पेड़ कोई तो हरा मिलने लगे
पंछियों को आसरा मिलने लगे
रात काली हो तो कोई ग़म नहीं
दिन उजाले से भरा मिलने लगे
फैसले की चाह फिर ये न हो
खोखला-सा मशविरा मिलने लगे
सिक्के अगर खोटे चलें, चलते रहें
आदमी लेकिन खरा मिलने लगे
लौट आए फिर सचाई का चलन
सर हथेली पर धरा मिलने लगे
ये और ऐसी ही कुछ और ग़ज़लें 20-21 की उम्र की याद हैं, जिन्हें अब तक बस डायरी में संजोया था। अब ब्लाग पर सार्वजनिक करने का सिलसिला शुरू करने जा रहा हूँ। हिन्दी के कवियों में छंद की नासमझी को लेकर सुल्तान अहमद ने कृतिओर -47 में कुछ सवाल उठाए हैं - मेरी इस कोशिश या कदम को उनसे भी जोड़ कर देखा जा सकता है।

6 comments:
शिरीष जी - बड़ा अच्छा लगा - can't resist
आदमी भी खर खरा मिल जायगा
ईमान को मौसम ज़रा मिलने लगे
- मनीष
बात को आगे बढ़ाने के लिए धन्यवाद मनीष जी !
अच्छी कविता लगायी है आपने
tumahara chehra dekha. kavi katai nhi lagte. ek sikari lagte ho. harjeet ka ek ser pes hai -
ye hare paid hain, inko n jalo logon.
inke jalne se bahut roj dhuna hota hai.
naveen kumar naithani
sirsh bhai ye naveen ka comment hai, mera nhi
नवीन भाई का हर शब्द सर-माथे पर.....
और विजय भाई को इन्हें मुझ तक पहुंचाने का आभार भी पहुंचे !
सुन्दर।
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