Monday, March 31, 2008

राजेन्द्र कैडा

सपनों पर किसी का जोर नहीं

न तुम्हारा, न मेरा और न ही किसी और का

कुछ भी हो सकता है वहाँ

बर्फ-सी ठंडी आग या जलता हुआ पानी

यह भी हो सकता है कि मैं डालूं अपनी कमीज की जेब में हाथ

और निकाल लूं हरहराता समुद्र - पूरा का पूरा

मैं खोलूं मुट्ठी

और रख् दूं तुम्हारे सामने विराट हिमालय

अब देखो - मैंने देखा है एक सपना

मैं एक छोटा-सा बच्चा लटकाए हुए कंधे पर स्कूल बैग

अपने पिता की अंगुली थामे भाग रहा हूं स्कूल की घंटी के सहारे

भरी हुई क्लास में

सबसे आगे बैंच पर मैं

और

तुम मेरी टीचर

कितनी अजीब-सी घूरती हुई तुम मुझे

और मैं झिझक कर करता हुआ आंखें नीची

मैंने देखा - दो और दो होते हुए पांच

और खरगोश वाली कहानी में बंदर वाली कविता का स्वाद
तुम पढ़ा रही थीं `ए´ फार `एप्पल´

और मुझे सुनाई दिया `प´ से `प्यार´

तुम फटकारती थीं छड़ी

सिहरता था मैं

खीझ कर तुमने उमेठे मेरे कान

सपनों के ढेर सारे जादुई नीले फूलों के बीच ही

मैंने देखा

मेरा ही सपना खेलता हुआ मुझसे

जब बड़े-बड़े अंडों से भरा मेरा परीक्षाफल देते हुए

तुमने कहा मुझसे - `फेल हो गए हो तुम हजारवीं बार´

और इतना कहते समय - मैंने देखा

तुम्हारी बड़ी-बड़ी आंखों में दमकता हुआ

पृथ्वी भर प्यार

और मुझे महसूस हुआ

कि वहीं कहीं आसपास शहद का छत्ता गुनगुना रहा था

धीमे से

हजार-हजार फूलों के सपनों का गीत !

दोस्तो ये बिना शीर्षक कविता एक बिलकुल नए कवि के पहले प्रेम की कविता है ! आप बताइए कैसी है !

Sunday, March 30, 2008

अप्रकाशित कविता

एक कविता जो पहले ही से ख़राब थी
होती जा रही है अब और ख़राब

कोई इंसानी कोशिश सुधार नहीं सकती
मेहनत से और बिगाड़ होता है पैदा
वह संगीन से संगीनतर होती जाती स्थायी दुर्घटना है
सारी रचनाओं को उसकी बगल से
लंबा चक्कर काट कर गुज़रना पड़ता है

मैं क्या करूं उस शिथिल
सीसे सी भारी काया का
जिसके आगे प्रकाशित कवितायेँ महज़ तितलियाँ हैं
और समालोचना राख

मनुष्यों में वह सिर्फ़ मुझे पहचानती है
और मैं भी मनुष्य जब तक हूँ तब तक हूँ !

असद जी की यह कविता उनकी नई कविता पुस्तक "सामान की तलाश" से साभार.........
परिकल्पना प्रकाशन
डी - 68 , निराला नगर,
Lucknow -6

Friday, March 28, 2008

ग़ज़ल

सुकूते- राह में उसके कयाम की दुनिया
बहुत हसीन है अब मेरे नाम की दुनिया

मुझे है चाह फजा में बिखर के रहने की
ये मेरे बस की नहीं है एहतिमाम की दुनिया

कहीं तो कोई मेरा जिक्रे-सुखन छेड़ेगा
किसी को भाएगी मेरे कलाम की दुनिया

मैं आज भी हूँ ज़मीने - दहर का कारिंदा
मुझे अजीज बहुत है ये काम की दुनिया

शहर की राह पे मैं बेअदब मुसाफिर हूं
शहर के पास है झूटे सलाम की दुनिया

दोस्तो उर्दू के अक्षरों में लगने वाले कई नुक्ते यहां नहीं लग पा रहे हैं - ये शायद यूनीकोड की सीमा है - आप तक बात पहुंचेगी ये उम्मीद भी है !

Thursday, March 27, 2008

बोधिसत्व

बोधि भाई की एक और छोटी - सी, लेकिन अर्थ विस्तार में खूब बड़ी और खुली कविता

सिकंदर

सिकंदर !
सैनिक थके हुए हैं
सैनिक अपने परिवार में पहुँचना चाहते है
सैनिक सोना चाहते हैं
अपने घर में
सैनिक अपने बच्चों को एक बार चूमना चाहते हैं

सैनिक अपने को
तुमसे और घोड़ों से अलग साबित करने के लिए
बीड़ी पी रहे हैं !

Monday, March 24, 2008

बोधिसत्व

बोधिसत्व की ये कविता उनके पहले संकलन से है और आप देख सकते हैं कि वैश्विक स्तर पर आज कितनी प्रासंगिक है। ऐसी ही कुछ कविताओं के लिए मैं इस कवि का आदर करता हूं और प्यार भी................

यहां हूं

मैं यहां हूं
नाइजर में खे रहा हूं डोंगी
मेरे डांड की छप्प छप्प
सुन रही हैं रावी में नहा रही
लड़कियां

मैं यहां हूं
तिब्बत में
`तिब्बत हूं.......... तिब्बत हूं´
का अन्नोर मचाता हुआ
मेरे पैरों के निशान
कालाहारी के रेगिस्तान में खोजता
थेंथर हो रहा है कोई

मैं यहां हूं
चाड का नुनखार पानी
अकसर मुझमें झांक कर
चुप रहती है
कोई झांवर पड़ रही औरत
परूसाल उसका सरबस खो गया था
यहीं
इसी पहाड़ के पीछे

मैं यहां हूं
बनारस के भिखारी रामपुर में
लगा रहा हूं
अपने खेत में गमकउवा धान
पूरे ताल पर ओनइ आया है मेघ
गिर रहा है महीन कना
महकती हुई फुहार
पड़ रही है
अदीस-अबाबा में !

Sunday, March 23, 2008

शिरीष कुमार मौर्य

स्वप्न

मेरे जीवन में उतनी नींद नहीं
जितने स्वप्न हैं

बेशुमार हैं वे
और अंट नहीं पाते मेरी रातों में
शायद यही कारण है
कि मुझे मारनी पड़ जाती है दिन में भी
एकाध झपकी

मेरे हिस्से के एक छोटे-से संसार में
वे ज्यादातर अतीत से आते हैं सम्मोहित करते
और भटकते हुए
कुछ आत्मीय लोगों
और जानी-पहचानी जगहों के साथ

इस तरह
किसी और काल में घटित होते हुए
देखना उन्हें
निश्चित ही सपने से ज्यादा
कुछ है

बहरहाल ऐसे ही वे आते हैं
या मैं जाता हूँ
उन तक
कभी-कभी तो
नींद के बाद की एक जागती हुई नींद में भी

कितनी बचकानी वास्तविकता है यह
कि मैं स्वप्न देखता हूँ वैसे
जैसे
खतने के समय
चाकू चलाने से ठीक पहले
बच्चों को दिखाया जाता है
हंस का पंख

Thursday, March 13, 2008

शिरीष कुमार मौर्य

पेड़ कोई तो हरा मिलने लगे

पंछियों को आसरा मिलने लगे



रात काली हो तो कोई ग़म नहीं

दिन उजाले से भरा मिलने लगे



फैसले की चाह फिर ये न हो

खोखला-सा मशविरा मिलने लगे



सिक्के अगर खोटे चलें, चलते रहें

आदमी लेकिन खरा मिलने लगे



लौट आए फिर सचाई का चलन

सर हथेली पर धरा मिलने लगे



ये और ऐसी ही कुछ और ग़ज़लें 20-21 की उम्र की याद हैं, जिन्हें अब तक बस डायरी में संजोया था। अब ब्लाग पर सार्वजनिक करने का सिलसिला शुरू करने जा रहा हूँ। हिन्दी के कवियों में छंद की नासमझी को लेकर सुल्तान अहमद ने कृतिओर -47 में कुछ सवाल उठाए हैं - मेरी इस कोशिश या कदम को उनसे भी जोड़ कर देखा जा सकता है।

Friday, March 7, 2008

शिरीष कुमार मौर्य

उसका सपना

सारा दिन काम में खटने के बाद
इस घिरती रात में
प्रेम से बहुत पहले ही कहीं
नींद खड़ी हैं
उसकी आंखों में

कुछ अर्द्धपरिचित सपने हैं
वहाँ
अपने होने की हर सम्भावना को पुख्ता करते हुए
उसके सो जाने के इन्तज़ार में

और उन सपनों की भीड़ में हो न हो
वह ज़रूर मैं ही हूँ -
एक भारी और सांवला बादल
छलाछल जल से भरा
बरस न पाने की मजबूरी में भटकता हुआ
धरती के ऊपर
यूं ही निठल्ला-सा

सपने में इतना कुछ देखा - ईजा-बाबू
भाई-बहन
बरसों की बिछुड़ी सखियाँ
कई सारे नगर-क़स्बे-बस्तियां

दिल्ली
लखनऊ
इलाहाबाद
रामनगर
पिपरिया
नैनीताल

अब सुबह जागते ही पूछेगी
यह बात -
कहाँ थे तुम ?

खड़ी हुई मल्लीताल रिक्शा स्टैंड पर अकेली घबराई-सी
खोजती तुम्हीं को तो
जाग पड़ी थी मैं अकबकाकर
तीन बजे रात !

ये बिल्कुल नई कविता है .........

शिरीष कुमार मौर्य

इसी रात में घर है सबका

अग्रज राजेश जोशी को विनम्रता और विश्वास के साथ

इसी रात में घर है सबका

जो चढ़ती चली आती है

छाती पर

और पार पाना मुमकिन नहीं जिससे

फिलहाल तो

इसी में हत्यारे घूमते हैं

बेनकाब

उनके चेहरे किसी निकटवर्ती नक्षत्र से भी ज्यादा

चमकते हैं

गाडियाँ गुज़रती हैं

हथियारों और लाशों से लदी

रास्ते गूंजते हैं

बूटों और चेतावनी देती सीटियों की आवाज़ों से

लाल और नीली बत्तियों की रोशनी में

बेखटके कुचली जाती है

मानवता

इसी रात में

जिसमें हम आँख मूँद कर सोने का अभिनय करते हैं

इसी रात में चलती रहती हैं

बगावत और खिलाफत की भी पोशीदा कार्यवाहियां

लोग कभी फुसफुसाते

तो कभी चीखते- चिल्लाते हैं

कितना भी हो अँधेरा

कुछ उठे हुए हाथ साफ नज़र आते हैं

कैसे रात किसी का घर नहीं -मेरे समय के बड़े और पुरस्कृत कवि राजेश जोशी बतलाते हैं

अपनी चमचमाते शब्दों वाली

एक कविता में

मैं अभागा समझ नहीं पाता उनकी बात

और जब भी पढ़ता हूँ उनकी यह कविता

भीतर-भीतर छटपटाता हूँ

इसी रात में घर है सबका

जी हाँ सबका !

जिसमें दारू पीकर स्त्रियों और नवोदितों पर विमर्श करते हुए

हमारे सारे बड़े कवि और चिन्तक भी शामिल हैं

कैसे कहूँ कि इसी रात में घर है उस प्रेम का भी

उनके जीवन में

दिनों-दिन क्षीण होती जाती है

जिसकी धार

ऐसे में जो बैठे रहते हैं मन मार

वही कहते हैं रात किसी का घर नहीं

उनके लिए खुला हुआ कहीं कोई दर नहीं

सिर्फ़ रोशनी है

छद्य भरी

दिन के उजाले की

अपना मुंह छुपाना बहुत सरल है वहाँ

मुझे याद आता है - अंधेरे के बारे में भी गाया जाएगा- कहने वाला

बीते हुए समय का एक चेहरा

गीदड़ों की अनवरत हुआं-हुआं के बीच भी

अमर हो गईं

जिसकी कवितायेँ

बहुत खुरदुरे बदन और

आत्मा वाली

मैं अभी बहुत छोटा हूँ यह कहने को

कि बहुत सरल है क्रांतिकारी हो जाना

बिना रात में रहे

बिना रात को जाने !

पर बड़े भाई इतना तो आप बताएं

अब से

क्या हम आपको सिर्फ़ उजाले का ही

कवि मानें ?

Thursday, March 6, 2008

शिरीष कुमार मौर्य

टीन की चादर

यह कुछ ठोंकने की आवाज़ है

और यह कुछ पीटने की

एक भारी-भरकम हथौडे के नीचे

पट पटा रही है टीन की चादर

क्या बनेगा इसका ?

किसी दुकान का शटर

या फ़िर किसी गरीब घर की छत

शटर बना अगर इसका

तो यह एक बाज़ार के मुहाने को खोलने और बंद करने के

काम आएगी

निगल जायेगी

बाज़ार के बाहर के सभी सपने

और अगर कहीं

किसी छोटे-से घर की छत बन पाई यह

तो आएँगी गर्मियों में

ताप से चिटकने की आवाजें इससे

बरसात में

बूंदों का संगीत झरेगा

और एक धीमी - धीमी टुकटुकाहट के साथ

दाना चुगेगा

गौरैयों का झुंड जाड़ों में इस पर

तो बोलो -

"अब तुम ही बोलो मेरी ठनठनाती टीन की चादर

बाज़ार जाओगी की घर ?"

ये कविता भी कोई दस साल पुरानी है ........

Wednesday, March 5, 2008

शिरीष कुमार मौर्य

सविनय निवेदन

सविनय निवेदन
उनसे
अलग-अलग रहने की जिनकी आदत है
और ज़माने भर से जिन्हें शिकायत है
कृपया
वे ख़ुद को जीवन से जोडें !

सविनय निवेदन
उनसे भी
जो रोज़ थोड़ा-थोड़ा ढहते हैं
और हमेशा चुप रहते हैं
वे कृपया कुछ बोलें !

और सविनय निवेदन
उनसे
जो खरी खरी कहने में शरमाते हैं
जिनके असली चेहरे शब्दों के पीछे
छुप जाते हैं

वे कृपया कविता को छोडें !

ये कविता २००४ में छपे मेरे कविता संग्रह से ........

शिरीष कुमार मौर्य

सबसे अच्छा शहर

ये कविता अपने छः साल के बेटे और उसकी पूरी कक्षा के लिए


बच्चो!

गाय पर निबन्ध लिखना

तो दूध का ज़िक्र करना



डाकिए पर निबन्ध लिखना

तो चिट्ठी का ज़िक्र करना


गाँव पर निबन्ध लिखना

तो खुद का ज़िक्र करना

मत भूलना


लेकिन

कभी लिखना पड़े

मुल्क के सबसे अच्छे शहर के बारे में

कोई निबन्ध

तो पन्ना ख़ाली छोड़ देना

क्योंकि वो

अभी बसा ही नहीं है कहीं!