Monday, February 9, 2009

संतुलन का ग़़ुब्बारा फूट गया है--पंकज चतुर्वेदी / भाग एक

{महत्वपूर्ण युवा आलोचक पंकज का यह लेख समयांतर के नए अंक में छपा है और इसे वहाँ से साभार लिया जा रहा है }

`तद्भव´ के संपादक अखिलेश ने कुछ अरसा पहले मुझसे एक बात कही थी, जिसे मैं बिलकुल सही मानता हूँ--``समकालीन कविता पर लेख तो कभी-कभार आते रहते हैं, मगर उसको केन्द्र में रखकर जो बहस उठनी चाहिए, वह उठ नहीं पा रही है।´´ ज़ाहिर है कि उनका इशारा बहस की संजीदगी, व्यापकता और उदात्तता की ओर है--उसकी युगांतरकारी मूल्य-चेतना और आंतरिक शक्ति की तरफ़। बेशक मुक्तिबोध के समय में और उसके आसपास स्वयं मुक्तिबोध, अज्ञेय और विजयदेवनारायण साही सरीखे अनेक दिग्गज रचनाकारों-चिंतकों के विशद आलोचनात्मक और वैचारिक अवदान की बदौलत कविता पर बहस का जो समृद्ध वातावरण बना था( उसकी चरम उपलब्धि के तौर पर 1968 में प्रकाशित नामवर सिंह की आलोचना-कृति `कविता के नये प्रतिमान´ को हम देख सकते हैं। मगर यह उस दौर का शीर्ष बिन्दु भी है और एक तरह से पटाक्षेप भी( क्योंकि फिर चालीस वर्ष बीत गये, पर काव्यालोचना की दुनिया में कोई बड़ा और यशस्वी काम नहीं हुआ। छिटपुट तौर पर कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण काम ज़रूर हुए। मसलन् मलयज और विष्णु खरे की किताबें आयीं--`कविता से साक्षात्कार´ और `आलोचना की पहली किताब´। ऐसा नहीं कि इस अंतराल में महत्त्वपूर्ण आलोचक हुए नहीं, मगर उन्होंने इस ओर से अपना हाथ अक्सर खींचे रखा। कोई बड़ा हस्तक्षेप नहीं किया, जिसे हमारे समय में एक प्रस्थान की मानिंद पहचाना जा सकता। विश्वनाथ त्रिपाठी, मैनेजर पाण्डेय और नित्यानन्द तिवारी जैसे प्रमुख आलोचकों से बहुतों को उम्मीद थी, जो अब भी उम्मीद ही है। बक़ौल आलोकधन्वा, ``क्या है चाँद के उजाले में / इस बिखरती हुई आधी रात में / एक असहायता / जो मुझे कुचलती है और एक उम्मीद/जो तकलीफ़ जैसी है।´´ (`दुनिया रोज़ बनती है´, पृ0 92)
अगरचे इन जैसे कुछ आलोचकों और ज़्यादातर हमारे समय के बड़े कवियों-विचारकों के फुटकर निबन्धों, समीक्षाओं, वक्तव्यों, डायरियों और साक्षात्कारों से इतना तो हुआ कि नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, शमशेर, रघुवीर सहाय, धूमिल, कुँवर नारायण, केदारनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे आदि से मंगलेश डबराल की पीढ़ी तक के अहम कवियों की शिनाख़्त हो पायी। इनकी कविता का वृहत्, अंतरंग और बहुआयामी विश्लेषण तथा मूल्यांकन मुमकिन नहीं हुआ, पर उसके महत्त्व और विशिष्टता को एक ज़रूरी हद तक रेखांकित किया गया। यह भी सच है कि कविता-सम्बन्धी विचार-विमर्श और आलोचना के समय का पहिया बीते चालीस साल से चाहे जैसी सुस्ती, अकड़ या शान के साथ घूम रहा था मगर आठवें दशक तक आते-आते थम-सा गया। नतीजा यह है कि आठवें दशक को भी अट्ठाईस साल हो गये, लेकिन प्रतिष्ठित कवियों और आलोचकों से बात कीजिये, तो मालूम होगा कि हिन्दी कविता का अभी आठवाँ दशक ही चल रहा है। कोई ताज्जुब नहीं कि लगभग पैंतीस वर्ष पहले जो `समकालीन कविता´ कही जाती थी, वह आज भी `समकालीन कविता´ है! कवि और आलोचक दोनों मिलकर या अलग-अलग इसका एक नया नाम तक ईजाद नहीं कर सके। इनमें-से कुछ लोग आज रामचन्द्र शुक्ल की आलोचनात्मक क्षमताओं पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं और कुछ उन्हें पहचानते तक नहीं। ऐसी ही स्थितियों से हताश होकर त्रिलोचन ने लिखा होगा--``रुख देखकर समीक्षा का अब मैं हूँ हामी / कोई लिखा करे कुछ, जल्दी होगा नामी।´´ (`प्रतिनिधि कविताएँ´, पृ0 111)

अगर आठवें दशक पर नज़र टिकायें, तो वक़्त के साथ यह दर्पण की तरह साफ़ और निश्चित हो चला है कि उसके महत्त्वपूर्ण कवि कौन हैं। विचारधारा के स्तर पर यहाँ दो धाराएँ हैं--एक, `अल्ट्रा लेफ़्ट´, यानी क्रान्तिकारी वाम( दूसरे, लचीला या `सॉफ़्ट लेफ़्ट´, यानी किंचित् उदार और व्यापक वाम। `अल्ट्रा लेफ़्ट´ के प्रमुख कवि साबित होते हैं आलोकधन्वा, गोरख पाण्डेय और वीरेन डंगवाल। नरम वाम की भी दो धाराएँ हैं। एक, वे कवि, जो अग्रज पीढ़ी में रघुवीर सहाय को अपना आदर्श मानते हैं। इनमें मुख्य हैं--मंगलेश डबराल, असद ज़ैदी, नरेन्द्र जैन और मनमोहन। दूसरी धारा के कवि रघुवीर सहाय को दृष्टि-पथ से ओझल नहीं करते मगर अपनी काव्य-चेतना, उसे चरितार्थ करने के कलात्मक अंदाज़, मंतव्यों, सरोकारों और रुझानों के मामले में केदारनाथ सिंह के ज़्यादा नज़दीक हैं। इनमें अग्रगण्य हैं--अरुण कमल, राजेश जोशी और ज्ञानेन्द्रपति।
यह दुखद अचरज का विषय है कि इतनी कविता-सजग और आलोचना-सजग इस पीढ़ी ने अपने ही एक कवि गोरख पाण्डेय के व्यक्तित्व न सही, मगर कविता को जाने-अनजाने नज़रअंदाज़ और विस्मृत-सा कर दिया है। अभी यशस्वी कथाकार और `पहल´ के संपादक ज्ञानरंजन ने `पहल´ के समापन पर आयी शोकाकुल प्रतिक्रियाओं, चिंताओं और प्रशस्तियों के संदर्भ में कहा है कि ``हमारे समाज में मरण का माहात्म्य बहुत है।´´ (`लमही´, जनवरी-मार्च, 2009, पृ0 9) मानो गोरख की कविता के महत्त्व को पहचानने के लिए `मृत्यु-बोध का आघात´ भी काफ़ी न था, जिसकी--बक़ौल नामवर सिंह--मुक्तिबोध की प्रतिष्ठा के प्रसंग में कभी एक भूमिका रही थी। प्रगतिशील काव्य-आंदोलन और नक्सलबाड़ी-श्रीकाकुलम किसान-विद्रोह की समेकित पृष्ठभूमि में गोरख पाण्डेय, आलोकधन्वा और वीरेन डंगवाल ऐसे कवि हैं, जिन्होंने अपनी कविता में समग्र समाज और राज्य-व्यवस्था के क्रान्तिकारी रूपान्तरण के लिए समझौताविहीन समर की बात की। इनमें गोरख अन्यतम थे, क्योंकि शोषित और पीड़ित साधारण जनता से उनके जितनी `आवयविक एकात्मता´ किसी और निम्न-मध्यवर्गीय कवि में न थी और अगर उनकी भोजपुरी रचनाओं को भी साक्ष्य मानकर चलें( तो आम किसान, मज़दूर, छात्र, स्त्री और दलित समाज की जीवन-स्थितियों का जितना सांद्र, मार्मिक और प्रभावशाली चित्रण उन्होंने किया, कोई और नहीं कर पाया। कला और आन्दोलनधर्मिता, दोनों ही कसौटियों पर खरी उतरनेवाली अनेक श्रेष्ठ और अविस्मरणीय रचनाएँ उन्होंने संभव कीं। सौन्दर्य-चेतना, दुख की व्यापकता का एहसास और यथास्थिति की असह्यता का तनाव उनकी एक छोटी-सी कविता `आँखें देखकर´ (1978) में जिस तरह एक साथ घटित होते हैं और कविता के अंत में ज़ाहिर होनेवाले संपूर्ण परिवर्तन के विचार या आकांक्षा को जितना सशक्त, विश्वसनीय और हृदयस्पर्शी बना देते हैं, वह अपने आप में बेमिसाल है--
``ये आँखें हैं तुम्हारी
तकलीफ़ का उमड़ता हुआ समुंदर
इस दुनिया को 
जितनी जल्दी हो
बदल देना चाहिए।´´

एक तरफ़ कवि घोर सामाजिक विषमता का गवाह है--
``फ़सल काटे गइलीं दुखवा बिसार सजना
उनके भरि दिहलीं सोना से बखार सजना
अपने घरे आइल बोझा दुइ चार सजना´´
दूसरी ओर वह जनता के दुख, विपन्नता और आत्म-वंचना के लिए ज़िम्मेदार ताक़तों की भी शिनाख़्त करता है --
``खून चूस, देस बेचवा, लबार सजनी
ई दलाल पूँजीपति ज़मींदार सजनी´´
समूचे संदर्भ में स्वाभाविक ही था कि उसके निश्छल, न्यायप्रिय, सजग और संघर्षशील मानस में इस विश्वास ने गहरी जड़ें जमा ली थीं --
``बिना क्रान्ति के न होई उधियार सजना´´

गोरख पाण्डेय ने इस विश्वास की क़ीमत अपनी जान देकर चुकायी। `समझदारों का गीत´ जैसी प्रसिद्ध कविता लिखनेवाले गोरख दरअसल अपने वक़्त के दूसरे बुद्धिजीवियों और कवियों की मानिंद न तो किसी कमतर किस्म के दुख का प्रदर्शन कर पाये, न विरोध को ज़रूरी समझने के समान्तर समझौता कर सके और न समझौतापरस्ती के `औचित्य´ को सिद्ध करना उनकी नैतिक चेतना को गवारा हुआ--``हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं / हम समझते हैं / मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी / हम समझते हैं / यहाँ विरोध ही वाजिब क़दम है / हम समझते हैं / हम क़दम-क़दम पर समझौता करते हैं / हम समझते हैं / हम समझौते के लिए तर्क गढ़ते हैं / हर तर्क को गोल-मटोल भाषा में / पेश करते हैं, हम समझते हैं / हम गोल-मटोल भाषा का तर्क भी / समझते हैं।´´ अपने रचनात्मक, बौद्धिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संघर्ष के बावजूद जब उन्हें समग्र सामाजिक रूपान्तरण का सपना सच होता नहीं दिखा, तब उन्होंने जनवरी, 1989 में आत्मघात कर लिया। उस समय कुछ लोगों को लगा था और आज भी शायद वे ऐसा मानते हों कि इस आत्मघात के निजी कारण थे--जैसे प्यार, दाम्पत्य, स्वास्थ्य या आजीविका से जुड़ी असफलताएँ। लेकिन ये लोग चाहें, तो इस सचाई के समक्ष अपनी आँखें खोलकर गोरख के बहुआयामी संघर्ष, उनके रचनात्मक तथा वैचारिक अवदान का अवमूल्यन करने से बाज़ आ सकते हैं कि उपर्युक्त निजी कारणों का वृहत् संदर्भ--जिसमें वस्तुत: गोरख सक्रिय और रचनारत थे--हरगिज़ निजी नहीं था। उनके निकट तो प्यार का स्वप्न भी तभी साकार हो सकता था, जब आम जनता के दुश्मन सामंती और पूँजीवादी निज़ाम को मिटाया जा सके। उनकी एक सुंदर, मार्मिक और विलक्षण रचना `सपना´ इस हक़ीक़त को समझने में हमारी मदद कर सकती है--
``सूतल रहलीं सपन एक देखलीं
सपन मनभावन हो सखिया, ................
अँखिया के नीरवा भइल खेत सोनवा
त खेत भइलें आपन हो सखिया, ..............
केहू नाहीं ऊँच-नीच केहू के ना भय
नाहीं केहू बा भयावन हो सखिया, .............
मेहनति माटी चारों ओर चमकवली
ढहल इनरासन हो सखिया,
बइरी पइसवा के रजवा मेटवलीं
मिलल मोर साजन हो सखिया।´´

क्रान्तिकारी वाम धारा के दूसरे कवि हैं आलोकधन्वा, जिन्होंने अभी तक घोषित तौर पर अपनी आखिरी कविता 1997 में लिखी है। यों उनके चुप और स्थगित होने की क्या वजह है? क्या उत्तर-सोवियत दौर की वह दारुण सचाई ही नहीं, जिसमें क्रान्ति एक नामुमकिन-सी बात लगने लगी और कवि ने उससे कम किसी एजेण्डे में शरीक होना नहीं चाहा? क्या यह एक `आत्महंता आस्था´ नहीं कि विचारधारा, संगठन और आंदोलन के शून्य के समय में कवि अपने उसी जज़्बाती परिवेश में साँस लेना पसंद करता है, क्योंकि उससे बाहर आते ही उसे अपने विपथित हो जाने का अंदेशा है-- ``और तुम स्वयं समुद्र सूर्य और नमक के हो/तुम्हारी आवाज़/आन्दोलन और गहराई की है .....
तुम्हें पार करने की इच्छा
अक्सर नहीं होती भटक जाने का डर बना रहता है।´´(1994) अचरज नहीं कि इस असमंजस, अनिच्छा और बेचैनी के छोर पर या उसकी चरम परिणति के रूप में नॉस्टेिल्जया, व्यर्थता-बोध और हताशा की वह इबारत है, जिसमें कवि ने मानो अपनी कविता का समाधि-लेख लिख दिया है--``भारत में जन्म लेने का/मैं भी कोई मतलब पाना चाहता था/अब वह भारत भी नहीं रहा
जिसमें जन्म लिया´´(1997)
आखिरकार इस धारा के सिर्फ़ एक कवि हैं वीरेन डंगवाल, जो आज भी सक्रिय और रचनारत हैं। 2002 में उनका दूसरा कविता-संग्रह छपता है-- `दुश्चक्र में स्रष्टा´। बदले हुए हालात में अपने ही देश में निर्वासित किये जाने या बेगानेपन का दंश उन्हें भी है, ``भीषणतम मुश्किल में दीन और देश´´ का विकट एहसास भी( मगर उनके कवि के बचे रहे आने की बुनियाद में यह संकल्पधर्मा चेतना है--
``देस बिराना हुआ मगर इसमें ही रहना है/
कहीं ना छोड़ के जाना है /इसे वापस भी पाना है/
बस न तू आँधी में उड़ियो ।/ मती ना आँधी में उड़ियो।´´

पूरे मामले का यह एक सकारात्मक पहलू है। पर इसका दूसरा पहलू बताता है कि क्रान्तिकारी वाम से अपनी प्रतिबद्धता के आशयों का विस्तार करते हुए वीरेन डंगवाल धीरे-धीरे अपनी पीढ़ी के अन्य कवियों द्वारा पहले से अपनायी जा रही किंचित् उदार और व्यापक वाम सरणि में दाखिल हो जाते हैं। इसीलिए एक ओर वे ``हे, अरे, अबे, ओ करुणानिधान!!´´ जैसी मूलगामी साहस से भरी काव्य-पंक्ति लिखते हैं, तो दूसरी तरफ़ परिस्थितिजन्य विवशता का हवाला देते हुए यह भी स्वीकार करते हैं कि उनके नये घर में --``एक गुप्त कोना भगवान के लिए भी है/जिसके बग़ैर आजकल गुज़र नहीं/यों हर ज़रूरत को ध्यान में रखकर बना/एक सात कोनों वाला घर मुझे मयस्सर हुआ´´ एक तरफ़ `आत्मग्रस्त छिछलापन ही जैसे जीवन में शेष´ रहा आता है( दूसरी ओर इस सारे धुँधलके, अवसाद और आत्मग्लानि को चीरती हुई ये इच्छाएँ भी सिर उठाती और एकदम मुनासिब मालूम होती हैं--``यह कौन नहीं चाहेगा उसको मिले प्यार/.....
बेटे-बेटी को मिले ठिकाना दुनिया में/कुछ इज्ज़त हो, कुछ मान बढ़े, फल-फूल जायँ..../पापड़-चटनी, आँचा-पाँचा, हल्ला-गुल्ला/दो-चार जशन भी कभी, कभी कुछ धूम-धाँय/जितना सम्भव हो देख सकें, इस धरती को/हो सके जहाँ तक, उतनी दुनिया घूम आयँ/यह कौन नहीं चाहेगा?´´ दरअसल, यही वह सामान्य भावभूमि है, जिस पर ज़्यादातर `समकालीन कविता´ रची गयी है। इसे प्रसन्नता और तकलीफ़ के बीच का द्वन्द्व कहेंगे या संतुलन? ऐसा कहने और मानने के लिए पर्याप्त सुबूत हैं--गोकि उन्हें यहाँ प्रस्तुत करने का अवकाश और ज़रूरत नहीं--कि अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में यह आत्मसंघर्ष, द्वन्द्व और प्रतिरोध की कविता है( लेकिन अपने कमज़ोर क्षणों में सन्तुलन, सामंजस्य और प्रदत्त स्थितियों के लाचार समर्थन या उनसे एक सायास पलायन की कविता भी है। क्रान्तिकारी वाम से यह राजनीतिक और वैचारिक `शिफ़्ट´ या अंतरण वृहत्तर सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया से अलहदा और स्वायत्त, कोई स्वत:स्फूर्त परिघटना नहीं थी, बल्कि यह उसके ही दबाव का नतीजा थी। युवा आलोचक आशुतोष कुमार ने बिलकुल सही लिखा है--``नक्सलबाड़ी ही आठवें दशक की रचनाशीलता का मूल संदर्भ था। विद्रोह के पहले आवेग में हिन्दी की क्रान्तिकारी वाम कविता वजूद में आयी। गोरख पाण्डेय, आलोकधन्वा, कुमार विकल इसी आवेग की उपलब्धियाँ थे। मगर विद्रोह की सच्चाई से दमन का यथार्थ कम बड़ा न था। यदि परिवर्तन इतना दुरूह था, तो रचनाकारों को लगा कि कविता में जीवंत मानवीय संवेदनाओं को दर्ज करके सुरक्षित कर लेना सबसे पहले ज़रूरी है। इसीलिए आठवें दशक की कहानियों-कविताओं में टूटते हुए जीवन-मूल्यों को बचाने की आतुरता और उनके टूटने से उपजनेवाली वेदना के मार्मिक चित्र इतने अधिक हैं। आठवें दशक की कविता की भावप्रवणता का मूल भी यही है।´´ (-`समकालीन जनमत´, अप्रैल-सितम्बर, 2004, पृ0 77)
दिलचस्प है कि `समकालीन कविता´ अपने से ठीक पहले की कविता-- यानी `अकविता´ को अपनी प्रेरणा का संदर्भ मानने से इनकार करती है। इसके कारण बताते हुए इस दौर के प्रमुख कवि-समीक्षक लिखते हैं कि उसमें जीवन-द्रव्य का अभाव, कोरी राजनीतिक बयानबाज़ी, छद्म-क्रान्तिकारिता, सरल राजनीतिक समझ, `भावोच्छ्वास में लिपटी मन:स्थितियाँ´ और `विचार-उच्छ्वासों तथा प्रतिज्ञाओं´ की बहुतायत थी। कवि मूल्यहीन होते जाते अपने परिवेश में बाक़ी समाज से ख़ुद को अलग-थलग, अकेला और एक उच्चतर नैतिक ज़मीन पर अवस्थित महसूस करता था और इसीलिए एक किस्म की आत्मबद्धता, आत्म-संकोच और आत्म- भर्त्सना का शिकार भी था। उसकी अभिव्यक्ति के लहज़े में संवाद की सहजता की बजाए आक्रामकता थी और इसीलिए अपने भाषिक व्यवहार में वह काफ़ी हिंस्र और आत्ममुग्ध था। बेशक उसमें बेचैनी, विद्रोह और युयुत्सा थी( पर कुल मिलाकर उसने आत्यन्तिक निराशा, अवसाद, अनास्था, सर्व-निषेधात्मकता, रूमानी आक्रोश, यौन कुंठा, सिनिसिज़्म और अराजकता से लैस काव्य-वातावरण को ही निर्मित किया।
(यह लेख अगली दो तीन किस्तों में जारी रहेगा ...)

4 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति। अगली किस्त की प्रतीक्षा रहेगी।

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  2. सुन्दर प्रस्तुति, शुभकामनाएँ

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  3. bahut lambi post n den shireesh,vaqt kahan hai. ye to patrika me deejiye. aur patrika kab tak aa rahi hai?

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  4. good narration..thanks for the same.

    i would like to know that,Present typing tools for Indian languages have got rigid rules as well as keymappings. Do you know any other tools which avoid these hurdles? so that a lay man like me can also type in Hindi...?

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