Sunday, April 12, 2009

प्रणय कृष्ण को देवीशंकर अवस्थी सम्मान - एक रिपोर्ट : अवधेश


प्रणय कृष्ण को देवीशंकर अवस्थी सम्मान


५ अप्रैल,२००९ के दिन रबीन्द्र भवन, साहित्य अकादमी में १३वां "देवीशंकर अवस्थी सम्मान" श्री प्रणय कृष्ण को उनकी पुस्तक "उत्तर औपनिवेशिकता के स्रोत" पर दिया गया।यह सम्मान हिंदी की यशस्वी लेखिका सुश्री कृष्णा सोबती के हाथों प्रदान किया गया। इस अवसर पर स्वर्गीय अवस्थी की याद में उनके बच्चों सर्वश्री अनुराग, वरूण और वत्सला द्वारा संपादित उनके आत्मीय मित्रॊं और परिजनों के संस्मरण की पुस्तक "आत्मीयता के विविध रंग" का विमोचन अवस्थी जी के अंतरंग मित्र व वरिष्ठ साहित्यकार अजित कुमार ने किया।अवस्थी जी की धर्मपत्नी श्रीमती कमलेश अवस्थी, पुत्र श्री अनुराग व पुत्रवधु श्रीमती गौरी ने फूलों के गुच्छे देकर सुश्री कृष्णा सोबती, सर्वश्री अशोक वाजपेई,जी.के.दास, विष्णु खरे, प्रियम अंकित और प्रणय कृष्ण का स्वागत किया। सर्वश्री अशोक वाजपेई, जी.के.दास, विष्णु खरे, प्रियम अंकित ने श्री वाजपेई की अध्यक्षता में इस अवसर पर आयोजित "साहित्य का दिक्काल" विषयक विचार गोष्ठी में अपने विचार रखे।

गोष्ठी से पहले आरम्भ में ही श्री मंगलेश डबराल ने निर्णायक मंडल की ओर से प्रशस्ति-पत्र का वाचन किया। श्री डबराल ने बताया कि इस बार के सम्मान का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। सभागार मे निर्णायक मंडल के सदस्य सुश्री कृष्णा सोबती, सर्वश्री अशोक वाजपेई, विश्वनाथ त्रिपाठी, मंगलेश डबराल उपस्थित थे। एक मात्र सदस्य जो अप्रिहार्य कारणों से नहीं आ सके, वे थे श्री चंद्रकांत देवताले। निर्णायक मंडल के सभी सदस्यों के नाम से जारी प्रशस्ति-पत्र में कहा गया- " अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ प्रणय कृष्ण मार्क्सवाद और उत्तर आधुनिकता के बीच चलने वाली जिरहॊं को भी अपनी पड़ताल में शामिल करते हुए औपनिवेशिकता, नस्लवाद, अश्वेतवाद,निम्नवर्गीयता, नवजागरण,स्त्री और दलित अस्मिताओं की भी एक बड़ी अंतर्दृष्टि के साथ पड़ताल करते हैं। शोधग्रंथ के रूप में लिखी गई यह कृति हिंदी में इस विषय पर उपलब्ध सामग्री के अभाव को बहुत हद तक पूरा करती है और इसकी रचना में जितना श्रम लगा है वह भी अलग से रेखांकित करने योग्य है। उत्तर आधुनिक साहित्यिक और साहित्येतर वैचारिकी को भारतीय यथार्थ के संदर्भ में जांचने की दृष्टि से यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है।"
सम्मान स्वरूप सुश्री कृष्णा सोबती के हाथों श्री प्रणय कृष्ण को प्रशस्ति-पत्र, स्मृति-चिन्ह के बतौर स्वर्गीय देवीशंकर अवस्थी की शीशे में मढ़ी आयताकार धातु की बनी आवक्ष प्रतिमा, ११०००/- की सम्मान राशि तथा कागज़- कलम भेंट की गई। सुश्री कृष्णा सोबती ने आशीर्वचन कहने के साथ सम्मानित लेखक की मां साहिबा को भी याद किया जिन्हें वह पुस्तक समर्पित है, जिसपर सम्मान दिया गया।

इस अवसर पर अपने वक्तव्य में प्रणय ने कहा," इस सम्मान को मैं युवा आलोचकों को दिए जाने वाले सम्मान की बजाय आलोचना के यौवन का सम्मान मानता हूं। स्वयं श्री देवीशंकर अवस्थी की आलोचना इसी का प्रतिनिधित्‍व करती है। श्री देवीशंकर अवस्थी का दुखद रूप से असमय चले जाना उनकी स्मृति में दिए जाने वाले इस सम्मान, आलोचना के असमाप्त कार्यभार और उसकी उन संभावनाओं के प्रति भी हमें बाखबर रखता है जो चरितार्थ नहीं हो सकीं।"

अंग्रेज़ी साहित्य के विद्वान श्री जी.के.दास ने दिल्ली में सन ५० के दशक में स्वर्गीय देवीशंकर अवस्थी के साथ बिताए दिनों की चर्चा करते हुए उनके आलोचनात्मक लेखन में साहित्य के देश-काल की चिंताओं को रेखांकित किया। श्री प्रियम अंकित ने कहा कि साहित्य का देश-काल जितना यथार्थ है उतना ही स्मृतिपरक । साहित्य अपना समानांतर देश-काल रचता है जो ऎतिहासिक देश-काल से भिन्न होता है। वह इतिहास से जुड़ा हुआ भी है और उससे मुक्त भी।

वरिष्ठ कवि विष्णु खरे ने कहा कि "साहित्य का दिक्काल" जैसे विषय की तत्समता इस पर विचार करनेवालों को अनिवार्यत: आध्यात्मिकता और अमूर्तन की ओर खींच ले जाकर समकाल के भयावह यथार्थ से दूर करती है। विष्णु खरे ने कहा कि यह दिक्काल दिक्कत पैदा करता है। उन्होंने अमरीकी मंदी की विभीषिका, आज के पूंजीवाद की भयावहता, किसानों की आत्महत्या जैसे खौफ़नाक मनाज़िर की चर्चा करते हुए कहा कि यही वह देश-काल है जिससे साहित्य को मुठभेड़ करना है। श्री खरे ने महाभारत और मीर तकी 'मीर' के साहित्य से प्रभूत उदाहरण देते हुए यह स्थापित किया कि साहित्य अपने समय की दमनकारी सत्ता से किस तरह टकराता है और इंसान के पक्ष की कैसी हिमायत करता है.ऎसा करने में उसे गहरे तौर पर राजनीतिक भी होना पड़ता है।

संक्षिप्त अध्यक्षीय संबोधन में श्री अशोक वाजपेई ने अमरीकी साम्राज्यवाद, भूमंडलीकरण के सर्वसत्तावाद और समरूपीकरण को लक्ष्य करते हुए कहा कि साहित्य को अपने ही स्वभाव के अनुसार, अपने ही मोर्चे पर साम्राज्य की विनाशलीला का प्रतिरोध करना पड़ेगा।


समूचे कार्यक्रम का चुस्त और प्रभावी संचालन युवा आलोचक संजीव ने किया। इस अवसर पर सर्वश्री मैनेजर पाण्डेय, नित्यानंद तिवारी, मैत्रेयी पुष्पा, वीरेन डंगवाल, अजय सिंह, अनामिका, चंद्रकांता, शोभा सिंह, रेखा अवस्थी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, हरिनारायण, शिवमूर्ति, योगेंद्र आहूजा, मदन कश्यप , रविभूषण, दिनेश शुक्ल, प्रेमपाल शर्मा, विमल कुमार, अजेय कुमार, असद ज़ैदी, पंकज चतुर्वेदी, आशुतोष कुमार, बजरंग बिहारी तिवारी, ज्योतिष जोशी, जीतेंद्र श्रीवास्तव, प्रभातरंजन, सुधीर सुमन, राजीवरंजन गिरि, प्रियदर्शन मालवीय, भाषा सिंह, संजय जोशी, मनोज कुमार सिंह, पंकज श्रीवास्तव, अनुराग वत्स, वैभव सिंह सहित कई साहित्यकार, मीडियाकर्मी, छात्र-छात्राएं तथा राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
***

4 comments:

  1. badhai. Adhiktar achhe logo ko hi milta raha hai yeh samman.
    Dilli mein na hone ka dukh ho raha hai. ye achha karykram hota hai. Pankaj Chaturvedi ko pahlam pahal yaheen jaana tha maine.

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  2. Pranay Krishan ko yah samman khud samman ki vishwaneeyata ko bhi badhane wala hai. Badhai.

    Pallav

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  3. प्रणय जी को बहुत-बहुत बधाई!
    इस तरह की रपटें पढ़कर जाने क्यों दुनिया के बचे होने का अहसास बना रहता है. ख़ास तौर पर जब मैं अखबारात में छपी राजनीतिक रपटों में भरती के लोगों की उपस्थिति पढ़ा करता हूँ और जो इस समारोह में लोगों के नाम पढ़े, सुकून हासिल हुआ है.

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  4. बहुत-बहुत बधाई!

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