Monday, May 12, 2008

हक़

हक़
उन्हें भी था
जो
मारे गए


और हक़
उन्हें भी है जो मारे जायेंगे


ग़रीबॉ के पास
सिर्फ़
हक़ होता है
चीज़ॉ पर

चीज़ें नहीं !

दोस्तों ये भी एक बहुत पुरानी - बहुत छोटी कविता १९९२ के ज़माने की .......

7 comments:

मीत said...

बहुत सही कहा है भाई. ग़रीबों के पास सिर्फ़ हक़ होता है .... चीज़ें नहीं. सौ फी सदी सही. ख़्वाब देखने का भी सिर्फ़ हक़, ताबीर का क्या है .... वाह !

Udan Tashtari said...

बिल्कुल सही-बहुत खूब!!

जोशिम said...

खूब

राजीव रंजन प्रसाद said...

वाह!!! अच्छी रचना और अब भी सामयिक

***राजीव रंजन प्रसाद

अनिल said...

शिरीष भैया. लाजवाब कविता. बनारस वाली कविता के बाद यह कविता बहुत पसंद आयी. आपकी और रचनायें पढने को कैसे मिलेंगी? याद आ रही है वो मुलाकात जब हम लोग बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय की कैंटीन के पास फोटो खिंचाये थे?
बहुत दिनों से आपसे बात करने का मन था. जब आपका ब्लाग देखा तो अद्‍भुत लगा. आप कैसे हैं?
हो सके तो मेल करियेगा.

शिरीष कुमार मौर्य said...

प्रिय अनिल बहुत अच्छा लगा तुम्हारी प्रतिक्रिया पाकर, मेल भी करूंगा !

Arun Aditya said...

अच्छी कविता। सच्ची कविता।