Friday, February 27, 2009

तुषार धवल की कविताएँ

(.....अभी मैंने तुषार के कविता संकलन से सम्बंधित पोस्ट लगाई थी। आज मेल में गीत, अनुराग, गिरिराज, व्योमेश आदि दोस्तों को सम्मिलित रूप से भेजी गई ये दो कविताएँ मिलीं। मुझे अच्छी लगीं, सो इन्हें जस का तस यहाँ लगा रहा हूँ ..... हालाँकि तुषार ने इन्हें पढ़ने भर को भेजा है .... पर मैं साधिकार लगा दे रहा हूँ ! )


तुम्हें मुक्त करते हुए

वह जो कुछ अब बीत जायेगा
किसी एल्बम में देखोगे तुम
वही परछाइयाँ
जिरह करेंगी तुम्हारे सन्नाटों से

एक दिन सदी बीत जायेगी
एक दिन नदी बीत जायेगी
सूखे किनारे पर बेमानी हो जायेगा पुल

एक प्यास फैली होगी यहाँ से वहां तक
मोह के बाहुपाश में कई कथाएँ होंगी
ये जो कई विचार मन पर दौड़ते हैं
एक दिन नहीं होंगे, जानता हूँ
जानता हूँ कि अब मुक्त होना है तुम्हें जबकि तुम मुक्त थे हमेशा ही
एक विचार था जो तुम्हें रोके हुए था अभी तक

ओ मेरे ओक्टोपस साथी
तुम्हें मुक्त करता हूँ
यहीं अभी और लौटता हूँ अपनी गुफा में
खुद मुक्त होता हुआ
इन अँधेरों में कोई अक्षर मेरे इंतज़ार में कब से बैठा है.
---

दुःख

दुःख सूने कैनवास सा
दुःख समुद्र के सिराहने खड़े टूटे चाँद सा
दुःख बालकनी में टंगे अकेले तौलिये सा
एक नमी से सीला संसार
रुकी हुई उबकाई लिए आ घेरता है
शीशे शीशे टुकड़े टुकड़े किरमिच कंकड़ पलकों में
समय का पीला धुआं
किसी छोड़ी गई बीड़ी की राख से उगता हुआ
बताता है कि तुम हो
कि यह जो सुख की केंचुल छूट गयी है
इसे मन ने उतारा था
सिरजते हुए विचार
दुःख सूखी लकड़ी सा
दुख सूने बथान सा
दुःख फाइल पर जमी धूल सा
जहाँ तहां गड़ता है झड़ता है
एक भीगा धुआं भीतर ही भीतर फ़ैल जाता है शरीर में
और तुम्हारे कई चित्र उभरते हैं जाने कौन कौन सी आँख में
दुःख लकड़बग्घे सा
दुःख उल्टे बर्तन सा
दुःख रात की हवा सा
दबे पाँव आता है जैसे आया हो कोई लोहार
खड़कने लगते हैं अचानक अनगढे औजार
कोई सपेरा बीन बजा कर गायब हो जाता है
कोई लकीर सांप निकाल लेती है
कोई फ़कीर मेरे भीतर जो रहता है टोकता है डूबती सांस को
मनजात है
मनजात है दुःख
दुःख मनजात है.
---
(२६।०२।२००९)
मुंबई

Monday, February 23, 2009

पंकज चतुर्वेदी की चार प्रेम कविताएं

अनुनाद पर अभी आपने समकालीन कविता को लेकर पंकज का एक लम्बा सैद्धान्तिक लेख पढ़ा है। अपने समय और पूर्वस्थापित सिद्धान्तों की गहन छानबीन करते हुए उन्होंने अपनी कुछ स्थापनाएं दी हैं, जिन पर प्रणयकृष्ण, आशुतोष कुमार और गिरिराज किराडू की प्रतिक्रियाएं भी अनुनाद पर मौजूद हैं।
यह पोस्ट पंकज की कविताओं की पोस्ट है और वह भी प्रेम कविताओं की ! पाठक उनके लेख के बरअक्स जब इन गुनगुनी कविताओं को पढ़ेंगे तो यह उनके लिए ज़रूर एक रोचक अनुभव साबित होगा।

गुस्ताव कूर्बे की कृति " चित्रकार का स्टूडियो"
निरावरण वह
(फ्रांसीसी कलाकार गुस्ताव कूर्बे की कृति " चित्रकार का स्टूडियो" को देखकर)

देह को निरावृत करने में
वह झिझकती है
क्या इसलिए कि उस पर
प्यार के निशान हैं

नहीं

बिजलियों की तड़प से
पुष्ट थे उभार
आकाश की लालिमा छुपाए हुए

क्षितिज था रेशम की सलवटों-सा
पांवों से लिपटा हुआ

जब उसे निरावरण देखा
प्रतीक्षा के ताप से उष्ण
लज्जा के रोमांच से भरी
अपनी निष्कलुष आभा में दमकता
स्वर्ण थी वह
इन्द्र के शाप से शापित नहीं
न मनुष्य-सान्निध्य से म्लान

वह नदी का जल
हमेशा ताज़ा
समस्त संसर्गों को आत्मसात किए हुए
छलछल पावनता

प्रेम

तुम्हारे रक्त की लालिमा से
त्वचा में ऐसी आभा है
पानी में जैसे
केसर घुल जाता हो

आंखें ऐसे खींचती हैं
कि उनकी सम्मोहक गहनता में
अस्तित्व डूबता-सा लगे
अपनी सनातन व्यथा से छूटकर

भौंहों में धनुष हैं
वक्ष में पराग
तुम्हारी निष्ठुरता में भी
हंसी की चमक है
अवरोध जैसे कोई है नहीं
बस बादलों में ठिठक गया चन्द्रमा है

तुममें जो व्याकुलता है
सही शब्द
या शब्द के सौन्दर्य के लिए
वही प्रेम है
जो तुम दुनिया से करती हो !


इसी कोलाहल में

इसी भीड़ में सम्भव है प्रेम
इसी तुमुल कोलाहल में
जब सूरज तप रहा है आसमान में
जींस और टी-शर्ट पहने वह युवती
बाइक पर कसकर थामे है
युवक चालक की देह

इसी भीड़ में
सम्भव है प्रेम !


तुम मुझे मिलीं

तमाम निराशा के बीच
तुम मुझे मिलीं
सुखद अचरज की तरह
मुस्कान में ठिठक गए
आंसू की तरह

शहर में जब प्रेम का अकाल पड़ा था
और भाषा में रह नहीं गया था
उत्साह का जल

तुम मुझे मिलीं
ओस में भीगी हुई
दूब की तरह
दूब में मंगल की
सूचना की तरह

इतनी धूप थी कि पेड़ों की छांह
अप्रासंगिक बनाती हुई
इतनी चौंध
कि स्वप्न के वितान को
छितराती हुई

तुम मुझे मिलीं
थकान में उतरती हुई
नींद की तरह
नींद में अपने प्राणों के
स्पर्श की तरह

जब समय को था संशय
इतिहास में उसे कहां होना है
तुमको यह अनिश्चय
तुम्हें क्या खोना है
तब मैं तुम्हें खोजता था
असमंजस की संध्या में नहीं
निर्विकल्प उषा की लालिमा में

तुम मुझे मिलीं
निस्संग रास्ते में
मित्र की तरह
मित्रता की सरहद पर
प्रेम की तरह


तुषार धवल का पहला कविता संग्रह


मैं चाहता था कि तुषार की किताब की समीक्षा अनुनाद पर करुँ लेकिन दूसरी कई व्यस्तताओं के कारण यह सम्भव नहीं हो पाया। समीक्षा के रूप में मैंने कुछ लिखा भी तो वो मुझे पर्याप्त नहीं लगा, सो अब समीक्षा को किसी पत्रिका के लिए छोड़ता हूँ और प्यारे दोस्त तुषार को उनके पहले संकलन के लिए बधाई देता हूँ। फोन पर वरिष्ठ कवि चंद्रकांत देवताले ने इस संकलन को "शानदार आवरण और उतनी ही शानदार कविताओं वाला संकलन " कहा है। गौरतलब है कि आवरण पर ख़ुद तुषार की बनाई पेंटिंग है। तुषार कविता के साथ - साथ अनुवाद, अभिनय और पेंटिंग में भी रूचि रखते हैं। उन्हें अनुनाद पर यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। हमारे इस बेहद प्रतिभाशाली मित्र को एक बार फ़िर बधाई और आगे के सफ़र की शुभकामनाएं !


पहर यह बेपहर का (कविता संकलन) - तुषार धवल
राजकमल प्रकाशन
१- बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली - २
पृष्ठ - १६०
मूल्य- २००

Wednesday, February 18, 2009

पंकज चतुर्वेदी के लेख तथा उस पर दो युवा आलोचकों की प्रतिक्रियाओं पर एक युवा कवि की प्रतिक्रिया ....


गिरिराज किराडू


दो-चार दिन छुट्टी पर था. काम से. आज ही पिछले दोनों पोस्ट देखे- श्रीकांतजी और दो प्रतिक्रियाओं वाला. दोनों अच्छी हैं. पंकज का लेख तुम्हारे लगाने से पहले पढ़ चुका था. ऐसा लग रहा है अनुनाद अब पूरी तरह पत्रिका हो रहा है. :)- पंकज के लेख में कई चीज़ें हैं और शायद एक पूरे लेख से ही उस संवाद को आगे बढाया जा सकता है. प्रणय ठीक कहते हैं कि अल्ट्रा-लेफ्ट और सॉफ्ट लेफ्ट को री-फ्रेज किया जाना चाहिए. जिसे अल्ट्रा कहा जा रहा है वो क्लैसिकल मार्क्सवादी है और जिसे सॉफ्ट ('संसदीय मार्क्सवाद!) वो रघुवीर सहाय की परम्परा में पूर्ण क्रांति और यूटोपिया की जगह जो व्यवस्था है - क्लैसिकल पदावली में 'बुर्जुआ लोकतंत्र' - उसकी 'समीक्षा' (अपने प्रभाव में) और प्रतिरोध (शैली/ रहैटरिक में) का काव्य-मार्ग है. रघुवीर सहाय की केन्द्रीयता का यह सीधा संदेश था: अब इसी व्यवस्था को सहनीय और मानवीय बनने के लिए काम किया जा सकता है. शायद यही कारण हैं कि रघुवीर की कविता गैर-मार्क्सवादी आलोचकों लेखकों को भी उतना ही आकृष्ट करती रही है. रघुवीर यूटोपिया की असम्भावना के कवि हैं, उनकी पद्धति दैनिक है एक पत्रकार की तरह, दीर्घकालिक नहीं, कवि की तरह - इस दुःख को रोज समझना पड़ता है. आज की कविता भी, उम्मीद और यूटोपिया को एक 'असम्भावना' की तरह ही, एक 'पैथोलोजी' की तरह ही 'उत्पन्न' कर सकती है. उम्मीद का कोई आधार नहीं सिवाय इसके कि एक उम्मीद ही है जो बिना आधार भी की जा सकती है. यह याद रहे कि यह लेख आठवे दशक और उसके बाद की कविता को लेकर पिछले लंबे अरसे से चल रही पोलेमिक्स का हिस्सा है, उसके सबसे तार्किक और समझदार हिस्सों में से है पर जाने क्यों हम इसको समझने की दो सबसे महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक श्रेणियों में से एक - संगतकार सिंड्रोम (अगर यह नया नामकरण है तो इसे थोड़ा स्पष्ट करदूं: मंगलेशजी की प्रसिद्द कविता से हासिल यह पद आठवे दशक की कविता की उस तकलीफ और विडम्बना और डिफेन्स मैकेनिज्म से वाबस्ता है कि वह 'जानबूझकर' 'बड़ी कविता' नहीं बन पाई) को तो विश्लेषण में काम में लेने लगें हैं किंतु बाद की कविता के 'एन्ग्जायटी ऑफ़ इन्फ्लुएंस' को नहीं?

Tuesday, February 17, 2009

पंकज चतुर्वेदी के लेख पर दो युवा आलोचकों की प्रतिक्रियाएं

आशुतोष कुमार

पंकज के इस आलेख की कुछ विशेषताएं, जिनके लिए इसकी सराहना वाजिब है -
1- यह संवादधर्मी आलोचना है। जितने सवालों से टकराती है, उससे कई गुना ज्यादा सवालों को जन्म देती है। अंतिम बात कहके आत्मतुष्ट हो लेने की सुविधा चुनने की जगह बहस पसारने के लिए अधूरेपन की असुविधा से नहीं कतराती।
2- समकालीन कविता की रचनात्मक प्रवृत्तियों की पहचान और उसके उत्थान-अवसान के ऐतिहासिक मार्गचिन्हों की खोज करते हुए वह उसकी एक सैद्धान्तिकी विकसित करने की गम्भीर चेष्टा करती है। यह सैद्धान्तिकी एक आलोचनात्मक तर्क के रूप में निरूपित होती है, जो काफी सुलझा हुआ और सुप्रमाणित है।
3- गोलमाल बातें करने की जगह `सामान्यीकरण´ का खतरा उठाते हुए भी कुछ ठोस बिन्दुओं को रेखांकित करती है। नामों से बचकर निकलने की जगह उन्हें बहस में घसीटने के रचनात्मक दुस्साहस का रास्ता चुनती है।

अब कुछ सवाल जो आलेख पढ़ते समय तुरत-फुरत दिमाग में आ गए हैं -

1- क्या यह बेहतर न होता कि समकालीन कविता पर बात करते समय कवियों की जगह कुछ चुनी हुई कविताओं को फोकस में रखा जाता। यह प्रश्न इसलिए उठता है क्योंकि इस आलेख में कवियों को तीन बड़े समूहों में रखा गया है, जबकि किसी एक समूह में रखे गए किसी कवि की अनेक कविताएं याद आती हैं, जिनकी संवेदना दूसरे समूह से मेल खाती है। मसलन गोरख की कविता `आयेंगे अच्छे दिन आयेंगे´, वीरेन की `आयेंगे उजले दिन जरूर आयेंगे´ वगैरह में जो आशावाद है उसका रिश्ता अरुण कमल, राजेश जोशी वगैरह की कविताओं से जुड़ता है।
2- आलेख से ऐसा संकेत मिलता है कि क्रांतिकारी वाम के कवियों की आत्महंता आस्था ही हो सकती थी, या फिर उदार वाम में अपसरित हो जाना। ये स्थापना बेहद समस्यापूर्ण हैं। यह अनेक रूपों में एक भ्रामक निष्कर्ष है, जो कविताओं की जगह कवियों को ध्यान में रखने से उपजा है। इस पर विस्तार से चर्चा अपेक्षित है।
3- संतुलन का गुब्बारा फोड़ डालने वाले कवियों के नाम तो गिनाए गए हैं, लेकिन यहां जरूरी था कि उनकी कुछ कविताओं के उदाहरण, विश्लेषण के साथ दिये जाते - जिससे कि यह तर्क रचनात्मक रूप से प्रमाणित हो पाता।
ये तुरन्त प्रतिक्रिया है, लेकिन उम्मीद है कि बहस चलेगी और धार लेगी।
(आशुतोष कुमार अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में हिंदी के प्राध्यापक हैं और यह प्रतिक्रिया उन्होंने पोस्ट पर त्वरित टिप्पणी के रूप में अनुनाद तक पहुंचाई है।)
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प्रणयकृष्ण

लेख सरसरी तौर पर पढ तो गया, तफ़सील से विचार करूंगा और प्रतिक्रिया दूंगा। कुछेक चीजें जिन पर मैं अभी प्रथम दृष्टया कुछ कह सकता हूं, वे हैं -
1- अल्ट्रा लेफ्ट जैसी कोई चीज़ नहीं है गोरख, आलोक और वीरेन में ! वाम की तमाम धारणाएं सही रास्ते की तलाश में एक दूसरे से टकराती हैं। क्रांतिकारी वामपंथ तब भी एक सही संज्ञा है। कविता में अल्ट्रा लेफ्ट जैसे लेबेल का इस्तेमाल तो मुझे और भी ठीक नहीं लगता। गोरख, आलोक और वीरेन की कविता लेफ्ट की कविता है, उसमें `अल्ट्रा´ या `अति´ जैसी कौन चीज़ है? लचीला या साफ्ट वाम नया नामकरण जरूर है क्योंकि यह राजनीतिक हलकों में नहीं व्यवहार किया जाता। जबकि अल्ट्रा लेफ्ट जैसी संज्ञा बहुप्रचलित राजनीतिक शब्दावली है, जिसके संदर्भ नकारात्मक हैं। दोनों धाराओं को अलगाने के बेहतर मुहावरे तलाशे जाने चाहिए।
2- बात धाराओं या प्रवृत्तियों पर ज्यादा और व्यक्तियों पर कम होनी चाहिए। नाम लेना गुनाह नहीं और न ही लेने डरना चाहिए लेकिन एक ही कवि की अलग अलग कविताएं अलग अलग प्रवृत्तियों की हों जैसे कि उदाहरण के लिए निराला या शमशेर के यहां तो प्रवृत्ति और व्यक्ति की एकता स्वयंसिद्ध नहीं रह जाती।
3- कवियों की जगह कविताओं के उदाहरण देना सबसे बेहतर है।
वैसे लेख विचारोत्तेजक और गम्भीर है जिस पर थोड़ा समय लेकर और ज्यादा ठीक से पढ़कर तुमसे बात करूंगा।
(प्रणयकृष्ण इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं और उनकी यह प्रतिक्रिया स्वयं पंकज चतुर्वेदी ने अनुनाद को उपलब्ध कराई।)

Saturday, February 14, 2009

हस्तक्षेप - श्रीकांत वर्मा

(चित्र राजकमल द्वारा प्रकाशित 'प्रतिनिधि कविताएँ' से साभार)

कोई छींकता तक नहीं
इस डर से
कि मगध की शांति
भंग न हो जाए
मगध को बनाए रखना है तो
मगध में शांति
रहनी ही चाहिए

मगध है, तो शांति है
कोई चीखता तक नहीं
इस डर से
कि मगध की व्यवस्था में
दखल न पड़ जाए
मगध में व्यवस्था रहनी ही चाहिए

मगध में न रही
तो कहां रहेगी ?

क्या कहेंगे लोग ?

लोगों का क्या?
लोग तो यह भी कहते हैं
मगध अब कहने को मगध है
रहने को नहीं

कोई टोकता तक नहीं
इस डर से
कि मगध में
टोकने का रिवाज़ न बन जाए

एक बार शुरू होने पर
कहीं नहीं रुकता हस्तक्षेप -

वैसे तो मगधनिवासियों
कितना भी कतराओ
तुम बच नहीं सकते हस्तक्षेप से -

जब कोई नहीं करता
तब नगर के बीच से गुज़रता हुआ
मुर्दा
यह प्रश्न कर हस्तक्षेप करता है -
मनुष्य क्यों मरता हो?

(`मगध´ संग्रह से)

Friday, February 13, 2009

संतुलन का गुब्बारा फूट गया है - पंकज चतुर्वेदी / अन्तिम भाग

ये आरोप लगते रहे हैं और लगते रहेंगे। इनमें सचाई भी है। लेकिन इनमें-से ज़्यादातर उन युवा कवियों के सम्बन्ध में सच हैं, जिन्होंने जाने-अनजाने अपने कवि-कर्म में `समकालीन कविता´ का `एक्सटेंशन´ बनना और बने रहना मंज़ूर किया है। इनकी शिनाख़्त करना असंभव नहीं है। एक ज़िम्मेदार आलोचना का यह ज़रूरी कार्य-भार है। अब वक़्त आ गया है कि इल्जाम हवाओं में न लगाये जायें, बल्कि जिन कवियों और कविताओं को मद्देनज़र रखकर ऐसा किया जा रहा हो, उनका संदर्भ भी निश्चित और स्पष्ट किया जाय। आलोचना की संजीदगी और विश्वसनीयता उसकी ईमानदारी और वस्तुपरकता पर निर्भर है। श्रेष्ठ कवि शायद हर दौर में गिने-चुने ही होते हैं, सो यहाँ भी हैं, जिन्होंने `समकालीन कविता´ के बाद नया बहुत-कुछ किया है और अपनी एक अलग, मुकम्मल पहचान या मुहावरा खोजा और गढ़ा है। ये वही कवि हैं, जिन्होंने `समकालीन कविता´ के संतुलन के फ़लसफ़े को नामंज़ूर कर दिया है या जो उससे सापेक्षिक ढंग से स्वायत्त हैं। देवीप्रसाद मिश्र, कुमार अम्बुज, कात्यायनी, अनीता वर्मा, आशुतोष दुबे, अष्टभुजा शुक्ल, बद्रीनारायण, निलय उपाध्याय, नीलेश रघुवंशी और व्योमेश शुक्ल ऐसे ही कवि हैं। संतुलन स्थापित करने की कोशिश में जिस `सुख के एकालाप´ को रचने में `समकालीन कविता´ की परिणति हुई, उपर्युक्त युवा कवियों ने उसे अस्वीकार करने का रैडिकल साहस किया है। स्मरणीय है कि लगभग एक दशक पहले देवीप्रसाद मिश्र ने अपने एक वक्तव्य में कहा था--``कविता के स्रोत होते ही नहीं, तलाशने पड़ते हैं। संवेगों पर इसीलिए बहुत ज़्यादा समय तक भरोसा नहीं किया जा सकता है। संवेग पर भरोसा आनंद की तानाशाही को जन्म देता है। वह सुख का एकालाप रचता है, जबकि हिन्दी कविता का सबसे वैध स्रोत सुख और शक्ति के ढाँचे को ढहाने में निहित है।´´ (--`उर्वर प्रदेश´, 1999, पृ0 64) युवा कवियों के इस तरह के विचारों और `समकालीन कविता´ से उनकी कविता की मूलभूत भिन्नताओं को रेखांकित करते हुए युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने यह मूल्यवान् विश्लेषण प्रस्तुत किया है--``निस्संदेह समकालीन कविता जीवन के रचनात्मक-सौन्दर्यात्मक संवेगों की खोज और उन्हें कविता में बचाये रखने की कविता थी। उद्धत विद्रोह, क्रुद्ध असहमति, असंतोष और अस्वीकार की जगह उसने प्रतिरोध की एक नयी भाषा विकसित करने पर बल दिया था, जिसमें नाश और विध्वंस की जगह जिजीविषा और सृजन का स्वर प्रबल हो। ऐसा नहीं था कि इस कविता में दुख का राग या हाहाकार का संगीत `कुछ कम रहा है।´ फिर भी युवा कविता को उसमें `सुख का एकालाप´ ही अधिक सुनायी पड़ा, तो इसकी वजह यह थी कि उस `हाहाकार´ में `जीवन की सुगंध´ तो बहुत थी, शक्ति-संरचनाओं के विध्वंस की विकलता बहुत कम। कवि कहता तो था कि ``उठता हाहाकार जिधर है, उसी तरफ़ अपना भी घर है´´, पर तुरन्त यह भी जोड़ता था कि ``खुश हूँ आती है रह-रहकर, जीवन की सुगंध बह-बहकर।´´ (--`समकालीन जनमत´, अप्रैल-सितम्बर, 2004( पृ0 76)

उपर्युक्त नुक्ते के अलावा दो बातें यहाँ और ग़ौरतलब हैं। राजेश जोशी ने अपने एक इंटरव्यू में सही कहा है कि `गाँव से कोई बड़ा कवि इस समय हिन्दी में नहीं है।´ हम सिर्फ़ यह कहना चाहते हैं कि गाँव के जीवन और प्रकृति के कम-से-कम दो महत्त्वपूर्ण कवि हमारे बीच ज़रूर हैं--अष्टभुजा शुक्ल और निलय उपाध्याय। ख़ास बात यह है कि इन्होंने गाँव की सुंदर, सुखद, सजल, अयथार्थ और रोमानी तस्वीर पेश नहीं की है, बल्कि दारुण और विषाक्त हो चुके समकालीन ग्रामीण यथार्थ की प्रामाणिक कविता लिखी है। दूसरे, आठवें दशक के बाद की कविता में कवयित्रियों की उपस्थिति अपने आप में एक रैडिकल घटना है। कात्यायनी, अनीता वर्मा, शुभा, निर्मला गर्ग और नीलेश रघुवंशी ऐसे नाम हैं कि `रैडिकल´ शब्द का प्रयोग जायज़ है। स्त्रियों के बारे में कविता तो पहले भी लिखी ही जा रही थी, मगर उनके विचारों, सौन्दर्य-बोध और अनुभवों के संसार के उनकी अपनी भाषा में उजागर होने से ज़्यादा सच्ची, अहम और सशक्त कविता वह नहीं हो सकती। बक़ौल मैनेजर पाण्डेय, ``.......स्त्री जीवन के अनेक स्त्रियोचित अनुभवों की अभिव्यक्ति कोई पुरुष लेखक नहीं कर सकता। दलितों के जीवनानुभव और उसकी अभिव्यक्ति के प्रसंग में ज्योतिबा फुले का यह कथन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि ग़ुलामी की यातना को `जो सहता है, वही जानता है´ और जो जानता है, वही पूरा सच कह सकता है। केवल राख ही जानती है जलने का अनुभव....।´´ (--`मेरे साक्षात्कार´, 1998, पृ0 119)

हिन्दी कविता की दुनिया में अगर इस समय शताधिक युवा कवि रचनारत हैं, तो इनमें-से बीस-पच्चीस कवि निश्चय ही उल्लेखनीय हैं। बारह का नाम मैं ले चुका हूँ। जिनकी कविता किसी-न-किसी रूप या अर्थ में महत्त्वपूर्ण है, ऐसे कुछ और कवि हैं--विमल कुमार, उदयन वाजपेयी, गगन गिल, पवन करण, बोधिसत्व, सुंदरचंद ठाकुर, आर. चेतनक्रान्ति, संजय कुन्दन, शिरीष कुमार मौर्य, गिरिराज किराडू, गीत चतुर्वेदी और हरेप्रकाश उपाध्याय। पाँच-छह नाम और मैं ले सकता था, पर मेरे अध्ययन, अंतर्दृष्टि, अनुभव और रुचि की अपनी सीमाएँ हैं। जो नाम लिये हैं, उनकी बाबत यह दावा हरगिज़ नहीं है कि इन सभी ने अपना कवि-व्यक्तित्व निर्मित कर लिया है। कुछ ने किया है, कुछ उस प्रक्रिया में हैं और कुछ प्रक्रिया में होते हुए भी शायद न कर पायें। सारा मामला उनके अध्यवसाय और कमिटमेंट पर मुन्हसिर है। बहुत-से उल्लेखनीय युवा कवियों में यह समस्या नज़र आ रही है कि उनके पहले कविता-संग्रह से लेकर दूसरे और दूसरे से तीसरे तक के सफ़र में काव्य-तत्त्व का क्रमश: विस्मयजनक क्षरण होता गया है। वे अच्छी कविताएँ तो लिख ले रहे हैं, पर अच्छी कविता के नैरन्तर्य को संभव नहीं कर पा रहे। लेकिन कवि-व्यक्तित्व का निर्माण इस तरह की खण्डित या विषम सृजनात्मकता से नहीं हो सकता, जैसा कि यशस्वी कवि विनोद कुमार शुक्ल कहते हैं--``अगर किसी ने अपने जीवन में एक भी कविता लिखी, तो यह एक उपलब्धि होती है। पर रचनाकार का जो व्यक्तित्व बनता है, उस व्यक्तित्व के बनने में एक रचना पर्याप्त नहीं होती।´´ (--`सापेक्ष´, अंक-50( पृ0 282)

अगर लिखी जा रही कविता के स्तर में इस तरह की अनिश्चितता हरेक दौर में होती है, तब तो कोई बात ही नहीं। लेकिन वर्तमान युवा कविता में ख़ास तौर पर यह चिंताजनक पैटर्न दिख रहा हो, तो इसके कारणों पर बहस हो सकती है। लेकिन बहस कौन करेगा और किससे? युवा कवियों में परस्पर जिस संवादहीनता का माहौल है, आधुनिक हिन्दी कविता के इतिहास में शायद ऐसा पहले कभी नहीं रहा होगा। इस लेख में युवा कविता पर जिन तेरह आरोपों का बिन्दुवार ज़िक्र किया गया है, उनमें-से तीसरा आरोप अच्छे-बुरे सभी तरह के कवियों के सम्बन्ध में अधिकांशत: सच है। इन कवियों के यहाँ वैचारिक जद्दोजेहद कम-से-कम है, ये विचार-कर्म से परहेज़ करते हैं और पक्ष लेने से बचते हैं। ऐसी ही स्पर्श-कातर आस्थाओं के होने के चलते बीते पच्चीस-तीस वर्षों की युवा कविता पर सार्थक विमर्श का कोई वातावरण नहीं बन सका है। जितना और जैसा गद्य इनमें-से कुछ कवियों ने लिखा है, वह अन्यथा भले मूल्यवान् हो, पर इस वातावरण को बनाने में किसी काम का नहीं है। हमें अच्छी और ख़राब कविता और कवियों का फर्क नहीं मालूम, क्योंकि हम अभी भी इस सामंती संस्कार से पीड़ित हैं कि कोई आलोचना आयेगी और क़यामत के दिन ये चमत्कारी फ़ैसले सुनायेगी। वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने किसी के हवाले से एक बड़ी अच्छी बात कही है कि `अभागा है वह देश, जिसके पास आलोचक नहीं है और उससे भी अभागा वह है, जिसे आलोचक की तलाश है।´ उन्होंने यह भी कहा है कि `जो वास्तव में हमारी परंपरा के समर्थ और बड़े रचनाकार हैं, उन्होंने अपने समय की आलोचना से न कभी कोई अपेक्षा की, न उसकी शिकायत ही।´

ये कवि चाहें, तो इतिहास के इस तथ्य से भी प्रेरणा ले सकते हैं कि छायावाद से लेकर आज तक की कविता को समझने और उसके महत्त्व को सामने लाने का सबसे मूल्यवान् वैचारिक और आलोचनात्मक काम कवियों ने ही किया है। इसी ग़रज़ से विष्णु खरे, अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल, अरुण कमल और असद ज़ैदी सरीखे कवि लम्बे अरसे से इन कवियों से आलोचनात्मक गद्य या विचार-कर्म की उम्मीद करते रहे हैं। मंगलेश डबराल तो कहते हैं कि `जो अपने माध्यम का बड़ा चिंतक नहीं है, वह उसका बड़ा कलाकार भी नहीं हो सकता।´ निकट अतीत में भी हम देख सकते हैं कि आठवें दशक की कविता के महत्त्व की जो भी पहचान हो सकी है, वह किसी आलोचक के अनुग्रह से नहीं, बल्कि आठवें दशक के ही कवियों की समवेत आलोचनात्मक कोशिशों की बदौलत। भूलना नहीं चाहिए कि विजय कुमार भी दरअसल कवि हैं, आलोचना तो उन्होंने अपने साथी कवियों की `सहयात्रा´ के तौर पर की है, जो उनके ही शब्दों में ``कविता के साथ की गयी एक आधी-अधूरी संगत भर है।´´ (--`कविता की संगत´, पृ0 9) मुख़्तसर यह कि आठवें दशक के बाद की युवा हिन्दी कविता की दुर्गति, उपेक्षा और अवमूल्यन की मुख्य वजह ख़ुद उसके ही कवियों की वैचारिक निष्क्रियता है। इनमें-से बहुत-से कवियों में सत्ता-प्रतिष्ठान के प्रति जो एक मूक और विवश समर्पण का भाव दिखायी पड़ता है, उसका सबब भी अपने पक्ष को ज़ाहिर न करने की साहसहीनता है या कहें कि `कमिटमेंट´ का अभाव। काव्य-परिदृश्य से कविता की सार्थक, संवेदनशील और उत्कृष्ट आलोचना के सहसा ग़ायब होने का नतीजा यह हुआ है कि हिन्दी के युवा कवि की िक़स्मत कुछ `पेशेवर´ समीक्षकों, संपादकों और पुरस्कारों के निर्णायकों की मुट्ठी में बंद रहती है। अचरज नहीं कि हिन्दी के साहित्यिक सत्ता-प्रतिष्ठान के एक हाथ में युवा कवियों के लिए `भारतभूषण´ और `अंकुर मिश्र सम्मान´ जैसे अनेक पुरस्कार हैं, तो दूसरे हाथ में तिरस्कार। यानी कविता को छापने, पुरस्कृत करने और उस पर लिखनेवाले ज़्यादातर लोग बाक़ायदा यह कहते और लिखते हुए भी पाये जाते हैं कि युवा कविता में ख़ास कुछ है नहीं। यह स्थिति दुखद, हैरतनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है। मानो आज से लगभग पन्द्रह वर्ष पहले अरुण कमल ने जो अंदेशा ज़ाहिर किया था, वह अब हक़ीक़त की शक्ल में सामने है--``खतरा यह है कि यह पाठक-वर्ग यदि अचानक लुप्त हो जाय, तो कवि और कविता के स्थान का निर्धारण कुछ पत्र-पत्रिकाएँ, पुरस्कार-समितियाँ और फ़ौरी समीक्षक किया करेंगे। हिन्दी कविता का यूँ भी कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध सामान्य पाठकों से नहीं है।´´ (--`कविता और समय´, पृ0 195) ये हालात इसलिए पैदा हुए कि युवा कवि `कवि-कर्म´ को ही पर्याप्त मानते हैं, गोया इस कर्म का कोई संदर्भ ही न हो। लेकिन संदर्भ है, इसलिए अंतत: मुक्तिबोध की याद आना स्वाभाविक है--

गलियों में अंधकार भयावह ...........

मानो मेरे कारण ही लग गया
मार्शल लॉ वह,

मानो मेरी निष्क्रिय संज्ञा ने संकट बुलाया,

मानो मेरे कारण ही दुर्घट 
हुई यह घटना।´´
( यह पंकज चतुर्वेदी के समयान्तर में छपे लेख का संवर्धित एवं सम्पूर्ण रूप है )

Thursday, February 12, 2009

संतुलन का गुब्बारा फूट गया है - पंकज चतुर्वेदी / भाग चार

संतुलन के जिस फ़लसफ़े का ज़िक्र इस लेख में बार-बार किया गया है, वह जिस बड़े कवि की काव्य-दृष्टि और काव्य-सृष्टि के सबसे नज़दीक पड़ता है, वे हैं केदारनाथ सिंह। आशुतोष कुमार ने सही लिखा है कि आठवाँ दशक ``और जटिल अनुभूतियों का वहन करने में सक्षम एक नयी काव्य-भाषा के ढलने और केदारनाथ सिंह के काव्य-यूटोपिया के परवान चढ़ने का दशक´´ भी है। (-`समकालीन जनमत´, अप्रैल-सितम्बर, 2004( पृ0 75) आठवें दशक के बाद के तमाम युवा कवियों पर संतुलन के इस फ़लसफ़े का जो दूरगामी और व्यापक असर पड़ा -- जो अपनी प्रकृति में सृजनात्मक से ज़्यादा विनाशकारी साबित हुआ--उससे केदारनाथ सिंह की कविता और `समकालीन कविता´ दोनों की ही शक्ति और सम्मोहन का पता चलता है। बाद के इन युवा कवियों की ज़्यादातर कविता में `समकालीन कविता´ की अन्य प्रवृत्तियों के गतानुगतिक दोहराव और विस्तार के साथ-साथ पेड़-चिड़िया-फूल-पत्ती-बच्चों वग़ैरह का जो समारोह मिलता है, उसे देखकर जिज्ञासा होती है कि यह सब कहाँ से आया है, जैसे ग़ालिब ने सृष्टि के सौन्दर्य से विस्मित होकर पूछा था--``सब्ज़:-ओ-गुल कहाँ से आये हैं/अब्र क्या चीज़ है, हवा क्या है?´´ कोई भी थोड़ी-सी ज्ञान-संवेदनात्मक कोशिश के सहारे जान सकता है कि ये चीज़ें केदारनाथ सिंह और उनके प्रभाव में रही आठवें दशक की कविता से आ रही हैं, जैसा कि विजय कुमार ने इस बाबत लिखा है--``मनुष्य के बुनियादी राग और ऐंद्रिकता को बचाने पर बहुत अधिक ज़ोर दिया गया, जिसके चलते एक आसान और उत्सवधर्मी कविता को भी इसमें खप जाने की पूरी छूट मिल गयी।´´ (--`कविता की संगत´, पृ0 49)

आठवें दशक को अट्ठाईस वर्ष हो गये। इस लम्बे समयान्तराल में जितने युवा कवि सामने आये हैं, उनकी संख्या--अब इस बात का कोई मनोरंजक मूल्य भले ही हो, पर यह सच है--उतनी ही होगी, जितनी कि इस वक़्त हिन्दी की साहित्यिक लघु-पत्रिकाओं की संख्या है। `समकालीन कविता´ ने --राजेश जोशी का शब्द लेकर कहें तो--कविता को जिस तरह एक `जनतांत्रिक´ विधा बनाया है, उसका एक नतीजा यह भी है, जो अपने आप में स्वागत-योग्य है। मगर मुश्किल यह है कि इनमें-से बहुत सारे युवा कवि तब से लेकर आज तक लोक के आग्रह के नाम पर लोकवादी रोमान, सरलीकरण, इकहरेपन, विचार-शून्यता और पिछड़े हुए भाव-संस्कारों से ग्रस्त कविता लिख रहे हैं। विजय कुमार ने ठीक ही इसे ``उत्सवधर्मी लोक-संस्कृति´´ की, ``कृत्रिमता की हदों को स्पर्श करती सुघड़ कविता´´ कहा है। संतुलन के फूटे हुए ग़ुब्बारे को हवा में लहराये जाने के कारोबार पर एक वाजिब आलोचनात्मक आक्रोश में उन्होंने लिखा है--``अस्सी के दशक में सरकारी कला-भवनों और अकादमियों ने एक ख़ास तरह की द्वंद्व-रहित, अन्न-जल को गानेवाली, अनैतिहासिक और शाश्वत किस्म की कविता को बढ़ावा देना शुरू किया। इसी कविता को अस्सी के दशक की मुख्य प्रवृत्ति के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिशें हुई हैं। यह कविता ऊपरी तौर पर प्रगतिशील भी लगती है, क्योंकि इसमें लोक-जीवन और ऐंद्रिकता की गंध महसूस होती है, पर अपनी पूरी `एप्रोच´ में यह कविता लोक-जीवन को किसी डिपार्टमेंटल स्टोर में रखे जाने लायक़ चमकदार और सुघड़ बना देती है। यहाँ यथार्थ में दिख रही चीज़ों में अर्थ का विस्तार कवि के निजी जीवन के प्रत्यक्ष घर्षण से नहीं, बल्कि एक निर्द्वंद्व किस्म की रसिकता या कैशोर्य भावुकता के स्तर पर किया जाता है। .... यहाँ समाज की दुसह्य स्थितियाँ कहीं भी व्यक्ति के खिलाफ़ खड़ी नहीं हो रही होतीं, बल्कि हर जगह कवि उन्हें कमांड करते हुए उनकी भीतरी अर्थवत्ता को समाप्त कर देता है। ऐसी कविता मूलत: आनंदवादी होती है। यह कविता अकाल की विभीषिका को दिखाने के बजाए जाने कहाँ से अकाल में झट-से एक सारस को पकड़ लाती है और पाठक से कहती है--देखिये, आप तनाव और विषाद में न डूबें, आख़िर अकाल में भी तो जीवन दिख ही जाता है। ज़ाहिर है, शासक-वर्ग कला से इसी तरह के सरलीकरण चाहता भी है। दरअसल यह एक संदिग्ध चरित्र वाली रागात्मकता है, जिसका औसत मनुष्य के भीतरी इलाक़ों से कोई वास्ता नहीं है और यह किसी नुस्खे की तरह उम्मीद का बखान करती है। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि अस्सी के दशक में कला-भवन के रसियाओं और प्राध्यापक-आलोचकों ने इस रागात्मकता को भरपूर प्रोत्साहित किया।´´ (--`कविता की संगत´, पृ0 49-50)

पिछले लगभग तीस वर्षों में उभरे युवा कवियों पर विभिन्न रचनाकारों या आलोचकों द्वारा जो मुख्य आरोप लगाये गये हैं, उनका बिन्दुवार उल्लेख इसलिए ज़रूरी है कि इस क्षेत्र में सक्रिय लोगों को आनेवाले समय में निर्णय एवं विश्लेषण की सुविधा प्राप्त हो सके--
(1) अनुभव के गहन साक्षात्कार और एक वृहत्तर वैचारिक परिप्रेक्ष्य की कमी।
(2) इन कवियों ने नया या अलग कुछ नहीं किया है और ये ज़्यादा-से-ज़्यादा आठवें दशक की कविता का ही `एक्सटेंशन´ हैं।
(3) इन कवियों के यहाँ वैचारिक संघर्ष कम-से-कम मिलता है। ये आलोचनात्मक गद्य नहीं लिखते, विचार-कर्म से अक्सर परहेज़ करते रहे हैं और वैचारिक `स्टैंड´ या पक्ष लेने से कतराते हैं--``किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते।´´
(4) विश्व-साहित्य से अनभिज्ञता।
(5) अपनी परम्परा का अज्ञान।
(6) प्राय: ग़ैर-राजनीतिक कविता।
(7) `माइनर पोइट्री´ या कनिष्ठ कविता का विपुल उत्पादन।
(8) कुछ प्रचलित नुस्खों पर आधारित आत्म-तुष्ट, एकांगी, तनावहीन, सरल-सुगम, औसत, सुघड़, सुपाच्य और `सफल´ कविता। आत्म-संघर्ष और रचनात्मक जद्दोजेहद की शिथिलता और अनुपस्थिति।
(9) जीवन की जटिलता, अंतर्विरोधों, संिश्लष्टता, सूक्ष्मता और उसके विविध आयामों में प्रवेश करने से बचती हुई कविता।
(10) `इंटेलेक्चुअल टफ़नेस´ या बौद्धिक सान्द्रता का अभाव।
(11) लोकवादी रोमान से ग्रस्त। गाँव की ग़ैर-समकालीन, सुंदर, सुखद, स्वप्निल , सजल, शांत, ऐन्द्रिय , अनालोचनात्मक और अयथार्थ स्मृतियों और छवियों का निर्माण।
(12) `शहरी सिन्थेटिक पेण्ट´ से ग्रस्त--अनावश्यक रूप से जटिल, दुर्बोध , चटख , अपारदर्शी , विवरण-बहुल, एकरसता, शब्द-स्फीति, सूचनाओं और तथाकथित ज्ञान से आक्रान्त कविता।
(13) कविता के शिल्प, भाषा, शैली, व्यंजना और लय वग़ैरह के स्तर पर प्रयोगधर्मिता नदारद।

संतुलन का गुब्बारा फूट गया है - पंकज चतुर्वेदी / भाग तीन

वैसे बाहर से भीतर या बाह्य से आत्म की तरफ़ लौट आने की यह शुरूआत नक्सलबाड़ी से सीधे प्रभावित कवियों की क्रान्तिकारी वाम चेतना के समान्तर अन्य समकालीन कवियों में उदार वाम चेतना के उदय के साथ ही हो गयी थी। इसका प्रमाण मुहैया करते हुए विजय कुमार ने लिखा है--``धूमिल विपक्ष की कविता को बाहर-बाहर से लेकर आगे बढ़े थे। कवियों की परवर्ती पीढ़ी को अब इस विरोध को उसकी आंतरिकता और जटिलता में पाना था।´´ (--`कविता की संगत´, पृ0 46) जटिलता और संघर्ष धूमिल की कविता के वस्तु-संसार में भी कम नहीं है, बल्कि ज़्यादा ही है, मगर जिस आंतरिकता की बात यहाँ की गयी है, उसने ही समकालीन कवि को--प्रणय कृष्ण का शब्द इस्तेमाल करें तो--`आत्मसजग´ बनाया है। यह आत्मसजगता उसे किसी लड़ाई में शामिल होने या अपने वजूद को दाँव पर लगाने से ज़्यादा `विश्लेषण´ के लिए प्रेरित करती है। राजेश जोशी अपने दौर की कविता की यही विशेषता बताते हैं--``आठवें दशक की कविता अपने पूर्व काव्य-आन्दोलनों से इस अर्थ में भिन्न कविता है। वह वस्तुत: विश्लेषणात्मक विवेक और विश्लेषणात्मक प्रक्रिया की कविता है। वह आर्ग्युमेंट की कविता है।´´ (--`एक कवि की नोटबुक´, पृ0 167) इस कथन में उनका यह आत्म-स्वीकार भी जोड़ दें, तो किसी और व्याख्या की ज़रूरत नहीं रह जाती कि उपयुZक्त कविता ने ``एक ऐसा इनर-स्पेस भी बनाया है, जिसमें एक आत्मिक राहत भी है और सृजनात्मकता के लिए अवकाश भी।´´ (--`वही´, पृ0 165)

`आंतरिकता´, `आत्मसजगता´ या `विश्लेषणात्मक विवेक´ का ही तक़ाज़ा था कि `समकालीन कविता´ ने सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा और `जीवन के राग-रंग´ के बीच संतुलन को अपना आदर्श बनाया। इस तरह कविता, अरुण कमल के शब्दों में, ``साहित्य की समतल भूमि पर स्थिर´´ की जा सकी। (--`कविता और समय´, पृ0 20) उन्होंने अपने दौर के कवियों द्वारा ``ज़्यादा संतुलित राजनीतिक दृष्टिकोण´´ अपनाये जाने की सराहना की। (--वही, पृ0 188) सच पूछिये, तो `समकालीन कविता´ निराला, प्रगतिशील काव्य-आंदोलन, नक्सलबाड़ी, रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह की कविता--प्रमुख रूप से इन पाँच दिशाओं और आयामों में अपनी रचनात्मक सक्रियता के घेरे बनाती और विस्तृत करती है। वह अपनी अभिरुचि और अंतर्दृष्टि के मुताबिक़ इन पाँच संदर्भों से अर्जित वस्तुओं एवं उपादानों का चयांधर्मी इस्तेमाल करती है। वह जितने मुद्दों पर इनसे साझा करती है, उतने ही बिन्दुओं पर इनसे अलग भी नज़र आती है। उसकी कोशिश इनसे जुड़ने और टकराने के साथ-साथ इनके आपसी सम्बन्ध-सूत्रों की तलाश और इनके बीच सामंजस्य की ज़मीन को अपने लिए स्वायत्त करने की रही है( जैसा कि राजेश जोशी के इस बयान से ज़ाहिर है-- ``.......यह कविता अपनी पूरी परम्परा को आत्मसात् करके ही सम्भव हुई है। अपने से पूर्व कविता के उच्छेदन से नहीं। यह मात्र प्रगतिवादी कविता का विस्तार नहीं है। यह तो विभिन्न परस्पर-विरोधी काव्य-प्रवृत्तियों और काव्य-आन्दोलन के घात-प्रतिघात से, उसकी प्रक्रिया से प्रतिफलित हुई है।´´ (--`एक कवि की नोटबुक´, पृ0 165)

सन्तुलन का अपना सौन्दर्य और आकर्षण था, पर उससे लगी-लिपटी उसकी विडम्बनाएँ और खतरे भी थे, जिनका अंदाज़ा औरों को भले बाद में हुआ हो, मगर समकालीन कवियों को पहले से ही था, क्योंकि वे उस परिदृश्य के `इनसाइडर´ थे। उन्होंने देखा कि सामाजिक बदलाव के सवाल, आकांक्षा और बेचैनी को जीवन की रागात्मकता के आग्रह ने धीरे-धीरे हाशिये की ओर धकेला और फिर उसे निस्तेज और अप्रासंगिक-सा बना दिया। विजय कुमार ने 1988 में ही आगाह किया था--``......मनुष्य की रागात्मकता और ऐिन्द्रकता को चित्रित करने के नाम पर यह (`समकालीन कविता´) कहीं इस समकालीन दुनिया को तनावहीन और संतुलनपरक बनाकर तो पेश नहीं कर रही?´´ (--`कविता की संगत´, पृ0 21) दूसरी ओर, हिन्दी काव्य-दृश्य में भिन्न पृष्ठभूमियों, रुचियों और दृष्टियों के तमाम कवियों के शान्ति-सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व को किसी बुनियादी मुश्किल या क्षरण की निशानी मानते हुए राजेश जोशी ने ठीक ही शक किया है--``क्या कविता के समाज में सारे वैचारिक टकराव और तनाव ख़त्म हो गये हैं? क्या किसी ऐसे जनतन्त्र का उदय कविता में हो गया है, जिसमें राजनीतिक सवाल गौण हो चुके हैं?´´ (--`एक कवि की नोटबुक´, पृ0 164)
इस बिन्दु पर कोई जानना चाह सकता है कि आधुनिक हिन्दी कविता के इतिहास में `समकालीन कविता´ के कुल अवदान का वैशिष्ट्य या महत्त्व क्या है? राजेश जोशी की मानें, तो उसमें गहराई, ऊँचाई, जटिलता, अद्वितीयता और नायकत्व जैसी खुसूसियातें नहीं हैं। इनके उलट विस्तार, वैविध्य, साधारणता, सहजता, सचाई और संवादधर्मिता उसकी विशेषताएँ हैं। यह सब इसलिए मुमकिन हुआ है, क्योंकि यह--उनके शब्दों में--``अपने से पहले की संपूर्ण कविता की बनिस्बत सबसे अधिक जनतािन्त्रक कविता है।´´ (--वही, पृ0 165) राजेश जोशी के अनुसार जीवन का विशद चित्रण ही `समकालीन कविता´ का ख़्ाास मक़सद रहा है--``मुझे लगता है कि आठवें दशक की कविता वस्तुत: हारिजेंटल एिक्सस की कविता है। उदात्तता, गहराई, ऊँचाई या जटिलता में धँसना जैसे पदों में उसे नहीं समझा जा सकता। .......आज की कविता में गूढ़ार्थ नहीं, निहितार्थ महत्त्वपूर्ण है। ........... यहाँ नायकों का प्रवेश निषिद्ध है। यह चरित्रों की कविता है। यह हमारे आसपास और दूर तक फैले जीवन-प्रसंगों की कविता है। वह जीवन को उसकी विशिष्टता में नहीं, उसके विस्तार और विविधता में रचना चाहती है।´´ (--वही, पृ0 164)

इस सिलसिले में ग़ौरतलब है कि अरुण कमल ने अपने विश्लेषण में हद दरजे की ईमानदारी, पारदर्शिता और आत्म-निर्मम साहस की मिसाल पेश की है। वे लाख कहें --``मुझमें जो सबसे बड़ी कमज़ोरी है, वह है किसी को भी दुखी न करना। इसीलिए मैं अच्छा आलोचक नहीं बन सका।´´ (--`सापेक्ष´, अंक-50, पृ0 558) मगर यह सच नहीं है। उन्होंने किसी के भी दुख की पर्वा न करते हुए लिखा है--``कविता के लिए मुख्य चीज़ है जीवन-दृष्टि, जो विचारधारा और दर्शन से सम्बद्ध होकर भी उससे भिन्न और बड़ी है। समकालीन कविता ने वैसी दृष्टि हासिल की या नहीं, यह संदिग्ध है......... समकालीन कविता इन सबके बावजूद अभी छोटे क़द-काठी की कविता है। जो व्यग्रता, जो छटपटाहट निराला में है, जो फिर मुक्तिबोध-शमशेर में है, वह समकालीन कविता में सम्भवत: नहीं है। किसी भी विचार-सूत्र या भाव-सूत्र को उसके अंतिम छोर तक ले जाने वाला जीवट और धैर्य भी नहीं मिलता। छंद की समृद्धि और जीवन की वैसी विपुलता नहीं मिलती। संपूर्ण परंपरा का समाहार नहीं मिलता।´´ (--`कविता और समय´, पृ0 22) इस वक्तव्य की रौशनी में मुझे मंगलेश डबराल का वह वाक्य याद आता है, जो एकाधिक बार निजी बातचीत में उन्होंने मेरी मौजूदगी में बहुत विचलित होकर कहा है--``हममें-से कोई बड़ा कवि नहीं बन पाया।´´ ये बयान सिर्फ़ `समकालीन कविता´ को जानने-समझने की ग़रज़ से प्रस्तुत किये जा रहे हैं, इसलिए नहीं कि सादादिमाग़ों की शैली में इन्हें अभिधा में ग्रहण किया जाये या सच मान लिया जाये। रचना के महत्त्व का फ़ैसला तो उसके विश्लेषण और मूल्यांकन की बुनियाद पर ही होगा, ऐसे बयानों और आत्म-स्वीकृतियों की बिना पर नहीं। इस संदर्भ में सही रास्ता हमें यह मशहूर रणनीति ही दिखा सकती है--``कहानी पर भरोसा करो, कहानीकार पर नहीं।´´ अलबत्ता उपर्युक्त बयानों से यह तो सीखा ही जा सकता है कि कवियों और रचनाकारों में कैसी व्याकुलता, पैशन, विनम्रता, अपरिग्रह और आत्म-निर्ममता होनी चाहिए। एक ऐसे समय में इसका मूल्य और बढ़ जाता है( जब अहम्मन्य, आक्रामक, कंरियरिस्ट, मूल्य-विमुख और ताक़तवर लोगों ने साहित्य-संसार के दरवाज़े तोड़ डाले हैं। इसके बरअक्स--बक़ौल ग़ालिब--तमीज़ तो यह होती--
``घिसते-घिसते मिट जाता, आपने `अबस बदला

नँग-ए-सिज्दा से मेरे, सँग-ए-आस्ताँ अपना´´

बहरहाल। `समकालीन कविता´ में `जीवन की रागात्मकता´ का पूर्वग्रह क्रमश: इतना बड़ा रूप लेता गया कि उसने कविता की बाक़ी सभी विशेषताओं को दोयम बना दिया। कविता कुछ सामान्य प्रवृत्तियों से पहचानी और संभव की जाने लगी। मसलन् मूलभूत मानवीय संवेदनाओं को बचाने की चिंता, घर-परिवार, बच्चे, पेड़, फूल-पत्ती, चिड़ियाँ, आसपास का परिवेश, गाँव-क़स्बे की स्मृतियाँ, स्त्रियों, शोषित और उपेक्षित तबक़ों के प्रति `वास्तविक सहानुभूति की खोज´ वग़ैरह मिलकर `समकालीन कविता´ के वस्तु-संसार को निर्मित करते हैं। जब कविता की अंतर्वस्तु, संरचना, स्वभाव, शैली और भाषा को एक िक़स्म की सर्वानुमति हासिल हो गयी( तो यह सारा क्रिया-व्यापार एक ख़ास मानी में रूढ़ भी हो गया। इसकी सीमाएँ, अंतराल और असफलताएँ स्वयं समकालीन कवियों के समक्ष उजागर हो गयीं। यह कहना ज़्यादती नहीं होगी कि परिवर्तनकामी विचारधारा और जीवन के रागात्मक चित्रण के बीच संतुलन के `समकालीन कविता´ के जिस सुंदर, आकर्षक और मूल्यवान् ग़ुब्बारे ने आसमान में एक अरसे तक उड़ान भरी( वह अपनी ऐतिहासिक रचनात्मक भूमिका और ज़िम्मेदारी के निर्वाह के बाद फूट भी गया। निम्नलिखित वक्तव्यों में हम इस घटना की मार्मिक आहटें सुन सकते हैं--
(1) ``समकालीन कविता पर एक आरोप अक्सर लगाया जाता है कि वह फूल-पत्ती-चिड़िया-बच्चा की कविता है। यह आरोप एक अर्थ में सही है।´´
-- अरुण कमल (`कविता और समय´, पृ0 22)
(2) ``वह (`समकालीन कविता´) विशिष्ट होने के दर्प से बाहर आयी है। सहज होने की प्रक्रिया में उसने अपने को स्वतन्त्र किया है और स्वतन्त्र होने की प्रक्रिया में वह सहज हुई है। शायद इसीलिए इस कविता में पेड़, चिड़िया और बच्चे बड़ी संख्या में दिखते हैं।´´
--राजेश जोशी (`एक कवि की नोटबुक´, पृ0 165)
(3) ``...... किसी भी अनुभव के एक रूपाकार के कुछ दूर तक चलने के बाद जड़ हो जाने के ख़्ातरे हमेशा बने रहेंगे। क्योंकि हमारे अनुभव के दायरे अभी भी काफ़ी सीमित हैं और रचनाकार के वर्ग-अपसरण की प्रक्रिया अभी भी वास्तविक सच्चाई नहीं है। अत: किसी भी सामाजिक कन्सर्न के अमूर्त हो जाने और उसके एक `विशफ़ुल थिंकिंग´ में बदल जाने में देर नहीं लगती। समकालीन कविता में चिड़िया, पेड़ और बच्चों का संदर्भ इसीलिए बड़ी जल्दी एक अर्थहीन रैटारिक में भी तब्दील हो गया है।´´ --विजय कुमार (`कविता की संगत´, पृ0 21)

Wednesday, February 11, 2009

संतुलन का गुब्बारा फूट गया है - पंकज चतुर्वेदी / भाग दो

इस माहौल के बरअक्स `समकालीन कविता´ के कवि मार्क्सवादी विचारधारा में आस्था का सकारात्मक प्रस्ताव लेकर आते हैं। वे विचार की प्रधानता, कोरी राजनीतिक बयानबाज़ी और व्याख्या के विरुद्ध भाव की प्रधानता और भारतीय जन-जीवन के ऐन्द्रिय और वस्तुपरक चित्रण को कविता के लिए अहम मानते हैं। वे जीवन के अंतर्विरोधों और जटिलता को समझने की कोशिश करते हैं। वे कविता में व्यापक जीवन-दृष्टि और भाषा के वैविध्य को विन्यस्त किये जाने की माँग करते हैं। ऐन्द्रियता का इसरार ऐन्द्रिय चित्रण के लिए मशहूर कवि अरुण कमल ही नहीं करते, उसके लिए अक्सर न जाने जानेवाले कवि विजय कुमार भी करते हैं-- ``.........समकालीन कविता के संसार में रचनाकार की पेशकश यदि एक ओर अपने माहौल में व्याप्त अत्यन्त क्रूर किस्म की सच्चाइयों को मूर्त करने में है, तो दूसरी ओर वह शोषित जन की नैसिर्गक आस्था, ज़िन्दा रहने और जूझने की प्रवृत्ति को उकेरने में है। रचनाकार और परिवेश के बीच एक नये किस्म के लगाव और ऐन्द्रिक रिश्ते ने संघर्ष का नया सौन्दर्यशास्त्र इधर की कविता में रचना आरम्भ किया है।´´ (--`कविता की संगत´, पृ0 18)
पूर्ववर्ती कविता के विपरीत आठवें दशक के कवियों ने स्पष्ट किया कि उनके लिए राजनीति अलग से प्रकट या रेखांकित किये जाने की विषय-वस्तु नहीं, बल्कि जीवन का ही हिस्सा है। बक़ौल अरुण कमल--``राजनीति ऊपर-ऊपर की चीज़ नहीं, बल्कि पूरे जीवन-व्यापार में पेबस्त है।´´ (`कविता और समय´, पृ0 22) विजय कुमार ने भी लिखा कि आठवें दशक की कविता ने राजनीतिक चेतना को जिस तरह आभ्यंतरीकृत किया, वैसा पहले नहीं हुआ था--``उस (कविता) की राजनीतिक चेतना केवल कुछ सिम्बल्स तक सीमित न होकर जीवन की जटिल प्रक्रियाओं को एक ऐतिहासिक बोध से सम्पन्न करने में है। आठवें दशक के दौरान सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन यह घटित हुआ है कि भारतीय समाज में जनतांत्रिक चेतना मात्र राजनीतिक पार्टियों और चुनाव के जंगल से निकलकर समाज के मूल ढाँचे की उन भीतरी पर्तों तक जा रही है, जो अब तक `पालिटी´ की पकड़ के बाहर थे।´´ (`कविता की संगत´, पृ0 16) अंतर्वस्तु के स्तर पर आये इस बदलाव से शिल्प पर यह असर पड़ा कि कविता के लिए परिणति ही नहीं, प्रक्रिया भी महत्त्वपूर्ण हो गयी। कविता अपने प्रभाव के लिए महज़ कुछ पंक्तियों, निष्कर्षों या बीच में लगे-लिपटे चले आनेवाले दार्शनिक और विवेचनात्मक मंतव्यों पर आश्रित नहीं रह गयी, बल्कि उसकी पूरी संरचना में काव्यार्थ का अनुस्यूत होना प्राथमिक माना गया। इसी मानी में अरुण कमल ने लिखा--``समकालीन कविता ने एक बार फिर कविता के समग्र, संश्लिष्ट विन्यास का आग्रह सामने रखा।´´ (--`कविता और समय´, पृ0 20)
इस पृष्ठभूमि में ताज्जुब नहीं कि काव्य-विमर्श की भाषा में समूचे जीवन से गहरी आसक्ति, अनुभूति, संवेदना, करुणा, ऐन्द्रियता , प्रगीतात्मकता और रागात्मकता जैसे पारिभाषिक शब्दों का दबदबा क़ायम हो गया। एक ओर अरुण कमल ने `संपूर्ण जीवन के राग-विराग´ की अहमियत पर ज़ोर दिया( दूसरी तरफ़ राजेश जोशी ने निर्णायक अंदाज़ में इस काव्य-उपलब्धि का ऐलान किया--``आठवें दशक की कविता ने एक बार पुन: उस कविता को संभव बनाया है, जिसमें जीवन के सभी राग-रंग मौजूद हैं। यह कविता में जीवन के पुनर्वास की कविता है।´´ (--`एक कवि की नोटबुक´, पृ0 168)
नक्सलबाड़ी किसान-आंदोलन के अलावा आठवें दशक के कवि प्रगतिशील काव्य-आंदोलन को अपनी सकर्मक रचनाशीलता का संदर्भ मानते हैं। उनका दावा है कि उन्होंने नागार्जुन , त्रिलोचन, शमशेर और केदारनाथ अग्रवाल की कविता के छूटे हुए धागों को फिर से उठाया, इन कवियों का पुनराविष्कार किया और इनके दाय को आगे बढ़ाते हुए इन्हें नये सिरे से प्रासंगिक बनाया। इस बात में सचाई का अंश हो सकता है, पर यह संपूर्ण सचाई नहीं। युवा आलोचक प्रणय कृष्ण ने हाल ही प्रकाशित अपने एक आलेख में इन दोनों तरह की कविताओं के बड़े और बुनियादी फर्क उजागर किये हैं। ये अंतर इन कवियों की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमि और भूमिका से लेकर इनकी काव्यानुभूति की संस्कृति और ज्ञानमीमांसा तक में अंतर्व्याप्त हैं-- `` `समकालीन कविता´ परि-`स्थिति´-वाचक है, गति-वाचक उतनी नहीं। उसे इसलिए नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि वह अपने दौर के विराट् घटनाचक्रों, उनके किरदारों और उनके आवेगों का गति-चित्र प्रस्तुत करेगी। ....प्रगतिशील कवियों में गति का तीव्र आकर्षण था। वे अपने समय के तेज़ घुमावों के कवि थे, आन्दोलनों की ताक में रहते थे--परिणामों की फि़क्र उन्हें उतनी नहीं रहा करती थी। नागार्जुन तो इस प्रवृत्ति के आक़ा थे। ........समकालीन कविता ने ख़ुद को निराला-नागार्जुन -केदार-त्रिलोचन सबसे जोड़ा, लेकिन उसका अनुभव-जगत् और अनुभव-प्रणाली इन कवियों से काफ़ी भिन्न है। ये सभी कवि गाँव के जीवन की ओर झुके हुए थे। उनकी अपनी दुनिया वहीं थी। उनकी प्रगतिशीलता में विचारधारा और ठेठ गँवई दृष्टि को अलगाना मुश्किल है। प्रगतिशील कवि की यात्रा गाँव-क़स्बा-शहर की दिशा में है, जबकि समकालीन कवि के लिए यह शहर-क़स्बा-गाँव की दिशा है। प्रगतिशील कवि के लिए शहर सबसे दूर है, समकालीन कवि के लिए गाँव। प्रगतिशील और समकालीन कविता की ज्ञानमीमांसा भी अलग है। ........जहाँ प्रगतिशील कवि परिवेश की हलचलों में शामिल हुए बग़ैर उसे जानने का दावा नहीं करता, वहीं समकालीन कवि बग़ैर जाने शामिल नहीं होना चाहता। कह सकते हैं कि वह ज़्यादा आत्म-सजग है। प्रगतिशील कवियों में भी काल से परे जाने का चाव नहीं था, लेकिन ऐतिहासिक काल का एक बड़ा आयाम उनकी अनुभूति की बनावट में ही सक्रिय था। वे घटनाओं, गतिविधियों और चरित्रों के भीतर पैठते हैं, जबकि समकालीन कविता मुख्यत: विश्लेषण/सूक्ष्म पर्यवेक्षण पर अधिक निर्भर रहकर गुज़र चुकी अच्छी-बुरी घटनाओं के बाद भीतर और बाहर की परिस्थिति पर छोड़े गये उनके निशानात और उनके अभिप्राय अंकित करती है।´´ (--`कथा´-13, नवम्बर, 2008, पृ0 116-117) प्रणय कृष्ण ने इस ओर भी ध्यान आकृष्ट किया है कि प्रगतिशील कवि के बरअक्स समकालीन कवि का संघर्ष अक्सर समाज, राजनीति और संस्कृति के खुले, व्यापक और वेध्य परिसर की बजाए भाषा की सरहदों में ही मह्दूद है-- 
`` `समकालीन कविता´ समय और समाज में वांछित वास्तविक प्रतिरोध को प्रेरित, संगठित करने की भूमिका नहीं चुनती। वह भाषा में ही प्रतिरोध रचती है। .......सम्भवत: समकालीन कवि का विश्वास है कि उसे कविता की ज़मीन पर भाषा के औज़ारों से ही लड़ना है। उसका मूल काम यही है। काव्य-निर्माण के आंतरिक गति-नियम, जो सामाजिक या पार्थिव जगत् के गति-नियमों से अपेक्षया स्वायत्त हैं, वे ही उसे सर्वाधिक व्यस्त रखते हैं।´´ (--वही, पृ0 112-113)

Monday, February 9, 2009

संतुलन का ग़़ुब्बारा फूट गया है--पंकज चतुर्वेदी / भाग एक

{महत्वपूर्ण युवा आलोचक पंकज का यह लेख समयांतर के नए अंक में छपा है और इसे वहाँ से साभार लिया जा रहा है }


`तद्भव´ के संपादक अखिलेश ने कुछ अरसा पहले मुझसे एक बात कही थी, जिसे मैं बिलकुल सही मानता हूँ--``समकालीन कविता पर लेख तो कभी-कभार आते रहते हैं, मगर उसको केन्द्र में रखकर जो बहस उठनी चाहिए, वह उठ नहीं पा रही है।´´ ज़ाहिर है कि उनका इशारा बहस की संजीदगी, व्यापकता और उदात्तता की ओर है--उसकी युगांतरकारी मूल्य-चेतना और आंतरिक शक्ति की तरफ़। बेशक मुक्तिबोध के समय में और उसके आसपास स्वयं मुक्तिबोध, अज्ञेय और विजयदेवनारायण साही सरीखे अनेक दिग्गज रचनाकारों-चिंतकों के विशद आलोचनात्मक और वैचारिक अवदान की बदौलत कविता पर बहस का जो समृद्ध वातावरण बना था( उसकी चरम उपलब्धि के तौर पर 1968 में प्रकाशित नामवर सिंह की आलोचना-कृति `कविता के नये प्रतिमान´ को हम देख सकते हैं। मगर यह उस दौर का शीर्ष बिन्दु भी है और एक तरह से पटाक्षेप भी( क्योंकि फिर चालीस वर्ष बीत गये, पर काव्यालोचना की दुनिया में कोई बड़ा और यशस्वी काम नहीं हुआ। छिटपुट तौर पर कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण काम ज़रूर हुए। मसलन् मलयज और विष्णु खरे की किताबें आयीं--`कविता से साक्षात्कार´ और `आलोचना की पहली किताब´। ऐसा नहीं कि इस अंतराल में महत्त्वपूर्ण आलोचक हुए नहीं, मगर उन्होंने इस ओर से अपना हाथ अक्सर खींचे रखा। कोई बड़ा हस्तक्षेप नहीं किया, जिसे हमारे समय में एक प्रस्थान की मानिंद पहचाना जा सकता। विश्वनाथ त्रिपाठी, मैनेजर पाण्डेय और नित्यानन्द तिवारी जैसे प्रमुख आलोचकों से बहुतों को उम्मीद थी, जो अब भी उम्मीद ही है। बक़ौल आलोकधन्वा, ``क्या है चाँद के उजाले में / इस बिखरती हुई आधी रात में / एक असहायता / जो मुझे कुचलती है और एक उम्मीद/जो तकलीफ़ जैसी है।´´ (`दुनिया रोज़ बनती है´, पृ0 92)
अगरचे इन जैसे कुछ आलोचकों और ज़्यादातर हमारे समय के बड़े कवियों-विचारकों के फुटकर निबन्धों, समीक्षाओं, वक्तव्यों, डायरियों और साक्षात्कारों से इतना तो हुआ कि नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, शमशेर, रघुवीर सहाय, धूमिल, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे आदि से मंगलेश डबराल की पीढ़ी तक के अहम कवियों की शिनाख़्त हो पायी। इनकी कविता का वृहत्, अंतरंग और बहुआयामी विश्लेषण तथा मूल्यांकन मुमकिन नहीं हुआ, पर उसके महत्त्व और विशिष्टता को एक ज़रूरी हद तक रेखांकित किया गया। यह भी सच है कि कविता-सम्बन्धी विचार-विमर्श और आलोचना के समय का पहिया बीते चालीस साल से चाहे जैसी सुस्ती, अकड़ या शान के साथ घूम रहा था मगर आठवें दशक तक आते-आते थम-सा गया। नतीजा यह है कि आठवें दशक को भी अट्ठाईस साल हो गये, लेकिन प्रतिष्ठित कवियों और आलोचकों से बात कीजिये, तो मालूम होगा कि हिन्दी कविता का अभी आठवाँ दशक ही चल रहा है। कोई ताज्जुब नहीं कि लगभग पैंतीस वर्ष पहले जो `समकालीन कविता´ कही जाती थी, वह आज भी `समकालीन कविता´ है! कवि और आलोचक दोनों मिलकर या अलग-अलग इसका एक नया नाम तक ईजाद नहीं कर सके। इनमें-से कुछ लोग आज रामचन्द्र शुक्ल की आलोचनात्मक क्षमताओं पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं और कुछ उन्हें पहचानते तक नहीं। ऐसी ही स्थितियों से हताश होकर त्रिलोचन ने लिखा होगा--``रुख देखकर समीक्षा का अब मैं हूँ हामी / कोई लिखा करे कुछ, जल्दी होगा नामी।´´ (`प्रतिनिधि कविताएँ´, पृ0 111)
अगर आठवें दशक पर नज़र टिकायें, तो वक़्त के साथ यह दर्पण की तरह साफ़ और निश्चित हो चला है कि उसके महत्त्वपूर्ण कवि कौन हैं। विचारधारा के स्तर पर यहाँ दो धाराएँ हैं--एक, `अल्ट्रा लेफ़्ट´, यानी क्रान्तिकारी वाम( दूसरे, लचीला या `सॉफ़्ट लेफ़्ट´, यानी किंचित् उदार और व्यापक वाम। `अल्ट्रा लेफ़्ट´ के प्रमुख कवि साबित होते हैं आलोकधन्वा, गोरख पाण्डेय और वीरेन डंगवाल। नरम वाम की भी दो धाराएँ हैं। एक, वे कवि, जो अग्रज पीढ़ी में रघुवीर सहाय को अपना आदर्श मानते हैं। इनमें मुख्य हैं--मंगलेश डबराल, असद ज़ैदी, नरेन्द्र जैन और मनमोहन। दूसरी धारा के कवि रघुवीर सहाय को दृष्टि-पथ से ओझल नहीं करते मगर अपनी काव्य-चेतना, उसे चरितार्थ करने के कलात्मक अंदाज़, मंतव्यों, सरोकारों और रुझानों के मामले में केदारनाथ सिंह के ज़्यादा नज़दीक हैं। इनमें अग्रगण्य हैं--अरुण कमल, राजेश जोशी और ज्ञानेन्द्रपति।
यह दुखद अचरज का विषय है कि इतनी कविता-सजग और आलोचना-सजग इस पीढ़ी ने अपने ही एक कवि गोरख पाण्डेय के व्यक्तित्व न सही, मगर कविता को जाने-अनजाने नज़रअंदाज़ और विस्मृत-सा कर दिया है। अभी यशस्वी कथाकार और `पहल´ के संपादक ज्ञानरंजन ने `पहल´ के समापन पर आयी शोकाकुल प्रतिक्रियाओं, चिंताओं और प्रशस्तियों के संदर्भ में कहा है कि ``हमारे समाज में मरण का माहात्म्य बहुत है।´´ (`लमही´, जनवरी-मार्च, 2009, पृ0 9) मानो गोरख की कविता के महत्त्व को पहचानने के लिए `मृत्यु-बोध का आघात´ भी काफ़ी न था, जिसकी--बक़ौल नामवर सिंह--मुक्तिबोध की प्रतिष्ठा के प्रसंग में कभी एक भूमिका रही थी। प्रगतिशील काव्य-आंदोलन और नक्सलबाड़ी-श्रीकाकुलम किसान-विद्रोह की समेकित पृष्ठभूमि में गोरख पाण्डेय, आलोकधन्वा और वीरेन डंगवाल ऐसे कवि हैं, जिन्होंने अपनी कविता में समग्र समाज और राज्य-व्यवस्था के क्रान्तिकारी रूपान्तरण के लिए समझौताविहीन समर की बात की। इनमें गोरख अन्यतम थे, क्योंकि शोषित और पीड़ित साधारण जनता से उनके जितनी `आवयविक एकात्मता´ किसी और निम्न-मध्यवर्गीय कवि में न थी और अगर उनकी भोजपुरी रचनाओं को भी साक्ष्य मानकर चलें( तो आम किसान, मज़दूर, छात्र, स्त्री और दलित समाज की जीवन-स्थितियों का जितना सांद्र, मार्मिक और प्रभावशाली चित्रण उन्होंने किया, कोई और नहीं कर पाया। कला और आन्दोलनधर्मिता, दोनों ही कसौटियों पर खरी उतरनेवाली अनेक श्रेष्ठ और अविस्मरणीय रचनाएँ उन्होंने संभव कीं। सौन्दर्य-चेतना, दुख की व्यापकता का एहसास और यथास्थिति की असह्यता का तनाव उनकी एक छोटी-सी कविता `आँखें देखकर´ (1978) में जिस तरह एक साथ घटित होते हैं और कविता के अंत में ज़ाहिर होनेवाले संपूर्ण परिवर्तन के विचार या आकांक्षा को जितना सशक्त, विश्वसनीय और हृदयस्पर्शी बना देते हैं, वह अपने आप में बेमिसाल है--
``ये आँखें हैं तुम्हारी
तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समुंदर
इस दुनिया को 
जितनी जल्दी हो
बदल देना चाहिए।´´
एक तरफ़ कवि घोर सामाजिक विषमता का गवाह है--
``फ़सल काटे गइलीं दुखवा बिसार सजना
उनके भरि दिहलीं सोना से बखार सजना
अपने घरे आइल बोझा दुइ चार सजना´´
दूसरी ओर वह जनता के दुख, विपन्नता और आत्म-वंचना के लिए ज़िम्मेदार ताक़तों की भी शिनाख़्त करता है --
``खून चूस, देस बेचवा, लबार सजनी
ई दलाल पूँजीपति ज़मींदार सजनी´´
समूचे संदर्भ में स्वाभाविक ही था कि उसके निश्छल, न्यायप्रिय, सजग और संघर्षशील मानस में इस विश्वास ने गहरी जड़ें जमा ली थीं --
``बिना क्रान्ति के न होई उधियार सजना´´
गोरख पाण्डेय ने इस विश्वास की क़ीमत अपनी जान देकर चुकायी। `समझदारों का गीत´ जैसी प्रसिद्ध कविता लिखनेवाले गोरख दरअसल अपने वक़्त के दूसरे बुद्धिजीवियों और कवियों की मानिंद न तो किसी कमतर किस्म के दुख का प्रदर्शन कर पाये, न विरोध को ज़रूरी समझने के समान्तर समझौता कर सके और न समझौतापरस्ती के `औचित्य´ को सिद्ध करना उनकी नैतिक चेतना को गवारा हुआ--``हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं / हम समझते हैं / मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी / हम समझते हैं / यहाँ विरोध ही वाजिब क़दम है / हम समझते हैं / हम क़दम-क़दम पर समझौता करते हैं / हम समझते हैं / हम समझौते के लिए तर्क गढ़ते हैं / हर तर्क को गोल-मटोल भाषा में / पेश करते हैं, हम समझते हैं / हम गोल-मटोल भाषा का तर्क भी / समझते हैं।´´ अपने रचनात्मक, बौद्धिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्ष के बावजूद जब उन्हें समग्र सामाजिक रूपान्तरण का सपना सच होता नहीं दिखा, तब उन्होंने जनवरी, 1989 में आत्मघात कर लिया। उस समय कुछ लोगों को लगा था और आज भी शायद वे ऐसा मानते हों कि इस आत्मघात के निजी कारण थे--जैसे प्यार, दाम्पत्य, स्वास्थ्य या आजीविका से जुड़ी असफलताएँ। लेकिन ये लोग चाहें, तो इस सचाई के समक्ष अपनी आँखें खोलकर गोरख के बहुआयामी संघर्ष, उनके रचनात्मक तथा वैचारिक अवदान का अवमूल्यन करने से बाज़ आ सकते हैं कि उपर्युक्त निजी कारणों का वृहत् संदर्भ--जिसमें वस्तुत: गोरख सक्रिय और रचनारत थे--हरगिज़ निजी नहीं था। उनके निकट तो प्यार का स्वप्न भी तभी साकार हो सकता था, जब आम जनता के दुश्मन सामंती और पूँजीवादी निज़ाम को मिटाया जा सके। उनकी एक सुंदर, मार्मिक और विलक्षण रचना `सपना´ इस हक़ीक़त को समझने में हमारी मदद कर सकती है--
``सूतल रहलीं सपन एक देखलीं
सपन मनभावन हो सखिया, ................
अँखिया के नीरवा भइल खेत सोनवा
त खेत भइलें आपन हो सखिया, ..............
केहू नाहीं ऊँच-नीच केहू के ना भय
नाहीं केहू बा भयावन हो सखिया, .............
मेहनति माटी चारों ओर चमकवली
ढहल इनरासन हो सखिया,
बइरी पइसवा के रजवा मेटवलीं
मिलल मोर साजन हो सखिया।´´
क्रान्तिकारी वाम धारा के दूसरे कवि हैं आलोकधन्वा, जिन्होंने अभी तक घोषित तौर पर अपनी आखिरी कविता 1997 में लिखी है। यों उनके चुप और स्थगित होने की क्या वजह है? क्या उत्तर-सोवियत दौर की वह दारुण सचाई ही नहीं, जिसमें क्रान्ति एक नामुमकिन-सी बात लगने लगी और कवि ने उससे कम किसी एजेण्डे में शरीक होना नहीं चाहा? क्या यह एक `आत्महंता आस्था´ नहीं कि विचारधारा, संगठन और आंदोलन के शून्य के समय में कवि अपने उसी जज़्बाती परिवेश में साँस लेना पसंद करता है, क्योंकि उससे बाहर आते ही उसे अपने विपथित हो जाने का अंदेशा है-- ``और तुम स्वयं समुद्र सूर्य और नमक के हो/तुम्हारी आवाज़/आन्दोलन और गहराई की है .....
तुम्हें पार करने की इच्छा
अक्सर नहीं होती भटक जाने का डर बना रहता है।´´(1994) अचरज नहीं कि इस असमंजस, अनिच्छा और बेचैनी के छोर पर या उसकी चरम परिणति के रूप में नॉस्टेिल्जया, व्यर्थता-बोध और हताशा की वह इबारत है, जिसमें कवि ने मानो अपनी कविता का समाधि-लेख लिख दिया है--``भारत में जन्म लेने का/मैं भी कोई मतलब पाना चाहता था/अब वह भारत भी नहीं रहा
जिसमें जन्म लिया´´(1997)
आखिरकार इस धारा के सिर्फ़ एक कवि हैं वीरेन डंगवाल, जो आज भी सक्रिय और रचनारत हैं। 2002 में उनका दूसरा कविता-संग्रह छपता है-- `दुश्चक्र में स्रष्टा´। बदले हुए हालात में अपने ही देश में निर्वासित किये जाने या बेगानेपन का दंश उन्हें भी है, ``भीषणतम मुश्किल में दीन और देश´´ का विकट एहसास भी( मगर उनके कवि के बचे रहे आने की बुनियाद में यह संकल्पधर्मा चेतना है--
``देस बिराना हुआ मगर इसमें ही रहना है/
कहीं ना छोड़ के जाना है /इसे वापस भी पाना है/
बस न तू आँधी में उड़ियो ।/ मती ना आँधी में उड़ियो।´´
पूरे मामले का यह एक सकारात्मक पहलू है। पर इसका दूसरा पहलू बताता है कि क्रान्तिकारी वाम से अपनी प्रतिबद्धता के आशयों का विस्तार करते हुए वीरेन डंगवाल धीरे-धीरे अपनी पीढ़ी के अन्य कवियों द्वारा पहले से अपनायी जा रही किंचित् उदार और व्यापक वाम सरणि में दाखिल हो जाते हैं। इसीलिए एक ओर वे ``हे, अरे, अबे, ओ करुणानिधान!!´´ जैसी मूलगामी साहस से भरी काव्य-पंक्ति लिखते हैं, तो दूसरी तरफ़ परिस्थितिजन्य विवशता का हवाला देते हुए यह भी स्वीकार करते हैं कि उनके नये घर में --``एक गुप्त कोना भगवान के लिए भी है/जिसके बग़ैर आजकल गुज़र नहीं/यों हर ज़रूरत को ध्यान में रखकर बना/एक सात कोनों वाला घर मुझे मयस्सर हुआ´´ एक तरफ़ `आत्मग्रस्त छिछलापन ही जैसे जीवन में शेष´ रहा आता है( दूसरी ओर इस सारे धुँधलके, अवसाद और आत्मग्लानि को चीरती हुई ये इच्छाएँ भी सिर उठाती और एकदम मुनासिब मालूम होती हैं--``यह कौन नहीं चाहेगा उसको मिले प्यार/.....
बेटे-बेटी को मिले ठिकाना दुनिया में/कुछ इज्ज़त हो, कुछ मान बढ़े, फल-फूल जायँ..../पापड़-चटनी, आँचा-पाँचा, हल्ला-गुल्ला/दो-चार जशन भी कभी, कभी कुछ धूम-धाँय/जितना सम्भव हो देख सकें, इस धरती को/हो सके जहाँ तक, उतनी दुनिया घूम आयँ/यह कौन नहीं चाहेगा?´´ दरअसल, यही वह सामान्य भावभूमि है, जिस पर ज़्यादातर `समकालीन कविता´ रची गयी है। इसे प्रसन्नता और तकलीफ़ के बीच का द्वन्द्व कहेंगे या संतुलन? ऐसा कहने और मानने के लिए पर्याप्त सुबूत हैं--गोकि उन्हें यहाँ प्रस्तुत करने का अवकाश और ज़रूरत नहीं--कि अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में यह आत्मसंघर्ष, द्वन्द्व और प्रतिरोध की कविता है( लेकिन अपने कमज़ोर क्षणों में सन्तुलन, सामंजस्य और प्रदत्त स्थितियों के लाचार समर्थन या उनसे एक सायास पलायन की कविता भी है। क्रान्तिकारी वाम से यह राजनीतिक और वैचारिक `शिफ़्ट´ या अंतरण वृहत्तर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया से अलहदा और स्वायत्त, कोई स्वत:स्फूर्त परिघटना नहीं थी, बल्कि यह उसके ही दबाव का नतीजा थी। युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने बिलकुल सही लिखा है--``नक्सलबाड़ी ही आठवें दशक की रचनाशीलता का मूल संदर्भ था। विद्रोह के पहले आवेग में हिन्दी की क्रान्तिकारी वाम कविता वजूद में आयी। गोरख पाण्डेय, आलोकधन्वा, कुमार विकल इसी आवेग की उपलब्धियाँ थे। मगर विद्रोह की सच्चाई से दमन का यथार्थ कम बड़ा न था। यदि परिवर्तन इतना दुरूह था, तो रचनाकारों को लगा कि कविता में जीवंत मानवीय संवेदनाओं को दर्ज करके सुरक्षित कर लेना सबसे पहले ज़रूरी है। इसीलिए आठवें दशक की कहानियों-कविताओं में टूटते हुए जीवन-मूल्यों को बचाने की आतुरता और उनके टूटने से उपजनेवाली वेदना के मार्मिक चित्र इतने अधिक हैं। आठवें दशक की कविता की भावप्रवणता का मूल भी यही है।´´ (-`समकालीन जनमत´, अप्रैल-सितम्बर, 2004, पृ0 77)
दिलचस्प है कि `समकालीन कविता´ अपने से ठीक पहले की कविता-- यानी `अकविता´ को अपनी प्रेरणा का संदर्भ मानने से इनकार करती है। इसके कारण बताते हुए इस दौर के प्रमुख कवि-समीक्षक लिखते हैं कि उसमें जीवन-द्रव्य का अभाव, कोरी राजनीतिक बयानबाज़ी, छद्म-क्रान्तिकारिता, सरल राजनीतिक समझ, `भावोच्छ्वास में लिपटी मन:स्थितियाँ´ और `विचार-उच्छ्वासों तथा प्रतिज्ञाओं´ की बहुतायत थी। कवि मूल्यहीन होते जाते अपने परिवेश में बाक़ी समाज से ख़ुद को अलग-थलग, अकेला और एक उच्चतर नैतिक ज़मीन पर अवस्थित महसूस करता था और इसीलिए एक किस्म की आत्मबद्धता, आत्म-संकोच और आत्म- भर्त्सना का शिकार भी था। उसकी अभिव्यक्ति के लहज़े में संवाद की सहजता की बजाए आक्रामकता थी और इसीलिए अपने भाषिक व्यवहार में वह काफ़ी हिंस्र और आत्ममुग्ध था। बेशक उसमें बेचैनी, विद्रोह और युयुत्सा थी( पर कुल मिलाकर उसने आत्यन्तिक निराशा, अवसाद, अनास्था, सर्व-निषेधात्मकता, रूमानी आक्रोश, यौन कुंठा, सिनिसिज़्म और अराजकता से लैस काव्य-वातावरण को ही निर्मित किया।
(यह लेख अगली दो तीन किस्तों में जारी रहेगा ...)

Monday, February 2, 2009

वसन्त कभी अकेले नहीं आता - वरवर राव

वरवर राव विख्यात तेलगू कवि हैं। उनका संकलन हिंदी में भी उपलब्ध है। वसन्त के क्रम को आगे बढ़ाती हुई उनकी यह कविता पहल-47 से साभार!


वसन्त कभी अकेले नहीं आता
गर्मियों के साथ मिलकर आता है

झड़े हुए फूलों की याद के करीब
नई कोंपलें फूटती हैं
वर्तमान पत्तों के पीछे अदृश्य भविष्य जैसी कोयल विगत विषाद की
मधुरता सुनाती है

निरीक्षित क्षणों में उगते हुए
सपनों की अवधि घटती है
सारा दिन तवे-से तपे आकाश में
चंद्रमा मक्खन की तरह शायद पिघल गया होगा
मुझे क्या मालूम

चांदनी कभी अकेले नहीं आती
रात को साथ लाती है
सपने कभी अकेले नहीं आते
गहरी नींद को साथ लाते हैं
गिरे हुए सूर्य बिंब जैसे स्वप्न से छूटकर भी
नींद नहीं टूटती

सुख कभी अकेले नहीं आता
पंखों के भीतर भीगा भार भी
कसमसाता है !

अनुवाद - एम0टी0 खान और आदेश यादव

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