Tuesday, February 17, 2009

पंकज चतुर्वेदी के लेख पर दो युवा आलोचकों की प्रतिक्रियाएं

आशुतोष कुमार

पंकज के इस आलेख की कुछ विशेषताएं, जिनके लिए इसकी सराहना वाजिब है -
1- यह संवादधर्मी आलोचना है। जितने सवालों से टकराती है, उससे कई गुना ज्यादा सवालों को जन्म देती है। अंतिम बात कहके आत्मतुष्ट हो लेने की सुविधा चुनने की जगह बहस पसारने के लिए अधूरेपन की असुविधा से नहीं कतराती।
2- समकालीन कविता की रचनात्मक प्रवृत्तियों की पहचान और उसके उत्थान-अवसान के ऐतिहासिक मार्गचिन्हों की खोज करते हुए वह उसकी एक सैद्धान्तिकी विकसित करने की गम्भीर चेष्टा करती है। यह सैद्धान्तिकी एक आलोचनात्मक तर्क के रूप में निरूपित होती है, जो काफी सुलझा हुआ और सुप्रमाणित है।
3- गोलमाल बातें करने की जगह `सामान्यीकरण´ का खतरा उठाते हुए भी कुछ ठोस बिन्दुओं को रेखांकित करती है। नामों से बचकर निकलने की जगह उन्हें बहस में घसीटने के रचनात्मक दुस्साहस का रास्ता चुनती है।

अब कुछ सवाल जो आलेख पढ़ते समय तुरत-फुरत दिमाग में आ गए हैं -

1- क्या यह बेहतर न होता कि समकालीन कविता पर बात करते समय कवियों की जगह कुछ चुनी हुई कविताओं को फोकस में रखा जाता। यह प्रश्न इसलिए उठता है क्योंकि इस आलेख में कवियों को तीन बड़े समूहों में रखा गया है, जबकि किसी एक समूह में रखे गए किसी कवि की अनेक कविताएं याद आती हैं, जिनकी संवेदना दूसरे समूह से मेल खाती है। मसलन गोरख की कविता `आयेंगे अच्छे दिन आयेंगे´, वीरेन की `आयेंगे उजले दिन जरूर आयेंगे´ वगैरह में जो आशावाद है उसका रिश्ता अरुण कमल, राजेश जोशी वगैरह की कविताओं से जुड़ता है।
2- आलेख से ऐसा संकेत मिलता है कि क्रांतिकारी वाम के कवियों की आत्महंता आस्था ही हो सकती थी, या फिर उदार वाम में अपसरित हो जाना। ये स्थापना बेहद समस्यापूर्ण हैं। यह अनेक रूपों में एक भ्रामक निष्कर्ष है, जो कविताओं की जगह कवियों को ध्यान में रखने से उपजा है। इस पर विस्तार से चर्चा अपेक्षित है।
3- संतुलन का गुब्बारा फोड़ डालने वाले कवियों के नाम तो गिनाए गए हैं, लेकिन यहां जरूरी था कि उनकी कुछ कविताओं के उदाहरण, विश्लेषण के साथ दिये जाते - जिससे कि यह तर्क रचनात्मक रूप से प्रमाणित हो पाता।

ये तुरन्त प्रतिक्रिया है, लेकिन उम्मीद है कि बहस चलेगी और धार लेगी।
(आशुतोष कुमार अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में हिंदी के प्राध्यापक हैं और यह प्रतिक्रिया उन्होंने पोस्ट पर त्वरित टिप्पणी के रूप में अनुनाद तक पहुंचाई है।)-------------------------------------------------------------------------------------------------

प्रणयकृष्ण
लेख सरसरी तौर पर पढ तो गया, तफ़सील से विचार करूंगा और प्रतिक्रिया दूंगा। कुछेक चीजें जिन पर मैं अभी प्रथम दृष्टया कुछ कह सकता हूं, वे हैं -
1- अल्ट्रा लेफ्ट जैसी कोई चीज़ नहीं है गोरख, आलोक और वीरेन में ! वाम की तमाम धारणाएं सही रास्ते की तलाश में एक दूसरे से टकराती हैं। क्रांतिकारी वामपंथ तब भी एक सही संज्ञा है। कविता में अल्ट्रा लेफ्ट जैसे लेबेल का इस्तेमाल तो मुझे और भी ठीक नहीं लगता। गोरख, आलोक और वीरेन की कविता लेफ्ट की कविता है, उसमें `अल्ट्रा´ या `अति´ जैसी कौन चीज़ है? लचीला या साफ्ट वाम नया नामकरण जरूर है क्योंकि यह राजनीतिक हलकों में नहीं व्यवहार किया जाता। जबकि अल्ट्रा लेफ्ट जैसी संज्ञा बहुप्रचलित राजनीतिक शब्दावली है, जिसके संदर्भ नकारात्मक हैं। दोनों धाराओं को अलगाने के बेहतर मुहावरे तलाशे जाने चाहिए।
2- बात धाराओं या प्रवृत्तियों पर ज्यादा और व्यक्तियों पर कम होनी चाहिए। नाम लेना गुनाह नहीं और न ही लेने डरना चाहिए लेकिन एक ही कवि की अलग अलग कविताएं अलग अलग प्रवृत्तियों की हों जैसे कि उदाहरण के लिए निराला या शमशेर के यहां तो प्रवृत्ति और व्यक्ति की एकता स्वयंसिद्ध नहीं रह जाती।
3- कवियों की जगह कविताओं के उदाहरण देना सबसे बेहतर है।
वैसे लेख विचारोत्तेजक और गम्भीर है जिस पर थोड़ा समय लेकर और ज्यादा ठीक से पढ़कर तुमसे बात करूंगा।
(प्रणयकृष्ण इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं और उनकी यह प्रतिक्रिया स्वयं पंकज चतुर्वेदी ने अनुनाद को उपलब्ध कराई।)

2 comments:

  1. पंकज इससे बेहतर लिखने के हकदार है पर लगता है कि उन पर कुछ दबाव बने रहे.
    लेफ्ट और अल्ट्रा लेफ्ट कई बार बेहद असमंजस पैदा कर सकता है और नरम-गरम का विभाजन भी. मंगलेश जिस लेखक संगठन से जुड़े हैं उस लिहाज से वे क्या अल्ट्रा लेफ्ट कहे जाएँ जबकि उनकी कविता का स्वर कई आग उगलने वाले कवियों जैसा नहीं है. क्या उनके यहाँ वाजिब कविता नहीं है?
    अलोक धन्वा बेहद आवेग के अद्भुत कवि हैं. उनकी कवितायेँ उफान के साथ ऊपर ले जाती हैं, पर इस तरह की कवितों की क्या कुछ समस्याएं भी हैं? यह बात गोरख पाण्डेय के लिए भी कही जा सकती है.
    इसी तरह कुछ कवि धीमे स्वर में बात करते हैं पर क्या यही कोई समस्या है और क्या वे कोई जेनुइने विमर्श से नहीं गुजर रही होती/
    क्या राजेश जोशी और अरुण कमल के डायरी के अंश किसी धारा (अगर इस तरह किसी कवि को बंधना ही है तो ) को प्रमाणिक रूप से पेश करने के लिए काफी हैं....

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  2. पंकज जी शायद अन्शु मालवीय की कविताओं को समकालीन कविता के फ़्रेमवर्क से बाहर समझते है वरना नई पीढी की कविताओं से शिकायत के बीच प्रतिबद्धता और सृजनशीलता का एक अवलम्ब ज़रूर देख पाते।

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