Friday, October 14, 2011

बल्‍ली सिंह चीमा को बधाई

केन्‍द्रीय हिंदी संस्‍थान ने बल्‍ली सिंह चीमा को पुरस्‍कार देने का निर्णय लिया है। हमारी जानकारी में एक अरसे के बाद हिंदी संस्‍थान ने किसी जनकवि को सम्‍मानित करने की ओर कदम बढ़ाए हैं। अनुनाद इस फैसले का स्‍वागत करता है और बल्‍ली सिंह चीमा को बधाई देता है। उन्‍हें मानपत्र तथा एक लाख रूपए की पुरस्‍कार राशि प्रदान की जाएगी। जीवनसंघर्षों और जनआन्‍दोलनों में जि़न्‍दगी गुज़ार देने इस कवि के लिए अब पुरस्‍कार महत्‍व नहीं रखते, तब भी हम जैसे उनके चाहने वालों के लिए यह ख़ुशी का मौका है। यहां प्रस्‍तुत हैं उनके दो गीत कविताकोश से साभार।

1

मैं अमरीका का पिठ्ठू और तू अमरीकी लाला है
आजा मिलकर लूटें–खाएँ कौन देखने वाला है
मैं विकास की चाबी हूँ और तू विकास का ताला है
सेज़ बनाएँ, मौज़ उड़ाएँ कौन पूछ्ने वाला है

बरगर-पीजा खाना है और शान से जीना-मरना
ऐसी–तैसी लस्सी की, अब पेप्सी कोला पीना है
डॉलर सबका बाप है और रुपया सबका साला है
आजा मिलकर लूटें–खायें कौन देखने वाला है

फॉरेन कपड़े पहनेंगे हम, फॉरेन खाना खायेंगे
फॉरेन धुन पर डाँस करेंगे, फॉरेन गाने गायेंगे
एन०आर०आई० बहनोई है, एन०आर०आई० साला है
आजा मिलकर लूट मचाएँ, कौन देखने वाला है

गंदा पानी पी लेते हैं, सचमुच भारतवासी हैं
भूखे रहकर जी लेते हैं, सचमुच के सन्यासी हैं
क्या जानें ये भूखे–नंगे, क्या गड़बड़-घोटाला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

रंग बदलते कम्युनिस्टों को अपने रंग में ढालेंगे
बाक़ी को आतंकी कहकर क़िस्सा ख़तम कर डालेंगे
संसद में हर कॉमरेड जपता पूंजी की माला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

पर्वत, नदिया, जंगल, धरती जो मेरा वो तेरा है
भूखा भारत भूखों का है, शाइनिंग इंडिया मेरा है
पूंजी के इस लोकतंत्र में अपना बोलम–बाला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

तेरी सेना, मेरी सेना मिलकर ये अभ्यास करें
हक़-इन्साफ़ की बात करे जो उसका सत्यानाश करें
एक क़रार की बात ही क्या सब नाम तेरा कर डाला है
आजा मिलकर राज करें, कौन देखने वाला है

मैं अमरीका का पिठ्ठू और तू अमरीकी लाला है
आजा मिलकर लूटें–खाएँ कौन देखने वाला है
मैं विकास की चाबी हूँ और तू विकास का ताला है
सेज़ बनाएँ, मौज़ उड़ाएँ कौन पूछ्ने वाला है

***

2

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के
अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के

कह रही है झोपडी औ' पूछते हैं खेत भी
कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के

बिन लड़े कुछ भी नहीं मिलता यहाँ ये जानकर
अब लड़ाई लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के

कफ़न बाँधे हैं सिरों पर हाथ में तलवार है
ढूँढने निकले हैं दुश्मन लोग मेरे गाँव के

हर रुकावट चीख़ती है ठोकरों की मार से
बेडि़याँ खनका रहे हैं लोग मेरे गाँव के

दे रहे हैं देख लो अब वो सदा-ए-इंक़लाब
हाथ में परचम लिए हैं लोग मेरे गाँव के

एकता से बल मिला है झोपड़ी की साँस को
आँधियों से लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के

देख 'बल्ली' जो सुबह फीकी दिखे है आजकल
लाल रंग उसमें भरेंगे लोग मेरे गाँव के
***

9 comments:

विजय गौड़ said...

balli bhai ko dheron badhai.

Vivek Rastogi said...

बधाई

प्रेम सरोवर said...

आपके पोस्ट पर पहली बार आया हूँ । पोस्ट अच्छा लगा । धन्यवाद ।

अनूप शुक्ल said...

बधाई है!

संजीव said...

जनकवि को बधाई.

अजेय said...

पहली कविता बहुत अच्छी लगी. इसे शेयर कर रहा हूँ .

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi said...

मेरे प्रिय कवि बल्‍ली सिंह चीमा को बहुत बहुत बधाइयां और आपका धन्‍यवाद कि आपने यह सूचना हम तक पहुंचाई

Mustfa Mahir Pantnagari said...

bahut bahut badhai cheema ji ko. ye mere liyee kismat ki baat rahi hai k 3-4 baar maine unhein pantnagar mushayeron mein bulaya hai aur vo bila kisi parhez kiye aaye aur mushayeron mein jaan daal di.
dua kartein hain ye jan kavi jan jan ke dil apni rasaai kare

हर्षवर्धन वर्मा. said...

चीमा जी को बहुत बहुत शुभकामनाएँ.अभी हाल ही में दिनेशपुर में उन्हें रू-ब-रू सुनने का मौक़ा मिला,बहुत खुशी हुई.

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