Thursday, March 6, 2008

शिरीष कुमार मौर्य

टीन की चादर

यह कुछ ठोंकने की आवाज़ है

और यह कुछ पीटने की

एक भारी-भरकम हथौडे के नीचे

पट पटा रही है टीन की चादर

क्या बनेगा इसका ?

किसी दुकान का शटर

या फ़िर किसी गरीब घर की छत

शटर बना अगर इसका

तो यह एक बाज़ार के मुहाने को खोलने और बंद करने के

काम आएगी

निगल जायेगी

बाज़ार के बाहर के सभी सपने

और अगर कहीं

किसी छोटे-से घर की छत बन पाई यह

तो आएँगी गर्मियों में

ताप से चिटकने की आवाजें इससे

बरसात में

बूंदों का संगीत झरेगा

और एक धीमी - धीमी टुकटुकाहट के साथ

दाना चुगेगा

गौरैयों का झुंड जाड़ों में इस पर

तो बोलो -

"अब तुम ही बोलो मेरी ठनठनाती टीन की चादर

बाज़ार जाओगी की घर ?"

ये कविता भी कोई दस साल पुरानी है ........

4 comments:

sidheshwer said...

शिरीष की कविता
अच्छी कविता
झूठ नहीं सचमुच अच्छी कविता

जोशिम said...

बहुत बढ़िया [ दस साल !!!!!!] - मनीष

Pramod Singh said...

बढ़ि‍या.. पुरानी और मजबूत..

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

hain g...bahut badhiya hainge g...