Wednesday, February 18, 2009

पंकज चतुर्वेदी के लेख तथा उस पर दो युवा आलोचकों की प्रतिक्रियाओं पर एक युवा कवि की प्रतिक्रिया ....


गिरिराज किराडू


दो-चार दिन छुट्टी पर था. काम से. आज ही पिछले दोनों पोस्ट देखे- श्रीकांतजी और दो प्रतिक्रियाओं वाला. दोनों अच्छी हैं. पंकज का लेख तुम्हारे लगाने से पहले पढ़ चुका था. ऐसा लग रहा है अनुनाद अब पूरी तरह पत्रिका हो रहा है. :)- पंकज के लेख में कई चीज़ें हैं और शायद एक पूरे लेख से ही उस संवाद को आगे बढाया जा सकता है. प्रणय ठीक कहते हैं कि अल्ट्रा-लेफ्ट और सॉफ्ट लेफ्ट को री-फ्रेज किया जाना चाहिए. जिसे अल्ट्रा कहा जा रहा है वो क्लैसिकल मार्क्सवादी है और जिसे सॉफ्ट ('संसदीय मार्क्सवाद!) वो रघुवीर सहाय की परम्परा में पूर्ण क्रांति और यूटोपिया की जगह जो व्यवस्था है - क्लैसिकल पदावली में 'बुर्जुआ लोकतंत्र' - उसकी 'समीक्षा' (अपने प्रभाव में) और प्रतिरोध (शैली/ रहैटरिक में) का काव्य-मार्ग है. रघुवीर सहाय की केन्द्रीयता का यह सीधा संदेश था: अब इसी व्यवस्था को सहनीय और मानवीय बनने के लिए काम किया जा सकता है. शायद यही कारण हैं कि रघुवीर की कविता गैर-मार्क्सवादी आलोचकों लेखकों को भी उतना ही आकृष्ट करती रही है. रघुवीर यूटोपिया की असम्भावना के कवि हैं, उनकी पद्धति दैनिक है एक पत्रकार की तरह, दीर्घकालिक नहीं, कवि की तरह - इस दुःख को रोज समझना पड़ता है. आज की कविता भी, उम्मीद और यूटोपिया को एक 'असम्भावना' की तरह ही, एक 'पैथोलोजी' की तरह ही 'उत्पन्न' कर सकती है. उम्मीद का कोई आधार नहीं सिवाय इसके कि एक उम्मीद ही है जो बिना आधार भी की जा सकती है. यह याद रहे कि यह लेख आठवे दशक और उसके बाद की कविता को लेकर पिछले लंबे अरसे से चल रही पोलेमिक्स का हिस्सा है, उसके सबसे तार्किक और समझदार हिस्सों में से है पर जाने क्यों हम इसको समझने की दो सबसे महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक श्रेणियों में से एक - संगतकार सिंड्रोम (अगर यह नया नामकरण है तो इसे थोड़ा स्पष्ट करदूं: मंगलेशजी की प्रसिद्द कविता से हासिल यह पद आठवे दशक की कविता की उस तकलीफ और विडम्बना और डिफेन्स मैकेनिज्म से वाबस्ता है कि वह 'जानबूझकर' 'बड़ी कविता' नहीं बन पाई) को तो विश्लेषण में काम में लेने लगें हैं किंतु बाद की कविता के 'एन्ग्जायटी ऑफ़ इन्फ्लुएंस' को नहीं?

3 comments:

  1. ये क्या विचार विमर्श को इतना खींच् रहे हैं शिरीष जी ! कविताएं दीजिए - विचार वे खुद दे देंगी !

    ReplyDelete
  2. आपकी बात एक हद तक ठीक है पर रागिनी आपके प्रोफाइल में देखा कि आप अठारह साल की विद्यार्थी हैं। कुछ परिपक्व हो जायेंगी तो विचार में रमना और जीवन में उसकी कद्र पहचानना सीखेंगी। आशा है बुरा नहीं मानेंगी।

    ReplyDelete
  3. शिरीष भाई, यह बेहद खुशी की बात है कि लेख समयान्तर से निकलकर ब्लाग तक आ पहुन्चा है। उसी अन्क मे मेरा भी एक लेख है लेखक सन्गठनो पर्। अगर नज़र गयी हो तो बताये कैसा लगा।

    ReplyDelete

यहां तक आए हैं तो कृपया इस पोस्ट पर अपनी राय से अवश्‍य अवगत करायें !

जो जी को लगती हो कहें, बस भाषा के न्‍यूनतम आदर्श का ख़याल रखें। अनुनाद की बेहतरी के लिए सुझाव भी दें और कुछ ग़लत लग रहा हो तो टिप्‍पणी के स्‍थान को शिकायत-पेटिका के रूप में इस्‍तेमाल करने से कभी न हिचकें। हमने टिप्‍पणी के लिए सभी विकल्‍प खुले रखे हैं, कोई एकाउंट न होने की स्थिति में अनाम में नीचे अपना नाम और स्‍थान अवश्‍य अंकित कर दें।

आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा ही अनुनाद को प्रेरित करती हैं, हम उनके लिए आभारी रहेगे।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails