Wednesday, August 20, 2008

कमल - विमल कुमार

आज फिर विमल कुमार की एक विशिष्ट कविता, हमारे इस विशिष्ट लोकतंत्र में, उस विशिष्ट समय के लिए - जिसमें हम रहते हैं ! और, विमल जी, आप हैं कहां? ब्लाग की दुनिया में आते हैं तो कृपया संवाद कीजिए ! सोचिए तो कि नई पीढ़ी के कुछ कवि आपको, कुमार अम्बुज को और देवी भाई को क्यों इतना ख़ास पा रहे हैं!

कमल

देश में सब कुछ कमल के लिए हो रहा है
पहले तो लोग समझते रहे
यह एक अच्छी योजना है
क्योंकि कमल एक लड़के का नाम है जो अभी बेरोज़गार है
उसे नौकरी मिल जाएगी

फिर पता चला
कि कमल कोई लड़का नहीं है
देश में चारों तरफ कमल की ही चर्चा है
पहले तो लोग समझते रहे कमल एक सिनेमा टाकीज़ है
जिसकी दीवार अचानक गिर गई रात के शो में
और सैकड़ों लोग दबकर मर गए
फिर पता चला चला कि कमल नाम की कोई टाकीज़ नहीं

देश में आजकल सभी स्कूलों में
कमल के बारे में सवाल पूछे जा रहे हैं
पहले तो बच्चे समझते रहे कि कमल एक राष्ट्रीय फूल है
तालाब में कीचड़ में खिलता है
लेकिन बाद में पता चला कि कमल फूल का नाम भी नहीं है
तो फिर कमल क्या है?
जिसके लिए रात-दिन इतना प्रचार किया जा रहा है
कि जहां जहां झोपिड़यां थी शहर में
वहां कभी घास थी
और घास का ऐतिहासिक महत्व है
इसलिए सभी झोपिड़यों को तोड़कर
घास पैदा की जाएगी

मंहगाई के बोझ तले दबे लोगो
सावधान रहना
कमल एक विचार है
जो आज़ादी के बाद तेज़ी से फैल रहा है
पहले यह कभी दीपक था
जिसके तले अंधेरा जगजाहिर है !

Monday, August 18, 2008

सपने में एक औरत से बातचीत - विमल कुमार

विमल कुमार, मेरा अनुमान है कि कुमार अम्बुज और देवीप्रसाद मिश्र की पीढ़ी के कवि हैं। मैं उन्हें उनके संकलन `सपने में एक औरत से बातचीत´ से जानता हूं और पसंद भी करता हूं। यह भी सूच्य है कि इस पुस्तक का ब्लर्ब असद जैदी ने लिखा है। कुछ समय पहले जाना कि उन्होंने तो कोई `चोर-पुराण´ लिख डाला है। मैं इस कविता को यहां लगाकर उन्हें उनके काव्य-सामर्थ्य की याद कराना चाहता हूं - यानी कि `क्या चुपि साध रहा बलवाना!´


पहले दरवाजा खटखटाया उस औरत ने
सपने में

सपने में
कमरे में घुसते हुए बोली कैसे हैं मेरे बच्चे
अब तो हो गए होंगे काफी बड़े
शादी के लायक
स्कूल - कालेज जाते हैं कि नहीं?

मैं उस औरत से क्या कहूं
कैसे कहूं
कि उसकी मंझली लडत्रकी भाग गई ड्राइवर के साथ
कैसे कहूं
कि उनके नाम कट गए
और पिता ने गंवा दिए
जुए और शराब में तुम्हारे जेवरात

सपने में उस औरत को मैंने कहा
तुम बैठो तो सही
कैसी हो तुम कुछ सुनाओ
सपने में वह औरत बोली बैठना क्या?
थोड़ी देर के लिए आयी थी चलती हूं
तुम बेहद चुप हो
कुछ बताते नहीं?
तुम्हारी मेज पर कैसे हैं ये बिखरे हुए कागज
बक्से में क्या रखा है तुमने
कमरे में कुछ अजीब-सी गंध है
अच्छा तुम्हारी नौकरी का क्या हुआ
क्या कर रहे हो आजकल?

मैं उस औरत को क्या बताऊं
जो दस साल पैदल चलकर सपने में आयी आज
पहले वह पड़ोस में रहती थी
करती थी कुछ कामकाज
एक दिन अचानक उसके बच्चे रोने लगे दहाड़े मारकर
पति को काटो तो खून नहीं
मैं उस औरत को क्या कहूं
सपने में मैंने सोचा
सपने में ही कहा
अपना तो चलता ही रहता है कुछ न कुछ
चाय बनाता हूं थोड़ी देर ठहरो
फिर सपने में उस औरत ने पूछा
अच्छा बताओ शहर में क्या हो रहा है
तुम लोग कुछ करते वरते हो पहले की तरह या नहीं?
सपने में वह औरत बैठी रही बातें करती रही तरह-तरह की
सुनाती रही अपने अनुभव

वह सपने से जाने लगी उठकर
इसी बीच सपना खत्म हुआ
कि उसके बच्चे आए दौड़े दौड़े मेरे पास
मां का स्वास्थ्य कैसा है : मंझली ने पूछा
फूट-फूटकर रोने लगी छुटकी
कई दिनों से मां अब नहीं दिखती सपने में
बड़की यह कह गंभीर हो गई
ताड़-सी लम्बी और जवान बड़की की गंभीरता को देखकर
मैं सोचने लगा
अगली बार वह औरत फिर कभी आएगी सपने में
पूछेगी इस तरह के ढेर सवाल
तो मैं क्या कहूंगा
कौन-सा झूट चुनकर इस बार पहले रखना होगा
!

Saturday, August 16, 2008

किरीट मंदरियाल की कुछ और कविताएं

दोस्तो कल मैंने किरीट की तीन कविताएं लगायीं, जिन पर आप सबकी अच्छी प्रतिक्रिया भी मिली। आज उन्होंने तीन कविताएं और भेज दीं, जिनमें 15 अगस्त पर लिखी कविता भी है और वह मेरी कल की टिप्पणी पर आधारित है और एक उलाहने जैसी मुझी को समर्पित भी। यह तात्कालिक कवितानुमा संवाद मुझे तो अच्छा लगा, शायद आपको भी अच्छा लगे !

रात के सफ़र पर
(आदरणीय वीरेन डंगवाल जी के लिए)

मैं निकलूंगा
सपनों की तलछट लेकर
रात के सफ़र पर
टूटे इरादे हों कि टूटे सितारे
सब मेरे साथी होंगे

गुजरूंगा
यातनाओं के शिविर से
तो कराहूंगा नहीं
कराहने से नहीं टूटते
अंधेरे के तिलिस्म
जानता हूं मैं

हालांकि
बहुत मुश्किल है कहना कुछ भी अंधेरे के बारे में
फिर भी कहता हूं
कि जैसे मिट्टी के अंधेरे में पूरी करता है
अपनी यात्रा
एक नन्हा-सा बीज
मैं भी करूंगा

अंधेरे से गुजरने वाला
हर रास्ता
जाता है सुबह की ही तरफ
ऐसा यकीन है मेरा !


एक आत्मप्रशस्ति

फ़ौरन
खुल जाती है मेरी जुबान
जिस पर ताला लगाना
मुझे नहीं आता

खुश होता हूं तो अधिक
और गुस्सा उससे भी अधिक

लिखता हूं
हर रोज एक कविता आपत्तियों की
बांचता हूं उसे
और बनता हूं बुरा

सोचता हूं - मजबूत तने और गहरी जड़ों वाला
एक पेड़ हूं मैं
जो खिलाफ हवाओं में भी
अपने आप को
उखड़ने से रोक सकता है

और
भूल जाता हूं हमेशा
कि मेरे बहुत पास तक
आ पहुंचा है
दीमकों का काफिला !


उन्होंने कहा - 15 अगस्त 2008 की कविता
(शिरीष भाई साहब के लिए)

उन्होंने कहा
मुझमें उम्मीदें और स्वप्न ज्यादा हैं
और समय बेहद खराब और खतरनाक

बेहद खराब और खतरनाक समय में भी
देख सकता हूं स्वप्न
धर पाता हूं उम्मीद

यह तो बेशक कविता में दर्ज करने लायक बात है

उन्होंने कहा
और मैंने दर्ज कर लिया !

Friday, August 15, 2008

किरीट मंदरियाल की कविताएं

किरीट मेरे लिए व्यक्ति से ज़्यादा एक व्यक्तित्व हैं। उन्हें अपने अनुभव अभी प्राप्त करने हैं। वे अपने पहाड़ी गांव से नस-नाल आबद्ध हैं और बोलते-बतियाते उनके भीतर पहाड़ जैसे जी उठता है।
यहां उनकी कुछ कविताएं दी जा रही हैं, जो दरअसल उनके ठेठ भौगोलिक परिवेश से भिन्न कुछ भीतरी और निजी संघर्षों के छोटे-मोटे आख्यान-प्रत्याख्यान भर हैं। उनकी उम्र का नयापन या कहिए कि कच्चापन, आपको इनमें दिखेगा, जो मेरे हिसाब से इन कविताओं को एक भोला-भाला स्वर प्रदान करता है। हमारे सबसे ख़राब और ख़तरनाक समय में भी इन कविताओं में बसी उम्मीद भले बचकानी कही जाए पर लुभा भी बहुत रही है। बाक़ी आप बताइए !

इस महान सदी के आरम्भ में

इस
महान सदी के आरम्भ में
आम आदमी के लिए
शोकगीत लिखने वाले
कवियों से
मैं परिचित नहीं

मैं परिचित नहीं
अंत की घोषणा करने वाले
विद्वानों से
साहित्य के गढ़ और मठ कविता के
मेरी पहुंच से बाहर हैं

कम
बहुत ही कम और सीमित है
मेरा परिचय
और अपनी इस सीमा से बंधा मैं
खुश हूँ बहुत

खुश हूं
कि जहां रहता है आदमी
अपनी पूरी मुश्किलों और संघर्षों के साथ
मैं भी रहता हूं वहीं
और सुरक्षित है मेरी कविता भी
जीवन के उन्हीं
छोटे-बड़े दुखों और सुखों में
कहीं !

हम तुम मिलेंगे

हम-तुम मिलेंगे
इसी को शायद कहते हैं उम्मीद
सपना इसी को कहते हैं
इसी को शायद कहते हैं खुशी

तो एक उम्मीद को करने के लिए पूरा
साकार करने के लिए एक स्वप्न
पाने के लिए खुशी
हम-तुम मिलेंगे

मिलेंगे और देखेंगे तब
दुनिया
जो ज्यादा खूबसूरत होगी !



'क' से बनती है 'कोशिश'
और 'कामयाबी' भी
'क' न होता तो क्या कहलाती 'कविता' ?

क्या होता फिर प्रश्नों का
कैसे कहते फिर हम यह सब -
क्यों ?
कब ?
कैसे ?
क्या ?
कहां ?

Thursday, August 14, 2008

15 अगस्त की पूर्व संध्या पर एक "पाठान्तर" ...

ये फोटो डोंगरे जी के ब्लॉग "छिन्दवारा-छवि" से साभार

लगेंगे हर बरस मेले - विष्णु खरे

इंदिरा गांधी को मारने वाले शहीद हैं
1984 में सिखों को मारने वाले शहीद हैं

राजीव गांधी को मारने वाले शहीद हैं
तमिल टाइगरों को मारने वाले शहीद हैं
श्रीलंकाई सैनिकों को मारने वाले शहीद हैं

गांधी को मारने वाले शहीद हैं

यहूदियों और सोवियत रूसियों को मारने वाले जर्मन शहीद हैं

फ़लस्तीनियों को मारने वाले इस्त्राइली शहीद हैं
इस्त्राइलियों को मारने वाने फ़लस्तीनी शहीद हैं

अरबों को मारने वाले अमरीकी शहीद हैं
अमरीकियों को मारने वाले अरब शहीद हैं

विधर्मियों को मारने वाले हिंदू शहीद हैं
काफिरों को मारने वाले मोमिन शहीद हैं

दलितों को मारने वाले सवर्ण शहीद हैं
आदिवासियों को मारने वाले शहराती शहीद हैं

पाकिस्तानियों को मारने वाले हिंदुस्तानी शहीद हैं
हिंदुस्तानियों को मारने वाले पाकिस्तानी शहीद हैं

चीनियों को मारने वाले भारतीय शहीद हैं
भारतीयों को मारने वाले चीनी शहीद हैं

हिंदुस्तानियों को मारने वाले अंग्रेज शहीद हैं

कश्मीरियों को मारने वाले ग़ैरकश्मीरी शहीद हैं
ग़ैरकश्मीरियों को मारने वाले कश्मीरी शहीद हैं

हिंदीभाषी कामगारों को मारने वाले असमिया शहीद हैं

लोगों को मारने वाले पुलिसकर्मी शहीद हैं
पुलिसकर्मियों को मारने वाले लोग शहीद हैं

कालों को मारने वाले गोरे शहीद हैं
गोरों को मारने वाले काले शहीद हैं

शियों को मारने वाले सुन्नी शहीद हैं
सुन्नियो को मारने वाले शिया शहीद हैं

औरतों बच्चों को मारने वाले मर्द शहीद हैं

कम्यूनिस्टों को मारने वाले ग़ैरकम्यूनिस्ट शहीद हैं

सबको मारने वाले सभी शहीद हैं
सभी को मारने वाले सब शहीद हैं

Wednesday, August 13, 2008

दोस्तों के डेरे पर एक शाम - दो कवितायें

दोस्तों के डेरे पर एक शाम - एक

बहुत कुछ नहीं रहा जब बाक़ी
हमारे जीवन में
हमने टटोली अपनी आत्मा

जैसे आटे का ख़ाली कनस्तर
जैसे घी का सूना बरतन
जैसे पैंट की जेब में छुपा दिन का
आखिरी सिक्का

बहुत कुछ नहीं रहा जब बाक़ी
हमने खंगाला अपना अंतस

जैसे तालाब को खंगाले उसकी लहर
जैसे बादल को खंगाले उसकी गरज
हमने खंगाला खुद को

और फिर
रात और दिन के बीच छटपटाती
उस थोड़ी-सी
धुंधलाई रोशनी में
हमने पाया
कि बाक़ी था अभी
कनस्तर में थोड़ा-सा आटा
बरतन में छौंकने भर का घी

जे़ब में सिगरेट के लिए पैसा
अभी बाक़ी था

बाक़ी था जीवन।


दोस्तों के डेरे पर एक शाम - दो

बहुत कुछ टूटा हमारे भीतर
और बाहर भी

रिश्ते टूटे
रिश्तों के साथ टूटे दिल
दिलों के साथ देह

इच्छाओं की भीत टूटी
खुशियों का वितान

घर टूटे हमारे
घरों के साथ सपने
सपनों के साथ नींद

बहुत कुछ टूटा जीवन में
जागते हुए काटीं हमने अपनी सबसे काली रातें
पर बचे रहे

बचे रहे हम

जैसे आकाश में तारों के निशान
जैसे धरती में जल की तरलता
जैसे चट्टानों में जीवाश्मों के साक्ष्य

बचे रहे
इस दुनियावी उथल-पुथल में
हमेशा के लिए बस गई
हमारी उपस्थिति।
1999

Thursday, August 7, 2008

असद ज़ैदी की कविता - बहनें

ये असद जी की विख्यात कविता का अपने ढंग से किया गया एक बेतरतीब पाठ है। पता नहीं मैं क्या कर पाया हूं, लेकिन आप सुनिए ज़रूर !