स्वप्न
मेरे जीवन में उतनी नींद नहीं
जितने स्वप्न हैं
बेशुमार हैं वे
और अंट नहीं पाते मेरी रातों में
शायद यही कारण है
कि मुझे मारनी पड़ जाती है दिन में भी
एकाध झपकी
मेरे हिस्से के एक छोटे-से संसार में
वे ज्यादातर अतीत से आते हैं सम्मोहित करते
और भटकते हुए
कुछ आत्मीय लोगों
और जानी-पहचानी जगहों के साथ
इस तरह
किसी और काल में घटित होते हुए
देखना उन्हें
निश्चित ही सपने से ज्यादा
कुछ है
बहरहाल ऐसे ही वे आते हैं
या मैं जाता हूँ
उन तक
कभी-कभी तो
नींद के बाद की एक जागती हुई नींद में भी
कितनी बचकानी वास्तविकता है यह
कि मैं स्वप्न देखता हूँ वैसे
जैसे
खतने के समय
चाकू चलाने से ठीक पहले
बच्चों को दिखाया जाता है
हंस का पंख
Sunday, March 23, 2008
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5 comments:
बहुत बढिया- [नींद है तो और ख्वाब भी नींद से ज़्यादा हैं]
कविता को जहां पहुंचना होता है वहां पहुंचने में कामयाब हैं आप। अच्छी कविता।
लगे रहें भाई...जय हो...
लगे रहो भाई.....जय हो
हौसलाअफजाई के लिए धन्यवाद बड़े भाइयो !
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