Friday, April 4, 2008

संस्कार

बीच के किसी स्टेशन पर दोने में पूड़ी साग खाते हुए
आप छिपाते हैं अपना रोना
जो अचानक शुरू होने लगता है पेट की मरोड़ की तरह
और फ़िर छिपाकर फेंक देते हैं
कहीं कोने में
अपना दोना

सोचते हैं - मुझे एक स्त्री ने जन्म दिया था
मैं यों ही
दरवाज़े से निकल कर नहीं चला आया था !

असद जी की ये अद्वितीय कविता उनके पहले संकलन " बहनें और अन्य कवितायेँ " से ...............

2 comments:

Geet Chaturvedi said...

ख़तरनाक कविता है दोस्‍त। भीतर तक हिला देती है।

Maverick said...

kya baat hai! kya baat hai! shabd sunn ho gaye hain...