Sunday, October 14, 2007

शिरीष कुमार मौर्य


जीवन-राग
2003-04
अनोखी सहजता वाले उस हृदय के लिए जिसने ` संगतकार ´ लिखी
यह कविताओं की एक विनम्र श्रंखला है। इसमें मैं तेरह दिनों तक रोज एक राग-एक कविता आपके सम्मुख प्रस्तुत करूंगा। कल मैंने मालकौंस पोस्ट किया था।






आज
का राग - शुद्ध कल्याण

भीमसेन जोशी का गायन सुनकर

ये घर लौटने का समय है
और हर कोई
लौट रहा है
कहीं न कहीं से

धीरे-धीरे लौट रही है रात
दिनभर की थकान का हिसाब मांगती

आकाश में लौट रही है
एक अजीब-सी टिमटिमाहट
तारों की

परिन्दे
पेड़ों पर लौट रहे हैं
दिनभर धूप सेंकने के बाद
पानी में लौट रही हैं
मछुवारों की नावें

दिनपाली के मजदूर लौट रहे हैं
लौट रहा है
बेसब्री से उनकी बाट जोहते परिवारों का
उत्साह

उधर बनिये के चेहरे की चमक भी
लौट रही है
दुकान के बल्ब की थोड़ी-सी चपल रोशनी में

बच्चों में लौट रही है भूख
हालाकि हर परिवार में उसका स्वागत नहीं है
और नींद के लौटने में अभी थोड़ी देर है

दिल में कोहराम मचाती
लौट रही हैं
दिनभर की आवाजें

कहीं लोग लौट रहे हैं तो कहीं उनकी यादें
यह बताती हुई
कि इतना आसान नहीं होता लौट पाना
हर बार

लेकिन
ये सिर्फ क्रिया नहीं एक राग भी है

दुखभरा हो कि सुखभरा
इसे गाया जाता रहेगा
हमेशा
हर कहीं
हर जगह।

3 comments:

ragini said...

hi, i am 'RAGINI' and you are the poet who wrote those beautiful poems based on 'RAAGS'. You did a great job.

ANUNAAD said...

धन्यवाद रागिनी !

बोधिसत्व said...

जीवन का राग दुख भरा हो या सुख भरा गाना ही पडता है । वाह क्या बात है...मित्र