Monday, February 8, 2010

गीत को बधाई दें !

हमारा प्रिय कवि गीत अब अपना पहला कविता संग्रह "आलाप में गिरह" लाया है, जिसका मुझे पिछले कुछ समय से बेहद इंतज़ार था। संग्रह तो अभी मुझे नहीं मिला है पर यहाँ हमारे पास उसका ख़ूबसूरत जैकेट है और साथ में एक नई अप्रकाशित कविता भी। मैं अपने इस साथी को बधाई देता हूँ। गीत की कविता अपने नितान्त नए और मौलिक मुहावरे में भारतीय समय, खासकर २००१ के बाद के समय, का एक अनोखा आख्यान रचती है और ऐसा करने के लिए उसे किसी अपेक्षाकृत बहुत लम्बे शिल्प की ज़रुरत कभी नहीं होती - यह गीत का अपना ख़ास हुनर है, मैं ख़ुद अपने लिए भी जिसकी कामना तो बहुत करता हूँ पर जो मेरे पास नहीं है...इस पीढ़ी में शायद किसी के पास नहीं है....

मुद्रा-स्फीति

दौड़ते दौड़ते उन स्टेशनों तक पहुंचा जहां ट्रेनें इन्तज़ार नहीं करतीं
पहुंचा तो लोगों को इन्तज़ार करते देखा
देखता रहा ट्रेनें मुझे लोगों की तरह दिखीं लोग ट्रेन की तरह

पुल की रेलिंग से दो बच्चे झुके हैं चीखते हुए बाय
झुके हैं क्योंकि बहुत छोटे हैं
उचकते हुए झुका जा सकता है ऐसा बड़प्पन भरा ख़याल आया
क्या करूं ये बड़प्पन जाता ही नहीं जैसे मुंहासों से बने छोटे सुराख़

मैले कपड़ों वाले एक आदमी को खोज रहा था
सोचिए, कपड़ों का मैला होना ख़त्म हो जाए
तो कितने प्रतीक यूं ही निकल जाएंगे जीवन से

अच्छा, आप असहमत हैं? लोग अक्सर रहते हैं मुझसे
जब कह देता हूं, इन दिनों
सहवासों को नहीं सहमति को सन्देह से देखो
सन्दिग्ध होने से डरता हूं तो साहस खो देता हूं
सिर झुका कहता हूं अपने शब्द मानो किसी और के
मूर्ख होना मंज़ूर करता हूं
सन्दिग्ध अक्सर बच निकलते हैं

तभी शोर हुआ चोर चोर चोर मेरे सामने वाले ने कहा सारे लोग चोर
मैं बेहद शर्मिन्दा हुआ दो चोर एक-दूसरे के सामने बैठे हैं
मैंने कहा- नहीं जिसे 'चाय पियोगे- नहीं' वाले नहीं की तरह लिया गया जबकि
मेरा नहीं सिर्फ़ मेरा नहीं नहीं है; लो, आप फिर असहमत हैं!

चलिए, मैंने हाथ जोड़कर नमस्कार किया
इस राजनीतिक हिम-युग में काइयांपन की निशानी कहा उन्होंने इसे

मैं इसे मुद्रा-स्फीति जैसा इन दिनों चर्चित एक शब्द देता हूं
***

Sunday, February 7, 2010

I, Too, Sing America

फरवरी माह अमेरिका,कनाडा और ब्रिटेन में ब्लैक हिस्ट्री मन्थ के तौर पर मनाया जाता है. 1926 में नीग्रो हिस्ट्री वीक के रूप में शुरू हुए इस दस्तूर की प्रासंगिकता और उपादेयता पर हाल के वर्षों में सवाल भी उठाये गए हैं.अनुनाद इस मौके पर याद कर रहा है हार्लम रेनेसांस के बड़े कवि लैंग्स्टन ह्यूज को, उनकी इस कविता के मार्फ़त. इस रचना के बारे में कुछ कहना उतना ही गैरज़रूरी लगता है जितना इसका हिन्दी अनुवाद करना.



I, too, sing America

I, too, sing America.
I am the darker brother.
They send me to eat in the kitchen
When company comes,
But I laugh,
And eat well,
And grow strong.

Tomorrow,
I'll be at the table
When company comes.
Nobody'll dare
Say to me,
"Eat in the kitchen,"
Then.

Besides,
They'll see how beautiful I am
And be ashamed--

I, too, am
America.

**********

Thursday, February 4, 2010

एक छूटा हुआ मकान - विजय कुमार

अग्रज कवि विजय कुमार का नाम समकालीन कविता और कवितालोचना में एक विशिष्ट, महत्वपूर्ण और ज़रूरी नाम है। विजय कुमार जी ने अपने सतत् अनुवादकर्म से विदेशी कविता और समालोचना को जानने-पहचानने की समझ भी हमें दी है। उनकी कविताएं हमारे भग्नावशेष समय में एक समूची और मुकम्मिल बात कहने का धीरज धरती हैं, जिसके लिए पाठक के मन में एक अनिवार्य सम्मान तुरत जागता है। प्रस्तुत कविता पहली बार विपाशा के 89 वें अंक में छपी और अब यहां.... अनुनाद पर विजय जी पहली बार छप रहे हैं, अनुनाद परिवार आभार ज्ञापित करते हुए उनका स्वागत करता है।


एक छूटा हुआ मकान

नए-नए बसते मोहल्ले में
वह एक उम्रदराज़ मकान है छोटा-सा
बन्द
अपनी अन्तिम सांसे गिनता हुआ
क्यों इसे घूरती रहती हैं
आसपास खड़ी ये गगनचुम्बी इमारतें ?

मैं प्रतिदिन गुज़रता हूँ इस राह
प्रतिदिन बुलाती है एक पुरानी दुनिया
बुलाते हैं
दालान, खम्भे, दरवाज़े, खिड़की का एक पल्ला
कब्ज़े से लटका हुआ
अब गिरा अब गिरा
काठ की एक झुकी हुई शहतीर
टूटे हुए जंगले
और एक शालीन ख़ामोशी

एक गिलहरी
इस मकान की पलस्तर उखड़ी दीवारों पर
वहां उस ओर ज़ख़्म की तरह झांकती हुई ईंटें
कौन कब आया पिछली बार यहां
ये उसके जूतों के निशान
दहलीज़ की धूल पर अब भी
दरवाज़े के सूराखों में
उसकी आहट बसी हुई है

नीम अंधेरे में
कौन टोह लेता हुआ
रोशनदान के मैले शीशे से
यह पाइप पर चढ़ी हरे-हरे पत्तोंवाली एक नटखट बेल
या उन बैंगनी फूलों का धीरज
या एक चिड़िया की छोटी-सी उदास देह
कमरे में थोड़ा-सा शोर मचा लेती हुई

ज़ंग खाया यह पुराना ताला
यह अभी भूला नहीं है खुलना
यह अभी भी एक चाबी के इन्तज़ार में
यह आरामकुर्सी यहां मरियल-सी
इसकी चरमराहट में
अटकी हुई है किसी की एक आख़िरी हिचकी
एक बन्द घड़ी दीवार पर
प्रार्थना में हाथ जोड़े हुए पलंग के पैताने
और दीवार पर यह शीशा
किसी बीते समय से कानाबाती करता हुआ
यह गुसलख़ाने का नल
यह जो सूख गया बरसों पहले
फ़र्श पर इसके बूँद -बूँद टपकने का
अलौकिक धीरज अब भी

छत की सीढ़ियों से
चांदनी रात
यह क्यों उतरती है यहां
एक शर्मीली लड़की-सी दबे पांव
क्या अब भी
दादी-मां की कहानियां सुनते-सुनते
आंख मूँद लेती है ?

जो लोग रहे यहां
उनकी छांव यहां
दुनिया के शोर से घिरी हुई
स्वप्न में एक चित्र-सी रची हुई
शामिल होने मुझे बुलाती है हर रोज़

नहीं बीता कुछ भी नहीं
बीतेगा कुछ भी नहीं
सिर्फ़ हम बीत जायेंगे
वहां अब भी बचे रहने की
कोई जुगत
भीतर तमाम धड़कनें
अनटूटे स्वप्न
सारे मौसम
अच्छे-बुरे की अनगिन स्मृतियां
बहस मुबाहिसे
कुछ फ़ैसले जो हुए या नहीं हुए
कुछ समाधान जो मिले या नहीं मिले
भीतर अब भी थोड़ा-सा प्रेम
जो उलझता रहा क़दमों से
कुछ इच्छाएं
जो ख़त्म नहीं हुईं कभी भी

यहां से गुज़रते
मैं किसी दिन आऊंगा यहां
मैं आऊंगा
लेकिन आगन्तुक-सा नहीं
किसी हड़बड़ी में नहीं
मैं आऊंगा
और दरवाज़ा खुलेगा
और उम्मीद है
कौन है? कौन है? कौन है? का शोर उठेगा नहीं भीतर से।
***

Tuesday, February 2, 2010

मैंने सुना - लाल्टू की एक कविता




मैंने सुना


बेटी आठवीं में आ गई है उन्होंने कहा

देखते-देखते दसवीं में चली जाएगी उन्होंने कहा

एक दिन विदा हो जाएगी.


यह कविता क्यों है आलोचक डाँटेंगे

इसमें कौन सी छोटी बात बड़ी बनती है

इस टिप्पणी पर तुम कहोगे

नहीं-नहीं बात छोटी बड़ी की नहीं कविता की है.


बात कविता की है फिर कहूँ

उन्होंने कहा बेटी एक दिन विदा हो जाएगी

मैंने सुना.


****


(मार्सेल ड्यूचैम्प की तस्वीर 'बाइसिकल व्हील' म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट्स, न्यू योंर्क की वेब साईट से साभार)

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