Thursday, October 11, 2007

ईरानी कविता - फरूग फरूखजाद

ईश्वर से मुखामुखी

मेरी चमकती आंखों से दूसरी पर भाग जाने कि आतुरता
छीन कर
उन्हें सिखालाओ पर्दा करना
उन चमकीली आंखों से

हे ईश्वर
हे ईश्वर अपनी सूरत दिखलाओ
और बीन लो मेरे ह्रदय से स्वार्थ और पाप के ये कण

मत करो बर्दाश्त एक तुच्छ बांदी का विद्रोह
और दूसरे मे शरण की याचना

सुन लो मेरी गुहार
ओ समर्थ बिरले देवता !

मूल से अनुवाद : राजुला साह
तनाव अंक ९८ से साभार
टीप : अगर इस कविता के शीर्षक का अनुवाद ईश्वर से मुंहजोरी हो तो कैसा लगे ?
अनुनाद

3 comments:

Ashok Pande said...

अच्छी कविता है। अनुवाद भी उम्दा है। तेरा काम भी ठीक चल रिया दिख्खे हिरिया 'हरकसिंह' । ठीक ही ना भौत बड़िया।

[ आशुतोष ] said...

क्या ही अच्छा होता, तुम्हारे ब्लॉग में खिलने वाली सुंदर कविताएं तुम्हारी आवाज में सामने आतीं। मैंने प्रयोग के बतौर इस बात को जांचा है कि कविता से चार हाथ दूर रहने वाले लोग भी पूरे भाव के साथ सुनाए जाने पर इसका आनंद लेने लगते हैं। दरअसल उन्हें यह पता ही नहीं होता कि मुक्त छंद में लिखी जाने वाली कविता भी भावपूर्व और दिल को छू लेने वाली चीज है। कविता को पॉडकास्ट करना मुश्किल नहीं है। अपने कंप्यूटर पर 40 रुपए का एक अदद माइक्रोफोन लगा कर आसानी से कविता की एमपी-3 फाइल बनाई जा सकती है। बाकी तकनीकी बारीकियां पॉडकािस्टंग के गुरु महाकबाड़ी इरफान से सीखी जा सकती हैं। कविता के प्रचार-प्रसार के लिहाज से ब्लॉग में गजब की संभावनाएं हैं और अगर यह सुनाई जा सके तो समझो सोने में सुहागा।

ANUNAAD said...

आपने हमेशा ही राह दिखाई - आशुतोष भाई !
मैं कोशिश करता ह¡ू कुछ करने की। रिकार्ड करने तक तो कर ही सकता हूं फिर आपकी और इरफान भाई की शरण में आऊंगा।