Wednesday, April 22, 2009

परिचय के संपादक के नाम नीलाभ की खुली चिट्ठी

(दोस्तो यह पोस्ट एक गंभीर प्रकरण पर है। बीते दिनों हमने ब्लागजगत में भाषाई गंदगी का सामना किया है और इस पोस्ट में मैं अपने कुछ अटूट नैतिक-साहित्यिक मूल्यों के चलते आपको पत्रिकाजगत में ले चलने को बाध्य हूं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक श्री श्रीप्रकाश शुक्ल मेरे गुरुभाई भी हैं और बड़े भाई भी हैं। खुशी की बात है कि वे निरन्तर रचनारत रहते हुए `परिचय´ नाम की एक पत्रिका का सम्पादन-प्रकाशन भी करते है। उनका कविता संकलन `बोली बात´ भी इधर प्रकाशित हुआ है, जिसे हिंदी के बड़े आलोचकों ने बड़ा संकलन माना है। उनकी पत्रिका का नया अंक भी इसी बीच आया है, जिसका लम्बा सम्पादकीय एक `नकारात्मक और हिंसक´ कारण से चर्चा में है। पत्रिका मैं अभी प्राप्त नहीं कर पाया हूं पर सम्पादकीय मुझे ई-मेलिंग की सुविधा के चलते मिल गया है। मैं उसे पढ़कर अवाक और हतप्रभ हूं। मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि एक कवि इस तरह की भाषा लिख सकता है, जैसी इस सम्पादकीय में सर्वश्री विष्णु खरे, पंकज चतुर्वेदी और व्योमेश शुक्ल को इंगित करते हुए लिखी गई है। इसमें बतौर कवि विष्णु खरे और व्योमेश की तथा बतौर आलोचक पंकज चतुर्वेदी की खासी खबर ली गई है। रचनाकर्म में वाद-विवाद एक स्वाभाविक प्रक्रिया है पर उसे गाली-गलौज की हदों के भी पार ले जाना एक हिंसक कार्रवाई है। यहां मेरे पास नेट की सुस्त चाल और दूसरी अड़चनों के चलते इतने संसाधन नहीं हैं कि सम्पादकीय भी अनुनाद के पाठकों के अवलोकनार्थ लगा पाऊं पर उस सम्पादकीय पर वरिष्ठ कवि नीलाभ के पत्र को छाप पा रहा हूं, जिससे हिंदी पट्टी के पाठकों को उस नारकीय वातावरण का अनुमान हो जाएगा, जहां ऐसी बलात्कारी और हत्यारी भाषा साहित्य का मुखौटा लगाकर एक महत्वपूर्ण रचनात्मक पत्रिका का सम्पादकीय बन जाती है। श्रीप्रकाश शुक्ल जी से मेरा यह कहना है कि बड़े भाई माफ़ करना पर आपने जो लिखा-किया उससे मैं क्षुब्ध हूं। पता नहीं आपके जीवन में मेरी क्या अहमियत है, लेकिन मेरे लिए आपका लिखा-कहा मायने रखता है और हमारे गुरु प्रो0 सत्यप्रकाश मिश्र के सानिध्य की स्मृति भी। इस पोस्ट से हम एक प्रतिरोध की संस्कृति भी सामने लाना चाहते हैं, जिसकी आज के नैतिक रूप से विघटित होते साहित्य समाज को सबसे ज्यादा ज़रूरत है .....अंत में यह भी कि इस पत्र को ब्लाग पर सार्वजनिक करने का निर्णय स्वयं नीलाभ जी का है। )



प्रिय भाई,


जब इस बार के बनारस प्रवास के दौरान अस्सी पर `परिचय´ के सम्पादकीय की चर्चा सुनी थी तो सहज ही उसे पढ़ने की इच्छा हुई थी। इसीलिए मैंने अगले ही दिन आपको फोन करके आग्रहपूर्वक `परिचय´ का अंक आपसे मांगा था, क्योंकि शुरूआती अंकों को छोड़कर आपने बाद के अंक मुझको भेजने की जरूरत नहीं समझी। मेरे अनुरोध पर आपने सहृदयतापूर्वक `परिचय´ का अंक मुझे हिन्दी विभाग में ला कर दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।

मैं आपका सम्पादकीय पढ़ गया हूँ और मुझो यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि मुझो इसे पढ़कर बहुत खेद हुआ है। मैं खुद बहुत मुँहफट और बुरे अर्थों में निर्भीक प्रसिद्ध हूँ, लेकिन शायद मेरे दुश्मन भी मुझ पर यह आरोप नहीं लगा सकते कि मैंने कभी किसी पर दुर्भावनापूर्वक आघात किया है। आपके सम्पादकीय में पहली ही कुछ पंक्तियों से जो आक्रामक द्वेष झलकता है वह अन्त तक पहुंचते-पहुंचते लगभग गाली-गलौज तक पहुँच गया है और हमें यह सोचने पर विवश करता है कि `परिचय´ सचमुच `नई रचनाशीलता का अभिनव आयोजन´ है जैसा कि आपके पहले पृष्ठ पर ही घोषित किया गया है या फिर गत दशकों के `शनीचर´ जैसे कुख्यात पत्रों की ही अगली कड़ी है।

इसमें कोई शक नहीं है कि एक समय में अनेक पीढ़ियाँ रचनारत होती हैं। उनमें होड़ भी होती है और अच्छी रचनाओं के प्रति ईष्र्या भी होनी स्वाभाविक है, हालांकि ऐसी ईष्र्या अमूमन द्वेष में नहीं बदलती। दुर्भाग्य से पिछले डेढ़ दशक के दौरान हिन्दी का माहौल अनेक कारणों से बहुत दूषित हो गया है। क्रान्तियाँ पुरस्कृत हो रही हैं। जनता की पक्षधरता के बड़े-बड़े दावे करने वाले कवि हत्यारों के हाथों से पुरस्कार लेते दिखाई देते हैं, सत्ता के साथ बैठे दिखायी देते हैं। प्रतिष्ठा, परस्पर-पीठ-खुजाऊ मजलिसों और मण्डलियों का बोलबाला है - यह सब है, लेकिन इसके बावजूद ऐसे अनेकानेक रचनाकार हैं जो इस चूहा-दौड़ में शामिल नहीं है। चूहा-दौड़ में तो चूहे ही शामिल होंगे न! ऐसी स्थिति में हम गम्भीर और नयी रचनाशीलता का स्वागत करने वाली पत्रिका से ऐसे सम्पादकीय की आशा नहीं करते।

निराला ने अपनी एक महत्वपूर्ण कविता-`हिन्दी के भावी सुमनों के प्रति पत्र´ - में अपना पक्ष रखते हुए नये लिखने वालों को `सहज विराजे महाराज´ कहकर उनका स्वागत किया था। जरा उस कविता को पढ़ जाइए और उसके बाद अपने सम्पादकीय को पढ़कर देखिए। मुझे पूरा यकीन है कि अपने अन्तरंग कक्ष में बैठकर आपको यकीनन ग्लानि ही महसूस होगी, क्योंकि आपके सम्पादकीय के पहले पंक्ति से ही `नवांकुरों´ के प्रति जलता हुआ विद्वेष महसूस ही नहीं होता, बल्कि लगभग टपकता दिखायी देता है। आपने भोपाल से निकलने वाली पत्रिका `तथा´ में प्रकाशित पंकज चतुर्वेदी के लेख और हमाने नये साथी व्योमेश शक्ल की कविताओं पर सोदाहरण विचार किया होता तो शायद आपका लहजा इतना आपत्तिजनक न होता। मैं अभी इस बात पर बहस नहीं कर रहा हूँ कि पंकज ने क्या लिखा है, किस मानसिकता से लिखा है, मेरा एतराज आपके लेख के टोन और उसकी अतार्किक बौखलाहट से है। आपने सिर्फ पंकज या व्योमेश पर ही चोट नहीं की है, बल्कि आपने `उद्भावना´ द्वारा प्रकाशित पुस्तिका के भी संदर्भ से विष्णु खरे पर बहुत-से अनाप-शनाप आरोप लगाये गये हैं।

आपको यह बताने की मुझे जरूरत नहीं है कि कई बार बहुत-से कवि हमें पसन्द आते हैं, दूसरों को वे उतने अच्छे नहीं लगते या फिर दूसरों को जो कवि अच्छे लगते हैं वे हमें नहीं लगते हैं वे हमें नहीं लगते। अपनी पसन्द-नापसन्द को यदि हम उदाहरण के साथ और तर्क सहित सामने रखें तो बात बनती हैं, और उस हालत में सख्त आलोचना भी ग्राह्य होती है। मुझे याद आता है कि 1970 में मेरी एक लम्बी कविता पुस्तकाकार छपी थी। अपने आप से एक बहुत लम्बी, बहुत लम्बी बातचीत। इस पर नन्द किशोर नवल द्वारा सम्पादित पत्रिका `सिर्फ´ में वाचस्पति उपाध्याय ने लगभग दस पृष्ठों की एक टिप्पणी लिखी थी और उसकी सख्त आलोचना की थी। वह आलोचना इतनी सख्त थी कि शायद आज आप अपनी कविता पर वैसी टिप्पणी बर्दाश्त भी न कर पायें। लेकिन न सिर्फ मैंने उस टिप्पणी से बहुत कुछ सीखा, बल्कि मैं और वाचस्पति मित्र भी बन गये। इससे कुछ पहले मेरे पहले कविता संग्रह `संस्मरणारभ´ पर अशोक वाजपेयी ने एक समीक्षा की थी, जिसमें प्रशंसा थी। मेरी उमर उस वक्त सिर्फ बाईस बरस की थी। किसी ने भी अशोक पर यह आरोप नहीं लगाया कि उन्होंने किसी इतर मनतव्य से समीखा की है और फर्ज कीजिए कि इन चालीस वर्षों में इतना अन्तर आ गया है कि समीक्षाएँ और टिप्पणियाँ इतर मन्तव्य से भी होने लगी हैं तो भी आपका नजरिया ज्यादा वस्तुनिष्ठ और सार्थक रचनाशीलता को बढ़ाने वाला होना चाहिए। इस सम्पादकीय से तो यही लगता है कि आप भी उसी गटर के बाशिन्दे हैं या होना चाहते हैं। आपको तो नये लिखने वालों का स्वागत करना चाहिए, मार्ग दर्शन करना चाहिए, जैसा कि हमारी हिन्दी के अनेकानेक सम्पादकों ने किया है। उन सम्पादकों ने भी जो स्वयं रचनाकार भी रहे हैं।

अगर मन्तव्य की ही बात की जाय तो `उद्भावना´ वाली पत्रिका में जिन लोगों ने व्योमेश की तारीफ की है उनमें सिर्फ विष्णु खरे ही नहीं है, बल्कि मंगलेश डबराल और योगेन्दे आहूजा भी हैं। विष्णु को तो आपने अपशब्द सुनाये हैं, लेकिन मंगलेश को आपने क्यों छोड़ दिया? अगर किसी को मन्तव्य ढूंढ़ना हो तो वह इस बात में ढूँढ सकता है कि आप भी `देवीशंकर अवस्थी सम्मान´ के आकांक्षी हैं और मंगलेश उसके निर्णायक मण्डल का सदस्य। सिलेक्शन कमेटी के सदस्यों के दाँयें रहने के लाभ तो आप बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में नियुक्त होने के बाद भली-भांति जानते ही हैं, यही तर्क सम्मानों और पुरस्कारों में भी काम करता है। शायद इसीलिए अनुभव दास के छद्म नाम से (ऐसा मुझे बताया गया है कि अनुभव दास के नाम से आप ही लिखते हैं) आपने मंगलेश की पुस्तक `कवि का अकेलापन´ की वैसी ही टपकती हुई प्रशंसा की है जैसे टपकती हुई आक्रामक निन्दा अपने सम्पादकीय में आपने पंकज चतुर्वेदी, विष्णु खरे, व्योमेश शुक्ल और बिना नाम लिये अनेक नवांकुरों की है।

आपके सम्पादकीय में इंवर्टेड कॉमा की भरमार है। कौन-सा अंश उद्धरण है और कौन-से अंश पर इंवर्टेड कॉमा काकु के मिस लगा है, यह पता नहीं चलता। चूँकि आपका सारा सम्पादकीय सुविचारित गद्य का नमूना न होकर, घिरे हुए आदमी का बौखलाह-भरा एकालाप है इसलिए कई बार ऐसा लगता है कि आधा लेख आपका है और आधा अन्य लोगों का, और अन्य लोगों की तुलिकाओं के स्पर्श स्पष्ट ही नजर आने लगते हैं। मिसाल के लिए गालिब और दाग के उद्धरण या फिर हिन्दी विभाग `पत्रिकाओं का पालिका बाजार बना हुआ है´ जैसे जुमले जो जे.एन.यू. मार्का लगते हैं। आपकी अपनी भाषा में `ज्यादा´ को `ज्यादे´ लिखने की आदत है और दूसरी खटकने वाली बात याद आते हैं जैसे वाक्यांश को कसरत के साथ इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति। इसके साथ-साथ बिना कारण और दृष्टान्त दिये, फतवे देने का दुराग्रह। मिसाल के लिए ऐसा अतार्किक , बेमानी अंश जैसे-`मुझको पंकज द्वारा लिखी गयी गत वर्षों की सभी समीक्षायें करीब-करीब इसी आलोचना का मनोरंजक पक्ष लगती रही है। नशीली `श्रेणीबद्धताएं´ व `सूचीनिर्माण´ इसी के वीभत्स रूप हुआ करते हैं। मनोरंजन के अर्थ में इसका कुछ महत्व हो सकता है क्योंकि ऐसे लोगों की साहित्य में हमेशा ही जरूरत रही है। कम से कम आज के इस `रसरंजन´ के दौर में इनके भविष्य को लेकर कोई संकट भी नहीं है और आगे के दिनों में यह प्रवृत्ति और बढ़े तो कोई आश्चर्य नहीं।´

ऐसे पैराग्राफ का क्या मतलब है? इसका गम्भीर और `नयी रचनाशीलता के अभिनव आयोजन´ से क्या ताल्लुक है? और यह एकाध जगह नहीं है, आपके पूरे सम्पादकीय में ऐसे अतार्किक आक्रोश की भरमार है। आपने बड़े दम्भ से अपने बनारसी होने का उल्लेख किया है और बनारस के `नमक´ की हक-अदायगी का। लेकिन जैसी कह-अदायगी आपने इस समीक्षा में की है, उसे देखकर यही कह सकता हूँ कि जब आप इलाहाबाद के न हुए तो बनारस के क्या होंगे। आप की सारी शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद की है, जिसे इस बात का गौरव प्राप्त है कि बड़े-बड़े बनारसी नामवर सिद्धान्त निरूपण और आन्दोलन शुरू करने के लिए बनारस छोड़कर इलाहाबाद आते थे, क्योंकि बनारस में उस तरह की लण्ठई की परम्परा थी, जैसी आपके सम्पादकीय में दिखायी देती है। जबकि इलाहाबाद में एक गम्भीर और रचनात्मक माहौल था। आप इससे वाकिफ भी हैं। लेकिन जब कोई बड़ा उद्देश्य सामने न हो तो फिर एक हिंसात्मक द्वेष और कुित्सक मात्सर्य ही रह जाता है। बढ़िया शराब के नीचे रह जाने वाली गलीज तलछट की तरह। आप अगर इलाहाबाद के हाते तो शायद आपका सम्पादकीय अधिक तार्किक , अधिक संतुलित होता, फिर भले ही आप विष्णु खरे से लेकर व्योमेश शुक्ल तक, और पंकज चतुर्वेदी से लेकर और भी जिस-जिस के आप चाहते परखचे उड़ाते।

क्या मैं आपसे पूछ सकता हूँ, एक पुराने साथी होने के नाते, कि इतना मात्सर्य आपके अन्दर क्यों है? लालसाओं का ऐसा हाहाकार। मैं न तो व्योमेश शुक्ल का वकील हूँ, न विष्णु खरे का, न पंकज चतुर्वेदी का। लेकिन मैं नये अंकुरों का वकीज जरूर हूँ और यह हक मुझो पिछले पैतालिस वर्ष के रचनाशील जीवन ने दिया है और मैं सरस्वती के आँगन को चकलाघर बने देखना एक अपराध समझाता हूँ। आपने तो हद ही कर दी है मित्र। एक कहानी पुरानी याद आती है - एक बार कोई सुअर कीचड़ में लिपटा हुआ वहाँ चला आया जहाँ बहुत से शेर बैठे हुए थे, और ललकार-ललकार कर उन्हें लड़ने के लिए चुनौती देने लगा जाहिर है उस गँधाते, कीचड़ में सने सुअर से लड़ने की ताब उन शेरों में नहीं थी। तब क्या यह माना जाये कि उनमे शक्ति और ओज का अभाव था? फैसला आप ही करें।

और अन्त में एक किस्सा आपको सुनाना चाहता हूँ, जो काशी से ही सम्बन्धित हैं और मुझे आदरणीय त्रिलोचन जी ने सुनाया था। अरसा पहले नागरी प्रचारिणी सभा को लेकर रूद्र काशिकेय हजारी प्रसाद द्विवेदी से रूष्ट हो गये। रूद्र तो थे ही, `बहती गंगा´ जैसे अप्रतिम उपन्यास के रचनाकार और यों भी काशी की परम्परा में `गुरू´। उन दिनों वे `आज´ में `भूतनाथ की डायरी´ के नाम से एक स्तम्भ लिखते थे। उन्होंने हजारी प्रसाद द्विवेदी जी पर बहुत आक्रामक टिप्पणियाँ उस स्तम्भ में करनी शुरू कर दी। बात यहाँ तक पहुँची कि एक बार के स्तम्भ में उन्होंने हजारी प्रसाद जी की बेटियों पर कुछ छींटाकशी कर दी। त्रिलोचन तब `आज´ में काम करते थे और जब वहाँ चर्चा चली तो त्रिलोचन जी ने उस बार के स्तम्भ की कड़ी आलोचना की। बात रूद्र काशिकेय तक पहुचनी ही थी, सो पहुंची। अगले दिन दो मुस्टण्डे त्रिलोचन जी के पास आये, और बोले कि आपको गुरूजी ने बुलाया है। त्रिलोचन शाम को जब रूद्र काशिकेय के यहाँ पहुँचे तो वहाँ एक दरबार जैसा माहौल था, कुछ लोग भांग घोंट रहे थे, कुछ लोग वैसे ही बल्ले सहला रहे थे, कुछ गुरू की सेवा में लगे हुए थे। रूद्र काशिकेय ने कड़े शब्दों में त्रिलोचन से पूछा-क्यों भाई, सुना है तुमने इस बार के स्तम्भ की आलोचना की है? त्रिलोचन ने जवाब दिया - जी हाँ, रूद्र काशिकेय ने कहा - जानते हो न हम कौन हैं? त्रिलोचन ने कहा - बखूबी। रूद्र काशिकेय बोले- फिर कैसे हिम्मत पड़ी? त्रिलोचन ने कहा - जब तक आपने हजारी प्रसाद द्विवेदी को निशाना बनाया हुआ था, मैंने एक शब्द नहीं कहा। उनके हाथ में भी कलम है, वे भी चाहें तो आपकी खबर ले सकते हैं। लेकिन हमारी परम्परा बेटी-पतोहू पर छींटाकशी करने की नही है। यह आपको शोभा नहीं देता। वे तो जवाब भी नहीं दे सकतीं। रूद्र काशिकेय ने कहा- तुम ऐसा समझाते हो? त्रिलोचन बोले-एकदम। रूद्र काशिकेय ने कहा - जाओ, आज के बाद हम स्तम्भ नहीं लिखेंगे। और उन्होंनें स्तम्भ लिखना बन्द कर दिया।

मैं नहीं जानता यह किस्सा कितना सच है। लेकिन जब मैं `बहती गंगा´ में रूद्र काशिकेय के सृजित पात्रों-भंगड़ भिक्षुक और दाता राम नागर-को देखता हूँ, तो सहज रूप से विश्वास कर सकता हूँ कि रूद्र काशिकेय ने ऐसा ही किया होगा। लेकिन आपने अपने सम्पादकीय के अन्त में जिस तरह साहित्य का दामन छोड़कर व्यक्तिगत आपेक्ष किये हैं और उनका भी दायरा जहाँ तक पहुँचाया है - मेरा संकेत वारिस और वंश वाले प्रकरण का है - उससे मेरा सिर लज्जा से नीचा हो गया है कि मेरे समकालीन ने, जिसने मेरे ही शहर में शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की, कैसे इस प्रकार की अशोभनीय टिप्पणी की। हिन्दी में साहित्यिक लड़ाइयों की मिसालें कम नहीं है। निराला और पन्त की आपसी होड़ को देख लीजिए- कोई दाँव ऐसा नहीं जिसे आजमाने में हिचक रही हो, लेकिन मजाल कि चोट कठाँव लगे।

बस, मुझको इससे अधिक और कुछ नहीं कहना है। मेरा पत्र, प्रकट ही, बहुत कड़ा हो गया है, लेकिन आपका सम्पादकीय इतना आपत्तिजनक था कि यह प्रतिक्रिया लाज़िमी थी। मुझे विश्वास है, आप एक बार फिर अपने कृत्य पर विचार करेंगे और अगले अंकों में कर सकें तो इसका परिमार्जन भी करेंगे।


सप्रेम आपका
नीलाभ
श्री श्रीप्रकाश शुक्ल,
सम्पादक-परिचय,
68, रोहित नगर, नरिया,
वाराणसी - 221 005

कपिल देव द्वारा प्रत्यावेदन

(नीलाभ जी की चिट्ठी पर कपिल देव की अतिविलम्बित यह प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है। कुछ लोकतांत्रिक मूल्यों के चलते इसे यहाँ लगाया जा रहा है. इसमे विष्णु जी की कविता पर कपिल जी के विचारों से मेरी घोर असहमति है. मेरी निगाह में ये विचार विष्णु जी द्वारा किए गये उनके कथित अपमान से जन्मे हैं. मेरा मानना है कि कवि के व्यक्तिगत बर्ताव से उसकी कविता का मूल्यांकन सरासर ग़लत है. मैने खुद नागार्जुन को चार आदमियों के बीच एक आदमी को गरियाते देखा है और फिर उसी आदमी को उनकी कविता का मुरीद बनते भी देखा.)


नीलाभ जी

‘परिचय’ का सम्पादकीय निश्‍चय ही लज्जास्पद और हिन्दी समाज को कलंकित करने वाला है। मगर हिन्दी-आलोचना का जैसा माहौल बना दिया गया है,उसमे ऐसी निर्लज्ज भाषा में प्रतिक्रियाओं का आना कतई अस्वाभाविक नहीं है। हां, इस अर्थ में अस्वाभाविक जरूर हे कि यह किसी ने नहीं सोचा था कि साहित्य के आतताइयों के पाप का घड़ा इतनी जल्दी भर जाएगा और वह भी इतने घिनौने ढंग से फूटेगा-ऐन उन्हीं के सिरों पर, जो ‘देव दनुज नर सब बस मोरे’ वाले रावणी गर्व में चूर हो कर निर्भय घूम रहे थे और यह मान कर चल रहे थे कि हमने इस समूची पृथ्वी को ‘वीर-विहीन’ कर डाला है। बार बार कहने की जरूरत नहीं है कि ‘परिचय’ के सम्पादकीय पर हर वह व्यक्ति दुख और लज्जा का अनुभव करेगा जो किसी भी रूप में साहित्य की संस्कृति को बचा कर रखना चाहता है। मगर इस प्रकरण पर सोचते हुए सबसे पहले यह समझ लेने की जरूरत है कि यह कोई देवासुर संग्राम नहीं है। यह तो सांप और नेवले की लड़ाई है। पंक से पंक-प्राक्षालन का विचित्र उदाहरण! कल तक जो स्वयं अपने नमक- हलाल स्वामिभक्तों को उकसा कर साहित्य के षांत तपस्वियों का यज्ञ-भंग कराते रहे, ईंट पत्थर फिंकवाते रहे, आज उनके अंगने में जब किसी मनो-भ्रष्ट आतताई नें सीधे बम से हमला बोल दिया तो उन्हें उसका मुकाबला करने में मुश्किल पेश आ रही है और साहित्य की संस्कृति की रक्षा का वास्ता दे कर समूचे साहित्य-समाज से अपने पक्ष में समर्थन की याचना का प्रायष्चित्त करना पड़ रहा है। मेरा मानना है कि आलोचना में यदि अनर्गल प्रशंसाओं की सीमा तय नहीं की जाएगी तो आप निन्दा की सीमा भी तय नहीं कर पाएंगे। दोनों एक ही सांस्कृतिक विकार की भिन्न अभिव्यक्तियां हैं। असहनीय रूप से अतार्किक और दरबारी- प्रशंसाओं  के बल पर फलने फूलने वाले लोग साहित्य के अपने छोटे-मोटे कुनबे में खुश भले ही हो लें, किन्तु भूलना नहीं चाहिए कि नकली  प्रशंसाओं  पर टिका यशाकांक्षा का स्वार्थी अहंकार अपने पीछे एक अनर्गल किस्म की असहिष्णु और उद्दण्ड-पाणि प्रतिक्रिया को उकसाता है। इस प्रतिक्रिया का ही दूसरा नाम श्रीप्रकाश शुक्ल है।

नीलाभ जी, यदि हमारी बात समझनें की उदारता बरतें तो मै कहना चाहूंगा कि प्रशंसा या निन्दा का जैसा ‘सुपरलेटिव’ हिन्दी में देखने को मिलता है, अन्यत्र शायद ही कहीं मिले। और यहां अलग से कहने की जरूरत नहीं है कि समकालीन आलोचना में किसी दोस्त या दुश्‍मन की प्रशंसा या निन्दा के एक से एक नायाब नुस्खों का अप्रतिम आविष्कर्ता होने का पहला ‘गौरव’ विष्णु खरे नामक कवि-आलोचक को ही प्राप्त है। आप विष्णु खरे के मित्र हैं, इसलिए आप से अधिक यह कौन जानता होगा कि उनके जैसा असहिष्णु कवि-आलोचक इस पृथ्वी पर और कोई नहीं है(इस अतिशयोक्ति के लिए क्षमा करें)। मैं तो हिन्दी साहित्य की दुनिया में यदा कदा ही घूमने फिरने वाला एक अनाम व्यक्ति हूं,, इसलिए इस प्रसंग में, वर्षो पुराने अपने ही एक अनुभव को उदाहृत करते हुए संकोच का अनुभव हो रहा है। फिर भी मैं जिस संगोष्ठी का जिक्र करना चाहता हूं, वह यहां समीचीन इस लिए है कि आप स्वयं उसमें उपस्थित रहे हैं और उससे विष्णु खरे जैसे नामी कवि के भीतर बैठी हुई प्रशंसा-लोलुपता और अधिनायकवादी प्रवृत्ति का पता चलता है। लखनऊ में कात्यायनी के घर एक गोष्ठी में खरे जी एकल काव्य पाठ कर रहे थे। पाठोपरांत चर्चा का जो दौर शुरू हुआ, उसमें शायद पहले या दूसरे वक्ता के तौर पर मैंने आरम्भ में ही स्पष्ट कर दिया था कि मैं एक मामूली पाठक हूं । अपनी बारी में मैने जो कुछ कहा उसका सार यही था कि खरे के दूसरे-तीसरे संग्रहों की संवेदना का ग्राफ पहले वाले संग्रह जितना आकर्षित नहीं करता। यह सब कहते हुए मेरे मन में उनकी वे तमाम वर्णन-बोझिल कविताएं थीं जो पहले संग्रह की ‘बंगले’ और ‘लालटेन जलाना’ आदि के मुकाबले मुझे काफी शुष्क प्रतीत हुई थीं। मेरे बोल चुकने के बाद  प्रशंसाओं  का दौर जो शुरू हुआ, उससे मुझे अपनी ‘भूल-गलती’ का एहसास तो हो गया था मगर यह नहीं सोचा था कि इसे खरे जी नें अपनी शान में गुस्ताखी समझ लिया है। मेरे बाद,लोगों नें उनकी प्रशंसा में जो कसीदे पढ़े उससे मुझे क्या एतराज हो सकता था। मगर लज्जास्पद बात यह थी कि उतनी सारी  प्रशंसाओं  से उस सुकवि केा संतोष नहीं था। उस महाकवि को तो मुझ अकिंचन का उतना-सा एतराज भी गवारा न था। उनका गुस्सा इस पर था कि यह कौन दुःहसाहसी है जो मेरी ही खिदमत में सजाइ गई मण्डली में ऐसा बोल रहा है ? उनके गुस्से और उत्तेजना का हाल यह था कि उन्होंने तीन घंटे का अविराम भाषण दे मारा। हम चूंकि कात्ययनी के मेंहमान थे, इसलिए अपना समय नष्ट करके भी उन्हें सुनने के लिए अभिषप्त थे। उनका भाषण अबाध था। रामायण और महाभारत से ले कर नरसिंहाराव, विश्‍वनाथ प्रताप सिंह और राजीव गांधी आदि से होता हुआ (उस समय उनकी कविता की क्रांति अर्जुनसिंह तक नहीं पहुंची थी) बीच बीच में अपनी ही कविता की प्रशंसा पर आकर ही विश्राम लेता। ऐसे विश्राम के क्षणों में वह महामानव कई बार तो ‘नैनों’ और एक दो बार अपने ‘बैनों’ से यह कहने से बाज नहीं आ रहा था कि यह आदमी (मैं) केवल कहने भर के लिए अपने को पाठक बता रहा है। हकीकत में तेा यह बहुत धूर्त और घुटा हुआ है। (खुदा का शुक्र कि उन्होंनें एक बार भी मूर्ख नहीं कहा। यद्यपि उनके तेवर को देखते हुए मैंने यह सब सुनने के लिए अपने को तैयार कर लिया था)। मेजबान भी ऐसे आक्रमण से मेरी रक्षा को तैयार न थीं। वे तो स्वयं ही मंत्रमुग्ध भाव से उनकी अमरवाणी का पान कर रही थीं क्योंकि खरे जी बीच-बीच में उन्हें(कात्यायनी) कविता के पिछले पांच हजार वर्षो के इतिहास की सबसे जरखेज पीढ़ी की सबसे समर्थ कवि होने का प्रमाण-पत्र भी देते जा रहे थे। इस समय उनकी अहंकार-भरी कई बातें याद आने लगी हैं, मगर विस्तार-भय से उनका जिक्र नहीं करूंगा। लेकिन उनकी मुख मुद्रा और आग्नेय नजरों को कैसे भूल सकता हूं जिसका मुझे सामना करना पड़ रहा था। अपने अबाध प्रवचन के दौरान खरे जी बीच बीच में तरह तरह की मुद्राएं बना कर हमें जब तब घूरते रहते- मानों पूछना चाहते हों मैं किस ‘काल बस’, कहां से और क्यों कर यहां आ गया हूं। उन्हें षायद यह पता न था कि कात्यायनी नें हमें बाकायदा बुलाया था (पता होता तो क्या होता!)। खैर, तीन घंटे तक लगातार उनके भाषिक वध से अधमरा हो चुकने के बाद, इस महान गोष्ठी में गोरखपुर से लखनऊ बुलाने के लिए कात्यायनी को धन्यवाद ज्ञापित कर जिस किसी तरह मै भागा। आज उस ‘भूली हुई कथा’को याद कर के मन क्षोभ और प्रतिक्रिया से एक बार फिर भर उठा है। जीवन में ऐसा शायद पहली बार था कि मैं किसी व्यक्ति की हिंसक मुद्रा का इस तरह सामना करने पर विवश था। यह घटना पुरानी है। मगर जैसी कि सूचनाएं मिलती रहती हैं, इस बीच खरे जी का आत्माभिमान उत्तरोत्तर प्रबल हुआ है। जो हो, किन्तु यहां यह सब कहने का मेरा मतलब यह नहीं है कि खरे जी के व्यवहार से मुझे जो चोट पहुंची उस कारण, ‘परिचय’-प्रकरण का लाभ उठा कर मुझे इस मुद्दे को उल्टे सिरे से पकड़ने का अधिकार मिल जाता है या श्री प्रकाश शुक्ल जैसों का कृत्य न्यायसंगत हो जाता है। फिर भी ,चूंकि इस प्रकरण का तार विष्‍णु खरे से जुड़ा हुआ है, और हिन्दी का पूरा समाज अपने अनुभव से जानता है कि हिन्दी आलोचना में घराना-संस्कृति के संस्थापक और तानाशाह-विचारों के आदि स्रोत का नाम विष्णु खरे है,इसलिए हमारे हिन्दी समाज के लिए यह समझना भी कतई मुश्किल न होगा कि एक निहायत ही गंदी भाषा में लिखे गए सम्पादकीय की मनोवैज्ञानिक बुनियाद में कोई और नहीं, स्वयं विष्णुखरे और उनके पट्टशिष्‍यों की मिली भगत से स्थापित ‘अहो रूपं अहो घ्वनिः’ वाली कुनबाई आलोचना का हिंसावाद है। यह तो आप भी मानेंगे कि विधि-बस या जैसे भी आप अगर उनके कुनबे के शीर्ष सदस्य बने हैं तो जाहिरा तौर पर इस अनिवार्य योग्यता के कारण कि आप में भी किसी की ऐसी तैसी कर देने की मुंहफटता है, जैसा कि आप नें खुद भी स्वीकार किया है। नीलाभ जी, क्या आप बताएंगे कि मुंहफट होना साहित्यकार होने के लिए क्यों और किस सीमा तक उचित है ? फिर सीमा कौन तय करेगा ? आप ने अपनी सीमा किससे पूछ कर तय की है ? और आप ने कैसे मान लिया कि मुंहफटता की जो आप की सीमा है वही सबकी सीमा होनी चाहिए ? इसमें दो राय नहीं कि अपने विरोधियों के मानमर्दन के लिए कुख्यात विष्णुखरे की मण्डली नें साहित्य में जो भय का वातावरण बनाया है,उसकी तुलना श्रीप्रकाश की जघन्यता से नहीं की जा सकती। परिचय के सम्पादकीय में वे नैतिक गिरावट की जिस पराकाष्ठा तक पहुंच चुके हैं वहां तक पहुंचने में विष्णु खरे की मण्डली को अभी काफी समय लगेगा। खरे की मण्डली के सदस्य , तुलसी के शब्दों में, ‘पर अकाज लगि तन परिहरहीं’ वाली कोटि का कुकर्म करने से घबराते हैं क्योकि वे सब के सब स्वयं अपनी छवि के प्रति आत्मचेतस लोग हैं। मारना तो चाहते हैं, मगर मरना नहीं चाहते। जबकि श्रीप्रकाश शुक्ल किसी भी तरह की नैतिक-चेतना से मुक्त ऐसे व्यक्ति का नाम है जो यदि जरूरी हुआ तो आत्मघाती हमला करने से भी नहीं चूकता। ऐसा भी नहीं कि उन्होनें साहित्यिक निकृष्टता की यह पराकाष्ठा अचानक ही प्राप्त कर ली है। वे पहले भी कई अवसरों पर अपनी विनाशिनी प्रतिभा का जौहर दिखा चुके हैं। मगर जबतक वे विष्णुखरे के प्रशंसक रहे, तबतक उनकी शैतानियत को अनदेखा किया जाता रहा। बहरहाल, इस समूचे प्रसंग में मैं पूछना यह चाहता हूं कि हमारा साहित्यिक समाज जिस तरह आप का और विष्णु खरे का मुहफट व्यवहार सहन कर लेता है उसी तरह अगर श्री प्रकाश शुक्ल की हिंसकता को सहन कर लेता है तो इसमें दोष किसका है ? श्री प्रकाश को क्या इसी कारण देशनिकाला दे दिया जाना चाहिए कि इसबार उसके निशाने पर कोई तीसरा नहीं, बल्कि स्वयं विष्णुखरे ओैर उनके द्वारा पालित-पुरस्कृत कोई बच्चा है ? पिछले दिनों पहल समेत अन्य पत्र पत्रिकाओं में विष्णुखरे पर अतिशयवादी  प्रशंसाओं  से भरा जितना कुछ लिखा गया है, वह क्या सिद्ध करता है ? मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि विष्णु खरे को इस पृथ्वी का सबसे महान कवि साबित करने की मुहिम में हमारे युवा आलोचकों को क्यों दूसरे तमाम कवियों को इस पृथ्वी से बेदखल कर डालने की मजबूरी सताने लगती है? विष्णु खरे क्या कविता के कोई कच्छप या बराह हैं ? हिन्दी कविता की पृथ्वी क्या उन्हीं की पीठ या बराह-दंत पर टिक कर बची रह पाएगी ? आखिर ऐसी कौन सी समस्या है कि केदार नाथ सिंह,अरूण कमल, मंगलेश या राजेश जोशी आदि को उनके समकालीनों की भरी-पूरी दुनिया में रख कर समझना ज्यादा सहज और सुखद प्रतीत होता है जबकि विष्णुखरे को स्थापित करने के लिए हिन्दी कविता के सारे कवियों को दृष्य से बाहर कर देना जरूरी हो जाता है ? विष्णु खरे और उनकी कविता को हिन्दी कविता के समूचे वातावरण और कोलाहल के बीच रख कर मूल्यांकित करने से परहेज करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि वे क्यो नहीं बताते कि केदार नाथ सिंह और विष्णुखरे में से कौन कविता की मूल प्रकृति का सम्मान करते हए उसकी सीमाओं को रचनात्मक विस्तार देता है और कौन अपने को प्रयोगशील साबित करने के अहंकार में कविता की मूल प्रकृति के साथ बलात्कार करने से तनिक हिचकता तक नहीं है। किसी समर्थ कवि से तुलना या स्पर्श मात्र से अपने प्रिय कवि के मर जाने के डर में जीने वाले इन युवा दरबारियों से पूछा जाना चाहिए कि वे क्यो विष्णु खरे के संदर्भ में सीधे ‘सुपरलेटिव’ वाचालता के शिकार हो जाते हैं। कारण साफ है। सुपरलेटिव में जीना इन्हें सिखाया ही इसलिए गया है कि उनका सारा हुनर अपने बॉस की शान बढ़ाने के काम आएगा। यह एक ऐसा बास है जो सुपरलेटिव से कमतर भाषा में अपनी प्रशंसा सुनने को तैयार नहीं हो सकता। कमतर आंकने वाले की वह खुद अपने हाथों हत्या भी कर सकता है। इसे कहते हैं-‘भय बिनु होहिं न प्रति’। भयजनित प्रीति से उपजी आलोचनाओं की प्रतिक्रिया में उपजी श्री प्रकाश शुक्ल के सम्पादकीय का अवदान यह है कि अपनी सारी निकृष्टता के बावजूद उसनें भय से उपजी इस प्रीति का खुलासा कर दिया है। यह दीगर बात है कि यह खुलासा नीचता के जिस स्तर पर जा कर किया गया है, उससे कम पर भी किया जा सकता था।

फिर कहूंगा कि विष्णु खरे और उनकी मण्डली जिस वातावरण की रचना कर रही है उसे यदि रोका नहीं गया तो कोई आश्‍चर्य नहीं कि आने वाले दिनों में श्री प्रकाश शुक्ल की भाषा को ही प्रतिरोध की नैतिक भाषा का दर्जा हासिल हो जाएगा और आश्‍चर्य नहीं कि अपने समानधर्माओं को लेकर वह भी विष्णुखरे की तर्ज पर अपना स्कूल खोल लेगा। कुल मिला कर कहना यह है कि ‘परिचय’ के सम्पादकीय प्रसंग की निन्दा का खुला अभियान चलाया जाना चाहिए। मगर भूलना नहीं चाहिए कि किसी इस या उस कवि का एकाधिकार स्थापित करने की गरज से आलोचना को अनर्गल अतिशयवादी प्रशंसा की भेंट चढ़ा देना भी कम चिंताजनक नहीं है।



कपिलदेव

7 comments:

  1. क्या कुछ होता है साहित्य के नाम पर. भगवान् के नाम पर हमें न बताइये - हमारा तो हिंदी कविता पढना ही छूट जायेगा! आपको श्रीप्रकाश शुक्ल जैसे लोगों के या उनके सही-गलत काम के बारे में अपने ब्लॉग पर लिख कर उन्हें महत्त्व नहीं देना चाहिए. भले ही वो आपके गुरूभाई हों या बड़े भाई.

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  2. Shriprakash se kya shikayat karte hain Neelabh Ji? JNU marka wali jo baat aapne kahi hai, usse hi saaf hai ki gandgi ka udgam kaun log bane baithe hain. aaj se nahi balki Banaras se JNU aate-aate hi ye gandgi shuru ho gayi thi.

    Dukh ye bhi hai ki NIRBHIK AUR MUNHFAT wali parampra bhi nahak apni urja galat misal paida karne mein laga baithi. Ab to bahut mushkil hai is keechad ke pigs saf karna.
    Apne jo likha hai ki bahut se rachnakaar hain o chuha daud mein shamil nahi hain, yuva lekhkon ko unki hi raah pakdnee chahiye. varna to yuva bhi jane kis-kis puraskar se lade ja rahe hain.

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  3. राम राम राम राम्॥

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  4. भाषा के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ हरगिज बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए. ऐसी बातों की अनदेखी ही ठीक है. इन्हें तवज्जो देना उचित नहीं. पिछले दिनों कबाड़खाना पर अशोक जी भी भाषा के माखौल से आहत नजर आये थे. आप लोगों के जरिये ब्लॉग्स के रूप में ऐसी दुनिया का निर्माण किया जा रहा है, जहां आकर क्रिएटिव रिलीफ मिले. वरना ब्लॉग्स तो और भी हैं और साहित्य में क्रिएटिविटी के नाम पर अरसे से क्या-क्या नहीं होता रहा है क्या किसी से छुपा है. च्वाइस हमारी है कि हम किसे, कितनी तवज्जो देते हैं. कृप्या ऐसी बातों से अपने प्यारे ब्लॉग को बचाइये!
    प्रतिभा कटियार

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  5. ek asmita bhasha kee bhee hotee hai. us ke saath aisee badsalookee bardaasht nahee keee jaanee chahiye ki wah gaaleegalauch see deekhane lage.

    aajkal raajneeti me varungardi haawee hai.aapkaaa bayaaan jitnaa sharmnaak hogaa , utnee hee aap kee charchaa hogee. lekin saahity kaa gativigyaan raajneeti se alag hotaa hai. saahity me varungardi haaraakeeree ke siwaa aur kuchhh nahee hai.

    aalochanaa pratyaalochanaa se pare n vishnu khare hain , n pankaj, n vyomesh. vishnu khare ne saatven aathven dashak kee vishnan gadymaytaa me dabee jaa rahee kavitaa ko punaraavishkrit karte huye bhale hee hindi kavitaa ko utkrishtataa kaa nayaa shikhar diyaa ho, pankaj hamaare uttar samkaleen samay ke kitne hee nukeele sawalon se takraate huye lahooluhaan huye hon,vyomeshn smritibhransh ke chautarafaa fascisti abhiyaan ke khilaf kavitaa kee kaisee bhee nishkavach jang chhede huyen hon, aalochanaa unhe aur bhee nikharegee, koee avagun n karegee. lekin aalochanaa aur gaalee ek hee vastu nahee hai.

    galee kaa ek hee matlab hai --aalochana kar sakne kee asahaay asamathataa.

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  6. शिरीष जी
    किसी लोकतांत्रिक मूल्य की रक्षा के लिए अपने को मजबूर महसूस करना एक अर्थ में उस मूल्य के ही विरोध में खड़ा हो जाना है। मूल्य के साथ हमारा सम्बन्ध सहज होना चाहिए। विवशता जन्य नहीं। लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत अगर आप को हमारी टिप्पणी छापनी उचित प्रतीत हुई तो अलग से यह कहने की क्या आवश्यकता थी कि इसे लोकतांत्रिक मूल्यों की हिफाजत के लिए छापना पड़ रहा है ? क्या आप मानते हैं कि इसे नहीं छापना चाहिए था ? अगर मानते हैं कि यह किसी व्यक्तिगत द्वेष-भावना से प्रेरित टिप्पणी है तो मैं पूछना चाहता हूंं कि वह कौन सा लोकतांत्रिक मूल्य है जो द्वेष-भावना से प्रेरित विचार को छापने के लिए विवश करता है ? वेैसे भी, एक ब्लागर होने की हैसियत से, छापने या न छापने के लिए आप सर्वथा स्वतंत्र थे। सम्पादक को यह स्वयं लोकतंत्र का ही दिया हुआ अधिकार है। अतः आप के समक्ष कम से कम लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संकट तो नहीं ही था। इतना सब निवेदन करते हुए, दरअस्ल मैं कहना यह चाहता हूं कि उचित तो यह था कि सम्पादकीय टिप्पणी के रूप में मेरे विचारों का विरोध न कर के, इन्हीं बातों को एक स्वतंत्र प्रतिक्रिया की तरह ब्लाग पर लगाते। तब वह आप का स्वतंत्र मत होता,और तब मैं आप का जवाब देने की स्थिति में भी होता। मगर अब मैं आप की बातों का जवाब इसलिए नहीं दे सकता कि आप की सम्पादकीय-सफाई उन लोगों को सम्बोधित है जो मेरी टिप्पणी के निशाने पर हैं। अस्ल बात तो यह है कि मेरी टिप्पणी ने आप को ‘निगलत उगिलत प्रीति घनेरी’ वाली मनोदशा में डाल दिया था। आप इस टिप्पणी में बयां किए गये सत्यों का खुलासा भी चाहते थे, विष्णु खरे के संदर्भ में आने वाले विरोधी विचारों का तमाशा भी खड़ा करना चाहते थे,मगर इसके कारण अपने सम्बन्धों पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों से बचना भी। इस संकट से उबरने के लिए आप नें, धूमिल के शब्दों में , ‘विरोध में मु्ट्ठी भी तनी रहे और कांख भी ढकी रहे’ की नीति का अनुसरण किया। यानी कि मेरी टिप्पणी पर सम्पादकीय असहमति का लेबल चस्पा करके, अपनी समझ से, इस प्रकरण से खुद को बाहर कर लिया। मगर यह सब करते हुए आप ने यह नहीं सोचा कि इस प्रक्रिया में आप नें अपनी अस्मिता को दांव पर लगा दिया है और आप की निर्भीकता का मुखौटा नीचे गिर गया है। मुझे गलत न समझें ,तो मैं कहना चाहता हूं कि आप का काम सिर्फ तमाशा देखना नहीं है। आप स्वयं एक लेखक हैं, इसलिए जो कहना हो, मंंच पर आकर कहें। आप की सम्पादकीय प्रतिक्रिया में मैं एक ऐसे निरीह युवा रचनाकार को देख रहा हूं जो नत-सिर हो कर विष्णु खरे जी से, अपनी इस ढिठाई के लिए, क्षमा-याचना कर रहा है। वैसे लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देकर अप्रत्यक्ष रूप से विष्णु जी से क्षमा मागने की आप की मजबूरी को भी मैं समझ सकता हूं। आखिर भय का भी अपना तर्क होता है।

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  7. कपिल जी मैं चाहता तो अपने खिलाफ़ इस टिप्पणी को भी नहीं छापता. इसका क्या अर्थ निकालेंगे आप ? आपको साफ़ बता दूँ कविता के अलावा मेरा कोई पक्ष नहीं है - मुझे विष्णु जी के चाहने वाले भी धक्कारेंगे और आप जैसे लोग भी, जो हर चीज़ अपनी तरफ से तय कर चुके होते हैं.

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