Wednesday, September 30, 2009
एक कविता `माँ` की छवि के विरुद्ध
लेकिन मनमोहन की यह कविता अपवाद की तरह है-
इतने दिनों बाद पता चलता है
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हल्के उजाले की तरह
अचानक कमरे से गुज़रती थी वह स्त्री
कई बार पानी की तरह हिलती थी देर तक
यह एक पुरानी बात हुई
वह एक छवि थी
जो तुम्हें तुम्हारी छवि दे देती थी
और इस तरह तुमसे ख़ुद को वापिस ले लेती थी
अब इतने दिनों बाद पता चलता है
कि वह माँ का प्यार नहीं
एक स्त्री का सन्ताप था
जिसे वह छवि जो तुम देखते थे
तुम्हें ठीक-ठीक नहीं बताती थी
उसे भी उस वक़्त कहाँ पता चला होगा
कि यह सिर्फ़ उसका शिशु नहीं है
जो देखता है
और इसे एक दिन पता चल जाएगा
कि आखिर किस्सा क्या था
Friday, September 25, 2009
सीरिया से लीना टिब्बी की एक कविता : चयन तथा प्रस्तुति - यादवेन्द्र

काश ऐसा होता
काश ऐसा होता
कि ईश्वर मेरे बिस्तर के पास रखे
पानी भरे ग्लास के अन्दर से
बैंगनी प्रकाश पुंज सा अचानक प्रकट हो जाता
काश ऐसा होता
कि ईश्वर शाम की अजान बन कर
हमारे ललाट से दिन भर की थकान पोंछ देता
काश ऐसा होता
कि ईश्वर आंसू की एक बूंद बन जाता
जिसके लुढ़कने का अफ़सोस
हम मनाते रहते पूरे पूरे दिन
काश ऐसा होता
कि ईश्वर रूप धर लेता एक ऐसे पाप का
हम कभी न थकते जिसकी भूरी भूरी प्रशंसा करते
काश ऐसा होता
कि ईश्वर शाम तक मुरझा जाने वाला गुलाब होता
तो हर नयी सुबह हम नया फूल ढूढ़ कर ले आया करते
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Tuesday, September 22, 2009
न हो संगीत सन्नाटा तो टूटे

उधेड़ा रात भर दिन भर बुना है
बकाया उम्र से लाखों गुना है
हमारे हाथ में एक झुनझुना है
वहाँ पानी अभी तक गुनगुना है
Saturday, September 12, 2009
इस दुर्लभ क्षण में - अल मर्कोवित्ज़
अल मर्कोवित्ज़ एक 'श्रमजीवी' हैं जो बतौर मुद्रक, स्वास्थ्य-कार्यकर्ता, बावर्ची, माली, टैक्सी-ड्राइवर और फैक्ट्री-श्रमिक काम कर चुके हैं. उनका 'एक्टिविस्ट' जहाँ एक ओर रंगभेद, परमाणु ऊर्जा, अमेरिकी साम्राज्यवाद-आतंकवाद और युद्ध विरोधी संघर्षों में सक्रिय रहता है, वहीं दूसरी ओर मज़दूरों को संगठित करने का काम भी करता है. मर्कोवित्ज़ का 'कवि' श्रमजीवी वर्ग के जीवनानुभवों से उपजा यथार्थपरक साहित्य रचता है; इसके द्वारा अमेरिकी समाज में व्याप्त उपभोक्तावाद की मारू संस्कृति का विकल्प प्रस्तुत करता है. ये 'कवि' श्रमजीवी वर्ग के साहित्य को बढ़ावा देने के लिए प्रकाशक बनकर 'पार्टिज़न प्रेस' की नींव रखता है और यही 'कवि' मुख्यधारा की साहित्यिक पत्रिकाओं के 'एलीटिज़्म' के खिलाफ प्रगतिशील राजनैतिक चेतना की आवाज़ बनने के लिए 'ब्लू कॉलर रिव्यू' पत्रिका की स्थापना कर एक सम्पादक भी बन जाता है. पूँजीवाद की शक्तिपीठ में, जहाँ 'बाँयें'चलना महापातक हो और 'मैक्कार्थिज़्म' का दमनचक्र याद्दाश्त से पूरी तरह मिटा न हो, यह कोई आसान काम नहीं है, ज़ाहिर है.
पार्टिज़न प्रेस ने, जिसका स्लोगन है 'पोएट्री दैट टेक्स साइड्स', आर्थिक दिक्कतों से जूझते हुए श्रमजीवी साहित्य की कई पुस्तिकाएँ (चैपबुक्स) प्रकाशित की हैं. 'ब्लू कॉलर रिव्यू' एक पूर्णतः अव्यवसायिक त्रैमासिक पत्रिका है जिसकी प्रसार संख्या 600 के आस पास है. साहित्यिक मुख्यधारा की सतत उपेक्षा और आर्थिक अड़चनों के बावजूद अगर यह पत्रिका पिछले बारह सालों से टिकी है तो इसके पीछे सम्पादक मर्कोवित्ज़ का खुर्राट 'श्रमजीवी' है जो अपने घर के बेसमेंट में स्वयं छापखाना चलाता है.
जर्जर कगार
और आने वाले खौफ़नाक दिनों के
अँधेरे असगुनी तटों के बीच यहाँ
युगान्तर की इस अद्भुत घड़ी
इस दुर्लभ क्षण में
सम्भावना की बारीक नोंक पर
उम्मीद भय से
साझेदारी अलगाव से
और आपदाएँ पुनर्जन्म से जूझ रही हैं.
योद्धा का पंथ
यह घड़ी है आतिशबाज़ी की
भोंपुओं के चिल्लाने की
कविताई की.
एक नयी सुबह की पहली किरण से
उन चेहरों को दमकने दो-भले ज़रा सा
जो यहाँ नहीं आ पाए
इस लम्बी रात के गुज़रते हुए.
आगे जाना है बहुत
मगर काफी दूर तो आ ही चुके हैं.
टूटने दो
पैट्रिअट कानूनों2 और
'समर्पण' और युद्ध के यातना-गृहों
का दुःस्वप्न
बहने दो इन्साफ़ को
उस पानी के रेले की तरह
जो रोका न जा सके
धोकर निर्मल कर दे हमें
हत्यारों और झूठों,
संशयी साम्राज्यवादियों
और लम्पटों से.
और छोड़ जाए अपने पीछे
एक नयी सरज़मीं जिस पर बने
हमारे सपनों का कल.
Wednesday, September 9, 2009
आज की इराकी कविता- लतीफ़ हेलमेट : चयन तथा प्रस्तुति - यादवेन्द्र

स्त्री का दिल
स्त्री का दिल इकलौता ऐसा मुल्क है
जहां मैं दाखिल हो सकता हूं बग़ैर किसी पासपोर्ट के
कोई पुलिसवाला नहीं मांगता
मेरी पहचान का कार्ड
न ही लेता है तलाशी
उलटपुलट कर मेरे सूटकेस की
इसमें ठूंस ठूंसकर भरी गई हैं
ग़ैरक़ानूनी खुशियां
प्रतिबंधित कविताएं
और रसीली तकलीफ़ें
स्त्री का दिल इकलौता ऐसा मुल्क है
जो ज़खीरे नहीं बनाता मारक हथियारों के
न ही झोंकता है अपने लोगों को
लड़ने के लिए
ख़ुद की छेड़ी लड़ाइयां !
चित्र
टीचर ने छात्रों से कहा -
बनाएं कोई भी चित्र जो मन करे
प्रिंसपल के बेटे ने रच-रचकर बनाया
नई शेवरलेट का चित्र
बिल्डर के बेटे ने उकेरा
मॉल और होटल का रंगबिरंगा काम्प्लेक्स
पार्टी मेंबर के बेटे ने खींचा
बख़्तरबंद कार का चित्र
और स्कूल के चपरासी की बेटी
निश्चिंत भाव से बनाने लगी रोटी का चित्र !
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(फ्लावर्स ऑफ फ्लेम: दि अनहर्ड वाइसेज़ ऑफ ईराक से साभार)
Sunday, September 6, 2009
नन्हीं रूथ - येहूदा आमीखाई की कविता
तस्वीर यहाँ से साभार कभी-कभी मैं तुम्हें याद करता हूं
नन्हीं रूथ
हम अलग हो गए थे अपने सुदूर बचपन में कहीं
और उन्होंने तुम्हें शिविरों में जला दिया
यदि तुम ज़िन्दा होतीं
तो एक औरत होतीं पैंसठ साल की खड़ी बुढ़ापे की कगार पर
लेकिन बीस साल की उम्र में ही उन्होंने तुम्हें जला दिया
और मैं नहीं जानता कि और क्या क्या हुआ तुम्हारे साथ
तुम्हारे उस छोटे-से जीवन में
जब से हम अलग हुए - तुमने क्या क्या पाया
कौन कौन-से अधिकार चिह्म उन्होंने लगाए
तुम्हारे कंधों पर
तुम्हारी आस्तीनों पर
तुम्हारी बहादुर आत्मा पर
कौन कौन-सी सजावटें साहस के लिए
कौन कौन-से तमग़े प्रेम के लिए लटकाए गए तुम्हारे गले में
कैसी और कौन-सी शांति वे तुम तक लाए
और क्या तुम्हारे जीवन के अप्रयुक्त सालों का
क्या अब भी वे बंधे हैं सुंदर पुलिंदों में
क्या उन्हें जोड़ दिया गया मेरे जीवन में
क्या तुम मुझे लौटा ले गईं
स्विट्ज़रलैंड के बैंकों जैसे सुरक्षित अपने उस प्रेम-कोष में
जहां संभाली जाती है संपत्तियां उनके मालिकों की मौत के बाद भी
क्या यह सब मैं छोड़ जाऊंगा अपने बच्चों के लिए
- जिन्हें तुमने कभी नहीं देखा
तुमने तो दे दिया अपना जीवन मुझे
उस संयमी शराबविक्रेता की तरह जो शराब सिर्फ़ औरों को दे देता है
ख़ुद रहता है निर्विकार और निर्लिप्त हमेशा
तुम भी निर्लिप्त हो अपनी मृत्यु में
और मेरे लिए पीना इस जीवन को जैसे लोटते रहना
अपनी ही स्मृतियों के कीचड़ में
अब और तब
मैं तुम्हें याद करता हूं अविश्वसनीय समयों में
और ऐसी जगहों में जो याद रखने के लिए नहीं,
बस कुछ पल के लिए बनी हैं
बस गुज़र भर जाने के लिए
एक हवाई अड्डे की तरह जहां आने वाले यात्री थके और निढाल
खड़े रहते हैं कन्वेयर बेल्ट के पास
जो लाती है उनके सूटकेस और दूसरा सामान
और वे पहचान जाते हैं उन्हें चीखते हुए-से ख़ुशी से
मानो फिर से जी उठने और चल देने वापस अपने जीवन में
और वहां.... वहां एक सूटकेस है
जो लौटता है और फिर ओझल हो जाता है
और फिर से लौटता है
हमेशा बहुत धीमे खाली हो चुकी उस जगह में
यह फिर-फिर आता है - जाता है
ऐसे ही... तुम्हारी ख़ामोश आकृति गुज़रती है मेरे आगे से
ऐसे मैं तुम्हें याद करता हूं
कन्वेयर बेल्ट के थमकर शांत खड़े हो जाने तक
और वहाँ वे खड़े थे स्थिर शांत
आमीन....
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अनुवाद : शिरीष कुमार मौर्य ("धरती जानती है" संवाद प्रकाशन से)
Friday, September 4, 2009
वाक़या - अमीरी बराका की एक कविता
