित .....

5 comments:
सामयिक दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं आपने,संपादकीय में. बधाई. आपकी पत्रिका फले-फूले.
स्बागत
हमारे उथल-पुथल भरे आज को खंगालता-खोलता ' कल के लिए ' का जीवंत संपादकीय। देश-दुनिया के पेच-ओ-खम भरे दृश्य ' परिदृश्य ' के अंधेरे ' अदृश्य ' को दृश्यमान करता। ...प्रख्यात आलोचक चन्द्रबली सिह और कवि कुबेरदत्त पर स्मरण के कुछ ही दर्ज वाक्य किसी भी प्रदीर्घ संस्मरण-आलेख से कम भावप्रवण नहीं। मर्म को छू लेने वाले। इस घोर अ-रचना-काल में भी हमारे रचना-समाज में विद्यमान मिसाल सरीखे कुछ अनमोल रिश्तों की अनुकरणीय बानगी दिखाने वाली यादगार स्मृति-टिप्पणियां। ... अनौपचारिक आभार जयनारायण बुधवार जी और अशोक कुमार पाण्डेय जी...
बहुत ही सही कहा है भाई! यह समय सजगता से पूरे घटनाक्रम पर पैनी नज़र रखने और उस पर प्रतिक्रिया देने का है.. बहुत महत्त्वपूर्ण सम्पादकीय आलेख
पत्रिका का स्वागत है ! अशोक जी की प्रतिभा,ऊर्जा और आपका मार्गदर्शन ,इस अभियान को रुकने नहीं देगा ऐसा विश्वास है !
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