Sunday, February 28, 2010

दहशत : हरीशचन्द्र पाण्डे की एक कविता


दहशत

पारे सी चमक रही है वह

मुस्कुराते हुए होंठों के उस हलके दबे कोर को देखो

जहाँ से रिस रही है दहशत

एक दृश्य - अपने अपने भीतर बनते बंकरों का

एक ध्वनि - फूलों के चटाचट टूटने की

एक कल्पना - सारे आपराधिक उपन्यासों के पात्र

जीवित हो गए हैं

बहिष्कृत स्मृतियाँ लौटी हैं फिर

एक बार फिर

रगों में दौड़ने के बजाय

ख़ून, गलियों में दौड़ने लगा है

***

(थॉमस वेइगल की पेंटिंग उनकी वेबसाइट से साभार)

Thursday, February 25, 2010

रीता पेत्रो की कविताएँ - अनुवाद एवं प्रस्तुति यादवेन्द्र

१९६२ में अल्बानिया की राजधानी तिराना में जनमी रीता पेत्रो स्टालिन कालीन साम्यवादी पाबंदियों से मुक्त हुए अल्बानिया की नयी पीढ़ी की एक सशक्त कवियित्री हैं.उन्होंने तिराना विश्वविद्यालय से अल्बानी भाषा और साहित्य की डिग्री ली और बाद में एथेंस विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर उपाधि.उनके तीन बहुचर्चित कविता संग्रह डीफेम्ड वर्स (१९९४),दी टेस्ट ऑफ़ इंस्टिंक्ट(१९९८) तथा दे आर सिंगिंग लाइन डाउन हियर(२००२) प्रकाशित हुए हैं और विश्व की अनेक भाषाओँ में उनकी कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हुए हैं. यहाँ उनकी कुछ छोटी कवितायेँ प्रस्तुत हैं :
पूर्णता

ईश्वर...एक मर्द
अपने आंसुओं से इसने रच डाली दुनिया
दुनिया..एक औरत
अपनी पीड़ा में वो चलती गयी
और जा पहुंची पूर्णता की हद तक...
***
क्या इसको प्रेम कहेंगे?

क्या इसको प्रेम कहेंगे
यदि हमारा शरीर बना हो
गोश्त और लहू के बगैर...
आधी खुली आधी छिपी निहायत लुभावनी
इन मांसल गोलाइयों के बगैर...
नैनों के लपलपाते तीरों के बगैर..
गर्माते लहू और धड़कनों के बगैर...
क्या इसको भी हम कह पायेंगे
प्रेम?
***
यह प्यार

इस प्यार ने
उभार दिए हैं इतने मेरे सीने
कि आस पास की हवा होने लगी है विरल.
इस प्यार ने
हाथ पकड़ कर पहुंचा दिया है मुझे
स्वर्ग द्वार तक
पर मेरी खिड़की पड़ने लगी है छोटी.
इस प्यार कि मांग है
कि निछावर कर दूँ मैं सर्वस्व अपना
पर पाप का खौफ मन पर छाने लगा है
ये खौफ उतना ही उम्र दराज है
जितनी है ये दुनिया...
मेरी आँखें खोलो मेरे ईश्वर
कि मैं समझ सकूँ
यह प्यार तोड़ रहा है मेरी जंजीरें
या उल्टा उनसे ही बाँध रहा है मुझे???
***
अंतिम दरवाज़ा

अपनी रूह तक पहुँचने वाले
तमाम दरवाजे खोल दिए हैं मैंने-
सिवा एक दरवाजे के
बंद कर रखा है अंतिम दरवाज़ा...
इसके आस पास बसते हैं फ़रिश्ते
और यहीं मटरगश्ती करते फिरते हैं शैतान..
यदि तुम मुखातिब हो गए फरिश्तों से
तो बन जाउंगी मैं तुम्हारी गुलाम
पर अगर तुम चले गए शैतानों के पास
तो बन जाओगे फ़ौरन मेरे गुलाम...
अंतिम दरवाज़ा बंद है...बंद ही रहेगा.
***
तुमने मुझे समझा नहीं

नहीं,मैं तड़प नहीं रही हूँ तुम्हारे लिए...
जैसे अग्नि जला कर लकड़ी को
बदल देती है राख में
मैंने वैसा सलूक किया नहीं तुम्हारे साथ
जैसे हिंसक पशु करता है अपने शिकार के साथ
अट्ठहास करता हुआ उसको अपनी गिरफ्त में ले कर...
मैं तो बस एक रुदन थी
ख़ामोशी के बियावान में.
अब हो रही हूँ विदा
गुड नाईट
आंसुओं से लथपथ और सुबगती हुई
अँधेरे की ओर.
***
प्यास

यदि जीवन होता एक गिलास
ऊपर तक भरा हुआ लबालब
तो मैं गटक जाती उसे
एक घूंट में पलक झपकते...
***
तुम्हारे बिना

इस खाली और ठण्ड से जमे घर में
जिन्दा रहने के लिए देती है तपिश
बस एक ही चीज...तुम्हारी जाकेट.
***
कोई वादा मत मांगो

कोई वादा मत मांगो
ये गुम हो सकता है कभी भी
चाभियों की मानिंद...
न ही मांगो
अनवरत अविछिन्न प्रेम
अमरत्व और मृत्यु छाया अक्सर
डोलते मिलते हैं आस पास ही..
मत मांगो वो शब्द जो कहे नहीं गए
शब्दों की औकात
मामूली वस्तुओं से ज्यादा होती नहीं कुछ भी..
मांगना ही है तो बस ये मांगो
कि तुम्हारे जीवन में आऊं
तो सिरे से पलट कर रख सकूँ बस एक पल...
***
हम और हमारा बच्चा

मेरा बच्चा
तुम्हारा बच्चा
हमारा बच्चा
आज पहली बार चला.

मेरा बच्चा
तुम्हारा बच्चा
हमारा बच्चा
आज उसने सीखा पहली बार दौड़ना.

मेरा बच्चा
तुम्हारा बच्चा
हमारा बच्चा
आज बड़ा हुआ और चला गया.

हम आज बूढ़े हो गए.
***
(रोबर्ट एलसी और जानिस मथाई हेक के अंग्रेजी अनुवादों पर आधारित प्रस्तुति)

Tuesday, February 23, 2010

कुमार विकल की कुछ कविताएँ

चम्बा की धूप
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ठहरो भाई,
धूप अभी आएगी
इतने आतुर क्यों हो
आखिर यह चम्बा की धूप है-
एक पहाड़ी गाय-
आराम से आएगी.

यहीं कहीं चौगान में घास चरेगी
गद्दी महिलाओं के संग सुस्ताएगी
किलकारी भरते बच्चों के संग खेलेगी
रावी के पानी में तीर जाएगी.
और खेलकूद के बाद
यह सूरज की भूखी बिटिया
आते के पेडे लेने को
हर घर का चूल्हा चौखट चूमेगी.

और अचानक थककर
दूध बेच कर लौट रहे
गुज्जर-परिवारों के संग,
अपनी छोटी-सी पीठ पर
अँधेरे का बोझ उठाए,
उधर-
जिधर से उतरी थी
चढ़ जाएगी-
यह चम्बा की धूप-
पहाड़ी गाय.
***


मुक्ति का दस्तावेज़
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मैं एक ऐसी व्यवस्था में जीता हूँ
जहाँ मुक्त ज़िंदगी की तमाम सम्भावनाएँ
सफ़ेद आतंक से भरी इमारतों के कोनों में
नन्हे खरगोशों की तरह दुबकी पड़ी हैं.
और मुक्ति के लिए छटपटाता मेरा मन-
वामपंथी राजनीति के तीन शिविरों में भटकता है
और हर शिविर से-
मुक्ति का एक दस्तावेज़ लेकर लौटता है.

और अब-
शिविर-दर-शिविर भटकने के बाद
कुछ ऐसा हो गया है
कि मुझ से मेरा बहुत-कुछ खो गया है
मसलन कई प्रिय शब्दों के अर्थ
चीज़ों के नाम
संबंधों का बोध
और कुछ-कुछ अपनी पहचान.


अब तो हर आस्था गहरे संशय को जन्म देती है
और नया विश्वास अनेकों डर जगाता है.

संशय और छोटे-छोटे डरों के बीच जूझता मैं-
जब कभी हताश हो जाता हूँ
तो न किसी शिविर की और दौड़ सकता हूँ
न ही किसी दस्तावेज़ में अर्थ भर पाता हूँ.
अब तो अपने स्नायुतंत्र में छटपटाहट ले
इस व्यवस्था पर-
केवल एक क्रूर अट्टहास कर सकता हूँ.
***

एक प्रेम कविता
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यह गाड़ी अमृतसर को जाएगी
तुम इसमें बैठ जाओ
मैं तो दिल्ली की गाड़ी पकडूँगा
हाँ, यदि तुम चाहो
तो मेरे साथ
दिल्ली भी चल सकती हो
मैं तुम्हें अपनी नई कविताएँ सुनाऊंगा
जिन्हें बाद में तुम
अपने दोस्तों को
लतीफ़े कहकर सुना सकती हो.

तुम कविता और लतीफ़े के फ़र्क़ को
बखूबी जानती हो.

लेकिन तुम यह भी जानती हो
कि जख्म कैसे बनाया जाता है
और नमक कहाँ लगाया जाता है

वैसे मैं, अमृतसर भी चल सकता हूँ
वहाँ की नमक मंडी का नमक मुझे खासतौर से
अच्छा लगता है.
***


पहचान
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यह जो सड़क पर ख़ून बह रहा है
इसे सूँघकर तो देखो
और पहचानने की कोशिश करो
यह हिन्दू का है या मुसलमान का
किसी सिख का या किसी ईसाई का
किसी बहन का या भाई का.

सड़क पर इधर-उधर पड़े
पत्थरों के बीच में दबे
`टिफिन कैरियर` से
जो रोटी की गंध आ रही है
वह किस जाती की है?

क्या तुम मुझे यह सब बता सकते हो
इन रक्तसने कपड़ों, फटे जूतों, टूटी साइकिलों
किताबों और खिलौनों की कौम क्या है?
क्या तुम मुझे बता सकते हो
स्कूल से कभी न लौटने वाली
बच्ची की प्रतीक्षा में खड़ी
माँ के आँसुओं क़ धर्म क्या है
और अस्पताल में दाख़िल
जख्मियों की चीखों का मर्म क्या है?

हाँ, मैं बता सकता हूँ
यह ख़ून उस आदमी का है
जिसके टिफिन में बंद
रोटी की गंध
उस जाती की है
जो घर और दफ़्तर के बीच
साइकिल चलाते है
और जिसके सपनों की उम्र
फाइलों में बीत जाती है

ये रक्तसने कपड़े
उस आदमी के हैं
जिसके हाथ
मिलों में कपड़ा बुनते हैं
कारख़ानों में जूते बनाते हैं
खेतों में बीज डालते हैं
पुस्तकें लिखते, खिलौने बनाते हैं
और शहर की
अँधेरी सड़कों के लैंप-पोस्ट जलाते हैं

लैंप-पोस्ट तो मैं भी जला सकता हूँ
लेकिन
स्कूल से कभी न लौटने वाली बच्ची की
माँ के आँसुओं का धर्म नहीं बता सकता
जैसे
जख्मियों के घावों पर
मरहम तो लगा सकता हूँ
लेकिन उनकी चीखों का मर्म नहीं बता सकता.
***

(मशहूर कवि कुमार विकल का निधन 23 फरवरी 1997 को हुआ था. यह पोस्ट उनकी बरसी पर श्रद्धांजलि के रूप में है.)

Saturday, February 20, 2010

गर हुए खुशकिस्मत इस जहाँ में हम





गर हुए खुशकिस्मत इस जहाँ में हम
युद्ध के मैदान में एक खिड़की आ खड़ी होगी दो सेनाओं के बीच

और जब सैनिक झांकेंगे उस खिड़की से
तो उन्हें नहीं दिखाई देंगे दुश्मन
देखेंगे अपने आपको गोया बच्चे हों वे

और रोक देंगे लड़ाई
लौट पड़ेंगे अपने घरों को और सो जायेंगे.
और जब तक वे जागेंगे, धरती फिर
चंगी हो जाएगी.



************




कैमेरून पेनी ने यह कविता तब लिखी थी जब वे मिशिगन के एक स्कूल में चौथी कक्षा के छात्र थे. इसका प्रथम प्रकाशन हुआ था नॉर्थ अमेरिकन रिव्यू के नवम्बर/दिसंबर 2001 अंक में; 2005 में बनी डॅाक्युमेंट्री फ़िल्म 'वॉयसेज़ इन वॉरटाइम' में भी यह कविता संकलित है.


तस्वीर नैशनल कोएलिशन अगेंस्ट सेंसरशिप की वेबसाईट से साभार; स्पैनिश में 'गुएरा' का अर्थ है 'युद्ध'.

Wednesday, February 17, 2010

एक मेरा दिल था बेशर्म


एक मेरा दिल था बेशर्म
(अभिन्न कविमित्र गिरिराज किराडू और उसके "है था हो गया था" के लिए...)

है में घटने वाली चीज़ें
अब था में घटने लगी थीं
है अब भी था
पर मेरा समय कुछ गड़बड़ा गया था
मेरे भीतर
और होगा के बारे में भी मैं
था से पूछता था

गली में दो सफ़ेद से धूसर होते जाते आवारा पिल्ले
आपस में झूमकर मिलते थे
अपनी मित्रता को बचाते हुए

लगातार मोटरसाइकिल पर ही सवार रहने की आदत के कारण थोड़ी तोंद निकाले
दो छोकरे
मां-बहन की गालियों में बतियाते छिछोरपन झाड़ते थे
सूयास्त के थोड़ा पहले
एक लड़की ऊन-सलाइयां थामे पड़ोस की भाभी जी के पास जाती थी

क़स्बे में अभी फरवरी है मतलब थी
धूल कुछ और महीन और चिकनी थी

रात को तो होना था कुछ देर बाद
शायद उसी की अगवानी में हूटर बजाती
पुलिस की गश्ती जीप के साथ

एक बूढ़ी बेघर औरत नर्मदा मइया के नाम पर कुछ आटा मांगती
चली जाती थी
रास्ते पर
एक बूढ़ा बैठा साइकिल के पंचर सुधारता था

पान की दुकान पर
बंग्ला ज़र्दा पिपरमेंट चटनी-चमनबहार
जैसा कुछ होता था

रतन टाटा से बिलकुल भी न डरता हुआ
एक मैकेनिक
नैनो में विक्रम का इंजन लगाये जाने का रहस्य
गाहक के आगे
सप्रमाण खोलता था
उसे नई ली गाड़ी के भविष्य के प्रति
जितना हो सके
उतना हताश करता था

नालियों में बहता पानी
कुछ अधिक पानी था
पत्तों से टकराती खड़खड़ाती हवा
कुछ अधिक हवा थी
मन्दिर में होनेवाली आरती की तैयारी में
कुछ अधिक
आपसी राम राम थी

मैं देखता था आंखें सिकोड़
चौतरफ़ा घिरती शाम कुछ अधिक शाम थी

उसी झुटपुटे में डूबता जाता था एक मैला नंगा बच्चा
उसकी मां को एक लफंगा पटाता था
शराब पीते हुए बमुश्किल बचाए पैंतीस रुपयों के एवज़ में
``तेरेइ लाने बचाए हैं जे पइसे´´ कहता
साभिमान मांगता था कुछ समय सहवास का
बच्चे को मां कुछ देर में सड़क पर ही रुके रहने का निर्देश देती
रात के भोजन का ढाढ़स
बंधाती थी

नज़दीक ही
होनेवाले सभी था में से हो रहे सभी है को घटाता
एक मेरा दिल था बेशरम
अपने होने के ख़याल से
बेतरह धकधकाता था रह-रहकर
और पता नहीं कैसे
आनेवाले दिनों में किसी अच्छे की
लगभग अश्लील आकांक्षा से
भर जाता था ...

चित्र- पिकासो/गूगल से साभार

Friday, February 12, 2010

“चार पंक्तियों का राष्ट्रवादः टैगोर और कोरिया और पाँच अन्य दृश्य” -गिरिराज किराडू

कवि-अनुवादक गिरिराज किराडू के ब्लॉग "सारी दुनिया रंगा" से साभार।


ब्रिटेन के आधिपत्य वाले गयाना में उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में चीनी मजदूरों के बंधुआ शोषण के लिए कुख्यात कंपनी बुकर मैकोनेल (अब बुकर कैश एंड कैरी) द्वारा १९६८ में स्थापित (गयाना 1966 में आजाद हुआ) और सन २००२ के बाद से ३५०० मिलियन की नेट इनकम वाली इन्वेस्टमेंट कंपनी मैन ग्रुप द्वारा प्रायोजित ५०,००० ब्रिटिश पौंड का पुरस्कार पाने वाली एक लड़की जिसके राजनैतिक विचारों के बारे में यह पुरस्कार आने से पूर्व कोई नहीं जानता था जिसे उसके पहले उपन्यास के लिए पांच लाख डॉलर का एडवांस मिला जिसके अप्रकाशित उपन्यास के अंश को पचास बरस के सारी भारतीय भाषाओँ के सारे लेखन से बेहतर समझते हुए (उस एन्थोलोज़ी में एकमात्र भारतीय भाषा लेखक मंटो है) सलमान रश्दी ने भारत की आजादी की पचासवीं वर्षगांठ पर अमेरिका में प्रकाशित विंटेज के पचास साल के सर्वश्रेष्ठ भारतीय लेखन की एन्थोलोज़ी में शामिल कर लिया जिसकी किताब के लिए एजेंट लन्दन से उड़कर लेखिका के द्वारे आया वह लेखिका पुरस्कार की घोषणा के बाद भारत की सबसे चर्चित और सबसे बड़ी राजनैतिक एक्टिविस्ट बन गयी (हालाँकि उससे पहले उपन्यास में केरल में सीपीआई (एम) के कथित नेगेटिव चित्रण की वजह से ई.एम.एस. नंबूदरीपाद और समूचे लेफ्ट ने लेखिका को एंटी-कम्युनिस्ट, एंटी-लेफ्ट कहा और उसके उपन्यास को यौन स्वैराचार और बुर्जुआ मूल्यों को बढ़ावा देने वाला बताया) और उस लेखिका ने कालांतर में साहित्य अकादेमी पुरस्कार यह कहते हुए ठुकरा दिया कि ऐसा करके वह भारत सरकार की अमेरिकापरस्ती का और नियोलिबरल नीतियों का विरोध कर रही है जो औद्योगिक मजदूरों के शोषण को बढ़ावा देती हैं और देश में सशस्त्रीकरण को बढ़ावा देती हैं. लेफ्ट समेत तमाम बुद्धिजीवियों ने इस निर्णय की देशव्यापी सराहना की।


जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल २०१० के आखिरी दिन भारत में १३००० मिलियन डॉलर के प्रोजेक्ट्स कर रही इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी डी.एस.सी. ने दक्षिण एशियाई लेखन के लिए ५०,००० डॉलर की इनामी राशि वाला पुरस्कार घोषित किया. २०११ के फेस्टिवल में पहली बार दिया जाने वाला यह पुरस्कार वर्ष की एक श्रेष्ठ कृति को दिया जायेगा. पुरस्कार के लिए घोषित की गयी समिति में अरुंधती रॉय, विक्रम सेठ, अरविन्द अडिगा, किरण देसाई के एजेंट और लिटरेरी एजेंसी डी.जी.ए. के सह-संस्थापक डेविड गॉडविन, लॉर्ड मेघनाद देसाई, नयनतारा सहगल,टीना ब्राउन और माइकल व्होर्टन के साथ भारत के पहले फेमिनिस्ट प्रकाशन काली फॉर वीमन की सह संस्थापक, अब अलग हो कर प्रकाशन गृह जुबान की मालकिन और एक एक्टिविस्ट व कमिटेड, सेकुलर बुद्धिजीवी के रूप में देश और देश के बाहर प्रसिद्ध उर्वशी बुटालिया भी शामिल हैं.


१९२९ में अपनी तीसरी जापान यात्रा पर जा रहे रवींद्रनाथ ठाकुर = टैगोर को दक्षिण कोरियाई अखबार डोंग-ए के ब्यूरो चीफ यी ताएरो और कवि चू योहान ने अपने देश आने के लिए आमंत्रित किया. रवि बाबू के लिए वहाँ जाना संभव नहीं हुआ लेकिन उन्होंने इन दो कोरियाई मित्रों को निराशा से बचाने के लिए चार पंक्तियों की एक कविता लिखी उनके देश कोरिया के लिए जो चू योहान के अनुवाद में डोंग-ए में प्रकाशित हुई. एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता की चार पंक्तियाँ तब जापानी आधिपत्य से जूझ रहे कोरियाई मानस के लिए एक प्रेरणा की तरह घटित हुई. इससे पहले अपनी दूसरी जापान यात्रा के दौरान १९२४ में एक भारी भीड़ के सामने सार्वजनिक रूप से रवींद्रनाथ जापान के विरुद्ध कोरियाई संघर्ष का समर्थन कर चुके थे. उधर खुद अपने देश में वे उपनिवेशवाद के विरुद्ध भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का समर्थन करते हुए तत्क्षण सांप्रदायिक अस्मिता आधारित राष्ट्रवाद का विरोध भी कर रहे थे. १९१० में प्रकाशित उनका उपन्यास ‘गोरा’ हिन्दू अस्मिता के विमर्शों का एक प्रत्याख्यान है.

फ्राग इन ए वैल के मुताबिक चार पंक्तियों की यह कविता दक्षिण कोरियाई राष्ट्रवाद की कल्पना में कोरियाई आजादी आन्दोलन को जायज़ ठहराने वाली एक ‘बाहरी वैधता’ की तरह बहुत महत्वपूर्ण ढंग से अंकित रही है. कोरियाई पाठ्यपुस्तकों में इस कविता को पढाया जाता रहा है. और यहीं से हमारी कहानी शुरू होती है. २००७ में कोरियन टाइम्स में एक लेख प्रकाशित हुआ कि हाई स्कूल पाठ्यपुस्तकों में इस चार लाइन की कविता का एक ऐसा संस्करण पढाया जा रहा है जो चार नहीं बारह लाइनों का है. रवींद्रनाथ ने कोरिया के लिए चार पंक्तियाँ लिखी थीं जो इस प्रकार हैं (अंग्रेजी में):

In the golden age of Asia
Korea was one of its lamp-bearers
And that lamp is waiting to be lighted once again
For the illumination in the East

एशिया के किसी स्वर्ण युग की कल्पना करती हुई यह कविता कोरियाई आत्मसम्मान के लिए कैसी रही होगी यह समझना जितना आसान है उतना ही यह समझना भी कि कविता में पूरब और पश्चिम, एशिया और योरोप, अँधेरा और रोशनी की संकेत-व्यवस्था क्या है लेकिन रवींद्रनाथ की यह कविता जितनी एक गुलाम देश के नाम एक शुभकामना सन्देश थी उतनी ही जापान के उपनिवेशवादी आतंक के खिलाफ भी एक सन्देश थी. १९४५ में जापान का पतन हो गया लेकिन कोरिया के दो हिस्सों पर रूसी और अमेरिकी सेनाओं का कब्ज़ा हो गया जिसके परिणामस्वरूप १९४८ में देश का विभाजन हुआ और उत्तर और दक्षिण कोरिया बने. १९५० में साम्यवादी उत्तरी कोरिया के हमला करने से शुरू हुआ युद्ध तीन साल बाद बिना किसी औपचारिक संधि के खत्म हुआ, तब तक २५ लाख लोग मर चुके थे. तकनीकी तौर पर युद्ध आज भी खत्म नहीं है क्योंकि दोनो देशों ने किसी शांति प्रस्ताव/संधि पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं. दक्षिण कोरिया में १९६० से १९९० के बीच का समय तानाशाही का रहा जबकि उत्तरी में एक पार्टी सर्वसत्तावादी सिस्टम १९४८ से है. १९९१ में दोनों को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता मिल गई. उत्तरी कोरिया अभी भी एक प्रमुख अमेरिका-विरोधी, मिलिटेंट देश बना हुआ है जबकि दक्षिणी कोरिया ने हैरतंगेज़ तकनीकी और आर्थिक प्रगति की है (अपने पूर्व-औपनिवेशिक मालिक जापान की तरह) है. वर्तमान राष्ट्रपति ली म्युंग बाक बहुराष्ट्रीय कंपनी ह्युंडाई के पूर्व सी.ई.ओ. हैं. इस पूरे समय में भारत-कोरिया राजनय में ४ पंक्तियों की वह कविता अब भी महत्वपूर्ण बनी रही है (ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कोरियाई संसद में उसे सुनाया था २००६ में). लेकिन जो आठ पंक्तियाँ पाठ्यपुस्तकों में अतिरिक्त जोड़कर दक्षिण कोरियाई राष्ट्रवाद को और प्रभावशाली बनाया गया था वे भारत में एक स्वतंत्र कविता के रूप में, जो कि वे दरअसल हैं, पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाई जाती हैं:

Where the mind is without fear and the head is held high;
Where knowledge is free;
Where the world has not been broken up into fragments by narrow domestic walls;
Where words come out from the depth of truth;
Where tireless striving stretches its arms towards perfection;
Where the clear stream of reason has not lost its way into the dreary desert sand of dead habit;
Where the mind is led forward by thee into ever-widening thought and action –
Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.


भारत में जिस समय केंद्र में एक दक्षिणपंथी सरकार थी (१९९८-२००४) उस दौरान साहित्य अकादेमी का हिंदी पुरस्कार अरुण कमल (१९९८), विनोद कुमार शुक्ल (१९९९), मंगलेश डबराल (२०००), अलका सरावगी (२००१), राजेश जोशी (२००२), कमलेश्वर ( २००३), वीरेन डंगवाल (२००४) को मिला.


जनवरी २०१० में चिंतित और आक्रोशित लेखकों ने एक मानव श्रंखला बनाई. साहित्य अकादेमी के एक साहसिक भूतपूर्व उपसचिव की प्रमुख उपस्थिति में हुए इस आयोजन में और लेखकों को हिस्सा ले सकना चाहिये था.


जिस देश में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का भूतपूर्व सी.ई.ओ. राष्ट्रपति था उसके देश में एशिया के पहले नोबेल विजेता की चार लाईनें राष्ट्रवादी भाव जगाने में सहायक थी. १०.७ बिलियन डॉलर की नेट इनकम वाली एक कंपनी ने कुल एक स्ट्रोक में और मात्र ५०,००० डॉलर में दक्षिण कोरियाई राष्ट्रवाद, भारत दक्षिण कोरिया द्विपक्षीय सम्बन्ध, एक महान कवि के प्रति एक राष्ट्र की कृतज्ञता और अपनी सी.एस.आर. (कोर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी) सब को एक साथ साध लिया था.

है था हो गया था.
***
सामने (शायद किसी कोरियन) स्क्रीन पर ये यह छह पाठ/दृश्य गुजर रहे हैं. अगर आप इनका कोई समझदार अर्थापन कर सकें तो बताना न भूलें.

Wednesday, February 10, 2010

हमीं हम हमीं हम






हमीं हम हमीं हम
रहेंगे जहाँ में
हमीं हम हमीं हम
ज़मीं आसमाँ में
हमीं हम हमीं हम
नफीरी ये बाजे
नगाड़े ये तासे
कि बजता है डंका
धमाधम धमाधम
हमीं हम हमीं हम
हमीं हम हमीं हम

ये खुखरी ये छुरियाँ
ये त्रिशूल तेगे
ये फरसे में बल्लम
ये लकदम चमाचम
ये नफरत का परचम
हमीं हम हमीं हम
हमीं हम हमीं हम

ये अपनी ज़मीं है
ये खाली करा लो
वो अपनी ज़मीं है
उसे नाप डालो
ये अपनी ही गलियाँ
ये अपनी ही नदियाँ
कि खूनों के धारे
यहाँ पर बहा दो
यहाँ से वहाँ तक
ये लाशें बिछा दो
सरों को उड़ाते
धड़ों को गिराते
ये गाओ तराना
हमीं हम हमीं हम
हमीं हम हमीं हम

न सोचो ये बालक है
बूढ़ा है क्या है
न सोचो ये भाई है
बेटी है माँ है
पड़ोसी जो सुख दुख का
साथी रहा है
न सोचो कि इसकी है
किसकी खता है
न सोचो न सोचो
न सोचो ये क्या है

अरे तू है गुरखा
अरे तू है मराठा
तू बामन का जाया
तो क्या मोह माया
ओ लोरिक की सेना
ओ छत्री की सेना
ये देखो कि बैरी का
साया बचे ना

यही है यही है
जो आगे अड़ा है
यही है यही है
जो सिर पर चढ़ा है
हाँ ये भी ये भी
जो पीछे खड़ा है
ये दाएँ खड़ा है
ये बाएँ खडा है
खडा है खड़ा है
खड़ा है खड़ा है
अरे जल्द थामो
कि जाने न पाए
कि चीखे पै कुछ भी
बताने न पाए
कि पलटो, कि काटो
कि रस्ता बनाओ
अब कैसा रहम
और कैसा करम, हाँ
हमीं हम हमीं हम
हमीं हम हमीं हम
रहेंगे जहाँ में
हमीं हम ज़मीं पे
हमीं आसमाँ पे.




--मनमोहन





(तस्वीर नताली एट सेटेरा के ब्लॉग से साभार)

Monday, February 8, 2010

गीत को बधाई दें !

हमारा प्रिय कवि गीत अब अपना पहला कविता संग्रह "आलाप में गिरह" लाया है, जिसका मुझे पिछले कुछ समय से बेहद इंतज़ार था। संग्रह तो अभी मुझे नहीं मिला है पर यहाँ हमारे पास उसका ख़ूबसूरत जैकेट है और साथ में एक नई अप्रकाशित कविता भी। मैं अपने इस साथी को बधाई देता हूँ। गीत की कविता अपने नितान्त नए और मौलिक मुहावरे में भारतीय समय, खासकर २००१ के बाद के समय, का एक अनोखा आख्यान रचती है और ऐसा करने के लिए उसे किसी अपेक्षाकृत बहुत लम्बे शिल्प की ज़रुरत कभी नहीं होती - यह गीत का अपना ख़ास हुनर है, मैं ख़ुद अपने लिए भी जिसकी कामना तो बहुत करता हूँ पर जो मेरे पास नहीं है...इस पीढ़ी में शायद किसी के पास नहीं है....

मुद्रा-स्फीति

दौड़ते दौड़ते उन स्टेशनों तक पहुंचा जहां ट्रेनें इन्तज़ार नहीं करतीं
पहुंचा तो लोगों को इन्तज़ार करते देखा
देखता रहा ट्रेनें मुझे लोगों की तरह दिखीं लोग ट्रेन की तरह

पुल की रेलिंग से दो बच्चे झुके हैं चीखते हुए बाय
झुके हैं क्योंकि बहुत छोटे हैं
उचकते हुए झुका जा सकता है ऐसा बड़प्पन भरा ख़याल आया
क्या करूं ये बड़प्पन जाता ही नहीं जैसे मुंहासों से बने छोटे सुराख़

मैले कपड़ों वाले एक आदमी को खोज रहा था
सोचिए, कपड़ों का मैला होना ख़त्म हो जाए
तो कितने प्रतीक यूं ही निकल जाएंगे जीवन से

अच्छा, आप असहमत हैं? लोग अक्सर रहते हैं मुझसे
जब कह देता हूं, इन दिनों
सहवासों को नहीं सहमति को सन्देह से देखो
सन्दिग्ध होने से डरता हूं तो साहस खो देता हूं
सिर झुका कहता हूं अपने शब्द मानो किसी और के
मूर्ख होना मंज़ूर करता हूं
सन्दिग्ध अक्सर बच निकलते हैं

तभी शोर हुआ चोर चोर चोर मेरे सामने वाले ने कहा सारे लोग चोर
मैं बेहद शर्मिन्दा हुआ दो चोर एक-दूसरे के सामने बैठे हैं
मैंने कहा- नहीं जिसे 'चाय पियोगे- नहीं' वाले नहीं की तरह लिया गया जबकि
मेरा नहीं सिर्फ़ मेरा नहीं नहीं है; लो, आप फिर असहमत हैं!

चलिए, मैंने हाथ जोड़कर नमस्कार किया
इस राजनीतिक हिम-युग में काइयांपन की निशानी कहा उन्होंने इसे

मैं इसे मुद्रा-स्फीति जैसा इन दिनों चर्चित एक शब्द देता हूं
***

Sunday, February 7, 2010

I, Too, Sing America

फरवरी माह अमेरिका,कनाडा और ब्रिटेन में ब्लैक हिस्ट्री मन्थ के तौर पर मनाया जाता है. 1926 में नीग्रो हिस्ट्री वीक के रूप में शुरू हुए इस दस्तूर की प्रासंगिकता और उपादेयता पर हाल के वर्षों में सवाल भी उठाये गए हैं.अनुनाद इस मौके पर याद कर रहा है हार्लम रेनेसांस के बड़े कवि लैंग्स्टन ह्यूज को, उनकी इस कविता के मार्फ़त. इस रचना के बारे में कुछ कहना उतना ही गैरज़रूरी लगता है जितना इसका हिन्दी अनुवाद करना.



I, too, sing America

I, too, sing America.
I am the darker brother.
They send me to eat in the kitchen
When company comes,
But I laugh,
And eat well,
And grow strong.

Tomorrow,
I'll be at the table
When company comes.
Nobody'll dare
Say to me,
"Eat in the kitchen,"
Then.

Besides,
They'll see how beautiful I am
And be ashamed--

I, too, am
America.

**********

Thursday, February 4, 2010

एक छूटा हुआ मकान - विजय कुमार

अग्रज कवि विजय कुमार का नाम समकालीन कविता और कवितालोचना में एक विशिष्ट, महत्वपूर्ण और ज़रूरी नाम है। विजय कुमार जी ने अपने सतत् अनुवादकर्म से विदेशी कविता और समालोचना को जानने-पहचानने की समझ भी हमें दी है। उनकी कविताएं हमारे भग्नावशेष समय में एक समूची और मुकम्मिल बात कहने का धीरज धरती हैं, जिसके लिए पाठक के मन में एक अनिवार्य सम्मान तुरत जागता है। प्रस्तुत कविता पहली बार विपाशा के 89 वें अंक में छपी और अब यहां.... अनुनाद पर विजय जी पहली बार छप रहे हैं, अनुनाद परिवार आभार ज्ञापित करते हुए उनका स्वागत करता है।


एक छूटा हुआ मकान

नए-नए बसते मोहल्ले में
वह एक उम्रदराज़ मकान है छोटा-सा
बन्द
अपनी अन्तिम सांसे गिनता हुआ
क्यों इसे घूरती रहती हैं
आसपास खड़ी ये गगनचुम्बी इमारतें ?

मैं प्रतिदिन गुज़रता हूँ इस राह
प्रतिदिन बुलाती है एक पुरानी दुनिया
बुलाते हैं
दालान, खम्भे, दरवाज़े, खिड़की का एक पल्ला
कब्ज़े से लटका हुआ
अब गिरा अब गिरा
काठ की एक झुकी हुई शहतीर
टूटे हुए जंगले
और एक शालीन ख़ामोशी

एक गिलहरी
इस मकान की पलस्तर उखड़ी दीवारों पर
वहां उस ओर ज़ख़्म की तरह झांकती हुई ईंटें
कौन कब आया पिछली बार यहां
ये उसके जूतों के निशान
दहलीज़ की धूल पर अब भी
दरवाज़े के सूराखों में
उसकी आहट बसी हुई है

नीम अंधेरे में
कौन टोह लेता हुआ
रोशनदान के मैले शीशे से
यह पाइप पर चढ़ी हरे-हरे पत्तोंवाली एक नटखट बेल
या उन बैंगनी फूलों का धीरज
या एक चिड़िया की छोटी-सी उदास देह
कमरे में थोड़ा-सा शोर मचा लेती हुई

ज़ंग खाया यह पुराना ताला
यह अभी भूला नहीं है खुलना
यह अभी भी एक चाबी के इन्तज़ार में
यह आरामकुर्सी यहां मरियल-सी
इसकी चरमराहट में
अटकी हुई है किसी की एक आख़िरी हिचकी
एक बन्द घड़ी दीवार पर
प्रार्थना में हाथ जोड़े हुए पलंग के पैताने
और दीवार पर यह शीशा
किसी बीते समय से कानाबाती करता हुआ
यह गुसलख़ाने का नल
यह जो सूख गया बरसों पहले
फ़र्श पर इसके बूँद -बूँद टपकने का
अलौकिक धीरज अब भी

छत की सीढ़ियों से
चांदनी रात
यह क्यों उतरती है यहां
एक शर्मीली लड़की-सी दबे पांव
क्या अब भी
दादी-मां की कहानियां सुनते-सुनते
आंख मूँद लेती है ?

जो लोग रहे यहां
उनकी छांव यहां
दुनिया के शोर से घिरी हुई
स्वप्न में एक चित्र-सी रची हुई
शामिल होने मुझे बुलाती है हर रोज़

नहीं बीता कुछ भी नहीं
बीतेगा कुछ भी नहीं
सिर्फ़ हम बीत जायेंगे
वहां अब भी बचे रहने की
कोई जुगत
भीतर तमाम धड़कनें
अनटूटे स्वप्न
सारे मौसम
अच्छे-बुरे की अनगिन स्मृतियां
बहस मुबाहिसे
कुछ फ़ैसले जो हुए या नहीं हुए
कुछ समाधान जो मिले या नहीं मिले
भीतर अब भी थोड़ा-सा प्रेम
जो उलझता रहा क़दमों से
कुछ इच्छाएं
जो ख़त्म नहीं हुईं कभी भी

यहां से गुज़रते
मैं किसी दिन आऊंगा यहां
मैं आऊंगा
लेकिन आगन्तुक-सा नहीं
किसी हड़बड़ी में नहीं
मैं आऊंगा
और दरवाज़ा खुलेगा
और उम्मीद है
कौन है? कौन है? कौन है? का शोर उठेगा नहीं भीतर से।
***

Tuesday, February 2, 2010

मैंने सुना - लाल्टू की एक कविता




मैंने सुना


बेटी आठवीं में आ गई है उन्होंने कहा

देखते-देखते दसवीं में चली जाएगी उन्होंने कहा

एक दिन विदा हो जाएगी.


यह कविता क्यों है आलोचक डाँटेंगे

इसमें कौन सी छोटी बात बड़ी बनती है

इस टिप्पणी पर तुम कहोगे

नहीं-नहीं बात छोटी बड़ी की नहीं कविता की है.


बात कविता की है फिर कहूँ

उन्होंने कहा बेटी एक दिन विदा हो जाएगी

मैंने सुना.


****


(मार्सेल ड्यूचैम्प की तस्वीर 'बाइसिकल व्हील' म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट्स, न्यू योंर्क की वेब साईट से साभार)

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