Tuesday, October 16, 2007

शिरीष कुमार मौर्य


जीवन-राग
2003-04
अनोखी सहजता वाले उस हृदय के लिए जिसने ` संगतकार ´ लिखी।
यह कविताओं की एक विनम्र श्रंखला है। इसमें मैं तेरह दिनों तक रोज एक कविता आपके सम्मुख प्रस्तुत करूंगा।

आज का राग भीमपलासी
मल्लिकार्जुन मंसूर का गायन सुनकर

छत पर पड़ी हैं
न जाने कितनी चीजें
कपड़े
बडियां
पापड़
अचार
इन्हें धूप की ज़रूरत है
और मुझे इन सबको बचाना है
अपनी देह
और
आत्मा के साथ

बाहर से आती हैं न जाने कितनी आवाजें
कभी फेरीवाले की
तो कभी रद्दीवाले की
पसीने से भीगा एक आदमी पूछता है
किसी का पता
कभी-कभी आने वाला बूढ़ा भिखारी भी
आ धमकता है
आज ही

लेकिन
इस सबके बीच पता नहीं क्यों
मेरे भीतर एक गहरी उदासी है
रेडियो पर
विलिम्बत लय में गाती हुई
ये आवाज़
मानो बहुत दूर से आती है

उधर
हड़बड़ी में नंगे पा¡व
छत पर
बन्दर भगाने दौड़ी जाती है
मेरी पत्नी

इधर
अचानक पहचान जाता हूँ मैं
ये राग भीमपलासी है।

येहूदा आमिखाई

आंखों की उदासी और एक सफ़र की तफसील


एक अँधेरी याद है
जिस पर चीनी के बुरे की तरह बिखरा हुआ है
खेलते हुए बच्चों का शोर वहाँ

वहाँ वे चीज़ें हैं
जो दुबारा कभी नहीं बचायेंगी तुम्हें
और वहीँ
मकबरों से ज़्यादा मज़बूत वे दरवाजें हैं

वहाँ एक सुरीली धुन है
जैसी कि काहिरा के मादी में
उन चीजों के वादे के साथ जिन्हें इस वक़्त की खामोशी
नसों के भीतर ही
रोके रहने की कोशिश करती है

और वहाँ एक जगह है
जहाँ तुम दुबारा कभी नहीं लौट सकते
दिन के वक़्त
एक पेड छुपाता है इसे
रात के वक़्त
एक लैंप की रोशनी चमकाती है

मैं इससे ज़्यादा और कुछ भी नहीं कह सकता
मैं इससे ज़्यादा और कुछ भी नहीं जानता

भूलने और खुश होने के लिए
खुश होने और भूलने के लिए
इतना ही बहुत है

बाकी तो सब आंखों की उदासी है
और एक सफ़र की तफसील !

अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य
संवाद प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ' धरती जानती है ' में संकलित

Monday, October 15, 2007

अंकुर मिश्र


ये स्मृति है एक अंकुर की जिसे बड़ा पेड बनना था लेकिन अब उसके अंकुराने के कुछ प्रमाण ही शेष हैं। उसके नाम से मुझे, विशाल श्रीवास्तव, हरेप्रकाश उपाध्याय और उमाकांत चौधरी को मिले सम्मान ने हम सभी को युवा कविता में एक मुकाम तक पहुंचाया है। सोचता हूँ काश ये सम्मान न होता, अंकुर खुद होता ...... बहरहाल उसकी ये दो कवितायेँ और एक पेटिंग........

( जन्म 13 जुलाई 1980 - देहान्त 26 अगस्त 2001)

जनम

ईंटों की चट्टानें और उनमें से झांकती खौफनाक खिड़कियाँ
रोज़मर्रा की दहशत
रंडियों की खुली टांगें जो चाहें तो पैदा कर दें धरती, पाताल और
उससे आगे भी

मगर पेड़ों की दरारों में से अब सिर्फ
मकड़े निकल रहे हैं
सूखे पत्तों की नसों को चूस लिया है
दीमकों ने

बारिश, गर्जना, बिजलियां कौंधती
फूलों पर तितलियां

और अंत
और अंत
और मृत्यु

मुझे जन्मना है !


I Don't Want My Paradise Lost

Nobody calls out to me.
I roam around in the wilderness
of patterns on my bed-sheet.
Someone please call out to me
Iam desperate to be born,
and reborn,
and die and re-die
and
be reborn.
I have metamorphosed into
a wheel with many steel rims.
There has to be a speed-breaker.
Someone, there must be someone,
stretch your hand to me.
Call out, for god's sake.
Iwill grasp your hand and take you on a journey
through the stars.
Show me Aladdin's chirag,
show me the flying carpet,
show me the dancing daffodils,
show me the rabbit hole.
I will dig into it,
I will keep digging until I find
Paradise
I don't want my paradise lost

प्रस्तुति - शिरीष कुमार मौर्य

हंस मानूस इंजेंत्सबरजर


खुशी


वह नहीं चाहती
कि मैं उसके बारे में कुछ बोलूं
उसे कागज पर नहीं उतारा जा सकेगा
और न ही
उसके बारे में कोई भविष्यवाणी ही की जा सकती है

वह इस सबसे अधिक कुछ है
लेकिन
मैं उसे जानता हूं
बहुत अच्छी तरह

चाहे स्थिर हो या गतिमान
वह
हर चीज को हिलाकर रख देगी

वह झूठ नहीं बोलेगी
कोहराम मचा देगी

उस अकेली से मैं अपने होने का
मतलब पाता हूं
वह मेरा तर्क है
हालांकि
मुझसे बाबस्ता नहीं है वह

वह अजीब और अडियल है
मैं उसे आसरा देता हूं और छुपाता हूं
किसी कलंक की तरह

वह भगोड़ी है
न तो दूसरों के साथ बांटने के लिए है
और न ही
खुद के पास रखने के लिए

मुझे उससे कुछ नहीं मिला
जो कुछ मेरे पास था
मैंने उसके साथ बांट लिया
लेकिन
वह मुझे छोड़ जायेगी

तब दूसरे आसरा देंगे उसे
विजय की ओर उसकी लम्बी उड़ान में
और अपनी रातों में
छुपायेंगे उसे

विक्रय मशीन

वह उसके छेद में
चार सिक्के डालता है
और अपने लिए
कुछ सिगरेट हासिल कर लेता है

वह हासिल कर लेता है
कैंसर
रंग-भेद
यूनान का राज्य
सत्ताकर
राज्यकर
व्यापारकर वगैरह
और अतिरिक्त मूल्य
मुक्त उद्यम और सकारात्मक विचारधारा

वह हासिल कर लेता है
एक बड़ी-सी लिफ्ट
बड़ा-सा व्यापार
और मनचीती लड़कियां
महान समाज
बड़े-बड़े धमाके
उल्टियाँ हर चीज बड़ी......और बड़ी........और बड़ी

वह हासिल कर लेता है
ज्यादा से ज्यादा
अपने चार सिक्कों के बदले
लेकिन पलभर के लिए
उसकी हासिल की हुई हर चीज
गायब हो जाती है
यहां तक कि सिगरेट भी

वह विक्रय मशीन की ओर देखता है
लेकिन उसे देख नही पाता
तब वह खुद को देखता है और उस एक पल के लिए
वह बिल्कुल
आदमी की तरह लगता है
और फिर जल्द ही
एक चुटकी में
वह पहले-सा हो जाता है!
ये रहीं उसकी सिगरेट

वह गायब हो चुका है- जो एक तेज़ी से बीतता हुआ पल था
-अचानक मिला एक सुख

अब वह गायब हो चुका है
चला गया है
दफन हो गया है उस कबाड़ के नीचे
जो उसे
महज चार सिक्कों के बदले मिला है!

समझदारों का गीत

अब जरूर कुछ किया जाना चाहिए
इतना हम जानते हैं
लेकिन यह बहुत जल्दी है कुछ करने को

लेकिन
अब बहुत देर हो गयी है
काफी कुछ बीत गया है दिन
ओह!
हम जानते हैं

हम जानते हैं
कि हम बहुत अच्छे हैं
और यह भी कि आगे और भी अच्छे होते जायेंगे
लेकिन यह किसी काम का नहीं
हम जानते हैं

हम जानते हैं कि हमें कोसा जायेगा
और अगर ऐसा होता है तो यह हमारी गलती नहीं है
और हम इससे पल्ला झाड़ लेंगे

हो सकता है
कि हमारे लिए अपना मुंह बंद रखना ही अच्छा हो
और यह भी कि हम इस तरह
अपना मुंह बन्द नहीं रख पायेंगे
हम जानते हैं
ओह!
हम जानते हैं

और हम यह भी जानते हैं
कि हम वास्तव में किसी की मदद नहीं कर सकते
और न ही कोई कर सकता है हमारी

और हम जानते हैं
कि हम बहुत प्रतिभावान और बुिद्धमान हैं
और `न होने` और `बेकार होने` में से कोई एक चीज़
चुनने के लिए आजाद हैं

हम जानते हैं
कि हमें इस समस्या का विश्लेषण
बहुत सावधानी से करना है
और यह भी कि हम अपनी चाय में
दो चम्मच चीनी लेते हैं
ओह!
यह सब हम जानते हैं

दमन और उत्पीड़न के बारे में भी
हम सब कुछ जानते हैं
और हम इसके सख्त खिलाफ भी हैं
और यह भी कि सिगरेट फिर गायब हो चुकी है
बाजार से

हम अच्छी तरह जानते हैं
कि देश वाकई दिक्कतों से गुज़र रहा है
और यह कि हमारे अनुमान अकसर बिल्कुल सही उतरते हैं
और यह भी
कि वे किसी काम के नहीं
और यह
कि ये सिर्फ एक बातचीत भर है
ओह!
हम जानते हैं

यह कोई ठीक बात नहीं है
कि चीजों को गिरता हुआ छोड़ दिया जाये
और हम जानते हैं
कि हम उन्हें गिरता हुआ छोड़ने जा रहे हैं

ओह!
हम जानते हैं
कि इस सबमें कुछ भी नया नहीं है
और अद्भुत है जीवन
यह सब कुछ ऐसा ही है
हम इस सबके बारे में
अच्छी तरह जानते है और उस सबके बारे में भी

हम यह भी जानते हैं और वह भी

ओह हम तो सब कुछ जानते हैं!


अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य

Sunday, October 14, 2007

शिरीष कुमार मौर्य


जीवन-राग
2003-04
अनोखी सहजता वाले उस हृदय के लिए जिसने ` संगतकार ´ लिखी
यह कविताओं की एक विनम्र श्रंखला है। इसमें मैं तेरह दिनों तक रोज एक राग-एक कविता आपके सम्मुख प्रस्तुत करूंगा। कल मैंने मालकौंस पोस्ट किया था।






आज
का राग - शुद्ध कल्याण

भीमसेन जोशी का गायन सुनकर

ये घर लौटने का समय है
और हर कोई
लौट रहा है
कहीं न कहीं से

धीरे-धीरे लौट रही है रात
दिनभर की थकान का हिसाब मांगती

आकाश में लौट रही है
एक अजीब-सी टिमटिमाहट
तारों की

परिन्दे
पेड़ों पर लौट रहे हैं
दिनभर धूप सेंकने के बाद
पानी में लौट रही हैं
मछुवारों की नावें

दिनपाली के मजदूर लौट रहे हैं
लौट रहा है
बेसब्री से उनकी बाट जोहते परिवारों का
उत्साह

उधर बनिये के चेहरे की चमक भी
लौट रही है
दुकान के बल्ब की थोड़ी-सी चपल रोशनी में

बच्चों में लौट रही है भूख
हालाकि हर परिवार में उसका स्वागत नहीं है
और नींद के लौटने में अभी थोड़ी देर है

दिल में कोहराम मचाती
लौट रही हैं
दिनभर की आवाजें

कहीं लोग लौट रहे हैं तो कहीं उनकी यादें
यह बताती हुई
कि इतना आसान नहीं होता लौट पाना
हर बार

लेकिन
ये सिर्फ क्रिया नहीं एक राग भी है

दुखभरा हो कि सुखभरा
इसे गाया जाता रहेगा
हमेशा
हर कहीं
हर जगह।

कू सेंग












अब बच्चा


अब बच्चा
कुछ देख रहा है
कुछ सुन रहा है

कुछ सोच रहा है

क्या वह देख रहा है
उस तरह की चीज़ों को जैसी देखी थीं मोहम्मद ने
एक पहाड़ी गुफा में
खुदा के इलहाम के बाद?

क्या वह सुन रहा है
उन आवाज़ों को
जिन्हें नाज़रेथ के जीसस ने
अपने सिर के ऊपर बजते सुना था

जब उसका बपतिस्मा हुआ था
जार्डन के किनारे?

क्या वह खोया है
विचारों में
जैसे शाक्यमुनि खोये थे बोधिवृक्ष के नीचे?

नहीं!
बच्चा इसमें से कुछ भी नहीं
देख

सुन
और सोच रहा है

यह तो देख

सुन
और सोच रहा है
ऐसा कुछ जिसे कोई दूसरा देख

सुन
और सोच नहीं सकता

कुछ ऐसा
कि मानो एक शांत ओर अनोखा आदमी होने के नाते
ये अकेला ही ले आएगा
बहार
इस दुनिया में
सिर्फ अपने ही दम पर

तभी तो
यह मुस्करा रहा है

एक प्यारी-सी मुस्कान !

अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य
पुनश्च द्वारा प्रकाशित काव्यपुस्तिका से

Saturday, October 13, 2007

शिरीष कुमार मौर्य

जीवन-राग
2003-०४
अनोखी सहजता वाले उस हृदय के लिए जिसने ` संगतकार ´ लिखी
यह कविताओं की एक विनम्र श्रंखला है। इसमें मैं तेरह दिनों तक रोज एक कविता आपके सम्मुख प्रस्तुत करूंगा।

आज का राग - मालकौंस
कुमार गंधर्व का गायन सुनकर

बहुत हौले
बहुत चुपके आराम से गुजरती रात
बिना कोई चोट पहुंचाए
बिना किसी दर्द के
बिना समझ में आए मगर ये मुमकिन न था

बहुत मुमकिन था
कि मुझे खोज लेती नींद
मगर मैं खोज पाता उसे बिना खुद को सपनों में भटकाए
ये मुमकिन न था



बहुत गाढ़ा था अन्धेरा
आंखों की समझ से लगभग बाहर
आवाज थी एक रोशनी
दूर से आती
दूर तक जाती
टिमटिमाती कभी जलती धधक कर
कभी धीमी पड़ जाती

मानो सपने में होता था सभी कुछ
देह में
भीतर तक खिलते थे
इच्छाओं के फूल
इधर-उधर टटोलते कामना भरे हाथों को मिलते थे
अपने जैसे दूसरे हाथ

आधी रात की ताजी भुरभुरी मिट्टी में
खुलते-खुलते रह जाती थी
बरसों से ख़ामोश खड़े
पेड़ों की आंख



धरती तक पहुंचने में चुक गया तारों का उजास
और स्मृतियों का दिल तक पहुंचने में
दिमाग में लेकिन अकेला भटकता था एक खयाल

अभी दूर थी सुबह
लेकिन मुमकिन था सोच पाना उसके बारे में

गर्म और गंधभरे घोंसलों में
ये परिन्दों का
पहली करवट बदलने का समय था



बहुत सारी चीजें थीं
जो अन्धेरे में भी छुप नहीं पाती थीं

छुप नहीं पाता था पानी
जहाँ भी हो
तमाम नदियों और समुद्रों के बीच
उसकी आवाज आती थी

छुप नहीं पाती थी हवा
हर कहीं
एक शरीर से दूसरे शरीर
एक सांस से दूसरी सांस के बीच
उसकी आवाज आती थी

छुप नहीं पाते थे दुख
हर जगह
हताश दिलो और दिमागों के बीच
उनकी आवाज आती थी

छुप नहीं पाती थी रोशनी
हर समय
दूसरी तमाम आवाजों के बीच
उसकी आवाज आती थी


शिरीष कुमार मौर्य

शरदस्य प्रथम दिवसे
रानीखेत के लिए

बहुत दूर कुछ शिखर दिखते थे
कमरे की
खिड़की से बाहर
उनसे बहुत पहले एक तिरछी घाटी
उससे पहले कुछ मकान
बिजली के कुछ तार
जाते हुए यहाँ से वहाँ
आपस में उलझी कपड़े टांगने की रस्सियां
कुछ लोग
आपस में बतियाते हुए
और उनसे भी पहले
बाहर देखते ही
दिख जाती थीं सलाखें
उस खिड़की की जिसे मैं सुबह सबसे पहले खोलता था
बन्द करता था रात
सबसे बाद।

मुझे कोई संवाद नहीं दिया गया था
मुझे हिलना भी नहीं था अपनी जगह से
दरअसल मुझे कुछ भी नहीं करना था
उस खूबसूरत दृश्य में
जो सिर्फ मेरी तरफ से दिखता था।

मैं कई दिनों से
कहीं जाने के बारे में सोच रहा था
पर मेरे पांव हिलते न थे

मैं कई दिनों से
कुछ चीजों की तरतीब देने के बारे में सोच रहा था
पर मेरे हाथ उठते न थे

मैं कई दिनों से
कुछ बोलने के बारे में सोच रहा था
बल्कि मैं तो बोल भी रहा था पर मेरे शब्दों में
आवाज न थी।

मैं बहुत साहसी होना चाहता था
और बहुत धीर भी

मैं उदार भी होना चाहता था
और बहुत गम्भीर भी

मैं ज्यादा होना चाहता था
और कम भी

मैं ``मैं´´ भी होना चाहता था
और ``हम´´ भी।

शायद ऐसे ही खत्म हो जाता है सफर
हर बार

बहुत घने
भाप भरे जंगल पुकारते हैं हमें
पेड़ों के तने
बहुत चिकने कुछ खुरदुरे भी
पतझर में साथ छोड़ जाने वाली
चतुर-चपल पत्तियां
लम्बी लचीली डगालें

मिट्टी की बहुत पतली चादर तले
रह-रहकर
करवट बदलती है जिन्दगी

अन्त मे
ऐसी ही किसी जगह हमें लाता है प्रेम

हम जहां से कहीं नहीं जाते
वहां से कोई नहीं आता
हमारे पास।

Thursday, October 11, 2007

टामस ट्रांसट्रोमर


1950 के बाद से टामस ट्रांसट्रोमर लगातार स्वीडिश कविता का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा बने हुए हैं। आधुनिक स्वीडिश कविता का कोई भी जिक्र उनके बिना अधूरा होगा। नोबेल के इस देश में उनका नाम पिछले पांच दशकों से अधिक समय से न सिर्फ कवि-अनुवादक, बल्कि एक मनोविज्ञानी के रूप में भी एक स्थापित और चर्चित नाम है।


शंघाई की सड़कें

एक

पार्क में
कई लोग ध्यान से देख रहे हैं
सफेद तितलियों को
मुझे वह तितली बहुत पसन्द है
जो खुद ही जैसे सत्य का फड़फड़ाता हुआ
कोना है कोई

सूरज के उगते ही
दौड़ती-भागती भीड़ हमारे इस खामोश ग्रह को
गतिमान बना देती है
और तब पार्क भर जाता है
लोगों से

हर आदमी के पास आठ-आठ चेहरे होते हैं
नगों-से चमचमाते
गलतियों से बचने के वास्ते
हर आदमी पास एक अदृश्य चेहरा भी होता है
जो जताता है -
` कुछ है जिसके बारे में आपबात नहीं करते!`

कुछ जो थकान के क्षणों में प्रकट होता है
और इतना तीखा है
जैसे किसी जानदार शराब का एक घूंट
उसके बाद में महसूस होने वाले
स्वाद की तरह

तालाब में हमेशा हिलती-डुलती रहती हैं मछलियां
सोते में भी तैरती वे
आस्थावान होने के लिए एक मिसाल हैं -हमेशा गतिवान


दो

अब यह दोपहर है
सलेटी समुद्री हवा धुलते हुए कपड़ों-सी
फड़फड़ाती है
उन साइकिल सवारों के ऊपर
जो चले आते हैं
एक दूसरे से चिपके हुए
एक समूह में
किनारे की खाइयों से बेखबर

मैं घिरा हुआ हूं किताबी चरित्रों से
लेकिन
उन्हें अभिव्यक्त नहीं कर सकता
निरा अनपढ़ हूं मैं

और
जैसी कि उम्मीद की गई मुझसे
मैंने कीमतें चुकाई हैं
और मेरे पास हर चीज की रसीद है
जमा हो चुकी हैं
पढ़ी न जा सकने वाली ऐसी कई रसीदें
-अब मैं एक पुराना पेड़ हूं इन्हीं मुरझाई पत्तियों वाला
जो बस लटकती रहती हैं
मेरे शरीर से
धरती पर गिर नहीं पातीं

समुद्री हवाओं के तेज झोंके
इनमें सीटिया बजाते हैं।


तीन

सूरज के डूबते ही
दौड़ती-भागती भीड़ हमारे इस खामोश ग्रह को
गतिमान बना देती है

हम सब
सड़क के इस मंच पर खड़े हुए
कलाकार हैं जैसे

यह भरी हुई है लोगों से
किसी छोटी नाव के
डेक की तरह
हम कहां जा रहे हैं?
क्या वहां चाय के इतने कप हैं?
हम खुद को सौभाग्यशाली मान सकते हैं
कि हम समय पर पहुंच गए हैं
इस सड़क पर

क्लास्ट्रोफोबिया की पैदाइश को तो अभी
हजार साल बाकी है !

यहां
हर चलते हुए आदमी के पीछे
एक सलीब मंडराती है
जो हमें पकड़ना चाहती है
हमारे बीच से गुज़रना
हमारे साथ आना चाहती है

कोई बदनीयत चीज़
जो हमारे पीछे से हम पर झपटना
और कहना चाहती है -बूझो तो कौन?

हम लोग
ज्यादातर खुश ही दिखाई देते हैं
बाहर की धूप में
जबकि हम अपने घावों से रिसते खून के कारण
मर जाने वाले हैं

हम इस बारे में
कुछ भी नहीं जानते!

अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य

शिरीष कुमार मौर्य

गैंगमेट वीरबहादुर थापा

बहुत
शानदार है यह नाम
और
थोड़ा अजीब भी
एक ही साथ जिसमें वीर भी है
और बहादुर भी

यहां से आगे तक २२.४ किलोमीटर सड़क
जिन मजदूरों ने बनायी
उनका उत्साही गैंग लीडर रहा होगा ये या कोई उम्रदराज मुखिया
लो.नि.वि. की भाषा
बस इतनी ही समझ आती है मुझे


दूर नेपाल के किन्हीं गांवों से आए मजदूर
उन गांवों से
जहां आज भी मीलों दूर हैं सड़कें
यों वे बनायी जाती रहेंगी हमेशा
लिखे जाते रहेगे कहीं-कहीं पर उन्हें बनाने के बाद
ग़ायब हो जाने वाले
कुछ नाम

१९८४ में कच्ची सड़क पर डामर बिछाने आए वे बांकुरे
अब न जाने कहां गए
पर आज तलक धुंधलाया नहीं उनके अगुआ का
ये नाम

बिना यह जाने
कि किसके लिए और क्यों बनायी जाती हैं
सड़कें
वे बनाते रहेंगे उन्हें
बिना उन पर चले
बिना कुछ कहे

उन सरल हृदय अनपढ़-असभ्यों को नहीं
हमारी सभ्यता को होगी
सड़क की ज़रूरत
बर्बरता की तरफ़ जाने के लिए

और बर्बरों को भी

सभ्यताओं तक आने के लिए


गिद्ध

किसी के भी प्रति उनमें कोई दुर्भावना नहीं थी
वे हत्यारे भी नहीं थे
हालांकि बहुत मजबूत और नुकीली थी उनकी चोंच
पंजे बहुत गठीले ताकतवर
और मीटर भर तक फैले उनके डैने

वे बहुत ऊंची और शान्त उड़ानें भरते थे
धरती पर मंडराती रहती थी उनकी
अपमार्जक छाया

दुनिया भर के दरिन्दों-परिन्दों में उनकी छवि

सबसे घिनौनी थी

किसी को भी डरा सकते थे उनके झुर्रीदार चेहरे
वे रक्त सूंघ सकते थे
नोच सकते थे कितनी ही मोटी खाल
मांस ही नहीं
हडि्डयां तक तोड़कर वे निगल जाते थे

लेकिन
वे कभी बस्तियों में नहीं घुसते थे
नहीं चुराते थे छत पर और आंगन में पड़ी
खाने की चीजें
वे पालतू जानवरों और बच्चों पर कभी नहीं झपटते थे
फिर भी हमारे बड़े
हमें उनके नाम से डराते थे
बचपन की रातों में अपने विशाल डैने फैलाये
वे हमारे सपनों में आते थे

बहुत कम समझा गया उन्हें इस दुनिया में
ठुकराया गया सबसे ज्यादा
जिन्दगी का रोना रोते लोगों के बीच
वे चुपचाप अपना काम करते रहे
धीरे-धीरे सिमटती रही उनकी छाया
बिना किसी को मारे
बिना किसी दुर्भावना के
मृत्यु को भी उत्सव में बदल देने वाली उनकी
वह सहज उपस्थिति
धीरे-धीरे
दुर्लभ होती गयी

हालांकि

उनके बिना भी बढ़ता ही जायेगा जिन्दगी का ये कारवां
लेकिन उसके साथ ही
असहनीय हाती जायेगी
मृत्यु की सड़ांध

हमारी दुनिया से

यह किसी परिन्दे का नहीं
एक साफ-सुथरे भविष्य का
विदा हो जाना है।

ये दोनो कविताएं हंस के 2005 अप्रैल अंक में छप चुकी हैं।

ईरानी कविता - फरूग फरूखजाद

ईश्वर से मुखामुखी

मेरी चमकती आंखों से दूसरी पर भाग जाने कि आतुरता
छीन कर
उन्हें सिखालाओ पर्दा करना
उन चमकीली आंखों से

हे ईश्वर
हे ईश्वर अपनी सूरत दिखलाओ
और बीन लो मेरे ह्रदय से स्वार्थ और पाप के ये कण

मत करो बर्दाश्त एक तुच्छ बांदी का विद्रोह
और दूसरे मे शरण की याचना

सुन लो मेरी गुहार
ओ समर्थ बिरले देवता !

मूल से अनुवाद : राजुला साह
तनाव अंक ९८ से साभार
टीप : अगर इस कविता के शीर्षक का अनुवाद ईश्वर से मुंहजोरी हो तो कैसा लगे ?
अनुनाद

Wednesday, October 10, 2007

शिरीष कुमार मौर्य

रानीखेत से हिमालय
बेटे से कुछ बात

वे जो दिखते हैं शिखर
नंदघंटा-पंचाचूली-नंदादेवी-त्रिशूल वगैरह
उन पर धूल राख और पानी नहीं
सिर्फ बर्फ गिरती है

अपनी गरिमा में निश्छल सोये-से
वे बहुत बड़े और शांत
दिखते हैं

हमेशा ही बर्फ नहीं गिरती थी
उन पर
एक समय था जब वे थे ही नहीं

जबकि
बहुत कठिन है उनके न होने की कल्पना
अक्षांशों और देशांतरों से भरी
इस दुनिया में

कभी वहां
समुद्र था नमक और मछलियों और एक छूंछे उत्साह से भरा
वहां समुद्र था
और बहुत दूर थी धरती
पक्षी जाते थे कुछ साहसी इस ओर से उस ओर
अपना प्रजनन-चक्र चलाने
समुद्र उन्हें रोक नहीं पाता

फिर एक दौर आया

जब दोनों तरफ की धरती ने
आपस में मिलने का फैसला किया
समुद्र इस फैसले के खिलाफ था
वह उबलने लगा
उसके भीतर कुछ ज्वालामुखी फूटे
उसने पूरा प्रतिरोध किया
धरती पर दूर-दूर तक जा पहुंचा लावा
लेकिन

यह धरती का फैसला था
इस पृथ्वी पर दो-तिहाई होकर भी रोक नहीं सकता था
जिसे समुद्र
आखिर वह भी तो एक छुपी हुई धरती पर था

धरती में भी छुपी हुई कई परतें थीं
प्रेम करते हुए हृदय की तरह
वे हिलने लगीं
दूसरी तरफ़ की धरती की परतों से
भीतर-भीतर मिलने लगीं
उनके हृदय मिलकर बहुत ऊचे उठे
इस तरह हमारे ये विशाल और अनूठे
पहाड़ बने

यह सिर्फ भूगोल या भूगर्भ-विज्ञान है
या कुछ और ?

जब धरती अलग होने का फैसला करती है
तो खाइयां बनती हैं
और जब मिलने का तब बनते हैं पहाड़

बिना किसी से मिले
यों ही इतना ऊचा नहीं उठ सकता कोई
जब ये बने

इन पर भी राख गिरी ज्वालामुखियों की
छाये रहे धूल के बादल
सैकड़ों बरस

फिर गिरा पानी
एक लगातार अनथक बरसात
एक प्रागैतिहासिक धीरज के साथ
ये ठंडे हुए

आज जो चमकते दीखते हैं
उन्होंने भी भोगे हैं
प्रतिशोध
भीतर-भीतर खौले हैं
बर्फ सा जमा हुआ उन पर
युगों का अवसाद है

पक्षी अब भी जाते हैं यहां से वहां
फर्क सिर्फ इतना है
पहले अछोर समुद्र था बीच में
अब

रोककर सहारा देते
पहाड़ हैं!

ये वागर्थ में छप चुकी एक पुरानी कविता है - 2005 की।