Sunday, March 23, 2008

शिरीष कुमार मौर्य

स्वप्न

मेरे जीवन में उतनी नींद नहीं
जितने स्वप्न हैं

बेशुमार हैं वे
और अंट नहीं पाते मेरी रातों में
शायद यही कारण है
कि मुझे मारनी पड़ जाती है दिन में भी
एकाध झपकी

मेरे हिस्से के एक छोटे-से संसार में
वे ज्यादातर अतीत से आते हैं सम्मोहित करते
और भटकते हुए
कुछ आत्मीय लोगों
और जानी-पहचानी जगहों के साथ

इस तरह
किसी और काल में घटित होते हुए
देखना उन्हें
निश्चित ही सपने से ज्यादा
कुछ है

बहरहाल ऐसे ही वे आते हैं
या मैं जाता हूँ
उन तक
कभी-कभी तो
नींद के बाद की एक जागती हुई नींद में भी

कितनी बचकानी वास्तविकता है यह
कि मैं स्वप्न देखता हूँ वैसे
जैसे
खतने के समय
चाकू चलाने से ठीक पहले
बच्चों को दिखाया जाता है
हंस का पंख

5 comments:

जोशिम said...

बहुत बढिया- [नींद है तो और ख्वाब भी नींद से ज़्यादा हैं]

अजित वडनेरकर said...

कविता को जहां पहुंचना होता है वहां पहुंचने में कामयाब हैं आप। अच्छी कविता।

बोधिसत्व said...

लगे रहें भाई...जय हो...

बोधिसत्व said...

लगे रहो भाई.....जय हो

शिरीष कुमार मौर्य said...

हौसलाअफजाई के लिए धन्यवाद बड़े भाइयो !