Friday, April 17, 2009

कोरियाई कवि कू सेंग की कविताओं का सिलसिला / छठवीं किस्त



अप्रैल
नवजात कलियाँ और नवजात टहनियाँ
नवजात पत्तियाँ और नवजात फूल

पहाड़ और मैदान
बगीचे और पगडंडियाँ
सबके सब एक साथ घिर जाते हैं
हरियाली लपटों में

हर चीज़ होती है गर्म
और सुखद

कौन हैं
जो कहते हैं यह सबसे क्रूर महीना है?

कृपया
अपने दिल के उजाड़ को
मौसमों पर मत लादिए!
मत कहिए आँखें बंद करके
कि यहाँ अंधेरा है

अप्रैल तो अन्नपूर्णा है
एक नई हरीतिमा
और बच्चों की एक भरी-पूरी दुनिया।
------------------------------------
अनुवादक की टीप : यह कविता टी.एस. इलियट की प्रसिद्ध कविता `वेस्टलैण्ड´ से जुड़ती है जिसमें वो लिखते हैं - "April is the cruellest month, breeding lilacs out of the dead land, mixing memory and desire..........."

शर्म
मुझे हैरत होगी
अगर आप इतना भी याद नहीं कर पाए
कि शर्म क्या चीज़ है?

कुछ ऐसा
जिसे आपने पहली बार तब महसूस किया था
जब आपने चीज़ों को
जानना शुरू किया था
तब
जब आपने तोड़ दिया था
वही गुलदान
जिसे छूने को माँ ने सख़्ती से मना किया था

उस दिन की तरह
जब आदम और हव्वा ने स्वर्ग के बगीचे में
निषिद्ध फल को तोडने और खाने के बाद
ढंका था अपनी नग्नता को
अंजीर की पत्तियों से

ग़लती करने पर वह क्या है
जिसे मनुष्य सबसे पहले महसूस करते हैं
मानवीय चेतना का एक संकेत
एक सगुन
उसकी मुक्ति का

लेकिन
आजकल मेरे बच्चों
आप ग़लती करने पर भी
कोई शर्म महसूस नहीं करते !
यह संकेत है
कि लकवा मार गया है आपकी
चेतना को

एक असगुन
जो बताता है कि आप जा रहे हैं
दरअसल
तबाही की तरफ़!

पंकज चतुर्वेदी की लम्बी और रोचक प्रतिक्रिया
प्रिय शिरीष जी,

आपने कू सेंग की बहुत अच्छी कविताओं का तोहफा हिन्दी दुनिया को दिया है ! मैं निजी तौर पर बहुत एहसानमंद हूँ। दरअसल ये कवितायें कई नई अंतरदृष्टियों से हमें समृद्द और प्रकाशित करती है . मसलन "शर्म" कविता आज लगता है की विश्व स्तर पर बहुत प्रासंगिक है. ग़लत आचरण में लोगों का रुझान और सन्लिप्ति बेतहाशा बढ़ी है और उसी अनुपात में उनकी संवेदनशीलता, अपराध बोध या कवि के शब्दों में उनकी "शर्म "छीजती गयी है. शायद इसलिए मॅंगलेश डबराल की ये कविता पंक्तियाँ मुझे बहुत प्रिय हैं और आज के सन्दर्भ में बेहद प्रासंगिक भी - " मैं चाहता हूँ कि ......... कवियों में बची रहे थोड़ी लज्जा !"

दूसरे अप्रैल को क्रूलैस्ट महीना कहना- मानना एक कवि का अधिकार है, पर कू सेंग का यह बड़ा रचनात्मक योगदान है कि वह इस बोध को सार्वजनीन या सार्वभौम बनाए जाने के वर्चस्ववादी सांस्कृतिक विमर्श को बहुत सार्थक और संवेदनशील अंदाज़ में तोड़ते हैं। महज इत्तेफ़ाक़ है कि मैं एक ग्राम देश का बाशिंदा हूँ और मेरे सबसे प्रिय महीने फ़रवरी, मार्च और अप्रैल हैं. यहाँ तक कि मई और जून भी मुझे दिसंबर- जनवरी से ज़्यादा पसंद हैं. फलों का राजा आम भला आपको गर्मियों के अलावा किस मौसम में खाने को मिल सकता है? यही नहीं तुलसीदास ने अपने अमर महाकाव्य "रामचरित मानस" में बार- बार भक्ति रस और काव्य रस के समकक्ष आम्र -रस को बताया है, बल्कि आसन्न अतीत में अक़बर इलाहाबादी ने भी लिखा है -

नामा न कोई यार का पैगाम भेजिए !
इस फसल में जो भेजिए, बस आम भेजिए !
ऐसा न हो कि आप यह लिखें जवाब में
तामील होगी, पहले मगर दाम भेजिए !

1 comment:

  1. priy shirish ji,
    aapne ku seng ki bahut achchhi kavitaaon ka tohfa hindi duniya ko diya hai. main niji taur par bahut ehsaanmand hoon. darasal ye kavitaayen kai nayi antardrishtiyon se hamen samriddha & prakaashit karti hain. maslan 'sharm' kavita aaj lagta hai ki vishwa-star par bahut praasangik hai. ghalat aacharan mein logon ka rujhaan aur sanlipti betahaasha barhi hai & usi anupaat mein unki samvedansheelta, aparaadh-bodh ya kavi ke shabdon mein-----unki 'sharm' chhejati gayi hai. shaayad isiliye mangalesh dabral ki ye kavita-panktiyaan mujhe bahut priy hain & aaj ke sandarbh mein behad praasangik bhi-----'main chaahta hoon ki----------kaviyon mein bachi
    rahe thodi lajja .'
    doosare 'april' ko cruellest mahina kahna-maanana ek kavi ka adhikaar hai, par ku seng ka yah bada rachanaatmak contribution hai ki wah is bodh ko saarvajaneen ya saarvabhaum banaaye jaane ke varchaswa-vaadi saanskritik vimarsh ko bahut saarthak & samvedansheel andaaz mein todate hain. mahaz ittifaaq hi hai ki main ek garm desh ka baashinda hoon & mere sabse priy maheene february, march & april hain. yahaan tak ki may & june bhi mujhe december-january se zyaada pasand hain. falon ka raja 'aam' bhala aapko garmiyon ke alaawa kis mausam mein khaane ko mil sakta hai ? yahi nahin ki tulsidas ne apne amar mahakaavya 'ramcharitmanas' mein baar-baar bhakti-ras & kaavya-ras ke samkaksha aamra-ras ko bataaya hai, balki aasanna ateet mein akbar allahabadi ne bhi likha hai------
    'naama na koi yaar ka paigaam bhejiye
    is fasal mein jo bhejiye, bas aam bhejiye

    aisa na ho ki aap yah likkhen jawaab mein
    taameel hogi, pahle magar daam bhejiye.'
    -----pankaj chaturvedi
    kanpur

    ReplyDelete

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