Thursday, February 12, 2009

संतुलन का गुब्बारा फूट गया है - पंकज चतुर्वेदी / भाग चार

संतुलन के जिस फ़लसफ़े का ज़िक्र इस लेख में बार-बार किया गया है, वह जिस बड़े कवि की काव्य-दृष्टि और काव्य-सृष्टि के सबसे नज़दीक पड़ता है, वे हैं केदारनाथ सिंह। आशुतोष कुमार ने सही लिखा है कि आठवाँ दशक ``और जटिल अनुभूतियों का वहन करने में सक्षम एक नयी काव्य-भाषा के ढलने और केदारनाथ सिंह के काव्य-यूटोपिया के परवान चढ़ने का दशक´´ भी है। (-`समकालीन जनमत´, अप्रैल-सितम्बर, 2004( पृ0 75) आठवें दशक के बाद के तमाम युवा कवियों पर संतुलन के इस फ़लसफ़े का जो दूरगामी और व्यापक असर पड़ा -- जो अपनी प्रकृति में सृजनात्मक से ज़्यादा विनाशकारी साबित हुआ--उससे केदारनाथ सिंह की कविता और `समकालीन कविता´ दोनों की ही शक्ति और सम्मोहन का पता चलता है। बाद के इन युवा कवियों की ज़्यादातर कविता में `समकालीन कविता´ की अन्य प्रवृत्तियों के गतानुगतिक दोहराव और विस्तार के साथ-साथ पेड़-चिड़िया-फूल-पत्ती-बच्चों वग़ैरह का जो समारोह मिलता है, उसे देखकर जिज्ञासा होती है कि यह सब कहाँ से आया है, जैसे ग़ालिब ने सृष्टि के सौन्दर्य से विस्मित होकर पूछा था--``सब्ज़:-ओ-गुल कहाँ से आये हैं/अब्र क्या चीज़ है, हवा क्या है?´´ कोई भी थोड़ी-सी ज्ञान-संवेदनात्मक कोशिश के सहारे जान सकता है कि ये चीज़ें केदारनाथ सिंह और उनके प्रभाव में रही आठवें दशक की कविता से आ रही हैं, जैसा कि विजय कुमार ने इस बाबत लिखा है--``मनुष्य के बुनियादी राग और ऐंद्रिकता को बचाने पर बहुत अधिक ज़ोर दिया गया, जिसके चलते एक आसान और उत्सवधर्मी कविता को भी इसमें खप जाने की पूरी छूट मिल गयी।´´ (--`कविता की संगत´, पृ0 49)

आठवें दशक को अट्ठाईस वर्ष हो गये। इस लम्बे समयान्तराल में जितने युवा कवि सामने आये हैं, उनकी संख्या--अब इस बात का कोई मनोरंजक मूल्य भले ही हो, पर यह सच है--उतनी ही होगी, जितनी कि इस वक़्त हिन्दी की साहित्यिक लघु-पत्रिकाओं की संख्या है। `समकालीन कविता´ ने --राजेश जोशी का शब्द लेकर कहें तो--कविता को जिस तरह एक `जनतांत्रिक´ विधा बनाया है, उसका एक नतीजा यह भी है, जो अपने आप में स्वागत-योग्य है। मगर मुश्किल यह है कि इनमें-से बहुत सारे युवा कवि तब से लेकर आज तक लोक के आग्रह के नाम पर लोकवादी रोमान, सरलीकरण, इकहरेपन, विचार-शून्यता और पिछड़े हुए भाव-संस्कारों से ग्रस्त कविता लिख रहे हैं। विजय कुमार ने ठीक ही इसे ``उत्सवधर्मी लोक-संस्कृति´´ की, ``कृत्रिमता की हदों को स्पर्श करती सुघड़ कविता´´ कहा है। संतुलन के फूटे हुए ग़ुब्बारे को हवा में लहराये जाने के कारोबार पर एक वाजिब आलोचनात्मक आक्रोश में उन्होंने लिखा है--``अस्सी के दशक में सरकारी कला-भवनों और अकादमियों ने एक ख़ास तरह की द्वंद्व-रहित, अन्न-जल को गानेवाली, अनैतिहासिक और शाश्वत किस्म की कविता को बढ़ावा देना शुरू किया। इसी कविता को अस्सी के दशक की मुख्य प्रवृत्ति के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिशें हुई हैं। यह कविता ऊपरी तौर पर प्रगतिशील भी लगती है, क्योंकि इसमें लोक-जीवन और ऐंद्रिकता की गंध महसूस होती है, पर अपनी पूरी `एप्रोच´ में यह कविता लोक-जीवन को किसी डिपार्टमेंटल स्टोर में रखे जाने लायक़ चमकदार और सुघड़ बना देती है। यहाँ यथार्थ में दिख रही चीज़ों में अर्थ का विस्तार कवि के निजी जीवन के प्रत्यक्ष घर्षण से नहीं, बल्कि एक निर्द्वंद्व किस्म की रसिकता या कैशोर्य भावुकता के स्तर पर किया जाता है। .... यहाँ समाज की दुसह्य स्थितियाँ कहीं भी व्यक्ति के खिलाफ़ खड़ी नहीं हो रही होतीं, बल्कि हर जगह कवि उन्हें कमांड करते हुए उनकी भीतरी अर्थवत्ता को समाप्त कर देता है। ऐसी कविता मूलत: आनंदवादी होती है। यह कविता अकाल की विभीषिका को दिखाने के बजाए जाने कहाँ से अकाल में झट-से एक सारस को पकड़ लाती है और पाठक से कहती है--देखिये, आप तनाव और विषाद में न डूबें, आख़िर अकाल में भी तो जीवन दिख ही जाता है। ज़ाहिर है, शासक-वर्ग कला से इसी तरह के सरलीकरण चाहता भी है। दरअसल यह एक संदिग्ध चरित्र वाली रागात्मकता है, जिसका औसत मनुष्य के भीतरी इलाक़ों से कोई वास्ता नहीं है और यह किसी नुस्खे की तरह उम्मीद का बखान करती है। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि अस्सी के दशक में कला-भवन के रसियाओं और प्राध्यापक-आलोचकों ने इस रागात्मकता को भरपूर प्रोत्साहित किया।´´ (--`कविता की संगत´, पृ0 49-50)

पिछले लगभग तीस वर्षों में उभरे युवा कवियों पर विभिन्न रचनाकारों या आलोचकों द्वारा जो मुख्य आरोप लगाये गये हैं, उनका बिन्दुवार उल्लेख इसलिए ज़रूरी है कि इस क्षेत्र में सक्रिय लोगों को आनेवाले समय में निर्णय एवं विश्लेषण की सुविधा प्राप्त हो सके--
(1) अनुभव के गहन साक्षात्कार और एक वृहत्तर वैचारिक परिप्रेक्ष्य की कमी।
(2) इन कवियों ने नया या अलग कुछ नहीं किया है और ये ज़्यादा-से-ज़्यादा आठवें दशक की कविता का ही `एक्सटेंशन´ हैं।
(3) इन कवियों के यहाँ वैचारिक संघर्ष कम-से-कम मिलता है। ये आलोचनात्मक गद्य नहीं लिखते, विचार-कर्म से अक्सर परहेज़ करते रहे हैं और वैचारिक `स्टैंड´ या पक्ष लेने से कतराते हैं--``किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते।´´
(4) विश्व-साहित्य से अनभिज्ञता।
(5) अपनी परम्परा का अज्ञान।
(6) प्राय: ग़ैर-राजनीतिक कविता।
(7) `माइनर पोइट्री´ या कनिष्ठ कविता का विपुल उत्पादन।
(8) कुछ प्रचलित नुस्खों पर आधारित आत्म-तुष्ट, एकांगी, तनावहीन, सरल-सुगम, औसत, सुघड़, सुपाच्य और `सफल´ कविता। आत्म-संघर्ष और रचनात्मक जद्दोजेहद की शिथिलता और अनुपस्थिति।
(9) जीवन की जटिलता, अंतर्विरोधों, संिश्लष्टता, सूक्ष्मता और उसके विविध आयामों में प्रवेश करने से बचती हुई कविता।
(10) `इंटेलेक्चुअल टफ़नेस´ या बौद्धिक सान्द्रता का अभाव।
(11) लोकवादी रोमान से ग्रस्त। गाँव की ग़ैर-समकालीन, सुंदर, सुखद, स्वप्निल , सजल, शांत, ऐन्द्रिय , अनालोचनात्मक और अयथार्थ स्मृतियों और छवियों का निर्माण।
(12) `शहरी सिन्थेटिक पेण्ट´ से ग्रस्त--अनावश्यक रूप से जटिल, दुर्बोध , चटख , अपारदर्शी , विवरण-बहुल, एकरसता, शब्द-स्फीति, सूचनाओं और तथाकथित ज्ञान से आक्रान्त कविता।
(13) कविता के शिल्प, भाषा, शैली, व्यंजना और लय वग़ैरह के स्तर पर प्रयोगधर्मिता नदारद।

1 comment:

  1. आपने केदारनाथ सिंह का जिक्र करते हुए समकालीन कविता को आनंदवादी और उत्सवधर्मी बताया है. लेकिन इसके पीछे केदारनाथ सिंह से ज्यादा अशोक वाजपेयी हैं. दरअसल अशोक के घोषित कलावादी होने के कारण कोई भी समकालीन कवि यह स्वीकार नहीं करना चाहता कि उस पर उनका प्रभाव है. इस मामले में केदारनाथ सिंह के साथ थोडी सुविधा मिल जाती है.

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