Thursday, December 31, 2009

मृत्यु की इच्छा करने वाले युवक के लिए - ग्वेंडोलिन ब्रुक्स

अनुवाद तथा प्रस्तुति : यादवेन्द्र



ग्वेंडोलिन ब्रुक्स (जून १९१७-दिसम्बर २०००)अमेरिका कि सर्वाधिक चर्चित और प्रतिष्ठित अश्वेत कवियों में एक --- बचपन शिकागो में बीता.पड़ोस में और स्कूल में नस्ली भेदभाव का दंश झेलना पड़ा,यहाँ तक कि एक स्कूल छोड़ कर दूसरे पूर्ण रूप से अश्वेत स्कूल में दाखिला लेने की मज़बूरी.. माँ पिता ने उनकी साहित्यिक अभिरुचि को बहुत बढ़ावा दिया...पिता ने लिखने को डेस्क और किताबों के लिए अलमारी खरीद कर दी, माँ ने उस समय अश्वेत कविता के सबसे बड़े हस्ताक्षर langston hughes और james johnson से ले जा कर मिलवाया..१३ साल की उम्र में पहली कविता छपी..१९४५ में पहला काव्य संकलन प्रकाशित..अनेक पुस्तकें प्रकाशित

अमेरका के लगभग सभी प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मान और पुरस्कार उनको मिले..१९५० में पुलित्ज़र पुरस्कार पाने वाली वे पहली अश्वेत कवि हैं,,,१९६२ में राष्ट्रपति केनेडी ने उन्हें लिब्ररी ऑफ़ कांग्रेस में काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया..बाद में वे वहां की पोएट्री कंसल्टेंट भी नियुक्त हुईं.. १९६८ में इल्लिनोय की पोएट लारिएट बनीं...अनेक यूनिवर्सिटीज़ में रचनात्मक लेखन का अध्यापन भी किया और मानद उपाधियाँ मिलीं..१९९४ में अमेरिका की संघीय सर्कार का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान प्राप्त...अश्वेत गौरव की दिशा में निरंतर सक्रिय...

यहाँ प्रस्तुत कविता उनकी बेहद लोकप्रिय कविता है जो मृत्यु की और मुखातिब युवक को जीवन की और लौटने को प्रेरित करती है...नए साल पर अपने उन तमाम साथियों को समर्पित जो जीवन के संघर्ष में थोड़ी सी भी निराशा झेलने को अभिशप्त हैं...

मृत्यु की इच्छा करने वाले युवक के लिए


बैठो,दम भर लो
थोडा सुस्ता तो लो...
प्रतीक्षा कर लेगी बन्दूक
देखने दो झील को थोड़ा और बाट
मनमोहक शीशी के अन्दर
फरफराती विकराल खीझ
कर लेगी थोड़ा और इन्तजार - करने दो
कोई बात नहीं ठहरने दो.. दो हफ्ते और
पूरा अप्रैल पड़ा हुआ है प्रतीक्षा के लिए....
तुम इतने आतुर क्यों हो
चुनने को कोई एक दिन
बस यूँ ही अचानक मर जाने के लिए????

मृत्यु सहर्ष स्वीकार कर लेगी तुम्हारा निर्णय
पुचकार कर सराहना करेगी तुम्हारे फैसले के स्थगन की
बिना किसी चू चपड़ के
मृत्यु को स्वीकार होगा इस तरह बचाया गया समय
दरअसल फुर्सत ही फुर्सत है उसके पास--
दरवाजा ही तो खड्काना है
आज नहीं कल खड़का लेगी तुम्हारा दरवाजा
या फिर अगले हफ्ते भी सही...

मृत्यु बाहर सड़क पार खड़ी है
इतना ही नहीं वो तुम्हारे पड़ोस के घर में ही तो
रहती है पहले से..कितनी शालीनता पूर्वक...
जब भी चाहेगी मृत्यु
आ कर मिल लेगी तुमसे बे झिझक
जरुरत क्या कि तुम मर जाओ बस आज के आज ही
रुको यहाँ--चाहे मुंह फुलाओ
या मातम की काली चद्दर ओढ़ लो
या.......
पर अभी तुम ठहरो यहीं --देखो तो सही
जाने कौन सी नयी खबर आ जाये तुम्हारे वास्ते कल सुबह सुबह..
कब्रों ने कब फैलाई है हरियाली की चादर
अपने आस पास उम्मीदों की
कि तुम सोच रहे हो चला लोगे उनसे ही अपना काम..
भूलो मत,तुम्हारा रंग ही है हरियाली का
अरे, तुम्हीं तो बसंत हो प्यारे...सचमुच के बसंत॥
***

Tuesday, December 29, 2009

मारियो सुसको की कविताएँ


बोस्निया के युद्ध की विभीषिका झेल चुके मारियो सुसको सरायेवो के रहने वाले हैं. 1993 में सरायेवो छोड़ कर अमेरिका में बस गए सुसको के अट्ठाइस कविता संग्रह प्रकाशित हैं. वे एक उत्कृष्ट सम्पादक और अनुवादक भी हैं, उनकी कविताओं को कई सम्मान प्राप्त हुए हैं.

पुनर्निर्माण

ठंडे सफ़ेद रसोईघर में
माँ बैठेगी मेज़ के किनारे,
प्रतीक्षा में कि मैं लाऊं मेरी वह किताब
जिसमें मैं लिखता हूँ कि

कैसे उसकी हड्डियों को मैं खोद निकालता हूँ
उन्हें वापिस घर ले जाने के लिए.

वह होगी वहाँ, पुनर्निर्मित,
घरों के बाहरी हिस्सों की मानिंद
और मैं इस हैरत में कि
पार्क का कौन सा पेड़ उसका ताबूत था
जिस पर अब कभी शाखें नहीं आएँगीं.
कचरे और सड़ी पत्तियों से गन्धाएँगे मेरे हाथ
उस सुबूत की तलाश में पन्ने पलटते हुए
जो न हो कोई लिपा-पुता सच.
यह जानकर कि माँ सचमुच कहाँ है
मैं शायद यह भूल जाऊं कि मुझे कहाँ होना चाहिए.
वह कहेगी, मैं कभी नहीं समझ पाई
तुम्हारी कोई भी कविता, और मैं पाऊंगा खुद को
उसकी गोद में चुपके से पुस्तक बंद करते,
और झूठमूठ यह जताते हुए
कि मैं गलत सफ़हे पर,
गलत मकान या गलत शहर में हूँ.

***


फ्रेम जड़ी यादें

और एक दिन आया जब हर कोई
बचता फिर रहा था छुपकर बरसाई जा रही गोलियों से

अ.हेलमेट और बुलेटप्रूफ जैकेट पहने एक औरत
गोडॉ* और एक पेड़ की तलाश में
ब. ढंके-छुपे इतिहास के जर्जर हॉल में
विकलांग से ऑर्केस्ट्रा का संचालन करता हुआ एक आदमी
क. तुरत-फुरत बनी कब्रगाह से
छोटी डंठलों वाले फूल चुनती हुई एक औरत
ड .एक लड़की जो चुपके से निकल पड़ी बाहर
बाज़ार और माचिस की डिबिया ढूँढने
ई. एक लड़का जो दौड़ पड़ा घूरे के ढेरों के बीच
अपने भटके हुए कुत्ते की खोज में
फ. एक बूढी अन्धी औरत जो समझा नहीं पाई
क्यों उसने यकायक फैसला लिया अपनी तंग कोठरी से बाहर निकलने का

ड. ई. और फ. उस दिन मारे गए
-- मुझे कैसे पता?
उस दिन मैं भी था उनके साथ मरा.

फिर भी,
ड. बाहर जाती रहती है,
जबकि मैं उसके लिए माचिस ला चुका हूँ
ई. ढूँढता फिरता है, जबकि मैंने
उसके कुत्ते को नदी की धारा में बहकर जाते हुए देखा
फ. बाहर खड़ी रहती है, जबकि मैं
अपने अदृश्य हाथ हिला हिला कर उसे अन्दर जाने को कहता हूँ

मैं उन्हें देखता हूँ अपनी स्क्रीन पर,
फिर स्क्रीन के रंग ऑफ कर देता हूँ
और निहारता हूँ फ्रेम जड़ी यादों को,
इस बात का इन्तज़ार करते हुए कि
कब मैं लड़की को उसकी माचिस देने जाता हूँ
भटक गए लड़के के लिए कोई और कुत्ता कब ढूँढता हूँ
कब बूढी अन्धी औरत का हाथ पकड़ कर
उसके साथ सड़क पर चलता हूँ

और हम दोनों मुस्कुराते हैं और टटोलते हैं अपनी राह
सूरज की उस तेज़ रौशनी में जो परछाई नहीं छोड़ती.
*****
*सैमुएल बेकेट के प्रसिद्द नाटक 'वेटिंग फॉर गोडॉ' का एक रहस्यमयी चरित्र जिसका नाटक के अन्य चरित्रों को इंतज़ार रहता है

Sunday, December 27, 2009

आमतौर पर कविता को सभी कलाओं में सर्वाधिक स्थानीय माना जाता है


१९४८ में टी एस इलियट ने नोबेल पुरस्कार लेते हुए जो वक्तव्य दिया था, उसके एक महत्त्वपूर्ण अंश का अनुवाद हमारे लिये किया है रंगनाथ सिंह ने।

आमतौर पर कविता को सभी कलाओं में सर्वाधिक स्थानीय माना जाता है। चित्र, मूर्ति, स्थापत्य, संगीत का आनन्द वही ले सकते हैं जो सुन या देख सकते हैं लेकिन भाषा, ख़ास तौर पर कविता की भाषा, का मामला अलग ही है। कविता लोगों को एक करने के बजाए अलग भी कर सकती है।

दूसरी तरफ हमें यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि यदि भाषा एक बाधा का निर्माण करती है तो वहीं कविता स्वयं इन बाधाओं को पार करने की वजह देती है। किसी अन्य भाषा की कविता का आस्वादन उन सभी लोगों के बारे में समझ बढ़ाने का आनंद देता है जिन लोगों की वह भाषा है जो कि किसी अन्य कला माध्यम में संभव नहीं है। हम यूरोप की कविता के इतिहास की बात कर सकते हैं और यह भी कि एक भाषा की महान कविता का किसी दूसरी भाषा की कविता पर क्या असर होता है। लेकिन हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हर विशिष्ट कवि के ऊपर अपनी भाषा से ज्यादा दूसरी भाषा के कवियों का असर रहा है। हम कह सकते हैं कि किसी भी देश या भाषा की कविता क्षीण या खत्म हो जाती गर इसे किसी विदेशी भाषा की कविता का पोषण न मिला होता। जब कोई कवि अपने लोगों से संवाद करता है तो उसकी आवाज में उन सभी अन्य भाषाओं के कवियों की आवाज भी होती है जिन्होंने उस कवि को प्रभावित किया हो। वह कवि स्वयं भी अन्य भाषा के युवा कवियों को प्रभावित करता है और उनके माध्यम से उसकी जीवनदृष्टि और सांस्कृतिक चेतना उनके लोगों तक पहुँचती है। इस तरह कोई कवि थोड़ा अनुवाद के द्वारा, जोकि एक हद तक कविता का पुनर्सृजन ही होता है, तथा थोड़ा अन्य कवियों के ऊपर प्रभाव के द्वारा एवं उन पाठकों पर अपने प्रभाव के द्वारा जो कवि नहीं हैं, लोगों के बीच आपसी समझ बढ़ाने में योगदान देता है।

हर कवि के कविकर्म का काफी हिस्सा ऐसा होता है जो सिर्फ उसके क्षे़त्र या भाषा के कवियों को प्रभावित करता है। लेकिन पूरी दुनिया में ‘यूरोप की कविता’ या सिर्फ ‘कविता’ का एक सर्वमान्य अर्थ है। मेरे हिसाब से विभिन्न देशों या विभिन्न भाषओं के लोग, किसी एक देश में प्रत्यक्षतः एक अल्पसंख्यक वर्ग, इसी अंश के माध्यम एक दूसरे के प्रति अपनी समझ बांटते हैं। कविता की समझ का वह अंश भले ही अल्प हो लेकिन वह बहुत जरूरी होता है। मैं यह नोबेल पुरस्कार स्वीकार करता हूँ क्योंकि यह एक कवि को दिया जा रहा है और इस तरह यह कविता के देशातीत मूल्यवत्ता को मान्यता प्रदान करता है। और इस बात पर जोर देने के लिए समय-समय पर कवियों को यह पुरस्कार मिलते रहना चाहिए। मैं आज आपके सामने यह पुरस्कार स्वीकार कर रहा हूँ लेकिन अपने निजी गुणों के लिए नहीं बल्कि किसी समय में कविता का जो महत्व होता है उसके प्रतीक के रूप में।
***

Saturday, December 26, 2009

राजेन्द्र कैड़ा की कविताएँ

राजेंद्र बिना शीर्षक की कविताएँ लिखते हैं, जिनमें एक प्रबल भावावेग निरन्तर जारी रहता है। लगता है कि ये सभी कविताएँ एक किसी बहुत लम्बी लिखी जा रही कविता का हिस्सा हैं, जिसमें टूटने की हद तक खिंचता एक शानदार तनाव है। यह तनाव या बेचैनी नए कवियों में पहली बार इस स्तर पर देखी जा रही है। इन कविताओं में प्रेम है, प्रार्थना है, असफलता है, दुख है, धैर्य है, समय की पहचान है और सबसे लाजवाब चीज़ के रूप में मौजूद वह एक `समूचा पागलपन´ है, जिस पर कोई भी कवि गर्व कर सकता है।

राजेन्द्र के पास एक आत्मीय और नामवर जी के शब्दों में कहें तो `प्रसन्न´ भाषा है, जिसे उन्हें बहुत साधना नहीं पड़ता, जो ख़ुद-ब-ख़ुद कविता के शिल्प में अपनी राह तलाशती है। रोज़मर्रा के साधारण जीवन और मनोभावों को वे इस तरह आँकते हैं कि हमारे सामने दुनिया के मानी खुलते जाते हैं। उनकी कविताएँ एक आम हिन्दुस्तानी नौजवान के समक्ष लगातार खुलते जीवन और संसार की कविताएँ है। इनकी सबसे बड़ी सफलता ये है कि ये बहुत सादाबयानी से अपनी बात कहती हैं, जो दरअसल कविता लिखने का एक बेहद असाधारण ढंग है। अपने कवि रूप में भाषा, डिक्शन या किसी और स्तर पर भी वे किसी से प्रभावित नज़र नहीं आते, इसलिए भी उनकी कविताएँ प्रभावित करती हैं।

बड़े संतोष की बात है कि अत्यन्त सम्भावनाशील कवि होने के बावजूद राजेन्द्र अपनी कविताओं को महज छपाने के लिए लिखा गया नहीं मानते, जो उनकी विषय वस्तु से भी जाहिर होता है। उन्हें शमशेर की इस बात पर गहरा विश्वास है कि `कविता एक बार लिखी जाकर हमेशा के लिए प्रकाशित हो जाती है´।

राजेन्द्र कैड़ा की कविताएँ पहली बार किसी साहित्यिक पत्रिका में छप रही हैं। हमें भरोसा है कि उनके इन शुरूआती लेकिन बेहद सधे हुए क़दमों का हिंदी कविता संसार में स्वागत होगा।

एक

तुम्हारा प्रेम प्रार्थना है
मेरे लिए
छोटी-सी पृथ्वी के सारे धैर्य जैसा

बहुत ज़रूरी काम से पहले बुदबुदाए जाने वाले
कुछ शब्दों जैसा
अपनी सारी असफलता
समूचे पागलपन
और कुछ थके हुए शब्दों को करता हूँ
तुम्हारे नाम

मेरे मीठे प्यार की तरह
इन्हें भी चखो

सब कुछ खोने के बाद भी
तुम्हारा प्रेम
प्रार्थना है मेरे लिए !
***

दो

सपनों पर किसी का ज़ोर नहीं
न तुम्हारा
न मेरा
और न ही किसी और का

कुछ भी हो सकता है वहाँ
बर्फ़-सी ठंडी आग
या जलता हुआ पानी
यह भी हो सकता है कि
मैं डालूँ अपनी कमीज़ की जेब में हाथ
और निकाल लूँ
हहराता समुद्र - पूरा का पूरा

मैं खोलूँ मुट्ठी
और रख दूँ तुम्हारे सामने विराट हिमालय
अब देखो -
मैंने देखा है एक सपना -
मैं एक छोटा-सा बच्चा लटकाए हुए कंधे पर स्कूल बैग
अपने पिता की अंगुली थामे
भाग रहा हूँ स्कूल की घंटी के सहारे
भरी हुई क्लास में
सबसे आगे बैंच पर मैं
और तुम मेरी टीचर !

कितना अजीब-सा घूरती हुई तुम मुझे
और मैं झिझककर करता हुआ
आँखें नीची
मैंने देखा - ` दो और दो होते हुए पाँच ´
और ख़रगोश वाली कहानी में बंदर वाली कविता का स्वाद
तुम पढ़ा रही थीं - `ए´ फार `एप्पल´
और मुझे सुनाई दिया `प´ से `प्यार´
तुम फटकारती थीं छड़ी
सिहरता था मैं
खीझकर तुमने उमेठे मेरे कान
सपनों के ढेर सारे जादुई नीले फूलों के बीच ही
मैंने देखा - मेरा सपना,
खेलता हुआ मुझसे !
जब बड़े-बड़े अंडों से भरा मेरा परीक्षाफल देते हुए
तुमने कहा मुझसे -
` फेल हो गए हो तुम हज़ारवीं बार ´
और इतना कहते समय मैंने देखा -
तुम्हारी बड़ी-बड़ी आँखों मे दमकता हुआ
पृथ्वी भर प्यार
और मुझे महसूस हुआ
कि वहीं कहीं आसपास शहद का छत्ता गुनगुना रहा था
धीमे से
हज़ार-हज़ार फूलों के
सपनों का गीत !
***

तीन

बदलता है समय
पर ऐसे नहीं कि एकदम सब कुछ बदल जाए
और सब कुछ हो जाए ठीक
ऐसा नहीं होता
कि एकाएक शहर के सारे कौवे हो जाएँ सफ़ेद
या पंख लगे हाथी चुगें आपकी छत पर चावल
समय बदलता है उतना ही धीरे
जितना कि `क´ के बाद `ख´ लिखती है धीमे-से
कोई बुढ़िया
और तब बदल जाता है इतिहास
जब कोई कह दे तुलसी के साथ मीर और ग़ालिब भी
बदलता तो तब भी है बहुत कुछ
जब भूलकर सब कुछ एक लड़की ठीक अपने साथी की तरह
मारती है पहला कश
और बाहर फेंकते हुए धुँआ
मुस्काती है धीमे-से

धीमे से बदल जाते हैं सपने
रंग तक बदल जाता है पानी का
सपने
लगने लगते हैं थोड़े और पराये
और खारा पानी हो जाता है थोड़ा और खारा
फेंफड़ों और हवा के बीच अक्सर बदल जाता है संवाद
हालाँकि यह बदलाव उतना ही धीमे होता है
जितना धीमे औार चुपचाप बदलता है बालों का रंग
कोई पढ़ नहीं पाता इसे
लेकिन यह भी एक बदलाव है
जब रात की एकांत खुमारी में
या छुपकर घर के किसी कोने में एक शैतान लड़की
करती है एक शरारत भरा एस.एम.एस.
अपने युवा प्रेमी को
तब भी बदलता है बहुत कुछ
***

चार


इस दुख का क्या करूँ
सोचा होगा उसने
कोई तैयार नहीं इसका स्वाद चखने को
तब धीमे से उसने पकाया होगा फिर से इसे
और घोल दिया होगा इसमें गहरा प्यार
लो अब तो जानबूझ कर लेना ही पड़ेगा हर किसी को गहरा लगाव,
कुछ अनन्त आँसू,
सारी असफलता और उत्तेजना के गाढ़े घोल को लोगों ने कहा प्यार !
अब वो अपनी बिल्ली के तीन बच्चों के लिए हो
प्यारे पिता के लिए हो
तुम्हें अपना मान चुकी एक जोड़ी आँखों के लिए हो
या इस अनगढ़ पृथ्वी के लिए
तुम आख़िर में ख़ुद को फँसा ही पाओगे
अब तुम कुछ नहीं कर सकते
कभी न कभी किसी न किसी तरह यह प्यार
तुम्हें अपने पवित्रतम अंदाज़ में दुख ही देगा
तुम्हारे चमकीले सुखों से ज़्यादा अपना दमकता दुख !
***

पाँच

(चप्पलकथा ..... - यह शीर्षक जैसा कुछ - सम्पादक द्वारा)
कुछ बेफि़क्रे लोग ज़रूर करते हैं मेरा भरोसा
लेकिन बन-ठनकर जीने वाले तो तभी होते हैं पूरे
जब सूट के साथ सजे हों बूट भी
मेरा कोई भी ढंग नहीं करता किसी को भी पूरा
एक लापरवाह अधूरापन
चिपका ही रहता है मेरे साथ
इसलिए कई बड़ी चमकती इमारतों और संस्थानों में
प्रतिबंधित हूँ में
लेकिन बहुत पुरानी साथिन भी हूँ आदमी की - शायद
उसके आराम की आदिम खोज

औरत, आग और हथियार के बाद तो
मेरा ही नम्बर आएगा
चाहे तो कर सकते हैं आपके बड़े-बड़े इतिहासकार
ये छोटी-सी खोज
पता नहीं क्यों लेकिन मुझे लगता है कि मुझे बनाया होगा
किसी औरत ने सबसे पहले
अपने खुरदुरे और आदिम अंदाज़ में
हो सकता है
मैं रही होऊँ प्रथम अनजाने प्रेम की आकिस्मक भेंट
किन्हीं खुरदुरे कृतज्ञ पैरों के लिए आराम की पहली इच्छा
मेरे भीतर तो अब भी चरमराता है
आदमी का पहला सफ़र
जब पहली बार मैंने उसके तलवों और धरती के बीच
एक अनोखा रिश्ता बनाया होगा
वो आदमी और पृथ्वी के बीच पहला अंतराल भी था
हालाँकि
घास और धूल के बहाने अब भी उसकी त्वचा
जब तब गपियाती रहती है पृथ्वी से
कभी-कभी आपका पिछड़ापन बचा लेता है आपको
कई झंझटों से
मसलन मुझे पहनकर नहीं जीते जाते युद्ध
वहाँ तो बड़े-बड़े और मज़बूत जूतों का राज है
और इतनी अपवित्र मैं
कि कोई नहीं ले जाता मंदिर या किसी पवित्र जगह
हाँ ! इस देश की एक पुरानी कहानी में
एक भाई ने ज़रूर बनाया था मुझे राजा
और दे दी थी राजगद्दी
चलो पर वो तो कहानी थी बस !

मेरी जीभ में आदमी का आदिम स्वाद है
थके हारे आदमी की शाम शामिल हो जाती है कभी-कभी
मेरी सिकुड़ी हुई साँस में
***
(राजेंद्र की उम्र अभी तीस साल के करीब है और उन्होंने हिंदी जाति की अवधारणा पर महत्त्वपूर्ण शोध कार्य किया है। वे नैनीताल में रहते हैं...राजेंद्र की कविताओं की इस पोस्ट के साथ ही अनुनाद ने तीन सौ पचास का आंकड़ा भी छू लिया है- अनुनाद के सभी पाठकों और सहयोगियों का आभार।)

Friday, December 25, 2009

दो कविता संग्रह

इस बीच मुझे दो कविता संग्रह मिले, जिनकी कविताओं ने मुझे प्रभावित किया है। इन किताबों का आवरण और प्रकाशन विवरण यहाँ दे रहा हूँ....आगे कभी इन संग्रहों पर समीक्षा भी अनुनाद पर प्रस्तुत करूंगा....फ़िलहाल दोनों कवियों को शुभकामनाओं के साथ ....अनुनाद परिवार

बंद टाकीज

विजय सिंह
शब्दालोक प्रकाशन, सी-३/५९, नागार्जुन नगर, सादतपुर विस्तार, दिल्ली-९४
पृष्ठ-९६, मूल्य- ८० रूपए
***
सफेदी में छुपा काला

हरि मृदुल
उद्भावना, ए- २१ झिलमिल इंडस्ट्रियल एरिया, जी टी रोड,शाहदरा, दिल्ली-९५
पृष्ठ १०९, मूल्य- ६० रूपए
***

Thursday, December 24, 2009

समकालीन कविता पर एक ज़रूरी किताब

अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक आशुतोष कुमार आज के आलोचकों में प्रमुख हैं। हिंदी के निरंतर जर्जर होते जा रहे आलोचना ढाँचे में आशुतोष ने मरम्मत का बेहद ज़रूरी और अनिवार्य काम पूरे समर्पण के साथ किया है। अनुनाद उनकी इस पुस्तक का स्वागत करता है।

समकालीन कविता और मार्क्सवाद

आशुतोष कुमार
शिल्पायन प्रकाशन
१०२९५, लेन संख्या -१, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा,
दिल्ली- ११००३२
प्रथम संस्करण २०१०
पृष्ठ संख्या-२३१, मूल्य - ३०० रूपए
***

Tuesday, December 22, 2009

सामान की तलाश और पहचान की (समीक्षा के शिल्प में नहीं....)

यह लेख जैसा कुछ समयांतर(जून 2008) में छपा

हिंदी में भुला देने या उपेक्षा की हिंसक साहित्यिक राजनीति के शिकार हो जाने वाले बड़े कवियों में एक असद ज़ैदी 20 साल के लम्बे अन्तराल पर अपना तीसरा कविता संकलन `सामान की तलाश´ दुनिया में लाए हैं। इस संकलन की आमद काफ़ी बेचैनी और सुगबुगाहट भरी है और हिंदी कविता का मौजूदा परिदृश्य, एकाध अपवाद को छोड़ दें, तो यह तय नहीं कर पा रहा है कि इसका आख़िर वह क्या करे ! हिंदी की सुपरिचित `धन्य-धन्य´ और `धत्-धत्´ समीक्षा पद्धति के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। इसे महज अच्छा या बुरा कह देने से काम नहीं चलने वाला। पहले तो ख़ुद को साबुत रखते हुए इसे शुरू से अंत तक पढ़़ना ही एक बड़ा काम है और फिर अपने पढ़े को समीक्षा के ढाँचे में गुनना.......... तौबा ! तौबा !!


मैंने सम्पादक पंकज बिष्ट से अनुरोध करके समयान्तर के लिए यह चुनौती स्वीकारी है और नतीज़तन ख़ुद को काफ़ी हद तक परेशानी में डाल दिया है। बात यह है कि असद ज़ैदी की कविता अपने साथ इतना विक्षोभ, खीझ, अटपटापन, चिड़चिड़ाहट और दिमाग को झंझोड़ देने वाले सघन बौद्धिक वातावरण के पीछे-पीछे छुपी हुई अकुलाहट भरा एक ऐसा भयावह संसार लाती है कि आप ख़ुद को न तो एकाग्र कर पाते हैं और न ही इस संसार को परे कर इससे छुट्टी पा सकते हैं। ये एक ऐसा कवि है जो आपको संक्रमित कर देता है - फिर आपकी हालत वीरेन डंगवाल की कविता में आने वाले `मई के महीने के उस मोटे पेड़ जैसी हो जाती है, जो बाहर से तो क़तई साबुत और दुरुस्त खड़ा दिखाई देता है, पर उसके भीतर दिमाग़ में नसों की तरह कुछ फटता है´ !


संकलन की पहली कविता है `अप्रकाशित कविता´ - कई सारी अजीब अर्थच्छायाओं से घिरी और घेरने वाली इस कविता के शीर्षक में ही जैसे असद ज़ैदी के बीस साल छुपे हैं, जो उन्होंने अपने पिछले और इस संकलन के बीच बिताए।

एक कविता जो पहले ही से ख़राब थी
होती जा रही है अब और ख़राब
कोई इंसानी कोशिश उसे सुधार नहीं सकती
मेहनत से और बिगाड़ होता है पैदा
वह संगीन से संगीनतर होती जाती एक स्थाई दुर्घटना है
सारी रचनाओं को उसकी बग़ल से
लम्बा चक्कर काटकर गुज़रना पड़ता है !


यह सिर्फ़ असद ज़ैदी की कविता का नहीं, उस पूरे अंतराल की हिंदी कविता का आत्मकथन प्रतीत होता है, जिसमें हमारी युवा कवि पीढ़ी बतौरे-ख़ास शामिल मानी जाए। इसमें उस अनकहे की पहचान छुपी है, जिसे कभी कोई भय, कभी कोई निजी या सामाजिक मजबूरी, तो कभी कोई निहित स्वार्थ कहने नहीं देता और मेरा मानना है कि इसी अनकहे की कविता ही दरअस्ल असद ज़ैदी के समूचे कविकर्म की केन्द्रीय भूमिका है। कवि ने इसे संगीन से संगीनतर होती जाती स्थाई दुघर्टना कहा है तो उसका भी स्पष्ट आशय है, क्योंकि अंत में चलकर कवि ख़ुद स्वीकारता है कि

मनुष्यों में वह सिर्फ़ मुझे पहचानती है
और मैं भी मनुष्य जब तक हूँ तब तक हूँ


जिस देश और काल में एक कवि के भीतर भी मनुष्यता का होना अनिश्चित दिखाई देने लगे, उसे और कैसे परिभाषित करेंगे आप... और वे कौन-सी रचनाएँ हैं, जिन्हें इस अप्रकाशित कविता की बग़ल से लम्बा चक्कर काटकर गुज़रना पड़ता है... मैं कवि के शब्दों में बाअदब फेरबदल करते हुए ऐसी कविताओं को `लम्बा चक्कर काटकर´ नहीं , बल्कि `कन्नी काटकर´ गुज़रने वाली कविताएँ कहना चाहूँगा। मुझे नहीं लगता कि इन कविताओं की शिनाख़्त कोई ख़ास मुश्किल काम है - आज का तो पूरा दौर ही ऐसी असंख्य कविताओं से भरा पड़ा है, जिसमें किसी कवि-विशेष की नहीं, हम सबकी कविताएँ शामिल हैं। मनमोहन के कविता-संकलन ` ज़िल्लत की रोटी ´ के ब्लर्ब पर असद ज़ैदी ने जिस ` मुक्तिबोधीय पीड़ा और एक महान अपराधबोध ´ का ज़िक्र किया है, यह यक़ीनन उसी का अर्थविस्तार है और मुझे ख़ुशी है कि कवि ने इसे अपनी कविता में सम्भव किया है। देखने वाली बात है कि हिंदी कविता का आनेवाला समय इस पीड़ा और अपराधबोध को किस अर्थ में स्वीकार करेगा या फिर करेगा भी या नहीं ! शायद वही एक बेशर्मी आगे भी जारी रहे, जो हमें आज उपलब्धि लग सकती है।


थोड़ा आगे बढ़ें तो तीसरे नंबर पर असद ज़ैदी की इस संकलन की अब तक की सबसे चर्चित कविता ` 1857 : सामान की तलाश ´ मिलेगी। इस कविता पर पहल-86 में कवि मंगलेश डबराल ने एक लम्बी और सार्थक टिप्पणी की है, जिसके बाद कहने-सुनने को कुछ ख़ास नहीं बचता, पर इस कविता पर उठाई गई एकाध आपित्तयों के बरअक्स मैं कुछ कहना चाहूँगा - हालाँकि इसे मेरी निजी समझ ही माना जाए, कोई साहित्यिक निष्कर्ष नहीं। मामला है कविता की इन कुछेक पंक्तियों का -

यह उस सत्तावन की याद है जिसे
पोंछ डाला था एक अखिल भारतीय भद्रलोक ने
अपनी-अपनी गद्दियों पर बैठे बंकिमों और अमीचंदों और हरिश्चंद्रों
और उनके वंशजों ने
जो ख़ुद एक बेहतर गुलामी से ज़्यादा कुछ नहीं चाहते थे
जिस सन् सत्तावन के लिए सिवा वितृष्णा या मौन के कुछ नहीं था
मूलशंकरों, शिवप्रसादों, नरेन्द्रनाथों, ईश्वरचंद्रों, सैयद अहमदों,
प्रतापनारायणों, मैथिलीशरणों और रामचंद्रों के मन में
और हिंदी के भद्र साहित्य में जिसकी पहली याद
सत्तर अस्सी साल के बाद सुभद्रा ही को आयी !


इन पंक्तियों में दरअसल एक लम्बी बहस छुपी है, जिसे अचानक हुए एकतरफ़ा प्रतिरोधात्मक विस्फोट की नहीं, बल्कि धीरे-धीरे विचार, राजनीति और इतिहास के पुनर्पाठ की शक्ल में सामने आना चाहिए। हड़बड़ी एक सार्थक पहल को बरबाद भी कर सकती है - ऐसा मुझे इन पंक्तियों के संदर्भ में लगता है। जिस लम्बी बहस की बात मैं कर रहा हूँ, उसकी शुरूआत कवि ने कर दी है और उसकी कविता में आए उस भद्रलोक के अस्तित्व, पहचान और उसकी नीयत या सीमाओं को लेकर भी कोई संकोच हमारे मन में नहीं होना चाहिए। जिस तरह के तंज़ के साथ कुछ स्पष्ट नामोल्लेख कवि ने किए हैं, उन्हें हमें किसी तरह के सामान्यीकरण का शिकार भी नहीं बनाना चाहिए। इन नामों का वर्तमान, दरअसल हमारा अतीत या कहें कि निकटतम इतिहास है और उसमें भी कई तरह की अवधारणाओं के बीच से हमें सही राह खोजने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। मैं अपनी अब तक की समझ के हिसाब से इन पंक्तियों में उस राह की झलक देख पा रहा हूँ। हो सकता है कवि के कथन में ये व्यंग्य ज़्यादा तीखा हो गया हो, लेकिन इसे तो उसकी सफलता ही माना जाएगा। मेरे विचार से तो कविता में 1857 के ऐतिहासिक ब्यौरों की यह इतिहास के अनुशासन में हुए प्रयासों से भी सफल अभिव्यक्ति है, जहाँ -

1857 के मृतक कहते हैं भूल जाओ हमारे सामन्ती नेताओं को
कि किन जागीरों की वापसी के लिए वे लड़ते थे
और हम उनके लिए कैसे मरते थे

कुछ अपनी बताओ

क्या अब दुनिया में कहीं भी नहीं है अन्याय
या तुम्हें ही नहीं सूझता उसका कोई उपाय !


अपने लिए मैं इस मसले पर कुछ समकालीन कवि-मित्रों और अग्रजों के साथ लगातार संवाद करते हुए इसे और कुछ दूसरी कविताओं को समझने की कोशिश कर रहा हूँ - अगर कोई कविता हमें इस तरह के व्यापक संवाद या बहस के लिए प्रेरित करती है तो फिर इससे ज़्यादा हम एक कविता से और भला क्या चाह सकते हैं....


यहाँ आकर मैं कहना चाहूँगा कि समय और अन्तराल असद ज़ैदी की कविताओं में बहुत मुखर होकर बोलते हैं - जैसे इस कविता में बोल रहे हैं। उनके पिछले संकलन की कविताओं में इसके अनेक उदाहरण हैं, जिन पर यहाँ चर्चा के लिए अधिक अवकाश नहीं है, लेकिन इतना तो साफ़ है कि ये सिलसिला `सामान की तलाश´ में भी बदस्तूर जारी है। यह अन्तराल 1947 से 1965 के बीच का हो सकता है और 1965 से 1980 के बीच का या फिर 1980 से 2008 के बीच का। इन अन्तरालों में हमारे देश, समाज, राजनीति, भाषा और साहित्य के स्तर पर जो कुछ बदला है, असद ज़ैदी की कविता उस पर एक लम्बी जिरह छेड़ती है।


मैंने पहले असद जी की कविताओं के सन्दर्भ में अटपटेपन की जो बात कही, उसका सीधा सम्बन्ध समय और अन्तराल की इसी विशिष्ट समझ से है। जब समय भीषण रूप से बाज़ारू और अटपटा होगा तो एक कवि की प्रतिक्रिया भी उतनी ही अटपटी होगी और न हुई तो फिर उन संकटों का प्रतिकार कभी नहीं कर पाएगी, जो हमारे देश और समाज के सामने मुँह बाये खड़े हैं और इतने मुखर हैं कि यहाँ उन सभी को सूचीबद्ध करने की कोई ज़रूरत भी मैं नहीं देखता। पिछला सब कुछ महान था, यह मनवाने की एक ज़बरिया कोशिश लगातार होती रही है और इसे मान लेना हद दर्ज़े का अपराध होगा। इससे भी बड़ी विडम्बना तब होगी, जब उस समय के इन नामों से जो ग़लतियाँ हुई , उनसे हम कुछ सीखने को तैयार नहीं होंगे और कहने की ज़रूरत नहीं कि सीखने से पहले स्वीकारना होता है। सीखने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता - वह तो लगता है स्वीकारने में।


`दुर्गा टॉकीज़´ श्रंखला की दोनों कविताएँ देख लीजिए - वहाँ आपको इसी अंतर्दृष्टि के साथ कथ्य और भाषा के बीच का एक ज़रूरी और कड़ियल सम्बन्ध भी स्पष्ट दिखाई देगा -

अड़तालीस साल से यहाँ की दीवारें
मर्दों के पेशाब से भीगी हैं

या फिर

ठंडे कठोर सीमेंट पर अनगिनत बार
टपका है वीर्य
स्कूली छात्रों का, बेबस अधेड़ों का

दुर्गा टॉकीज़ की वे दीवारें आदमियों या इंसानों के नहीं, बल्कि `मर्दों´ के पेशाब से भीगी हैं। स्कूली छात्रों और बेबस अधेड़ों के बीच भी एक अन्तराल है, जिसके बीच के अनिवार्य ख़ालीपन को कुछ चीज़ें लगातार भर भी रही हैं, भले ही वह ज़मीन पर गिरता उनका वीर्य ही क्यों न हो। इसी श्रंखला की दूसरी कविता में कवि इंसान और सभ्यता के बारे में ये बयान देता है कि

इस मिट्टी को ज़रा कुरेदिए, इसमें आपको
हमारी महान जनता की पसलियों के टुकड़े और सभ्यता के चिथड़े मिलेंगे


हिन्दुस्तान के नए-पुराने इतिहास और उसमें मौजूद कितने ही पेंचो-ख़म के पीछे कवि को वह महान जनता दिखाई देती है और उसके साथ हुआ सुलूक भी। असद ज़ैदी जिस तरह हिन्दुस्तान के इतिहास से उलझते दिखाई देते हैं, उससे मुझे वह मशहूर शे´र याद आता है कि

` मेरी हिम्मत देखिए , मेरी तबीयत देखिए ,
जो सुलझ जाती है गुत्थी फिर से उलझाता हूँ मै !´

हक़ीक़त तो यह है कि गुत्थी कभी ठीक से सुलझी ही नहीं, सुलझाने वालों ने बस `सब ठीक है´ का एक भ्रम पैदा किया, जिसे मीर, ग़ालिब, निराला(उनकी विक्षिप्तता के वर्ष), नागार्जुन, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, धूमिल, चंद्रकांत देवताले, विष्णु खरे, आलोक धन्वा, वीरेन डंगवाल, मनमोहन मंगलेश डबराल इत्यादि से लेकर आज असद ज़ैदी तक कई-कई साहसी जन समय-समय पर तोड़ते रहे हैं। इस संकलन में कई कविताएँ हैं, जो भारतीय फासीवाद और साम्प्रदायिकता के प्रश्नों से सीधे टकराती हैं और उनमें जज़्ब होकर नहीं रह जातीं, बल्कि कवि और पाठक के पास बूमरैंग की बार-बार तरह लौट कर आती हैं। अयोध्या में कुछ क़ब्रें, कौन नहीं जानता, इस्लामाबाद, हिंदू सांसद जैसी कविताएँ इस संकलन को एक ख़ुसूसियत प्रदान करती हैं। हम बानगी के तौर पर `इस्लामाबाद´ को देख सकते हैं, जहाँ -

मेरे साथ चलते शुक्ल जी से जब रहा न गया
तो बोले :
मेरे विचार से तो अब हमें इस्लामाबाद पर
परमाणु बम गिरा ही देना चाहिए !

मेरे हिसाब से यहाँ `शुक्ल जी´ की जगह महज `मित्र´ भर होता, तब भी काम निभ जाता लेकिन ज़िद की हद तक जोखिम उठाना जैसे कवि की फि़तरत में शामिल है। जिस इस्लामाबाद या पाकिस्तान पर बम गिराने की बात हो रही है, वहाँ आज भी अनगिन हिन्दुस्तानी मुसलमानों की आपाएँ, मौसियाँ, फूफियाँ वगैरह रहती हैं। वहाँ सिर्फ़ एक क़ौम नहीं बसती, बल्कि कुछ कोमल और अब तक लगभग अपरिभाषेय रहे रिश्ते भी बसते हैं। पता नहीं क्यों मुझे असद ज़ैदी को पढ़ते हुए बार-बार शानी याद आ जाते हैं। उनकी वह बेचैनी और तल्ख़ी मानो इन कविताओं में फिर लौट आयी है। अगर हम शानी की कुछ कहानियों और `काला जल´ के साथ असद ज़ैदी के अब तक के अट्ठाईससाला प्रकाशित कविकर्म की तुलना करें , तो स्पष्ट रूप से दोनों को एक ही ज़मीन पर खड़ा पाएंगे और मुझे नहीं लगता कि ये महज एक इत्तेफ़ाक होगा। जैसे शानी से उनकी कहानी `युद्ध´ का अर्थ पूछा गया था, वैसे ही असद ज़ैदी से शायद उनकी कविता `पूरब दिशा´ का अर्थ पूछा जाएगा और हैरत नहीं कि पूछने वालों में उनके मुझ जैसे पाठक भी शामिल हों। इस कविता ने मुझे बहुत परेशान किया है और मेरी यह हार्दिक कामना है कि ये अर्थ जब भी खुले तो वैसे ही खुले जैसा `युद्ध´ का खुला - जहाँ पाठक अनगिनत व्याख्याओं के कुहासे के बावजूद और देर से ही सही, पर उस तथाकथित राष्ट्रवाद की असलियत पहचान तो पाते हैं, जो देश और समाज की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि एक व्यापक छल को छुपाने के लिए इस्तेमाल होता आया है।


आइए अब इतिहास, विचार और तमाम बुद्धिवादी विमर्श के परे उन कोमल और गुनगुने रिश्तों की बात करें, जिनका एक छोटा-सा उल्लेख ऊपर हुआ है। असद ज़ैदी अपनी फि़तरत में ही शायद कहीं बहुत गहरे मानवीय रिश्तों के भी कवि हैं। उनके पहले ही संकलन का नाम इसकी गवाही देता है और उसमें मौजूद कविताएँ तो शायद ही कभी भुलायी जा सकें। अपने नए संकलन के सन्दर्भ में कवि को स्वीकारना होगा कि उसके काव्य-व्यक्तित्व में रिश्तों की ये आभा कुछ धुंधलायी है। यहाँ बहनें, 1965 या संस्कार जैसी कविताओं की याद भर बाक़ी है, जो `घर की बात´ सरीखी कविताओं में अनायास ही व्यक्त हो जाती है।


`सामान की तलाश´ के कवि के स्वभाव में एक ख़ास तरह का बौद्धिक विमर्श और उससे अनायास ही पैदा होने वाली रुक्षता भी बढ़ी है। हालाँकि मेरा इससे कोई स्वभावगत विरोध नहीं है और इसे हम एक बार फिर समय और अंतराल के तर्कों से परिभाषित कर सकते हैं, लेकिन नहीं ! बिल्कुल नहीं ! बार-बार ऐसा करना हमारे भीतर मरते मनुष्यों को और मारना होगा। मैं ऐसी कोई कोशिश नहीं करूँगा, बल्कि कवि से भी कहूँगा कि इतिहास को खंगालने और संक्रमणकाल के जीवन को आँकने के अपने काव्य-सामर्थ्य में आप भले ही बहुत आगे चले गए हैं, लेकिन एक बहुत प्रिय, बहुत आत्मीय और बहुत ज़रूरी दुनिया पीछे छूटती जा रही है - कृपया उसे भी पलटकर देखिए। यह बीती हुई ही सही, लेकिन आपकी अपनी दुनिया है। जिस `नाराज़ ऊर्जा, रूहानी वलवले और उससे पैदा मासूम आशावाद को देखकर´ आप अब झेंपते हैं, वह कहीं न कहीं मेरी पीढ़ी को ताक़त देता है।


असद ज़ैदी की पिछली और नई सभी कविताओं में छोटी कविताएँ बहुतायत में मौजूद हैं। इनके लिए मेरा यह मानना है कि अपने आकार के छोटेपन में ये दरअसल पाठक या श्रोता को अपने भीतर एक अजीब-सा अवकाश या स्पेस मुहैय्या कराती हैं। वहाँ हम उस कविता के छोर को पकड़ कर अपनी एक निजी यात्रा शुरू कर देते हैं। समकालीन काव्य परिदृश्य पर बहुत कम कवि हैं, जो ऐसा कर पाते हों। असद ज़ैदी की काव्यभाषा निस्संदेह वही हिंदी है, जो बाद तक बचेगी। उन्होंने उर्दू के मिटते जाने का सवाल भी अपने नए संकलन में बड़ी टीस के साथ उठाया है। इस मस्अले पर मेरा सोचना कुछ अलग है। मेरा मानना है कि जो लुप्त होगी, वह उर्दू नहीं, बल्कि उसकी लिपि होगी। हिंदी में उर्दू के शायरों को अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल है। मैं उर्दू के प्रति कवि की तर्कवान नास्टेल्जिक अभिव्यक्ति को भी समझ पा रहा हूँ, लेकिन उसके बरअक्स हिंदी को फासीवादी या साम्प्रदायिकता के एकतरफ़ा आईने में देख पाने में असमर्थ हूँ - मुझे तो उसे बोलने वाली असद जी की वही महान जनता दिखाई देती है, जो हिन्दुस्तान में करोड़ों की संख्या में मौजूद है और तरह-तरह से संकटग्रस्त एक दुनिया में किसी तरह अपना जीवन जी रही है। उसकी बोलचाल की भाषा में आधे शब्द उर्दू के होते हैं। मीर और ग़ालिब का नाम हम अकसर लेते रहते हैं और उनके शे´र जीवन के हर मोड़ पर हमारे सामने आ जाते हैं - वे हमारे जीवन में इसलिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि नागरी लिपि में उपलब्ध हैं, वरना कितने लेखक या पाठक हैं, जो इन्हें पढ़ने के लिए लिपि सीखने की ज़हमत भी उठाएंगे। इसे मेरी निजी समझ माना जा सकता है, लेकिन मेरे हिस्से की हक़ीक़त तो यही है।


बस इतना ही....... क्योंकि ख़ुद असद ज़ैदी के ही शब्दों में

क्या करूँ व्याख्या का इतना काम आन पड़ा है
हकलाने के अलावा मैं और कर ही क्या सकता हूँ

इतनी ही मेरी मनुष्यता है बस कि
एकाध और मनुष्य के बैठने की जगह साफ़ कर दूँ


ख़ुदा करे कि `सामान की तलाश´ पर बहस जारी रहे और जहाँ मैं ग़लत हूँ, वहाँ मुझे मेरी ग़लतियों का पता भी चलता रहे।
आमीन !


Saturday, December 19, 2009

रॉबर्टो सोसा की कविताएँ

अमेरिका के छोटे से गणराज्य होंदुरास को दुनिया ने जाना वहां जून में हुए दक्षिणपंथी तख्ता-पलट के बाद। कवि-लेखक-संपादक रॉबर्टो सोसा मध्य अमेरिका के साहित्य का प्रतिनिधि स्वर हैं। अपने शुरूआती दिन अत्यंत विपन्नावस्था में काट चुके सोसा के लिए कविता 'दि लास्ट रिमेनिंग लाइट हाउस इन दि यूनिवर्स' है. दमनकारी सरकारों के मुखर आलोचक सोसा ने 'अभिव्यक्ति के खतरे' खूब उठाये; कभी उनकी कविताओं पर पाबंदी लगी तो कभी जान से मारने की धमकियाँमिलीं।

तख्ता-पलट के बाद सोसा को देश छोड़ कर पड़ोसी राष्ट्र निकारागुआ में शरण लेनी पड़ी थी. 'दि प्रोग्रेसिव' के नवम्बर अंक में छपे अपने वक्तव्य में उन्होंने वर्तमान सैन्य सरकार के खिलाफ अपनी आवाज़ उसी बेबाकी के साथ बुलंद की जिसके लिए वे जाने जाते हैं।
***
यहाँ प्रस्तुत हैं (मूल स्पैनिश कविताओं के) हिंदी अनुवाद बरास्ता जो ऐन एंगेबेअत (Joe Anne Engelbert) के अंग्रेजी अनुवादों के।

ग़रीब

ग़रीब हैं बहुतेरे
और इसीलिए नामुमकिन है
उन्हें भुलाना

हर नई सुबह बेशक वे ताकते हैं

इमारत दर इमारत
जहाँ वे बनाना चाहते हैं
अपने बच्चों के लिए घर.

वे क़ाबिल हैं
एक सितारे का ताबूत
अपने कन्धों पर ढोने में.
वे कर सकते हैं हवाओं को तार-तार
सूरज को ढँक लेने वाले
पगलाए परिंदों की भांति

मगर अपनी विशेषताओं से अनभिज्ञ, वे करते हैं प्रवेश
रक्त के दर्पणों से होकर
और उन्हीं से होकर लौट जाते हैं
वे चलते हैं धीरे-धीरे
और धीरे-धीरे ही मरते हैं.

और इसीलिए नामुमकिन है
उन्हें भुलाना.
***

बेहिसाब बारिश ( अन्तिम न्याय का दस्तावेज़)


सौ दिनों और सौ रातों तक बिना रुके
बारिश हुई है
और शहर की धुरियाँ
बेहद जटिल कोण बना रही हैं. आज जब
गणराज्य के राष्ट्रपति प्रयत्नपूर्वक अपने बिस्तर से उठे
तो अजीब तरह से एक ओर झुके हुए थे
ऐसा ही उनके विश्वस्त सहयोगियों के साथ भी हुआ: मिलनसार पादरियों,
कई सारे सदाबहार अन्तर्राष्ट्रीय नेतागणों,
सनसनीखेज़ आकारों वाली सेक्रेटरियों
और जोखिम भरे अंदाज़ में उड़ान भरते
जंगली मदमस्त गिद्धों के झुण्ड के साथ.

ऑरोरा बोरेलिस* के नज़दीक नज़ारों की नर्म घास पर
अपने माशूकों के साथ लेटी हुई औरतों ने
अजीब मुद्राएँ अपना लीं.
और ऐसा ही किया

सेवकों की उदासी ने,
और अंगरक्षकों, सूदखोरों और बीमा एजेंटों की
संदेहास्पद भलाई ने
लोग टपक पड़े मक्खियों की तरह, गरीब लेखक और पत्रकार
जिनके चेहरों पर अमिट स्याही से बनाये गए भयानक टीसते निशान,
रक्ताभ पेयों की लत वाले
रिटायर्ड गैंगस्टर (निशानों के
निर्माता) और राजनीतिक पेचीदगियों
और महाजनी की परिवर्तनशील धुंध की
सूक्ष्म आन्तरिक कार्यप्रणाली
के अचूक विशेषज्ञ.

इतनी बारिश हुई
कि यातायात थम गया
और वाद्य-यन्त्र गूंगे हो गए.
***
*ध्रुवीय प्रदेशों में प्रायः रात के वक़्त दिखाई देने वाले प्राकृतिक प्रकाश के नयनाभिराम दृश्यों को ऑरोरा कहा जाता है. ऑरोरा बोरेलिस उत्तरी गोलार्ध के ऑरोरा को कहते हैं.

Friday, December 18, 2009

हरेप्रकाश उपाध्याय की कविता

हरेप्रकाश उपाध्याय युवा पीढी के कवियों में एक चर्चित नाम है। उन्हें २००६ का अंकुर मिश्र कविता पुरस्कार मिला है और इस वर्ष उनका पहला संग्रह "खिलाड़ी दोस्त और अन्य कविताएँ" ज्ञानपीठ प्रकाशन से छप कर आया है।

वर्तमान परिदृश्य में

यह जो वर्तमान है
ताजमहल की ऐतिहासिकता को चुनौती देता हुआ
इसके परिदृश्य में
कुछ सड़कें हैं काली-कलूटी
एक दूसरे को रौंदकर पार जातीं

बालू से भरी नदी बह रही है
पानी है, मगर मटमैला

कुछ सांप हैं फन काढ़े हुए
कुछ नेवले मरे पड़े हैं
जाने कितना लीटर खून बिखरा है
जाने किसका है

एक कुत्ता हड्डी चाट रहा है
कुत्ते की बात से
याद आया वह दृश्य
जिसमें पत्तलों की झीनाझपटी खेलते थे कुत्ते
यह दृश्य इस परिदृश्य में
कहीं नहीं है

इस परिदृश्य में एक पोस्टर है
इसमें लगभग बीस साल का लड़का
चालीस साल की औरत की नाभि में वंशी डुबोए हुए है
पोस्टर के सामने क़रीब दस साल का लड़का मूत रहा है
बगल में गदहा खड़ा है

इसकी आंखों में कीचड़
पैरों में पगहा
और पीठ पर डंडे के दाग़ हैं
यह आसमान में थूथन उठाए
कुछ खोज रहा है

सफ़ेदपोश एक
भाषण दे रहा है हवा में
हवा में उड़ रही है धूल
वृक्षों से झड़ रही हैं पत्तियां
मगर मौसम पतझड़ का नहीं है
परिदृश्य में नमी है

इस परिदृश्य में
मंदिर है मस्जिद है
दशहरा और बकरीद है
आमने सामने दोनों की मिट्टी पलीद है

प्रभु ईसा हैं क्रास पर ठुके हुए
महावीर नंगे बुद्ध उदास
गुरु गोविंद सिंह हैं खड़े
विशाल पहाड़ के पास
यहीं ग़लत जगह पर उठती दीवार है
एक भीड़ है उन्मादी
इसे दंगे का विचार है

सीड़ और दुर्गन्ध से त्रस्त
साढ़े तीन हाथ ज़मीन पर पसरा
इसी परिदृश्य में
मैं कविता लिख रहा हूं।


***

Wednesday, December 16, 2009

पंकज चतुर्वेदी की पाँच कविताएँ


गोया

कार से टकराते बचा
वह आदमी भी
कार चलाती स्त्री को
देखकर मुस्कराया
गोया औरत के हाथों
मारा जाना भी
कोई सुख हो
***

शमीम

जाड़े की सर्द रात
समय तीन-साढ़े तीन बजे
रेलवे स्टेशन पर
घर जाने के लिए
मुझे ऑटो की तलाश

आख़िर जितने पैसे मैं दे सकता था
उनमें मुझे मिला
ऑटो-ड्राइवर एक लड़का
उम्र सत्रह-अठारह साल

मैंने कहा : मस्जिद के नीचे
जो पान की दुकान है
ज़रा वहाँ से होते हुए चलना
रास्ते में उसने पूछा :
क्या आप मुसलमान हैं....

उसके पूछने में
प्यार की एक तरस थी
इसलिए मैंने कहा : नहीं,
पर होते तो अच्छा होता

फिर इतनी ठंडी हवा थी सख़्त
ऑटो की इतनी घरघराहट
कि और कोई बात नहीं हो सकी

लगभग आधा घंटे में
सफ़र ख़त्म हुआ
किराया देते वक़्त मैंने पूछा :
तुम्हारा नाम क्या है.....

उसने जवाब दिया : शमीम खान

नाम में ऐसी कशिश थी
कि मैंने कहा :
बहुत अच्छा नाम है

फिर पूछा :
तुम पढ़ते नहीं हो...

एक टूटा हुआ-सा वाक्य सुनायी पड़ा :
कहाँ से पढ़ें....

यही मेरे प्यार की हद थी
और इज़हार की भी
***

छब्बीस जनवरी को

छब्बीस जनवरी को
पुलिसवाले आये
हमारी दुकानें खुली थीं
इनकी फ़ोटो खींच ली

फिर फ़ोटो के सुबूत की बिना पर
हमें पीटा
थाने ले गये
हमसे रिश्वत वसूल की

जिस दिन देश गणतन्त्र हुआ था
उस दिन आम आदमी को
रोज़ी कमाना मना है

ख़ुशी मनाना अनिवार्य है
भले वह विपन्नता की ख़ुशी हो

टाइपिस्ट ने कहा :
आज आपकी कविता
टाइप नहीं हो सकती

मेरे विचार, मेरे स्वप्न
मेरे एहसास
मेरा सौन्दर्य-बोध
आज जारी नहीं हो सकता

कवि की छुट्टी का कोई दिन नहीं है
मगर आज के दिन
देश गणतन्त्र हुआ था

आज ख़ुशी मनाना अनिवार्य है
भले यह तुम्हें याद दिलाने के लिए हो
कि तुम ख़ुश नहीं हो
और यह
कि एक दिन तुम ग़ुलाम थे
***

आभार

एक प्रदेश की राजधानी में मिले वह
राष्ट्रीय परिसंवाद में
एक विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर
हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक

नींद से जगाकर पहली ख़बर
उन्होंने मुझे यही दी -
`मैं विभागाध्यक्ष नहीं बन पाया´

मैं समझ नहीं सका
इस बात का
मेरी ज़िन्दगी से
क्या सम्बन्ध है

तभी वहाँ आये मेरे मित्र
मैंने उनसे परिचय कराया -
ये गिरिराज किराडू हैं
युवा कवि
`प्रतिलिपि´ के संपादक

बाद में उन्होंने पूछा -
`किराडू क्या तमिलनाडु का है....´

मैंने कहा : नहीं
पर आपको ऐसा क्यों लगा ...

वह बोले : किराडू
चेराबंडू राजू से
मिलता-जुलता नाम है

वैसे जो नाम वह ले रहे थे
सही रूप में चेरबंडा राजु है
क्रांतिकारी तेलुगु कवि का

फिर उन्होंने किसी प्रसंग में कहा :
स्त्रियाँ पुरुषों को
एक उम्र के बाद
दया का पात्र
समझने लगती हैं

परिसंवाद के आखिरी दिन
उन्हें बोलना था
`आलोचना के सौन्दर्य-विमर्श´ पर
मगर उससे पहले उनकी ट्रेन थी
इसलिए आयोजकों ने चाहा
कि वह `आलोचना के समाज-विमर्श´ पर
कुछ कहें

यों एक सत्र का शीर्षक
`आलोचना का धर्म-विमर्श´ भी था

उन्होंने मुझसे कहा :
इस सत्र में बोलने को कहा जाता
तो ज़्यादा ठीक रहता

फिर कारण बताया :
हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ आलोचना
धर्म ही पर न लिखी गयी है

बहरहाल। उन्होंने अपने सत्र
`आलोचना का समाज-विमर्श´ में
जो कुछ कहा
उसका सारांश यह है :
पहले भी दो बार बुलाया था यहाँ
व्यवस्था अच्छी है
आभारी हूँ
इस बार भी
आभार
***

वृक्षारोपण

प्रबोध जी अध्यापक हैं
ज़िला शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान में

एक दिन सरकारी निर्देशों के मुताबिक़
वहाँ वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन हुआ

मुख्य अतिथि बनाये गये
संयुक्त शिक्षा निदेशक
यानी जे.डी. साहब
प्रबोध जी को संचालन सौंपा गया

प्राचार्या ने स्वागत-भाषण में
जे.डी. साहब के लिए वही कहा
जो कबीर ने प्रभु की
महिमा में कहा था :
``सात समुंद की मसि करौं,
लेखनि सब बनराइ।
धरनी सब कागद करौं,
हरि गुन लिखा न जाइ।।´´

प्रबोध जी से रहा नहीं गया
संचालक की हैसियत से वह बोले :
`जब मुख्य अतिथि की तारीफ़ में
काट डाले जायेंगे बनराइ
तो वृक्षारोपण
क्यों करते हो भाई .....´
***
_________________________
पंकज चतुर्वेदी, 203, उत्सव अपार्टमेंट, 379, लखनपुर, कानपुर (उ0प्र0)-208024
फ़ोन-(0512)-2580975
_________________________

Monday, December 14, 2009

लाल्टू - कविता की अपनी बौद्धिक दुनिया है !


***
एक पुरानी पोस्ट को फिर से लगा रहा हूँ दोस्तो.......
***
(कुछ समय पहले मैंने अनुनाद पर लाल्टू को छापा था और वक्तव्य सहित कविताएं भेजने का अनुरोध भी उनसे किया था। उन्होंने मेरे अनुरोध की रक्षा की है। प्रस्तुत है उनका वक्तव्य और कविताएं)

अपनी कविता पर टिप्पणी करने के कई जोखिम हैं। कुछ दोस्त नाक-भौंह सिकोड़ते हैं कि कविता अपने आप ही रास्ते नहीं दिखाती तो वह कविता क्या, यानी टिप्पणी की ज़रूरत ही क्या? मुसीबत यह कि अकसर जीवन में जन या लोकपक्षधरता से मीलों दूर रहने वाले लोग साहित्य-कर्म से यह मांग करते हैं कि वह सबके पढ़ने और समझने लायक होना चाहिए। तो क्या हर वैचारिक तत्व हर किसी के पल्ले पड़ सकता है? ऐसा हो तो इससे अच्छा क्या? पर ऐसा होता नहीं है। न केवल दुनिया के अधिकतर लोग अनपढ़ हैं, जो पढ़े-लिखे भी हैं उनकी महारत अलग-अलग विषयों में है। कविता की अपनी बौद्धिक दुनिया है। कविता भी वर्षों की साधना मांगती है। चूंकि कविता में मूल बात संवेदना है और कम से कम आधुनिक काल के बारे में कहा जा सकता है कि मानव संवेदना के अनन्त धरातलों में जीता है, इसलिए कविता से कोई एक निश्चित अर्थ की मांग रखना ग़लत है। मैं मानता हूं कि मेरे वैचारिक पूर्वाग्रह मेरी कविता में अभिव्यक्त होते हैं, पर चूंकि मैं जीवन में कोई निश्चित राह नहीं ढूंढ पाया हूं इसलिए मेरी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति भी निश्चित नहीं है।

कई दोस्तों को इस बात से नाराज़गी है कि मेरी कविता में बौद्धिक तत्व हैं। मैं समझता हूं कि ऐसी बातें, जो आम लोगों के समझ में आ जाएं और उनमें बौद्धिक तत्व न हों, किसी काम की नहीं। हां, यह ज़रूरी ज़रूर है कि जो कहा गया, उसे सरल ढंग से कैसे कहा जाए? पर इक्कीस क्लासें पढ़कर भी अगर साहित्य कर्म में मैं कोई बौद्धिक तत्व न ला पाऊं तो लानत है मुझ पर और मेरे अध्यापकों पर !

मसलन पंद्रह साल पहले की एक बहस को लें, जो जनविज्ञान कार्यकर्ताओं की एक सभा में हुई। मेरे कहने पर एक सत्र " मध्यवर्ग के सामाजिक कार्यकर्त्ता का विभाजित व्यक्तित्व" पर रखा गया। बहस पुरजोर थी। गांधीवादी और वामपंथी कार्यकर्ताओं के बीच खींचातानी चल रही थी। जब मैं पर्याप्त रूप से ऊब चुका तो जेब से पाकेट डायरी निकाल कर देखने लगा, जिसमें हर पन्ने पर दो दिनों के लिए जगह थी। हर दिन की जगह के नीचे उस दिन हुई घटनाओं के बारे में जिक्र था। मैंने ग़ौर किया कि तेईस अक्टूबर का वह दिन औरंगज़ेब का जन्मदिन था, उस दिन सुभाषचंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फौज की स्थापना की थी और उसी दिन लेनिन से ज़ारशाही के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का ऐलान किया था। मुझे लगा कि यह अद्भुत बात है उस दिन हम बहस में शामिल थे। मैंने सबको रोका और उस दिन के बारे में बताया। बहस रुकी, फिर चली और आखिरकार शाम को हम छोटे-छोटे गुटों में इधर उधर हो गए। उन दिनों समाज विज्ञान के हलकों में फुकोयामा के `इतिहास के अंत´ पर चर्चा जोरों पर थी। मैंने सोचा कि इतिहास का बनना महज एक यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है। और अगर मार्क्स ने इतिहास के यांत्रिक नियमों को देखा भी, तो यह तो हर कोई जानता है कि मनुष्य की पीड़ा मार्क्स के चिंतन के केंद्र में थी। मुझे लगा हर कोई इतिहास के निर्माण की प्रक्रिया में जुटा है, जैसे उस दिन हम लोग अगम प्रसाद शुक्ल की पहल पर एक इतिहास बना रहे थे। अचानक मुझे लगा कि मानव का बौद्धिक कर्म कितना अद्भुत है। कैसे बेहतर दुनिया के सपने देखते, एक दूसरे से प्यार करते हुए हम लगातार इतिहास बनाते हैं। मैंने ये बातें उस दिन डायरी में लिखीं -

उस दिन हम लोग सोच रहे थे अपने विभाजित व्यक्तित्वों के बारे में
रोटियों और सपनों की गड़बड़ के बारे में

बहस छिड़ी थी विकास पर
भविष्य की आस पर

सूरज डूबने पर गाए गीत हमने हाथों में हाथ रख
बात चली उस दिन देर रात तक
जमा हो रहा था धीरे -धीरे बहुत-सा प्यार
पूर्णिमा को बीते हो चुके थे पांच दिन

चांद का मुंह देखते ही हवा बह चली थी अचानक
गहरी उस रात पहली बार स्तब्ध खड़े थे हम

डायरी में तेईस अक्टूबर का अवसान हुआ बस यहीं पर

`चांद का मुंह´ हमें मुक्तिबोध से जोड़ता है जो हमारी कविता के इतिहास में एक बहुत बड़ा पड़ाव है। यह कविता मेरा फुकोयामा के खिलाफ प्रतिवाद है, जिसे मैंने इस तरह से लिखा। कुछ साथियों को इससे आपत्ति है कि ऐसे लेखन में वैचारिक प्रतिबद्धता है। यह उनको मुबारक कि वे नहीं जानते कि कुछ भी कहा जाए, कैसे भी कहा जाए, वैचारिक प्रतिबद्धता हर बात में है। कभी वह यथास्थिति के पक्ष में है, कभी ख़िलाफ!

कविता तो कविता तब है, अगर इसमें पीड़ा है। अगर नहीं है तो यह कविता नहीं है। यह पीड़ा प्यार की पीड़ा है। यह चर-अचर हर किसी से प्यार की पीड़ा है। पूंजीवाद के पक्ष में इतिहास का अंत घोषित करनेवाले फुकोयामा बाज़ार को मानव के भाग्यनिर्माता के रूप में देखते हैं। बाज़ार में खरीदने-बिकने की सामग्री तो होती है, पर प्यार नहीं होता।

बहरहाल, समाज से जुड़ने के मेरे अपने तरीके हैं। वैचारिक प्रतिबद्धता की घोषणा के लिए मैं कविता नहीं लिखता। कविता तो इसलिए लिखता हूं कि कविता लिखने का मन करता है। वह दूसरों को कैसी लगी, यह उनकी बात। सही है, हर कोई क्यों किसी की कविता पढ़े? यह मांग कोई कवि नहीं कर सकता कि हर कोई उसके लिखे को पढ़ने-सुनने लायक कविता कहे। यह तो कविता के संसार में सक्रिय लोगों की जिम्मेदारी है कि वे पहचानें क्या ठीक लिखा जा रहा है और क्या नहीं? कहां नया मुहावरा गढ़ा जा रहा है, कहां नहीं?


कविताएं



वही चौराहा

वही चौराहा है
एक कोने पर आकर मुड़कर देखता हूं
देखता ही रहता हूं
गाड़ी, बस, स्कूटर, आटो
विश्व के तमाम चलमान यंत्र मेरे ऊपर चढ़ते आते हैं
जाने कैसे मैं अपने आप को सड़क के दूसरी ओर पाता हूं
सृष्टि के रहस्यों में यह भी है
कि दिन के व्यस्ततम समय में भी शहर के इस व्यस्ततम चौराहे को मैं देर-सबेर पार कर ही लेता हूं

थोड़ी ही दूर पर अगली सदियों के लिए
दरवाज़े हैं
इन दरवाज़ों के ठीक विपरीत सड़क की दूसरी ओर
जिवदानी आयुर्वेदी दवाखाना का बोर्ड लगाए तम्बू लगे हैं
बोलो प्रोफेसर
यह जो जवाना मर्दानगी पेशाब आदि की चिकित्सा करता टेप चलता रहता है निरंतर इन तंबुओ में
आवाज़ जो इन भविष्य की सदियों के दरवाज़ों को पार करती
हमारे साथ प्रविष्ट होती है आई.टी. संस्थान के अंदर
धता बताती हमारी तर्कशीलता को
क्या यह उत्तरआधुनिक है
या प्राक् आधुनिक?

मैं सड़क की आत्मा को महसूस करता हूं
मेरे साथ जीती है लम्बे समय तक
बड़ी की जगह ग़लती से इस्तेमाल की गई
छोटी `इ´ की मात्रा
अगले दिनों के इंतज़ार में !


मैं लिखता हूं

मैं लिखता हूं क्योंकि बारिश होती इन दिनों
डागर बंधु गाते मियां की मल्हार
क्योंकि नदियां बहतीं मतवाली
पुकारतीं मुझे धरती के अनजान कोनों से

मैं लिखता हूं क्योंकि जुल्म नहीं रुकता
क्योंकि लोग मर रहे हैं
बच्चे मर रहे हैं
जंग छिड़ी हुई है
धरती के सीने पर जगह जगह

मैं लिखता हूं
क्योंकि मेरे दिल में उठती है हूक प्यार की
हर अपने बेगाने के लिए
मैं लिखता हूं
क्योंकि फरीद का बेटा हूं
मुझे पैदा करनी हैं संतानें
आज़ादी के नशे में मतवाली
मैं गोविंद का बेटा हूं
मैं सत्य, मैं श्री, मैं अकाल
मैं धूमिल, मैं निराला, मैं पाश, सुकांत
मैं ढूंढता हूं ब्रेख़्त, लैंगस्टन ह्यूज़ खुद में
मैंने रवीन्द्र से सीखी है बात
कि आस्मान सूरज और तारों से भरा है
मैं गाता हूं पूर्वजों के गीत
मैं गाता हूं भविष्य के लिए
मैं लिखता हूं

मैं औरतों से प्यार करता हूं
मैं माओ के साथ कहता हूं कि औरतें
आधा आस्मान थामे हुई हैं
मैं उस आस्मान के तले हूं
मैं लिखता हूं कि औरत का शरीर
सबसे खूबसूरत कविता है दुनिया में
जैसे है सबसे खूबसूरत उसका मन
मैं लिखता हूं कि मुझे
उन तमाम पुरुषों से है नफ़रत
जो औरत को औरत नहीं समझते
जो औरत को इंसान नहीं समझते

मैं लिखता हूं
क्योंकि मैं एक औरत का बेटा हूं
और मैंने जाना है कि जब एक औरत रोती है
तो पृथ्वी हिल जाती है अपनी धुरी से
बहुत कुछ ग़लत है इस दुनिया में
जब रो रही हैं औरतें

मैं लिखता हूं
किसी प्रेतछाया के लिए नहीं
बनने वह दीप जो बुझ जाए एक दिन
नहीं
मैं साफ़ स्पष्ट आदमी की आवाज़ हूं

मैं लिखता हूं क्योंकि बारिश होती इन दिनों
डागर बंधु गाते मियां की मल्हार
क्योंकि नदियां बहतीं मतवाली
पुकारतीं मुझे धरती के अनजान कोनों से !


_______________

Saturday, December 12, 2009

पदयात्रा के पद : काव्य- कथा / गिरिराज किराडू

आज से कई बरस पहले जब यतींद्र मिश्र ने एक बहुत अच्छी और खुली पत्रिका सहित शुरू की थी तब उसके दूसरे या तीसरे अंक में (शायद अक्टूबर 2001 में) यह पाठ पहली बार प्रकाशित हुआ था। अनुनाद पर कुछ समय पहले प्रकाशित काव्य-कथा बोरहेस और हिमालया लिखने के बाद जब मैंने अपनी बयाज़ों को टटोला तो वहाँ दो ऐसे पाठ मिले जो ऐन वही चीज़ थे जिसे काव्य-कथा कहना शुरू किया है मैंने। ‘पदयात्रा के पद’ के अलावा दूसरा टैक्स्ट ‘वनवास’ था जो पूर्वग्रह में उन्हीं दिनों प्रकाशित हुआ था।

मेरे शहर बीकानेर से साठ कोस की दूरी पर रामदेवरा है, विख्यात/कुख्यात पोखरण की बगल में। वह रामदेवजी या रामसा पीर का स्थान है। हमारे जैसे लोग रामदेवजी को को कम्पोजिट कल्चर का बेमिसाल नमूना मानते हैं पर ज्यादातर लोग एक ऐसा देव या पीर जो उनके दुख दूर करेगा, उनकी दुआएँ सुनेगा। कोई सरकार या एक्टिविस्ट या क्रांतिकारी उन तक पहुँचे या ना पहुँचे वह उन तक जरूर पहुँचेगा। अपने देवों, भगवानों से भारतीयों का संबंध खासा ‘भौतिकतावादी’ रहा है – जो देव कोई काम न करे, ‘परचा’ न दिखाये वह लोकप्रिय नहीं हो सकता। लाखों की तादाद में लोग एक वार्षिक मेले के लिये कई राज्यों से आते हैं। कई कई दिनों तक पदयात्रियों के जत्थे और राह में उनकी देखभाल करने वाले दस्ते शहर से निकलते हुए दिखते रहते हैं। पदयात्रा करने वाले साधनहीन हो यह भी जरूरी नहीं।

मेरे घर में दादी सबसे कट्टर धार्मिक रही हैं, परले दर्जे की ‘वैष्णव’- कुछ ऐसी कि वैष्णव की गाँधीजी वाली व्याख्या सुना दें तो छि छि करते हुए नहाने चली जाये। उधर मेरे नाना रामसा पीर के भक्त। कलकत्ते से हर साल आते सिर्फ उन्हीं के सपरिवार दर्शन के लिये। सपरिवार याने उनके बेटे- बेटियों, भाई-बहनों के परिवार; एक बस भर जातरी लेकर वे निकलते। दादी काफ़ी नीचा समझती हमारे नाना को, हमको और हमारे देव को भी। नाना के कराये हुए बचपन के उस धार्मिक पर्यटन की याद में, उनके निर्विकल्प रूप से आस्थाहीन दोहिते की ओर से यह कथा खुद उनकी याद के भी नाम। ज्यादातर बस की खिड़कियों से देखे हुए, अपनी असहायता और आस्था में तत्क्षण अकेले और जत्थेदार वे पदयात्री अब नाना की तरह ही अचानक याद आ जाते हैं और किसी ऐसी जगह खड़े खड़े रुला देते हैं जहाँ तमाशबीन इसी मौके के इंतज़ार में होते हैं कि इधर आप रोयें और उधर वे ठहाका लगायें।
- कवि

पदयात्रा के पद

एक
*
उनके साथ यात्रा करने की सोचते हुए आप अनुमान करते हैं कि वे किसी अनोखी आस्था से नहीं, किसी प्राचीन धार्मिक भाव से नहीं, चमत्कार के आश्वासन से नहीं, किसी अप्रकाशित दुख से संचालित हैं लेकिन उनके साथ थोड़ी यात्रा करते ही उनको सुनने पर आपको लगेगा कि वे अपने जीवन में सिर्फ यह उत्सवी यात्रा करते हुए ही जैसे उत्साह के परिचित होते हैं, कि उनका जीवन लगातार किसी इस या उस ईश्वर के हाथों प्रताड़ित है और यह या वह ईश्वर ही उसका उपचार कर सकता है, कि कोई न कोई मुश्किल आस्मां बनकर उनके सर पर तनी रही और ऐसा कोई वक्त न रहा जब आस्मां सर पर तना न था, कि इस या उस और खासकर इसी ईश्वर ने उनकी नहीं सुनी जिसकी तरफ उनके ये कदम बढ़ रहे हैं।

कि इस तरह वे अपनी मुश्किलों का लाचारी का, दुख का बयान इतना करते हैं कि वह एक प्रकाशित दुख हो जाता है और आपको उन पर एक अटपटी सी दया आती है और आपके चेहरे पर दया को देखते ही वे आपको अपने साथ से बेदखल कर देते हैं, आप उन्हें नहीं समझा पाते कि दुख के बयान सुनकर दया ही आती है और आपको इस बात से राहत महसूस होती रही है कि आपको अब तक दुख का कोई बयान सुनकर दया आती है

मुझे भी इन पदयात्रियों पर दया ही आती है पर दया करने जितना समर्थ क्योंकि मैं कभी नहीं रहा यह एक अप्रकाशित दया हो कर जाती है, क्या एक अप्रकाशित दुख और ईश्वर के बीच वही रिश्ता होता है जो एक अप्रकाशित दया और प्रकाशित दुख के बीच होता है ?

यदि आपको अब तक उन्होंने अपने साथ से बेदखल नहीं कर दिया है तो आप आखिरी कोशिश कर सकते हैं, यह साठ या अस्सी या सौ कोस लम्बी यात्रा इनके साथ कर लीजिए, शायद आप इनके उस अप्रकाशित दुख को देख, छू या जान पाएं जिसका अनुमान आपने किया था क्योंकि मुझे विश्वास है कि अपना दुख लगातार इतना कहने, इतना प्रकाशित करने के बावजूद उनके भतीर ऐसा कोई दुख है जरूर
हाँ, एक तरीका है उतना ही मुश्किल जितना आसान

आप उनके सामने, सपने में या सचमुच इस या उस ईश्वर के भेस में चले जाइये
जरा जल्दी कीजिए।

कल शाम तक तो वे इतनी दूर निकल चुके होंगे कि आप उन्हें कभी पकड़ नहीं पायेंगे।

दो
**
वह अपने पैरों की नहीं सुनती

हम अक्सर अपने पैरों की नहीं सुनते जब तक कि वे दुखने नही लग जाएँ

पैर हमें बताना चाहते हैं उन यात्राओं के बारे में जिन्हें हमें न चाहते हुए भी करना पड़ा था, उनके बारे में भी जिन्हें हम या तो भूल चुकते हैं या भूलना चाहते हैं, उन जगहों के बारे में जहाँ जाने की हमारी इच्छा अब तक पूरी नहीं हुई – यात्रा की ही नहीं हमारी सारी इच्छाएँ जैसे पैरों को पता होती हैं, इच्छाओं का निवास भले ही मन जैसी कोई जगह है लेकिन उनकी साँस पैरों में रहती है

‘तुम पैरों में कुछ पहना करो कि तुम्हारी मौजूदगी की आवाज़ दोगुनी सुनाई दे, तुम पैरों में कुछ इसलिए भी पहना करो कि बाद में कभी तुम्हारी गैर-मौजूदगी की आवाज़ भी दोगुनी सुनाई पड़े'
अब मैं उसकी गैर-मौजूदगी की दोगुनी आवाज़ सुनता हूँ

वह भी अगर अपने पैरों की सुनती, क्या यूँ मुझे अपने साथ से बेदखल करती?

तीन
***
पदयात्रियों से ज्यादा अपने पैरों को कोई नहीं सुनता

हममें से कोई जब उन्हें गिनकर बताता खासकर किसी वृद्ध यात्री को कि वह अपने जीवन में इतने हजार कोस चल चुका है तो वह कहता है कि मेरे कदमों को गिनकर बताओ तो सचमुच थकान का कोई अंदाजा हो, वह कहता यह गिनना इतना आसान नहीं इसमें थकान और इच्छा, उम्मीद और नाउम्मीद, नींद और बेहोशी को जोड़ दो

आप भी अगर उनके पैरों को सुने तो वे शायद आपको अपने साथ से कभी बेदखल न कर पाएँ

चार
****
पदयात्रियों के किस्से भी उनके पैर सुनाते हैं। वे जब बोलते हैं तो लगता है उनके पैर बोल रहे हैं, उनके किस्सों में न चाहते हुए भी चमत्कार के कई प्रसंग प्रकट होते हैं जैसे वे पूरे यकीन से आपको बतायेंगे कि जन्मजात कोई अपाहिज पचास फीट की ऊँचाई से बावड़ी में कूदा और निकलकर अपने पैरों पर चलता हुआ सीढ़ियाँ चढ़ गया

उनके लिए इससे बड़ा चमत्कार कोई नहीं कि पैर सलामत रहें

पाँच
*****
उनके हाथों में फहराती ध्वजाएँ कभी उनके हाथों का तो कभी उनके पैरों का विस्तार हो जाती हैं

‘हाथों और पैरों में कोई रिश्ता नहीं, हाथ किसी भी यात्रा में नहीं थकते और सबसे बड़ी नेमत ये है कि हाथ छू सकते हैं पैर कुछ भी छू नहीं सकते, वे सिर्फ छुए जा सकते हैं'

वे छूने के प्रति इतने शंकित हो उठते हैं कि कभी-कभी अपने हाथों से कभी कुछ नहीं छूते सिवाय उस इच्छा के जिसकी साँस उनके पैरों में रहती है

आप ध्वजाओं को छुएँ, उनके साजो सामान को छुएँ तो अपने हाथ काम में ले सकते हैं, लेकिन यदि आप अभी भी उस अप्रकाशित दुख को छूना चाहते हैं तो पैरों से छूकर दिखाइए

इससे बड़ा चमत्कार आप इपने इस जीवन में कभी नहीं कर पायेंगे

यह और बात है उन्होंने चमत्कार करने की यह कोशिश देख ली तो वे आपको अपने साथ से बेदखल कर देंगे

और आखिरी बात

उनके पैर मत छुएँ, इससे ज्यादा उन्हें कुछ भी दुखी नहीं करता

छह
******
उनके इस या उस किसी भी ईश्वर का कोई भी भेस मैंने तो कभी देखा या बनाया नहीं। उनके किसी स्थान या दरगाह तक मैं तो कभी गया नहीं

इतना सुना है पीर, फकीर, ईश्वर, देवता जैसे शब्द उनके मन में एक ही जगह रहते हैं

लेकिन वही रात को अपनी मरहम-पट्टी करते हुए कहेंगे कि उनका ईश्वर उनके पैर हैं

सात
*******
मैं और वह एक सपने में उनके पैरों की आवाज़ सुन रहे हैं, हम उस बावड़ी में कूदने ही वाले हैं जिसमें कूदकर उस अपाहिज को अपने पैर मिल गए थे, शायद हमार रिश्ते के भी पैर नहीं थे, हम सपने में चमत्कार के उनके किस्से पर शायद उनसे भी ज्यादा यकीन करते हुए उस प्राचीन पानी को कूदने से पहले आखिरी बार देख रहे हैं

माफ़ करें इस सपने में मैं आपकी यात्रा के बारे में भूल चुका हूँ

क्या हमारे कूदते ही आप भी उनके उस अप्रकाशित दुख को पैर से छू लेंगे जिसका अनुमान आपने बिल्कुल शुरू में किया था?
________________

Friday, December 11, 2009

बाबा नागार्जुन और पागलदास - बोधिसत्व

बोधिसत्व के संग्रह "दुःख-तंत्र" को पढ़ते हुए मेरा ध्यान अचानक इस बात की ओर गया कि आज हमारे इस प्रिय कवि का जन्मदिन है। मैंने रघुवीर सहाय वाली पोस्ट में नागार्जुन पर लिखी उनकी कविता का ज़िक्र किया था ...तो प्रस्तुत है उनकी ये कविता - साथ में उनकी एक और महत्वपूर्ण कविता "पागलदास" - उन्हें जन्मदिन की मुबारक़बाद के साथ।


बाबा नागार्जुन !

तुम पटने, बनारस, दिल्ली में
खोजते हो क्या
दाढ़ी-सिर खुजाते
कब तक होगा हमारा गुजर-बसर
टुटही मँड़ई में लाई-नून चबाके।

तुम्हारी यह चीलम सी नाक
चौड़ा चेहरा-माथा
सिझी हुई चमड़ी के नीचे
घुमड़े खूब तरौनी गाथा।

तुम हो हमारे हितू, बुजुरुक
सच्चे मेंठ
घुमंता-फिरंता उजबक्–चतुर
मानुष ठेंठ।

मिलना इसी जेठ-बैसाख
या अगले अगहन,
देना हमें हड्डियों में
चिर-संचित धातु गहन।
***
पागलदास

(पखावज वादक स्वामी पागलदास के लिए, जिनका 20 जनवरी 1997 को अयोध्या में देहावसान हो गया)

अयोध्या में बसकर
उदास रहते थे पागलदास
यह बताया उस मल्लाह ने
जिसने सरयू में प्रवाहित किया उन्हें।

मैंने पूछा-
आखिर क्यों उदास रहते थे पागलदास
अयोध्या में बसकर भी।

उसने कहा-
कारण तो बता सकते हैं वे ही
जो जानते हों पागलदास को ठीक से
मैं तो आते-जाते सुनता था
उनका रोदन
जिसे छुपाते थे वे पखावज की थापों में।

मैंने कहा, मुझे उनके स्थान तक ले चलो
उनके किसी जानकार से मिलाओ।

मैंने पागलदास के पट्ट शिष्यों से पूछा
क्या अयोध्या में बसकर
सचमुच उदास रहते थे पागलदास।
शिष्य कुछ बोले-बासे नहीं
बस थाप देते रहे,
मेरे आग्रह करने पर
उन्होंने मुझे दिखाया उनका कक्ष
जहाँ बंद हो गया था आना-जाना डोलना
पागलदास के पखावज भी भूल गए थे बोलना।

मैं अयोध्या में ढूंढ़ता रहा
पागलदास के जानकारों को
और लोग उनका नाम सुनते ही
चुप हो
बढ़ जाते थे।

बहुत दिन बीतने पर
मिले पागलदास के संगी
जो कभी संगत करते थे उनके साथ

उन्होंने मुझसे पूछा -
क्या करेंगे जानकर कि
अयोध्या में बसकर भी क्यों उदास रहते थे पागलदास।

उन्होंने कहा-
क्यों उदास हैं आप बनारस में
बुद्ध कपिलवस्तु में
कालिदास उज्जयिनी में
फसलें खेतों में
पत्तियाँ वृक्षों पर, लोग दिल्ली में, पटना में
दुनिया जहान में क्यों उदास हैं
आप सिर्फ यही क्यों पूछ रहे हैं
कि अयोध्या में बसकर भी क्यों उदास थे पागलदास।

मैंने कहा -
मुझे उनकी उदासी से कुछ काम नहीं
मुझे बुद्ध, कालिदास या लोगों की उदासी से
कुछ लेना-देना नहीं
मैं तो सिर्फ बताना चाहता था लोगों को
कि इस वजह से अयोध्या में बसकर भी
उदास रहते थे पागलदास।

उन्होंने बताया-
पागलदास की उदासी की जड़ थे पागलदास

मैंने कहा यह दूसरे पागलदास कौन हैं
क्या करते हैं।

उन्होंने बताया-
जैसे अयोध्या में बसती है दूसरी अयोध्या
सरजू में बहती है दूसरी सरजू
वैसे ही पागलदास में था दूसरा पागलदास
और दोनों रहते थे अलग-थलग और
उदास।

जो दूसरे पागलदास थे
वे न्याय चाहते थे
चाहते थे रक्षा हो सच की
बची रहे मर्यादा अयोध्या की
सहन नहीं होता था कुछ भी उल्टा-सीधा
क्रोधी थे पहले पागलदास की तरह
सिर्फ अपने भर से नहीं था काम-धाम
पहले पागलदास की तरह उदास होकर
बैठ नहीं गए थे घर के भीतर।

मैंने कहा-
अन्याय का विरोध तो होना ही चाहिए
होनी ही चाहिए सच की रक्षा
पर उदासी का कारण तो बताया नहीं आपने।

उन्होंने कहा-
जो पागलदास
सच की रक्षा चाहते थे
चाहते थे न्याय
वध किया गया उनका
मार दिया गया उनको घेर कर उनके ही आंगन में
एकान्त में नहीं
उनके लोगों की मौजूदगी में
और पहले पागलदास को छोड़ दिया गया
बजाने के लिए वाद्य
कला के सम्वर्धन के लिए।

दूसरे पागलदास की हत्या से
उसको न बचा पाने के संताप से
उदास रहने लगे थे पागलदास
दूसरे पागलदास के न रहने पर
उनको संगत देने वाला बचा न कोई
उन्होंने छोड़ दिया बजाना, भूल गए रंग भरना
तज गए समारोह, भूल गए कायदा, याद नहीं रहा भराव का ढंग
बचने लगे लोगों से, लोम-विलोम की गुंजायश नहीं रही।
बहुत जोर देने पर कभी बजाने बैठते तो
लगता पखावज नहीं
अपनी छाती पीट रहे हैं।

इतना कह कर वे चुप हो गए
मुझे सरजू पार कराया और बोले-
जितना जाना मैंने
पागलदास की उदासी का कारण
कह सुनाया
अब जाने सरजू कि उसके दक्षिण तरफ
बस कर भी क्यो उदास रहे पागलदास।
***

Thursday, December 10, 2009

धरती तेज़ी से अपनी स्मृति खोती जा रही है - दिलीप चित्रे

आज सुबह कविमित्र तुषार धवल ने दिलीप जी के न रहने का दुखद समाचार दिया। अनुनाद परिवार उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता है। उनके निधन पर कवि पत्रकार राजकुमार केसवानी की बेहद भावशील त्वरित टिप्पणी आप उनके ब्लॉग पर यहाँ पढ़ सकते हैं। यहाँ प्रस्तुत है तुषार धवल द्वारा अनूदित उनकी एक कविता ..... कविताकोश से साभार।

कवि की तस्वीर यहाँ से साभार



धरती तेज़ी से अपनी स्मृति खोती जा रही है
और इसमें मैं अपनी स्मृतियों को खोता हुआ पाता हूँ
क्योंकि मैं बहुत पहले से जानता हूँ कि
स्मृति केवल आपराधिक ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं है
स्मृतियाँ हैं जो लगातार आती हैं
जड़, तने और टहनियों से
और ज़िन्दा रहती हैं आसन्न भविष्य के बाद भी
स्मृतियाँ पुनर्सृष्‍ट होती उगती हैं
गढ़ती हैं अपना काम, पहचान और रूप
वे उस जीवन से ज्यादा अलग नहीं हैं जिसे हमने जाना है
घाव, उत्सव और
ज्ञान में उठते चक्र और भंवर
शून्यता के प्रति

अब मैं पाता हूँ कि यह धरती छोटी पड़ गई है
अपनी असंख्य और अकबकाई मनुष्यता के लिए
जहाँ हर कोई एक-दूसरे की जगह हड़प लेना चाहता है
और जगह बचती नहीं है किसी की स्मृतियों के लिए
ख़ुद स्मृति की भी नहीं।

और जब स्मृति खो जाती है
पागल हिंसाओं का युग आता है

भय की कोई स्मृति नहीं होती
घृणा की कोई स्मृति नहीं होती
अज्ञान की कोई स्मृति नहीं होती
एक बेलगाम हिंसक पशु अब संभावित ईश्वर नहीं रहा।
***
अनुवाद : तुषार धवल

मैं एक दिन ढूँढ रहा हूँ: लाल्टू की एक कविता

मैं एक दिन ढूँढ रहा हूँ

कवि चित्र यहाँ से साभार

मैं एक दिन ढूँढ रहा हूँ
साल में कभी कोई एक दिन
जिस दिन किसी नादिरशाह ने किसी मोदी ने
न किया हो क़त्ल-ए-आम
क्या मेरा जन्मदिन ऐसा दिन है
मत बतलाओ मुझे कि मेरे जन्मदिन को
इतिहास में कितना खून बहा है
मेरा जन्मदिन हो निष्कलंक, पवित्र
प्यार से भरा
मेरे जन्मदिन को वैलेंटाइन डे कह दो
कह दो कि मेरा जन्मदिन मानव-अधिकार दिवस है
कह दो मेरे जन्म पर दिए जाते हों पुरस्कार विलक्षण मानवीय प्रतिभाओं को
मुझे दे दो एक दिन जब मनुष्य सिर्फ मनुष्य से प्रेम करता हो
****

(प्रिय कवि लाल्टू को उनके जन्मदिन पर अनुनाद की शुभकामनाएँ)

***********************

Wednesday, December 9, 2009

आज रघुवीर सहाय का जन्मदिन है



आज फिर शुरू हुआ जीवन
आज मैंने एक छोटी-सी सरल-सी कविता पढ़ी

आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा
जी भर आज मैंने शीतल जल से स्नान किया

आज एक छोटी-सी बच्ची आयी,किलक मेरे कन्धे चढ़ी
आज मैंने आदि से अन्त तक पूरा गान किया
आज फिर जीवन शुरू हुआ।

आज रघुवीर सहाय का जन्मदिन है। अत्यन्त संक्षेप में कहें तो सहाय जी आधुनिक हिंदी कविता के उन कद्दावर कवियों में हैं, जिनकी कविता में हमारा सामाजिक जीवन और उसके संघर्ष कहीं व्यापक, जटिल और सम्पूर्णता के स्तर को छूते दिखाई देते है। इस अवसर पर यहाँ हम रघुवीर सहाय को समर्पित व्योमेश शुक्ल की एक कविता प्रस्तुत कर रहे हैं जिससे पता लगता है कि अपने समय का एक महान कवि और उसकी कविता की परम्परा कहाँ कहाँ पहचानी जा सकती है। जैसे निराला पर रामविलास शर्मा की कविता, जैसे नागार्जुन पर बोधिसत्व की कविता, वैसे ही (उतनी घोषित न होते हुए भी) व्योमेश की यह कविता अपनी पूर्वज कविता की याद का एक दुर्लभ आख्यान है।

व्योमेश शुक्ल की कविता


दादर कबूतरख़ाना
(और रघुवीर सहाय की याद)

कबूतर कितने साल ज़िन्दा रहते हैं नहीं मालूम
आज के कबूतर पन्द्रह साल पहले के कबूतर लगे
यथार्थ के कबूतर हैं कि स्मृति में फड़फड़ाते हुए कबूतर
ये वही कबूतर नहीं हैं कि वही हैं बूढे़ कबूतर

आज में कल के कबूतर
आज में आज के कबूतर
आज में कल के कबूतर
कबूतर कबूतर कबूतर कबूतर

सड़क वही लगती है वही है
लोग वही लगते हैं वही नहीं हैं
लगना वही लगता है बिलकुल बदल गया है बिलकुल बदलना
हमेशा दलबदल जैसा घृणित नहीं होता

मराठी और कम लागत वाली हिंदी फि़ल्मों का एडिटिंग लैब
अब यहाँ नहीं है यहाँ पन्द्रह साल पहले है

है नहीं है, था है, है था, है है
है है है है है है है है
दादा कोंडके नहीं हैं रमाकान्त दाभोलकर नहीं है
बाम्बे लैब नहीं है सस्ती फि़ल्में नहीं हैं मतलब
`नहीं´ है
जगह का नाम
वही है

***

Tuesday, December 8, 2009

अबू ताहा अपनी छत पर कबूतर पालता है: एप्रिल जॉर्ज


एप्रिल जॉर्ज की यह कविता (मूल अंग्रेजी में) दि नवेम्बर थर्ड क्लब के अद्यतन अंक में प्रकाशित हुई है.


अबू ताहा अपनी छत पर कबूतर पालता है


बगदाद में अबू ताहा अपनी छत पर
कबूतर पालता है.
सलेटी, भूरे, चितकबरे, कंठीदार.
सूरज ढलते वक़्त, वे करते हैं गुटरगूं
जब अबू आता है
और शहर के आसमान में उन्हें आज़ाद कर देता है.
मरता हुआ सूरज इमारतों पर नारंगी सा दमकता है.
वे मंडराते हैं मुहल्लों के ऊपर,
नीले गुम्बद वाली मस्जिद के सामने
चक्कर काटती चित्राकृतियों जैसे, झिलमिलाते हुए.
गश्त पर निकले ब्लैक हॉक* के जोड़े
के नीचे उड़ते हुए.
ज़मीन पर पड़े मुट्ठी भर दाने चुगने
अबू के पास लौटने से पहले
वे आखिरी बार
टाइग्रिस** के ऊपर उड़ान भरते हैं.
सिर्फ परिंदे बचे रह सकते हैं
नाकेबंदियों से, भीड़-भड़क्के से,
मार-काट से, गुस्से से फट पड़ते आदमियों से.
बगदाद में इन दिनों
सिर्फ परिंदे जहाँ मर्ज़ी वहां जा सकते हैं.


(3 जून 2007 को वाशिंगटन पोस्ट में छपे टेरी मैकार्थी के आलेख 'लाइफ़ इन दि इन्फर्नो ऑफ़ बगदाद' के पहले पैराग्राफ से प्रेरित)


***********

*ब्लैक हॉक: अमेरिकी सैन्य हेलीकॉप्टर
**टाइग्रिस: बगदाद से होकर बहने वाली नदी.

Monday, December 7, 2009

ज्योत्स्ना शर्मा (११ मार्च १९६५-२३ दिसम्बर २००८ ): प्रस्तुति धीरेश सैनी

ज्योत्स्ना शर्मा (११ मार्च १९६५-२३ दिसम्बर 2008) और उनके लेखन के बारे में साहित्य की दुनिया अनजान है। इसी महीने आये संबोधन के कविता विशेषांक में ज़रुर उनकी कुछ कवितायेँ छपी हैं। हम उनकी तीन अप्रकाशित कवितायें दे रहे हैं। उनके निधन पर अलीगढ़ में मनमोहन द्वारा शोक प्रस्ताव के रूप में पढ़ी गई संक्षिप्त टिप्पणी भी यहाँ दी जा रही है।

परिवार के शामियाने में

नाराज़ है बच्चा
पत्ते की तरह खामोश, अभेद्य
रह रह कर सुनता है हृदय में उदास क्रोध
प्रेम इसे बना रहा है उद्दंड
वफ़ादारी के एवज में
पूरा नहीं पड़ता
बच्चे का प्यार
बार बार जोड़ते हैं हिसाब माँ बाप
प्रेमी रहेगा वो या फिर शत्रु
पर कभी नहीं कहीं नहीं
शुक्रगुज़ार
इस तरह बचा लेगा इज्ज़त
इस यतीम रिश्ते की।

बहुत से थप्पड़ खाकर
सीख लेगा शुक्रगुज़ारी
धीमे धीमे पढ़ेगा खाता
रोटी और कपड़े का
एहसानमंदी बनायेगी इसे सभ्य
विस्मृति बन कर देह
छा जायेगी आत्मा पर
गिरेगा बार बार पर
सीख लेगा अपना आइटम
परिवार के शामियाने में
चलायेगा
एक पहिये की साइकिल।
***

गुमनाम साहस

वयस्कों की दुनिया में बच्चा
और पुरुषों की दुनिया में स्त्री
अगर होते सिर्फ़ योद्धा
अगर होती ये धरती सिर्फ़ रणक्षेत्र
तो युद्ध भी और जीत भी
आसान होती किस कदर;

लेकिन मरने का साहस लेकर
आते हैं बच्चे
और हारने का साहस लेकर
आती हैं स्त्रियाँ

ऐसा साहस जो गुमनाम है
ऐसा विचित्र साहस जो लील जाता है
समूचे व्यक्ति को

और कहते हैं जो मरा और हारा
कमज़ोर था
कि यही है भाग्य कीड़ों का;

ऐसी भी होती है एक शक्ति
छाती में जिस पर
हर रोज़ गुज़र जाती है
एक ओछी दुनिया।
***

चल ओ मेरी प्यारी !


आह! भारी हो गई है कचरागाड़ी
छोड़ यहीं विषविधाले के कम्पस में

खड़ी छोड़; बँट जायेगा अपने आप सारा माल मत्ता!
अरे छोड़ यहीं धीरज ओ मेरी प्यारी!

ओ काली करुण भैंस मेरी न्यारी!
ओ मेरी आत्मा! आत्मा, चल!!
रस बन कर भर गई है घास में बरसात
हरे फूल सा खिलकर झूमता मैदान
और सूरज भी कैसा टुकुर टुकुर चल!

अब मार भी उछाल जरा डकरा के चल!
सींगों की नोंक पे ठौर सब उछल के
फूली हुई दम से मक्खियाँ सब झाड़ के
चल कुलकलंकिनी प्रेमिका सी मेरे संग चल!

फूलों का स्वाद
और स्वाद के बीचोंबीच रंग छुआछू
और रंग के बीचोंबीच गंध छुआछू
छोड़ दे सब थाम ले अब सिर्फ़ छुआछू

फिर जायेंगे नदी पर
मैं तोड़ दूँ किनारा तू पीना खूब जल
घूँट नहीं ओक नहीं डुबकियों से पीना जल, चल!
फिर मिट्टी में लोटेंगे

आड़ नहीं बाड़ नहीं
रुकना नहीं सींच देना नई विषुवत रेखा धरती पर, चल!

फिर करेंगे जुगाली
मैं सुनूँ तू कहना, खूब रंभायेंगे,
चल!
***


मनमोहन की टिप्पणी


ज्योत्स्ना का जीवन एक अकथ कथा है और पिछले ३०-३२ साल का उनका विपुल और असाधारण लेखन लगभग सारा का सारा अभी अँधेरे में गुम है। सब कुछ एक आत्मनिर्वासित अंतर्गुहावासी अतिसंवेदनशील और गहन दृष्टिसंपन्न शख्स की छटपटाहट भरी खोज़ की दुर्गम और दुस्सहासिक यात्रा का अकल्पनीय रोमांचक आख्यान जैसा लगता है. कुछ कुछ वैसा ही जैसा मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस ने रचा था. जिन लोगों को ज्योत्स्ना के कृतित्व को कुछ समीप से देखने-जानने का मौका मिला है, वे शायद इतना ज़रूर कह सकते हैं कि अपने संक्षिप्त आयुष्य क्रम में ही ज्योत्स्ना ने अपने ओछेपन, हृदयहीनता और अन्धताओं पर इतराती हमारी सभ्यता के भूगर्भ में पड़े अनेक अलक्षित,असम्बोधित और विस्मृत प्रश्नों और गुत्थियों को दुर्निवार ढंग से पेश कर दिया है और एक पतनशील समय की विडम्बनाओं से भरी गहन बीहड़ दुखान्तिकी का युगीन आख्यान रच दिया है। यह एक ऐसा ट्रेजिक आख्यान है जिसमें इसके उद्दात्त शिखर और अधोगामी गर्त सब एक सूत्र में बंधे हैं। अपने तमाम अंतर्विरोधों, आत्मघाती विचलनों, और विक्षेपों के दबावों से गुजरते हुए भी ज्योत्स्ना हमारे सामजिक जीवन की मुख्यधारा और प्रचलित चेतना की रूढ़ और कुटिल छद्म सरंचनाओं के ताने बाने से कभी समझौता न कर सकीं. न सिर्फ वे इससे से बाहर रहीं बल्कि उनके साथ उनका सम्बन्ध आद्य शत्रुता का रहा. उनमें एक प्रतिवादी और subvertive eliment था जिसकी कीमत उन्होंने पूरी अदा की. वे चाहतीं तो एक सरल सुरक्षित जीवन का आसान रास्ता उनकी पहुँच से दूर न था, लेकिन उन्होंने पूरी अभिव्यक्ति का जोखिम भरा मुश्किल रास्ता चुना और इसके एवज में एक दारुण आत्मनिर्वासित और बहिष्कृत जीवन की आत्महंता लांछना और पीड़ा को क़ुबूल किया. और एक चीज़ का पीछा किया जिसे वे अमूल्य समझती थीं.

ज्योत्स्ना की नज़र में आविष्कारशील विद्युतम्यता की कौंद थी और देखने का वह विरल कोंण था जो इतिहास में वंचित मनुष्यता के प्रतिनिधि को ही नसीब हो पता है, वह कोंण जहाँ से रंगे चुने जीवन की सारी बनावट और सारे खोल, सुन्दरता की कुरूपता, सुखी जीवन के दाग धब्बे और भद्रलोक की अमानुषिकताएं और अपराध साफ़-साफ़ देखे जा सकते हैं। उनकी भाषा में एक दुर्लभ स्पर्श और अचूक बेधकता थी.

ज्योत्स्ना के लिए लेखन श्वास प्रश्वास की तरह ऑर्गेनिक क्रिया थी. इसे उन्होंने कभी इससे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया. लेखन को कैरियर बनाने से उन्हें सख्त नफरत थी. उनका लेखन एक दुर्लभ गवाही की तरह है, हालाँकि अपने समय की अदालत जो उन्हें संदिग्ध और बेगानी लगती, उसमें इसे बयान करने की उनमें कोई इच्छा नहीं थी. फिर भी हमारी जिम्मेदारी है कि इसे हम सामने लायें, जिससे अपनी शक्ल को ज्यादा-ज्यादा साफ़-साफ़ देख सकें।

-मनमोहन
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( यह पोस्ट अनुनाद के अहम् सहयोगी मित्र धीरेश सैनी द्वारा लगायी गई थी, जो कुछ अजीब सी तकनीकी दिक्क़तों के कारण पब्लिश नहीं हो पा रही थी। मैंने इसे दुबारा अपने एकाउंट से पब्लिश किया है। इस ज़रूरी पोस्ट के लिए मैं धीरेश भाई का शुक्रगुज़ार हूँ - शिरीष )
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Sunday, December 6, 2009

छह दिसंबर पर व्योमेश शुक्ल की एक कविता

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6 दिसंबर 2006




पहली और अंतिम बार
आज 6 दिसम्बर 2006 है
हमेशा की तरह

बच्चे प्रार्थनाएं और राष्ट्रगान हल्का बेसुरा गा रहे हैं
इसके बाद स्कूल बंद हो गए
एक प्रत्याशी दिशाओं को घनघोर गुंजाता हुआ कुछ देर पहले नामांकन करने
कचहरी गया है
हमेशा की तरह

एक व्यक्ति फोन पर हँसा बोला
गुटखा 1 रुपए का है आज भी
ख़रीदो खाओ
ठोंक पीट हवा इंजन बोलने रोने चिल्लाने की आवाज़ें हैं
हमेशा की तरह

पंखे और वाटर पम्प बनाने वाली एक छोटी कम्पनी
आज पहली और अंतिम बार ज़मींदोज़ हुई है
हमेशा की तरह

Thursday, December 3, 2009

मैं ऐसे बोलता हूँ जैसे कोई सुनता हो मुझे !

एक नई कविता .....

रात भर
पुरानी फ़िल्मों की एक पसन्दीदा श्वेत-श्याम नायिका की तरह
स्मृतियां मंडराती
सर से पांव तक कपड़ों से ढंकीं
कुछ बेहद मज़बूत पहाड़ी पेड़ों और घनी झरबेरियों के साये में
कुछ दृश्य बेडौल बुद्धू नायकों जैसे गाते आते ढलान पर

एक निरन्तर नीमबेहोशी के बाद
मैं उठता तो एक और सुबह पड़ी मिलती दरवाज़े के पार
उसकी कुहनियों से रक्त बहता
उसकी पीठ के नीचे अख़बार दबा होता उतना ही लहूलुहान
वह किसी पिटी हुई स्त्री सरीखी लगती
मेरी पत्नी उसे अनदेखा करती जैसे वह सिर्फ़ मेरी सुबह हो उसकी नहीं

मैं अपनी सुबह के उजाले में अपने सूजे हुए पपोटे देखता
ठंडी होती रहती मेज़ पर रखी चाय

मेरे मुंह में पुराने समय की बास बसी रहती बुरी तरह साफ़ करने के बाद वह कुछ और गाढ़ी हो जाती

मेरे हाथों से उतरती निर्जीव त्वचा की परत और मेरा बेटा हैरत से ताकता उसे

इस तरह अंतत: मैं तैयार होता और जाता बाहर की दुनिया में
और वहां बोलता ज़ोर ज़ोर से ऐसे जैसे कि कोई सुनता हो मुझे !


Tuesday, December 1, 2009

सभ्यता के गलियारे में रखे हुए टायर: मार्टिन एस्पादा

कविचित्र यहाँ से साभार


सभ्यता के गलियारे में रखे हुए टायर
--चेल्सिया, मैसाच्युसेट्स

"जी हुज़ूर, चूहे हैं"
मालिक-मकान ने जज से कहा,
"पर मैं किरायेदारों को बिल्ली पालने देता हूँ.
इसके अलावा, गलियारे में यह अपने टायर रखता है."

किरायेदार ने अटपटी अंग्रेजी में इकबाल किया,
"हाँ हुज़ूर, मैं अल सल्वाडोर से हूँ
और अपने टायर गलियारे में रखता हूँ."

जज ने अपना गाउन फड़फड़ाया
जैसे काला पंछी पानी झटकने के लिए
अपने पंख फड़फड़ाता है:
"बाहर करो टायर गलियारे से!
तुम किसी जंगल में नहीं रह रहे हो! यह सभ्य लोगों का देश है."

तो इस तरह प्रतिवादी को
सभ्यता के गलियारे से उसके टायर हटा लेने का आदेश
दिया गया,
और बिल्ली पाले रखने की
इजाज़त दी गई.
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