Thursday, February 12, 2009

संतुलन का गुब्बारा फूट गया है - पंकज चतुर्वेदी / भाग तीन

वैसे बाहर से भीतर या बाह्य से आत्म की तरफ़ लौट आने की यह शुरूआत नक्सलबाड़ी से सीधे प्रभावित कवियों की क्रान्तिकारी वाम चेतना के समान्तर अन्य समकालीन कवियों में उदार वाम चेतना के उदय के साथ ही हो गयी थी। इसका प्रमाण मुहैया करते हुए विजय कुमार ने लिखा है--``धूमिल विपक्ष की कविता को बाहर-बाहर से लेकर आगे बढ़े थे। कवियों की परवर्ती पीढ़ी को अब इस विरोध को उसकी आंतरिकता और जटिलता में पाना था।´´ (--`कविता की संगत´, पृ0 46) जटिलता और संघर्ष धूमिल की कविता के वस्तु-संसार में भी कम नहीं है, बल्कि ज़्यादा ही है, मगर जिस आंतरिकता की बात यहाँ की गयी है, उसने ही समकालीन कवि को--प्रणय कृष्ण का शब्द इस्तेमाल करें तो--`आत्मसजग´ बनाया है। यह आत्मसजगता उसे किसी लड़ाई में शामिल होने या अपने वजूद को दाँव पर लगाने से ज़्यादा `विश्लेषण´ के लिए प्रेरित करती है। राजेश जोशी अपने दौर की कविता की यही विशेषता बताते हैं--``आठवें दशक की कविता अपने पूर्व काव्य-आन्दोलनों से इस अर्थ में भिन्न कविता है। वह वस्तुत: विश्लेषणात्मक विवेक और विश्लेषणात्मक प्रक्रिया की कविता है। वह आर्ग्युमेंट की कविता है।´´ (--`एक कवि की नोटबुक´, पृ0 167) इस कथन में उनका यह आत्म-स्वीकार भी जोड़ दें, तो किसी और व्याख्या की ज़रूरत नहीं रह जाती कि उपयुZक्त कविता ने ``एक ऐसा इनर-स्पेस भी बनाया है, जिसमें एक आत्मिक राहत भी है और सृजनात्मकता के लिए अवकाश भी।´´ (--`वही´, पृ0 165)

`आंतरिकता´, `आत्मसजगता´ या `विश्लेषणात्मक विवेक´ का ही तक़ाज़ा था कि `समकालीन कविता´ ने सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा और `जीवन के राग-रंग´ के बीच संतुलन को अपना आदर्श बनाया। इस तरह कविता, अरुण कमल के शब्दों में, ``साहित्य की समतल भूमि पर स्थिर´´ की जा सकी। (--`कविता और समय´, पृ0 20) उन्होंने अपने दौर के कवियों द्वारा ``ज़्यादा संतुलित राजनीतिक दृष्टिकोण´´ अपनाये जाने की सराहना की। (--वही, पृ0 188) सच पूछिये, तो `समकालीन कविता´ निराला, प्रगतिशील काव्य-आंदोलन, नक्सलबाड़ी, रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह की कविता--प्रमुख रूप से इन पाँच दिशाओं और आयामों में अपनी रचनात्मक सक्रियता के घेरे बनाती और विस्तृत करती है। वह अपनी अभिरुचि और अंतर्दृष्टि के मुताबिक़ इन पाँच संदर्भों से अर्जित वस्तुओं एवं उपादानों का चयांधर्मी इस्तेमाल करती है। वह जितने मुद्दों पर इनसे साझा करती है, उतने ही बिन्दुओं पर इनसे अलग भी नज़र आती है। उसकी कोशिश इनसे जुड़ने और टकराने के साथ-साथ इनके आपसी सम्बन्ध-सूत्रों की तलाश और इनके बीच सामंजस्य की ज़मीन को अपने लिए स्वायत्त करने की रही है( जैसा कि राजेश जोशी के इस बयान से ज़ाहिर है-- ``.......यह कविता अपनी पूरी परम्परा को आत्मसात् करके ही सम्भव हुई है। अपने से पूर्व कविता के उच्छेदन से नहीं। यह मात्र प्रगतिवादी कविता का विस्तार नहीं है। यह तो विभिन्न परस्पर-विरोधी काव्य-प्रवृत्तियों और काव्य-आन्दोलन के घात-प्रतिघात से, उसकी प्रक्रिया से प्रतिफलित हुई है।´´ (--`एक कवि की नोटबुक´, पृ0 165)

सन्तुलन का अपना सौन्दर्य और आकर्षण था, पर उससे लगी-लिपटी उसकी विडम्बनाएँ और खतरे भी थे, जिनका अंदाज़ा औरों को भले बाद में हुआ हो, मगर समकालीन कवियों को पहले से ही था, क्योंकि वे उस परिदृश्य के `इनसाइडर´ थे। उन्होंने देखा कि सामाजिक बदलाव के सवाल, आकांक्षा और बेचैनी को जीवन की रागात्मकता के आग्रह ने धीरे-धीरे हाशिये की ओर धकेला और फिर उसे निस्तेज और अप्रासंगिक-सा बना दिया। विजय कुमार ने 1988 में ही आगाह किया था--``......मनुष्य की रागात्मकता और ऐिन्द्रकता को चित्रित करने के नाम पर यह (`समकालीन कविता´) कहीं इस समकालीन दुनिया को तनावहीन और संतुलनपरक बनाकर तो पेश नहीं कर रही?´´ (--`कविता की संगत´, पृ0 21) दूसरी ओर, हिन्दी काव्य-दृश्य में भिन्न पृष्ठभूमियों, रुचियों और दृष्टियों के तमाम कवियों के शान्ति-सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व को किसी बुनियादी मुश्किल या क्षरण की निशानी मानते हुए राजेश जोशी ने ठीक ही शक किया है--``क्या कविता के समाज में सारे वैचारिक टकराव और तनाव ख़त्म हो गये हैं? क्या किसी ऐसे जनतन्त्र का उदय कविता में हो गया है, जिसमें राजनीतिक सवाल गौण हो चुके हैं?´´ (--`एक कवि की नोटबुक´, पृ0 164)
इस बिन्दु पर कोई जानना चाह सकता है कि आधुनिक हिन्दी कविता के इतिहास में `समकालीन कविता´ के कुल अवदान का वैशिष्ट्य या महत्त्व क्या है? राजेश जोशी की मानें, तो उसमें गहराई, ऊँचाई, जटिलता, अद्वितीयता और नायकत्व जैसी खुसूसियातें नहीं हैं। इनके उलट विस्तार, वैविध्य, साधारणता, सहजता, सचाई और संवादधर्मिता उसकी विशेषताएँ हैं। यह सब इसलिए मुमकिन हुआ है, क्योंकि यह--उनके शब्दों में--``अपने से पहले की संपूर्ण कविता की बनिस्बत सबसे अधिक जनतािन्त्रक कविता है।´´ (--वही, पृ0 165) राजेश जोशी के अनुसार जीवन का विशद चित्रण ही `समकालीन कविता´ का ख़्ाास मक़सद रहा है--``मुझे लगता है कि आठवें दशक की कविता वस्तुत: हारिजेंटल एिक्सस की कविता है। उदात्तता, गहराई, ऊँचाई या जटिलता में धँसना जैसे पदों में उसे नहीं समझा जा सकता। .......आज की कविता में गूढ़ार्थ नहीं, निहितार्थ महत्त्वपूर्ण है। ........... यहाँ नायकों का प्रवेश निषिद्ध है। यह चरित्रों की कविता है। यह हमारे आसपास और दूर तक फैले जीवन-प्रसंगों की कविता है। वह जीवन को उसकी विशिष्टता में नहीं, उसके विस्तार और विविधता में रचना चाहती है।´´ (--वही, पृ0 164)

इस सिलसिले में ग़ौरतलब है कि अरुण कमल ने अपने विश्लेषण में हद दरजे की ईमानदारी, पारदर्शिता और आत्म-निर्मम साहस की मिसाल पेश की है। वे लाख कहें --``मुझमें जो सबसे बड़ी कमज़ोरी है, वह है किसी को भी दुखी न करना। इसीलिए मैं अच्छा आलोचक नहीं बन सका।´´ (--`सापेक्ष´, अंक-50, पृ0 558) मगर यह सच नहीं है। उन्होंने किसी के भी दुख की पर्वा न करते हुए लिखा है--``कविता के लिए मुख्य चीज़ है जीवन-दृष्टि, जो विचारधारा और दर्शन से सम्बद्ध होकर भी उससे भिन्न और बड़ी है। समकालीन कविता ने वैसी दृष्टि हासिल की या नहीं, यह संदिग्ध है......... समकालीन कविता इन सबके बावजूद अभी छोटे क़द-काठी की कविता है। जो व्यग्रता, जो छटपटाहट निराला में है, जो फिर मुक्तिबोध-शमशेर में है, वह समकालीन कविता में सम्भवत: नहीं है। किसी भी विचार-सूत्र या भाव-सूत्र को उसके अंतिम छोर तक ले जाने वाला जीवट और धैर्य भी नहीं मिलता। छंद की समृद्धि और जीवन की वैसी विपुलता नहीं मिलती। संपूर्ण परंपरा का समाहार नहीं मिलता।´´ (--`कविता और समय´, पृ0 22) इस वक्तव्य की रौशनी में मुझे मंगलेश डबराल का वह वाक्य याद आता है, जो एकाधिक बार निजी बातचीत में उन्होंने मेरी मौजूदगी में बहुत विचलित होकर कहा है--``हममें-से कोई बड़ा कवि नहीं बन पाया।´´ ये बयान सिर्फ़ `समकालीन कविता´ को जानने-समझने की ग़रज़ से प्रस्तुत किये जा रहे हैं, इसलिए नहीं कि सादादिमाग़ों की शैली में इन्हें अभिधा में ग्रहण किया जाये या सच मान लिया जाये। रचना के महत्त्व का फ़ैसला तो उसके विश्लेषण और मूल्यांकन की बुनियाद पर ही होगा, ऐसे बयानों और आत्म-स्वीकृतियों की बिना पर नहीं। इस संदर्भ में सही रास्ता हमें यह मशहूर रणनीति ही दिखा सकती है--``कहानी पर भरोसा करो, कहानीकार पर नहीं।´´ अलबत्ता उपर्युक्त बयानों से यह तो सीखा ही जा सकता है कि कवियों और रचनाकारों में कैसी व्याकुलता, पैशन, विनम्रता, अपरिग्रह और आत्म-निर्ममता होनी चाहिए। एक ऐसे समय में इसका मूल्य और बढ़ जाता है( जब अहम्मन्य, आक्रामक, कंरियरिस्ट, मूल्य-विमुख और ताक़तवर लोगों ने साहित्य-संसार के दरवाज़े तोड़ डाले हैं। इसके बरअक्स--बक़ौल ग़ालिब--तमीज़ तो यह होती--
``घिसते-घिसते मिट जाता, आपने `अबस बदला

नँग-ए-सिज्दा से मेरे, सँग-ए-आस्ताँ अपना´´

बहरहाल। `समकालीन कविता´ में `जीवन की रागात्मकता´ का पूर्वग्रह क्रमश: इतना बड़ा रूप लेता गया कि उसने कविता की बाक़ी सभी विशेषताओं को दोयम बना दिया। कविता कुछ सामान्य प्रवृत्तियों से पहचानी और संभव की जाने लगी। मसलन् मूलभूत मानवीय संवेदनाओं को बचाने की चिंता, घर-परिवार, बच्चे, पेड़, फूल-पत्ती, चिड़ियाँ, आसपास का परिवेश, गाँव-क़स्बे की स्मृतियाँ, स्त्रियों, शोषित और उपेक्षित तबक़ों के प्रति `वास्तविक सहानुभूति की खोज´ वग़ैरह मिलकर `समकालीन कविता´ के वस्तु-संसार को निर्मित करते हैं। जब कविता की अंतर्वस्तु, संरचना, स्वभाव, शैली और भाषा को एक िक़स्म की सर्वानुमति हासिल हो गयी( तो यह सारा क्रिया-व्यापार एक ख़ास मानी में रूढ़ भी हो गया। इसकी सीमाएँ, अंतराल और असफलताएँ स्वयं समकालीन कवियों के समक्ष उजागर हो गयीं। यह कहना ज़्यादती नहीं होगी कि परिवर्तनकामी विचारधारा और जीवन के रागात्मक चित्रण के बीच संतुलन के `समकालीन कविता´ के जिस सुंदर, आकर्षक और मूल्यवान् ग़ुब्बारे ने आसमान में एक अरसे तक उड़ान भरी( वह अपनी ऐतिहासिक रचनात्मक भूमिका और ज़िम्मेदारी के निर्वाह के बाद फूट भी गया। निम्नलिखित वक्तव्यों में हम इस घटना की मार्मिक आहटें सुन सकते हैं--
(1) ``समकालीन कविता पर एक आरोप अक्सर लगाया जाता है कि वह फूल-पत्ती-चिड़िया-बच्चा की कविता है। यह आरोप एक अर्थ में सही है।´´
-- अरुण कमल (`कविता और समय´, पृ0 22)
(2) ``वह (`समकालीन कविता´) विशिष्ट होने के दर्प से बाहर आयी है। सहज होने की प्रक्रिया में उसने अपने को स्वतन्त्र किया है और स्वतन्त्र होने की प्रक्रिया में वह सहज हुई है। शायद इसीलिए इस कविता में पेड़, चिड़िया और बच्चे बड़ी संख्या में दिखते हैं।´´
--राजेश जोशी (`एक कवि की नोटबुक´, पृ0 165)
(3) ``...... किसी भी अनुभव के एक रूपाकार के कुछ दूर तक चलने के बाद जड़ हो जाने के ख़्ातरे हमेशा बने रहेंगे। क्योंकि हमारे अनुभव के दायरे अभी भी काफ़ी सीमित हैं और रचनाकार के वर्ग-अपसरण की प्रक्रिया अभी भी वास्तविक सच्चाई नहीं है। अत: किसी भी सामाजिक कन्सर्न के अमूर्त हो जाने और उसके एक `विशफ़ुल थिंकिंग´ में बदल जाने में देर नहीं लगती। समकालीन कविता में चिड़िया, पेड़ और बच्चों का संदर्भ इसीलिए बड़ी जल्दी एक अर्थहीन रैटारिक में भी तब्दील हो गया है।´´ --विजय कुमार (`कविता की संगत´, पृ0 21)

1 comment:

  1. pankaj ke is aalekh kee kuchh visheshtayen, jinke liye iski saraahana wajib hai-
    1.yah samvaaddharmi aalochanaa hai. jitne sawalon se takraatee hai , unse kayee gunaa adhik naye sawaalon ko janm detee hai.antim baat kah ke aatmtusht ho lene kee suvidhaa chunane kee jagah bahas pasaarane ke liye adhoorepan kee asuvidhaa se nahi kataraatee.
    2.samkaleen kavitaa kee rachnaatmk prwrittiyon kee pahchaan aur uske utthan-awassn ke aitihaasik margchinhon kee khoj karte huye wah uskee ek saiddhantikee vikasit karne kee gambheer cheshtaa kartee hai. yah saiddhantikee ek aalochantamak tark ke roop men niroopit hotee hai , jo kaafee suljhaa hua aur supramanit hai hai.
    3 golmol baaten karne kee jagah 'saamaanyeekaran ' ka khatraa uthaate huye bhee kuchh tHos vinduon ko rekhankit kartee hai.naamon se bach kar niklne kee jagah unhe bahas men ghaseetnee ke rachnaatmak dussahas kaa rastaa chuntee hai.

    ab kuchh sawaal jo aalekh padhate hee turat-phurat man me ug aayen hai-

    1. kya yah behtar na hotaa kee samkaleen kavitaa par baat karte samay kaviyon kee jagah kuchh chuni huyi kavitaon ko focus me rakhaajaataa?yah prashn isliye uthataa hai kyonki is aalekh me samkaleen kaviyon ko teen bade samoohon me rakhaa gaya hai. jabki kisi ek samoo me rakhae gaye kisi kavi kee aisee anek kavitayen yaad atee hai,jinkee samvedanaa doosre samooh se mel khatee hain.maslan gorakh kee kavitaa-aayenge achhche din aayenge, viren kee- aayenge ujle din jaroor aayenge vagairah me jo aashaawad hai uskaa rishtaa arun kamal, rajesh josi vagairah kee kavitaon se judtaa hai.

    2 aalekh se aisaa sanket miltaa hai ke krantikaaree vaam ke kaviyon kee niyati atmhantaa aastaa hee ho saktee thee , ya phir udaar vaam me apsarit ho jaana. ye sthapanaa behad samsyaapurn hai.yah anek roopon me ek bhraamak nishkarsh hai, jo kavitaon kee jagah kaviyon ko dhyaan me rakhne se upjaa hai. is par vistaar se charchaa apekkshit hai.
    3. santulan ka gubbara phod dalne wale kaviyon ke naam to ginaaye gaye hai, lekin yahan jarooree tha ki unki kuchh kavitaon ke udaaharan , vishleshan ke saath ,diye jaate, jisase ki yah tark rachnatmak roop se pramaanit ho pata.

    ye turantaa pratikriyaa hai, lekin ummeed hai ki bahas chalegi aur dhaar legee.

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