Thursday, October 11, 2007

टामस ट्रांसट्रोमर


1950 के बाद से टामस ट्रांसट्रोमर लगातार स्वीडिश कविता का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा बने हुए हैं। आधुनिक स्वीडिश कविता का कोई भी जिक्र उनके बिना अधूरा होगा। नोबेल के इस देश में उनका नाम पिछले पांच दशकों से अधिक समय से न सिर्फ कवि-अनुवादक, बल्कि एक मनोविज्ञानी के रूप में भी एक स्थापित और चर्चित नाम है।


शंघाई की सड़कें

एक

पार्क में
कई लोग ध्यान से देख रहे हैं
सफेद तितलियों को
मुझे वह तितली बहुत पसन्द है
जो खुद ही जैसे सत्य का फड़फड़ाता हुआ
कोना है कोई

सूरज के उगते ही
दौड़ती-भागती भीड़ हमारे इस खामोश ग्रह को
गतिमान बना देती है
और तब पार्क भर जाता है
लोगों से

हर आदमी के पास आठ-आठ चेहरे होते हैं
नगों-से चमचमाते
गलतियों से बचने के वास्ते
हर आदमी पास एक अदृश्य चेहरा भी होता है
जो जताता है -
` कुछ है जिसके बारे में आपबात नहीं करते!`

कुछ जो थकान के क्षणों में प्रकट होता है
और इतना तीखा है
जैसे किसी जानदार शराब का एक घूंट
उसके बाद में महसूस होने वाले
स्वाद की तरह

तालाब में हमेशा हिलती-डुलती रहती हैं मछलियां
सोते में भी तैरती वे
आस्थावान होने के लिए एक मिसाल हैं -हमेशा गतिवान


दो

अब यह दोपहर है
सलेटी समुद्री हवा धुलते हुए कपड़ों-सी
फड़फड़ाती है
उन साइकिल सवारों के ऊपर
जो चले आते हैं
एक दूसरे से चिपके हुए
एक समूह में
किनारे की खाइयों से बेखबर

मैं घिरा हुआ हूं किताबी चरित्रों से
लेकिन
उन्हें अभिव्यक्त नहीं कर सकता
निरा अनपढ़ हूं मैं

और
जैसी कि उम्मीद की गई मुझसे
मैंने कीमतें चुकाई हैं
और मेरे पास हर चीज की रसीद है
जमा हो चुकी हैं
पढ़ी न जा सकने वाली ऐसी कई रसीदें
-अब मैं एक पुराना पेड़ हूं इन्हीं मुरझाई पत्तियों वाला
जो बस लटकती रहती हैं
मेरे शरीर से
धरती पर गिर नहीं पातीं

समुद्री हवाओं के तेज झोंके
इनमें सीटिया बजाते हैं।


तीन

सूरज के डूबते ही
दौड़ती-भागती भीड़ हमारे इस खामोश ग्रह को
गतिमान बना देती है

हम सब
सड़क के इस मंच पर खड़े हुए
कलाकार हैं जैसे

यह भरी हुई है लोगों से
किसी छोटी नाव के
डेक की तरह
हम कहां जा रहे हैं?
क्या वहां चाय के इतने कप हैं?
हम खुद को सौभाग्यशाली मान सकते हैं
कि हम समय पर पहुंच गए हैं
इस सड़क पर

क्लास्ट्रोफोबिया की पैदाइश को तो अभी
हजार साल बाकी है !

यहां
हर चलते हुए आदमी के पीछे
एक सलीब मंडराती है
जो हमें पकड़ना चाहती है
हमारे बीच से गुज़रना
हमारे साथ आना चाहती है

कोई बदनीयत चीज़
जो हमारे पीछे से हम पर झपटना
और कहना चाहती है -बूझो तो कौन?

हम लोग
ज्यादातर खुश ही दिखाई देते हैं
बाहर की धूप में
जबकि हम अपने घावों से रिसते खून के कारण
मर जाने वाले हैं

हम इस बारे में
कुछ भी नहीं जानते!

अनुवाद - शिरीष कुमार मौर्य

4 comments:

[ आशुतोष ] said...

टिप्पणी कविता पर नहीं है। बल्कि मैं तुम्हारी तरफ कुछ चारा फेंक रहा हूं। अपने बारे में तुमने लिखा है कि शास्त्रीय संगीत सुनने में दिलचस्पी रखते हो। मेरे पास इनकी एमपी-3 का बड़ा भारी खजाना है! क्या खयाल है!!

बोधिसत्व said...

भाई आपको लगातार पढ़ रहा हूँ...और मजे की बात है कि बीच में कोई संपादक प्रकाशक और पत्रिका नहीं है......

ANUNAAD said...

मुझ जैसा मछला ऐसे चारे में तुरन्त फंसता है। आशुतोष दद्दा बताओ ये एम0पी03 कैसे मिलेंगी मुझे?

ANUNAAD said...

बोधि भाई ब्लाग शायद यही सबसे बड़ा मजा है ! आप तो लम्बे समय से ये मजा ले रहे हो।
यहां हम खुद ही सम्पादक और प्रकाशक हैं ! या ऐसा कहें कि हमें इनकी जरूरत ही नहीं है।
आपको सलाम !
कुछ दिन पहले अशोक के साथ उन दिनों को याद कर रहा था जब आपको और मुझे सुधीर भाई ने मिलवाया था और हम बहुत देर तक साथ घूमा किए थे। अब तो ये बात हुई प्राचीन !