Thursday, March 13, 2008

शिरीष कुमार मौर्य

पेड़ कोई तो हरा मिलने लगे

पंछियों को आसरा मिलने लगे



रात काली हो तो कोई ग़म नहीं

दिन उजाले से भरा मिलने लगे



फैसले की चाह फिर ये न हो

खोखला-सा मशविरा मिलने लगे



सिक्के अगर खोटे चलें, चलते रहें

आदमी लेकिन खरा मिलने लगे



लौट आए फिर सचाई का चलन

सर हथेली पर धरा मिलने लगे



ये और ऐसी ही कुछ और ग़ज़लें 20-21 की उम्र की याद हैं, जिन्हें अब तक बस डायरी में संजोया था। अब ब्लाग पर सार्वजनिक करने का सिलसिला शुरू करने जा रहा हूँ। हिन्दी के कवियों में छंद की नासमझी को लेकर सुल्तान अहमद ने कृतिओर -47 में कुछ सवाल उठाए हैं - मेरी इस कोशिश या कदम को उनसे भी जोड़ कर देखा जा सकता है।

6 comments:

जोशिम said...

शिरीष जी - बड़ा अच्छा लगा - can't resist
आदमी भी खर खरा मिल जायगा
ईमान को मौसम ज़रा मिलने लगे
- मनीष

ANUNAAD said...

बात को आगे बढ़ाने के लिए धन्यवाद मनीष जी !

Vineeta Yashswi said...

अच्छी कविता लगायी है आपने

vijay gaur said...

tumahara chehra dekha. kavi katai nhi lagte. ek sikari lagte ho. harjeet ka ek ser pes hai -
ye hare paid hain, inko n jalo logon.
inke jalne se bahut roj dhuna hota hai.

naveen kumar naithani

sirsh bhai ye naveen ka comment hai, mera nhi

शिरीष कुमार मौर्य said...

नवीन भाई का हर शब्द सर-माथे पर.....
और विजय भाई को इन्हें मुझ तक पहुंचाने का आभार भी पहुंचे !

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर।