Wednesday, April 8, 2009

शुबेर्तियाना - टॉमस ट्रांसट्रोमर

टॉमस ट्रांसट्रोमर का जन्म १९३१ में स्वीडन के स्टाकहोम में हुआ। उन्होंने अपना बचपन तलाकशुदा माँ के साथ श्रमिक बस्तियों में गुज़ारा और कालेज में मनोविज्ञान और कविता की पढ़ाई की। आज उनकी गिनती दुनिया के नामचीन कवियों में होती है। अपनी जीवनस्थितियों से उन्होंने सीखा कि कैसे अपने भीतर के तलघर में घुटते हुए भी आप उसके एक-एक पल को जी और रच सकते हैं। यहाँ प्रस्तुत कविता संगीत से प्रेरित है, जिसका संक्षिप्त विवरण अंत में दिया गया है।

शुबेर्तियाना



न्यूयार्क से बाहर एक ऊँची जगह पर
जहाँ से एक ही निगाह में आप पहुँच जाते हैं
उन घरों के भीतर
जहाँ रहते हैं अस्सी लाख लोग

विशाल शहर के पार तक
वहाँ एक लम्बा चमकीला बहाव है -
दिखाई देती है
एक छल्लेदार आकाशगंगा
जिसके भीतर
मेज़ों पर खिसकाए जा रहे हैं काफी के मग
दुकानों की खिड़कियों की गुहार
और बेनिशान जूतों का गुज़र
ऊपर को चढ़ती लपकती भागती आग
स्वचालित सीढ़ियों के ख़ामोश द्वार
तीन तालों वाले दरवाज़ों के पीछे उमड़ता
आवाज़ों का हुजूम

एक दूसरे से जुड़ी कब्रों-से भूमिगत रेल के डिब्बों में
एक दूसरे पर लदे
ऊँघते बदन

मैं जानता हूँ इस जगह की यह सांख्यिकी भी
कि इस एक पल
वहाँ कहीं किसी कमरे में
बजाया जा रहा है शुबेर्त संगीत
और वह जो बजा रहा है इसे
उसके लिए तो बाक़ी की हरेक चीज़ के बरअक्स
कहीं अधिक वास्तविक हैं
उसके सुर

2
दूर तक फैले वृक्षविहीन मैदानों-से मानवमस्तिष्क
इतनी बार मोड़े और तहाए जा चुके हैं
कि समा जाएँ एक मुट्ठी में भी

अप्रैल में एक अबाबील लौटती है
अपने पिछले बरस के घोंसले की तरफ
ठीक उसी छत के तले
ठीक उसी दाने-पानी तक
ठीक उसी कस्बे में

सुदूर दक्षिण अफ्रीका से वह उड़ती है
दो महाद्वीपों को पार करती
छह हफ्तों में
पहुँचने को
भूदृश्य में खोते हुए ठीक इसी बिन्दु तक

और आदमी जो इकट्ठा करता है
जीवन भर से आए संकेतों को पञ्चतारवाद्य साजिन्दों के
मामूली तारों में

वह जिसे मिल गई है एक नदी सुई की आँख में से गुज़ार पाने को
औरों से घिरा बैठा एक नौजवान आदमी है
उसके दोस्त पुकारते थे उसे `मशरूम` कहकर
जो चश्मा पहने ही सो जाता था
और हर सुबह नियम से खड़ा दिखाई देता था
अपनी लिखने की ऊँची मेज़ पर
जब उसने यह किया
कि अद्भुत अष्टपाद रेंगने लगे पन्ने पर

3
पाँच साज़ बजते हैं
गर्म लकड़ियों के बीच से मैं घर लौटता हूँ
जहाँ मेरे पाँवों के नीचे पृथ्वी किसी स्प्रिंग -सी महसूस होती है
गुड़ीमुड़ी किसी अजन्मे बच्चे-सी
नींद में
निर्भार लुढ़कती भविष्य की ओर
अचानक मैं जान जाता हूँ
कि पेड़-पौधे भी कुछ सोचते हैं

4
जिए हुए हर पल में हम कितना विश्वास रखें!
कि गिरे नहीं धरती से

चट्टानों से उल्टी लटकती बर्फ पर विश्वास रखें
विश्वास रखें अनकहे वादों पर
और समझौते की मुस्कानों पर
विश्वास रखें कि टेलीग्राम जो आया है उसका हमसे कोई सम्बन्ध नहीं
और यह भी कि हमारे अन्दर
कुल्हाड़ी के प्रहार-सा औंचक
कोई आघात नहीं लगा
गाड़ी के उस घूमनेवाले लोहे पर विश्वास रखें
जिस पर सवार हो
हम सफर करते हैं लोहे की तीन सौ गुना बड़ी मधुमिक्खयों के
झुंड के बीच
लेकिन यह सब उतना कीमती नहीं
जितना कि वह विश्वास जो हमारे पास है

पाँच तारों वाले साज कहते हैं
हम किसी और चीज़ को विश्वास में ले सकते हैं
और वे हमारे साथ सड़क पर घूमते हैं
और जब बिजली का बल्ब सीढ़ियों पर जाता है
और हाथ उसका अनुसरण करते हैं उस पर विश्वास करते हुए
रेल की पटरियों पर दौड़ती हाथगाड़ी की तरह
जो अंधेरे में अपनी राह तलाश लेती है

5
हम सब पियानो के स्टूल के गिर्द इकट्ठे हैं और बजा रहे है उसे
चार हाथों से आइने में देखकर
एक ही गाड़ी को चलाते दो ड्राइवरों की तरह
यह थोड़ा बेहूदा दीखता है
यह ऐसा दीखता है जैसे हमारे हाथ आवाज़ से बने भार को
एक दूसरे के बीच अदल-बदल रहे हों
इस तरह जैसे असली वजन को साधा जाता है
किसी बड़े तराजू का सन्तुलन बनाने को
हर्ष और विषाद का भार बिल्कुल एक-सा है
एनी ने कहा -`` यह संगीत एक शानदार गाथा है`
वह सही कहती है

लेकिन वे जो इसे बजाते हुए आदमी को देखते हैं
ईर्ष्या के साथ
और खुद की प्रशंसा करते हैं हत्यारा न बनने के लिए,
नहीं खोज पाते खुद को इस संगीत में
वे जो खरादोफरोख़्त करते हैं दूसरों की
और मानते हैं कि हर किसी को ख़रीदा जा सकता है धरती पर
ख़ुद को यहाँ नहीं पाते

यह उनका संगीत नहीं
वह लम्बी सुरीली धुन जो बच जाती है इसके सभी रूपाकारों के बीच
कभी चमकती तो कभी सौम्य
कभी रूखी और ताकतवर
घोंघे के चलने पर पीछे छूटी लकीर और लोहे के तार-सी

यह बेकाबू सी गुनगुनाहट सुनाई देती है
यह क्षण
जो हमारे साथ है
ऊपर को उठता किसी गहराई में।
_____________________________________________________________
शुबेर्तियाना - फ्रैंज़ शुबेर्त (1797-1828) द्वारा अविष्कृत संगीत। शुबेर्त एक आस्ट्रियन संगीतकार थे। सिर्फ 31 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया, लेकिन उनके 600 के लगभग गीतों ने उन्हें अपने वक़्त के महान संगीतकारों में शुमार करा दिया। उपर्युक्त कविता उन्हीं की संगीतरचनाओं पर एक रहस्यात्मक लेकिन ऐंद्रिक काव्यात्मक प्रतिक्रिया है।

2 comments:

  1. मूल कविता नहीं पढी,फिर भी कह सकता हूँ कि आपने शब्दों का प्रयोग करने में न्याय किया है.

    बधाई!

    ReplyDelete
  2. वे जो खरीदो-फरोख्त करते हैं दूसरों की
    और मानते हैं कि धरती पर खरीदा जा सकता है हर किसी को
    ख़ुद को यहाँ नहीं पाते।

    यह उनका संगीत नहीं

    बहुत गहरे तक छूती कविता। प्रस्तुत कराने का धन्यवाद।

    ReplyDelete

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