Saturday, April 26, 2008

प्रधानाध्यापक निलंबित

प्रधानाध्यापक निलंबित

एक मशहूर अखबार के
स्थानीय संस्करण के पहले सफ़े पर मोटे शीर्षक में
छपी है ख़बर -
``प्रधानाध्यापक निलंबित´´

ज़िलाधीश ने अपने औंचक दौरे में पाया
कि पाठशाला में
उपस्थित नहीं थे प्रधानाध्यापक सेवकराम त्रिपाठी
और वहाँ उनकी ओर से छुट्टी की कोई अर्जी भी मौजूद नहीं थी
लिहाजा
उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाना तय हुआ

उस दिन तो क्या
लगातार पिछले तीन दिनों से पाठशाला नहीं आए थे
सेवकराम त्रिपाठी
उनके निलम्बन से बावस्ता ख़बर जो छपी

उसमें भी नहीं थी इतनी गुंजाइश
और सदाशयता
कि पता किया जा सके आखिर क्यों उपस्थित नहीं थे
सेवकराम त्रिपाठी ?

महीना भर पहले ही
विभाग के बड़े अफसर को घूस देकर
किसी तरह भविष्य निधि से अग्रिम स्वीकृत करा
अपनी तीसरी और आखिरी बिटिया का विवाह किया था उन्होंने
और अब गंगासागर जाने के बारे में सोच ही रहे थे
कि अचानक
उस बिटिया के ससुराल में दुबारा
तलब कर लिया गया
उन्हें

वे गए भागते
बिना किसी से कुछ कहे
कांपते दिल से
वहाँ जाकर अपने दशम् ग्रह जामाता के मुख से
सुना उन्होंने एक महीने के भीतर होंडा पल्सर मोटरसाइकिल
और
नोकिया एन सिरीज़ मोबाइल ला देने का
फ़रमान

वे न तो इन शब्दों
और न ही इन वस्तुओं को समझ पा रहे थे ठीक से
हालांकि
घूमने लगे थे उनके सामने टीवी में मंडराते
गुदाज़ अधनंगी लड़कियों
और रंगीनियों से बजबजाते कई सारे विज्ञापन

वे तो दरअसल पानी भी नहीं मांग सकते थे
बिटिया की चौखट पर
कंठ के लगातार सूखते चले के बावजूद
ऐसा करने से कुल की परम्परा
और मरजाद भंग होती थी

अपने अंतस में गहराती एक अजीब-सी प्यास लिए
वे लौट रहे थे
रोती-बिलखती बिटिया के घर से

उस गीली और गाढ़ी शाम में
मरे मन से बस अड्डे पर उतरकर उन्होंने बरसों बाद
अकेले में बैठकर
दो प्याला देशी शराब पी

उन्हें नहीं पता था
कि इस दुनिया में लौटने का आखिर ठीक-ठीक क्या आशय होता है

लेकिन वे लौट रहे थे

अभी कोस भर दूर ही था उनका घर कि अधराह में सीने के दर्द से तड़पकर
अपना यह लौटना बीच में रोक
सड़क के किनारे की भीगी मिट्टी में
लेट जाना पड़ा उन्हें

और वे लेट गए आकाश में तारों का आना
और
पक्षियों का लौटना देखते
उनके भीतर टूटती जा रही थी हर चीज़

और वे लेटे रहे
सुनते हुए जीवन के टूटने की कुछेक आखिरी अनाम आवाजें

दूसरे दिन मृत पाये गए
स्कूल से सौ किलोमीटर दूर अपने गाँव के बाहर
हालांकि
उनकी देह ने हार जाने से पहले घिसटकर कुछ दूर चलने की कोशिश भी की
जो दर्ज थी
सड़क किनारे की मिट्टी पर

जब दिखाई जा रही थी
उनकी देह को
उसके हिस्से की आखिरी धुआंती -सुलगती आग
ठीक उसी रात
स्थानीय संवाददाता के हवाले से
अखबार में छापी जा रही थी
यह ख़बर -
``प्रधानाध्यापक निलंबित´´

अगले रोज़ ज़िलाधीश महोदय की सुबह की चाय को
खुशनुमा बनाने के वास्ते !

Sunday, April 13, 2008

हाथों की व्याख्या

मैं व्याख्या करता हूँ ये मेरे हाथ हैं
इन हाथों की
मैं नहीं जानता कहाँ से आती है आवाज़

कुछ चीज़ें चींटियों की तरह चल कर आती हैं
हाथ इंतजार में थक जाते हैं

कुछ चीज़ें तेज़ी से उड़ती हुयी ऊपर से गुज़र जाती हैं
हाथ देखते रह जाते हैं

मैंने देख कर सारी रफ्तारॅ देख ली है ज़माने की रफ्तार
मैं व्याख्या करता हूँ ये मेरी आँखे हैं
इन आंखों की

ये आँखे सब कुछ देखने को तैयार हैं
देखिये ये आँखे देख रही हैं - समय का चक्का घूम रहा है
मैं नहीं जानता कहाँ से आती है आवाज़

मैं व्याख्या करता हूँ देखिये ये मेरा गला है
मैं यहाँ से बोलना चाहता हूँ
पर यह गला बहुत डरता है अपने ही हाथों से !

" बहनें तथा अन्य कवितायेँ " से

Thursday, April 10, 2008

एक चश्मदीद का बयान ......

रघुवीर सहाय को याद करते हुए

मैं किसी हत्या के बारे में कुछ नहीं
जानता हुज़ूर

अलबत्ता मैं जानता हूँ उस जगह के बारे थोड़ा कुछ
जहाँ सुना है कि हत्या हुई
उस रास्ते और उससे जुड़ी उस बंद गली के बारे में भी मैं जानता हूँ
और उन आवारा कुत्तों के बारे में भी
जो भूंकते हैं
वहाँ से गुज़रते ही

लेकिन मैं हत्या के बारे में कुछ नहीं जानता

हाँ , मैं मृतक को जानता हूँ माबदौलत
उसकी अड़तीस की उम्र
उसकी पत्नी की जवान मजबूरियों
और दो बच्चों की अनभिज्ञताओ को भी मैं जानता हूँ

हुज़ूर इस दुनिया में
मैं सिर्फ़ उतना जानता और नहीं जानता हूँ
जितना जानने और नहीं जानने से मैं
बच सकता हूँ
आपकी इस महान अदालत में
अगली किसी गवाही के लिए !

Saturday, April 5, 2008

1965

मैं आपा के बारे में बात कर रहा हूँ जो
अम्मी के बारे में बात करती थी जो शौहर के बारे में
बात करती थीं जो उस अफसर के बारे में बात करते थे
जो देश के बारे में बात करता था जो
युद्ध के बारे में बात कर रहा था चीखते हुए उन दिनों

पाकिस्तान के बारे में फिलहाल कोई बात नहीं करूंगा !

असद जी की ये बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करने वाली छोटी -सी कविता उनके पहले संकलन " बहनें और अन्य कवितायेँ " से ...............

Friday, April 4, 2008

संस्कार

बीच के किसी स्टेशन पर दोने में पूड़ी साग खाते हुए
आप छिपाते हैं अपना रोना
जो अचानक शुरू होने लगता है पेट की मरोड़ की तरह
और फ़िर छिपाकर फेंक देते हैं
कहीं कोने में
अपना दोना

सोचते हैं - मुझे एक स्त्री ने जन्म दिया था
मैं यों ही
दरवाज़े से निकल कर नहीं चला आया था !

असद जी की ये अद्वितीय कविता उनके पहले संकलन " बहनें और अन्य कवितायेँ " से ...............