स्मृतियां मुझ पर निगाह रखती हैं
जून की एक सुबह
यह बहुत जल्दी है जागने के लिए और दुबारा सो जाने के
बहुत देर हो चुकी है
मुझे जाना ही होगा
हरियाली के बीच जो पूरी तरह भरी हुई है स्मृतियों से
स्मृतियां -
जो निगाहों से मेरा पीछा करती हैं
वे दिखाई नहीं
घुलमिल जाती हैं अपने पसमंज़र में
गिरगिट की तरह
वे मेरे इतने पास हैं
कि चिडियों की बहरा कर देनेवाली चहचहाहट के बावजूद
मैं सुन सकता हूं
उनकी सांसों की आवाज़।
अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य
Monday, October 8, 2007
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